Amrit Dhara - Dhyanyogi Omdasji

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मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

वैकुण्ठ एकादशी

 यह (वैकुण्ठ एकादशी) भारत के अधिकांश उत्सवों में से एक है और गहरी अध्यात्मिक महत्ता रखता है । यह पौष हिन्दू चन्द्र मास के शुक्ल पक्ष का 11 वाँ  दिवस होता है और यह अगला दिवस - 5 जनवरी 2012 है । पौष मास अध्यात्मिक अभ्यासों को समर्पित होता है । वैकुण्ठ एकादशी  का अनुपालन उपवास रखना और पूजा करना हमें मोक्ष या आजादी का आशीर्वाद प्राप्त करने में सहायता देता है । इसलिए इसे "मोक्षदा एकादशी" भी कहा जाता है । 
                                                    
पदम पुराण - हिन्दू प्रथा के सबसे प्राचीन एवं पवित्र ग्रंथों में से एक - मूरण  नामक दानव की एक कथा एवं उसके द्वारा किये गए देवताओं के उत्पीडन को बताता है । भगवान् शिव ने देवताओं को भगवान् विष्णु की सुरक्षा को ढूँढने का निर्देश दिया । भगवान् विष्णु ने एक लम्बी एवं दुखद लड़ाई दानव मूरण से लड़ी लेकिन उसको हराने में असफल हुए । इसलिए भगवान् ने बद्रीनाथ में हिमावत नामक गुफा में शरण ली जहाँ वे दानवों के विरुद्ध नये हथियारों का निर्माण करने के लिए योगिक अल्प निद्रा में गये । मूरण ने उस स्थान पर भगवान को सोते हुए पाया और उनपर आक्रमण कर दिया । भगवान् में स्त्रीत्व उर्जा या भगवान् की शक्ति प्रज्वलित हो गई और मूरण मात्र देखने से भस्म हो गया । स्त्रीत्व उर्जा एकादशी नामक थी । जब भगवान् द्वारा उसे (एकादशी) को वरदान दिया गया, तो उसने मार्ग दिखाया कि जो लोग भगवान् की रात दिन पूजा अर्चना करते हैं, उपवास रखते हैं और उस दिन भगवान् के मन्दिर  का दर्शन करते हैं, वैकुण्ठ या भगवान् के सबसे ऊँचे निवास के लिये अतिरिक्त आशीर्वाद प्राप्त करते हैं । 
                    
उपवास रखना एवं पूजा अर्चना करना वैकुण्ठ एकादशी का एक अभिन्न हिस्सा होता है । उपवास दोपहर के भोजन के बाद के पूर्व दिन से आरम्भ होता है और पूजा अर्चना वैकुण्ठ एकादशी के बाद पूरे दिन की जाती है । पूजा करने वाले भगवान् के नाम का भजन करते हुए सम्पूर्ण रात्रि जागरण करते हैं और ब्रम्ह मुहूर्त में मंदिर दर्शन हेतु जाते हैं । मंदिर में प्रवेश पर वे एक अलंकृत द्वार से गुजरते हैं जो वैकुण्ठ के प्रवेश जैसा प्रतीकात्मक द्वार होता है । 
                         
वैकुण्ठ एकादशी की महान अध्यात्मिक महत्ता है । आत्मबोध या सर्वोच्च के सबसे ऊँचे स्थान के लिए प्रवेश केवल तभी संभव होता है जब कोई अपने अन्दर के नकारात्मक अवगुणों पर नियंत्रण पा लेता है और मस्तिष्क ईश्वर के लिए प्यार और शांति से परिपूर्ण होता है । दानव मूरण मनुष्य में राजसी एवं तामसी गुणों का प्रतीक माना जाता है । ये अवगुण क्रोध नुकसान, अभिमान,आसक्ति , लालच और ईर्ष्या होते है । इन अवगुणों पर नियंत्रण पा लिया जाता है या नष्ट कर दिया जाता है  और स्वयं में सात्विक गुण मोक्ष या आत्मबोध को प्राप्त करने के लिए स्पष्ट हो जाते हैं ।
                    
आत्मबोध को स्थिर एवं पवित्र मन की आवश्कता होती है । मन को स्थिर करने के लिए, मस्तिष्क का अवलोकन करना पड़ता है । हमें जागरूकता के परिक्षेत्र में होना और स्वयं का निरिक्षण करना चाहिए । यह केवल तभी संभव होता है जब मस्तिष्क की नकारात्मक उर्जाएँ नष्ट हो जाती हैं  और मस्तिष्क की सकारात्मक उर्जाएँ बलवती एवं स्पष्ट हो जाती हैं । उपवास में - क्रमबद्ध रूप से  - चावल जैसे आहार न ग्रहण करना महत्वपूर्ण होता है क्योंकि ऐसे आहार मस्तिष्क को शिथिल बनाते हैं । सम्पूर्ण रात्रि जागरण और भगवान् के नाम का जाप हमें जाग्रत और सचेत बनाता है । जब हम शान्त एवं स्थिर मन से मन्दिर में प्रवेश करते हैं, वास्तविक दर्शन स्थान ग्रहण करता है और आत्मबोध की सम्भावना बढ़ती  है । 
                                                                               
अध्यात्मिक अभ्यास उत्सव के पूर्व दिन से आरम्भ होकर दूसरे दिन तक करने के लिए निश्चित किया जाता है, यह सन्देश देने के लिए कि जाप का पवित्र अभ्यास पवित्र पुस्तकों का पाठन, मंत्र ध्यान  और स्वयं को जाग्रत रखने का नियमित सम्पूर्ण जीवन का अभ्यास मोक्ष या आत्मबोध को प्राप्त करने के लिए करना चाहिए । क्योंकि शान्त एवं स्थिर मस्तिष्क रातोंरात कुछ समय के जप या ध्यान से प्राप्त नहीं होता है । 
                 
जो ब्रहमाण्डीय ऊर्जा वैकुण्ठ एकादशी के दिन वातावरण में बहती है, अध्यात्मिक अभ्यास के लिए प्रेरक होतीं हैं । इस दिन सीता राम मन्त्र का अभ्यास और ध्यान स्वयं के अन्दर और भौतिक मंदिर में भी ईश्वर का दर्शन हमें भारी पुरस्कार के रूप में आशीर्वाद देगा । इस दिन एवं प्रत्येक दिन सीता राम मंत्र आपको आशीर्वाद दे ।