ध्यानयोगी मधुसूदन दास जी महानतम पैदा हुए परमयोगियों में से एक थे उन्होंने लगभग पचास वर्षों तक तपस्या की और स्वयं को पूर्ण किया । सार्वभौमिक शक्ति, शक्तिपात का वरदान और अन्य आशीर्वाद उन्हें प्राप्त हुए । यह परमगुरु करुणा के महासागर थे, उन्होंने मानवता को कष्ट सहते हुए उनकी पीड़ा एवं दुःख को देखा । उन्होंने उन सबको शक्तिपात देने का निश्चय किया जो उनके पास आये और उसे माँगा । उन्होंने जिज्ञासु की राष्ट्रीयता , जाति , पंथ, लिंग को नहीं देखा । उन्होंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि अमुक व्यक्ति शक्तिपात के आशीर्वाद को प्राप्त करने के योग्य या अयोग्य है । केवल इतना ही पर्याप्त होता था कि उस व्यक्ति की ईश्वर के प्रति ललक हो और उसने शक्तिपात के लिए कहा हो । अध्यात्मिक जगत में यह नवीन मील का पत्थर होता था जहाँ एक व्यक्ति को इतनी सरलता से शक्तिपात दिया जाता था । अतीत में लोगों ने कई वर्षों तक कठोर साधनाएं एवं तपस्या की तब उनको गुरुओं द्वारा शक्तिपात प्रदान किया गया ।
ध्यानयोगी मधुसूदन दास जी परमहंस थे वे सदैव अनंत शक्ति से एकाकार थे , फिर भी इस जगत के थे । वे स्वयं में श्री राम थे । वे बहुत मधुर बोलते थे और क्षमादान करते थे । वे अपने संपूर्ण जीवन काल में कई लोगों द्वारा कष्टित एवं अपमानित हुए । उन्होंने सभी को क्षमा किया और अपने शांत मुस्कराहट भरे मार्ग में सतत लगे रहे । उनका अध्यात्मिक कद ऐसा था कि जब उन्होंने सीता राम मंत्र का जाप किया हनुमान जी उनके सामने प्रकट हुए और उन्होंने हनुमान जी से एकांत में वार्तालाप किया । हनुमान जी ने उन्हें नियमित दर्शन दिए और उन्हें वह मार्ग बताया जिससे हम एक दुसरे से मिलते एवं वार्तालाप करते रहें । गुरु जी से निकली हुई तरंगें दुर्लभ थीं । जिन्होंने एक बार भी उनका दर्शन किया, अत्यधिक लाभान्वित हुआ ।
कई लोगों ने जिन्होंने उनका गलत विचारधारा, नकारात्मक दृष्टिकोण और नकारात्मक तरंगों सहित दर्शन किया वे यह जानने के अयोग्य हुए कि वे क्या थे । उन्होंने दर्शन नहीं प्राप्त किया और लाभान्वित नहीं हुए । आशीर्वाद जो एक महान साधू से बहता है, उन्हें प्राप्त नहीं हुआ । लघु परिपथ गुरु जी में नहीं था बल्कि उनमें था जो उनके दर्शन हेतु आये थे ।
आज हम इस महान गुरु के सम्मान में उनके एक सौ तैतिसवे जन्मोत्सव पर नमन करते हैं । उनका आशीर्वाद सदैव हम लोगों के साथ बना रहे ।