मन्त्र का जाप ईश्वर में समर्पण को बढाने के सबसे आसान मार्गों में एक है । यह साधारण होता है और यह कोई अधिक कीमत या प्रक्रिया को शामिल नहीं करता है । गुरु द्वारा प्राप्त मन्त्र का जाप दिए गए निर्देशों के अनुसार किया जाता है और मन्त्र का आशीर्वाद बहता है । भगवत गीता में, भगवान योगेश्वर श्री कृष्ण- विभूति योग अध्याय में कहतें हैं :- " योग एवं जाप में मैं ही हूँ "
द्रौपदी, जिन्होंने महाभारत में पाँच पांडवों से विवाह किया था, पंच महा कन्याओं में से एक थीं । वह शक्ति स्वरूपा (शक्ति का अवतार ) थीं और उनको पापों से छुटकारा पाने के लिए प्रत्येक प्रातः याद करने का अनुमोदन किया जाता है । ऐसी उनकी शुद्धता एवं भक्ति थी । द्रौपदी श्री कृष्ण में गहरा अध्यात्मिक लगाव रखती थी, वह (लगाव ) भगवान द्वारा पूर्णरूप से प्रतिफल में चुकाया हुआ था । वे ऐसे भक्त और भगवान थे । श्री कृष्ण के प्रति द्रौपदी का प्रेम इतना मजबूत था कि श्री कृष्ण उनके व्यक्तिगत रक्षक उनके अपने जीवन की सभी विपदाओं और अशांतियों में हुए ।
एक राज कुमारी होकर और बाद में एक रानी होकर , द्रौपदी के पास विशाल उत्तरदायित्व एवं कर्त्तव्य थे । वे और उनके पति सदैव अपने चचेरे भाइयों, कौरवों द्वारा निशाना बनाये जाते थे । उनके परिवार को ज़मीन जायदाद के कारण कपट वध , मानहानि , अपदस्थ और निर्वासन के लिए कष्ट सहना पड़ा । इन सभी राजनितिक हलचलों एवं समस्याओं में भी , द्रौपदी सदैव श्री कृष्ण के प्रति हृदय एवं मस्तिष्क से समर्पित थीं और पूरा दिन उन्हें याद करके अपना कार्य करती थीं । और श्री कृष्ण भी जब कोई संकट होता था प्रत्येक समय उनके बचाव में त्वरित प्रतिफल देते थे ।
सुभद्रा, श्री कृष्ण की बहन द्रौपदी से इर्ष्या करती थीं । वह जानती थीं की उनके भाई द्रौपदी से कितना प्रेम करते हैं । श्री कृष्ण भी द्रौपदी को अपनी बहन मानते थे । वह नहीं समझ सकी की श्री कृष्ण द्रौपदी से इतना प्रेम क्यों करते थे और द्रौपदी ने श्री कृष्ण से ऐसा प्रेम पाने के लिए क्या किया । श्री कृष्ण इस इर्ष्या को जानते थे और उन्होंने सुभद्रा को सबक सिखाने का निश्चय किया । एक बार जब द्रौपदी श्री कृष्ण दर्शन में थीं , श्री कृष्ण ने सुभद्रा को उनके (द्रौपदी) के केशों को सुखाने में सहायता के लिए और उनके कक्ष में जाने के लिए कहा क्योंकि उन्होंने थोड़ी देर पहले अपने केशों को धोया था ।सुभद्रा ने लटों को सुलझाने के लिए कंघी उठाई । जैसे ही उन्होंने केशों को कंघी किया, उन्होंने द्रौपदी के सिर पर प्रत्येक केशों को कृष्ण-कृष्ण का भजन करते हुए अनुभव किया । तब सुभद्रा को ज्ञात हुआ कि द्रौपदी का कितना समर्पण था और द्रौपदी श्री कृष्ण से कितना प्रेम करती थीं और क्यों उनके भाई उनसे इतना प्रेम करते थे । और इस प्रकार सभी संकीर्ण हृदयता एवं ईर्ष्या उनके मानस पटल से नष्ट हो गयीं ।
सीता राम मंत्र का जाप दो प्रकार से किया जाता है - आसन पर बैठकर और अपने दैनिक कार्यों को करते हुए चारों और भ्रमण करते हुए | कृपया मन्त्र का जाप टहलने, बातचीत करने, बैठने, खाना पकाने, नहाने, खाने, सोने, बुलावे की प्रतीक्षा करने, कम्प्यूटर इत्यादि पर कार्य करने के दौरान करें । इस प्रकार आप पवित्र नाम पर आसानी से अपने मस्तिष्क के एक हिस्से से बहुआयामी हो सकते है । नाम की तरंगें आपको सुरक्षित रखेंगी और आपको हर समय सर्वोच्च शक्ति से जोड़े रखेंगी । यह आसानी से सम्भव हो जाता है । अब यह केवल स्वयं को ध्यान दिलाने का प्रकरण हो जाता है और तब इस प्रकार नाम का जाप करना भी एक आदत और दूसरी प्रकति हो जाती है । यदि द्रौपदी , अपने सभी उत्तरदायित्वों, कर्तव्यों और समस्याओं सहित हर समय श्री कृष्ण को याद कर सकती थीं तो हम ऐसा आसानी से क्यों नहीं कर सकते हैं ।