Amrit Dhara - Dhyanyogi Omdasji

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बुधवार, 17 अप्रैल 2013

आश्रयदाता एवं अन्नदाता - एक ऐतिहासिक कहानी

मनुष्य  अहंकारी होता है  । वह सोंचता है कि वही केवल अकेला है जो सबकुछ करता है । वह सोंचता है कि यह उसके कारण होता है, उसका परिवार खाता एवं फलता फूलता है । वह अडिग विश्वास रखता है कि संपूर्ण संसार उसके चारों ओर घूमता है । 
                         
जीवन मानव से पहले पृथ्वी पर अस्तित्व में आया । पेड़, पौधे, फूल, फल, कीड़े-मकौड़े, मछली, पक्षी हर जगह थे । प्रक्रति ने प्रत्यॆक जीवित प्राणी को भोजन, पानी और आश्रय उपलब्ध कराया । लेकिन जब मनुष्य आया, उसने अन्य दूसरे प्राणियों पर स्वामित्व और नियंत्रण करना आरम्भ कर दिया । उसने यह भ्रम पाला कि वह सबका राजा  है । जिनकी वह निगरानी करता है और वह सभी अनुयायी प्राणियों को भोजन एवं आराम देने वाला और उनकी देखभाल करने वाला है । 
                                                  
कई लोग जो थोड़े या अधिक अधिकारों में निहित होतें है, सोंचते हैं कि वे मानवता के देखभाल करने वाले हैं । राजा या शासक, राष्ट्रपति एवं मंत्री, स्थानीय महापौर और आरक्षक और पारिवारिक व्यक्ति- सभी सोंचते है कि वे मानव एवं मवेशियों के अन्न दाता है । जबकि वे कार्य एवं अपने दायित्वों को निभाते हैं । वास्तव में भोजन एवं जल उपलब्ध कराने का कार्य प्रकृति द्वारा स्वयं किया जाता है । जैसे ही मनुष्य का अहंकार बढ़ता है , वह ईश्वर को भूल जाता है और सोंचने लगता है कि वह स्वयं ईश्वर है । 
                                                                                                                   
महान गुरु मनुष्य को सिखाते हैं कि वह सृजनकर्ता या अन्नदाता नहीं है , बल्कि ईश्वर है । वे मनुष्य के अहंकार का दमन करते हैं और ज्ञानरुपी प्रकाश का मार्ग दिखाते हैं । ऐसे ही एक गुरु श्री स्वामी रामदास जी- वीर शिवाजी महाराज के सद्गुरु थे ।  एक बार जब शिवाजी एक किले में थे जो निर्माणाधीन था, श्री स्वामी राम दास जी वहां पहुंचे । उन्हें देख कर शिवाजी ने एक बहुत ऊँचे कद के गुरु के लिए आभार प्रकट किया । जैसे ही शिवाजी ने श्री स्वामी रामदास जी को किये हुए कार्यों को दिखाते हुए चारों ओर भ्रमण किया, शिवाजी में अहंकार की भावना आ गई कि वह राजा हैं एवं वह आश्रयदाता एवं अन्नदाता हैं । श्री स्वामी रामदास जी ने शिवाजी में उठी हुई इस भावना को पढ़ लिया । उन्होंने देखा कि शिवाजी स्वयं में उच्चकोटि का गुण रखतें हैं और हिन्दू धर्म एवं अपनी जनता के लिए बहुत से अच्छे कार्य कर सकते हैं यदि उन्हें उचित मार्गदर्शन दिया जाये । उन्होंने शिवाजी के अहंकार को तोड़ने का निश्चय किया और जीवन के सत्य को दिखाने का निश्चय किया - कि ईश्वर अन्नदाता हैं और मानव उसके सम्मान का प्राप्तकर्ता  है । भ्रम सम्मान प्राप्त करने की मानव क्षमता का दमन करता है । 
                                            
श्री स्वामी रामदास जी ने एक सुनियोजित चट्टान को वहां के कार्यकर्ताओं में से एक को तोड़ने का आदेश दिया । जब चट्टान दो भागों में टूट गई, उसके अन्दर एक गड्ढा था । और एक मेंढक कूद कर बाहर आया । गड्ढे के अन्दर मेंढक के लिए जल एवं भोजन था " शिवा इस मेंढक को देखो " उन्होने कहा ।  यह तुम्हारी सुरक्षा के कारण पोषित हुआ है तुमने इस मेंढक को भी अन्न दिया है ।  तुम वास्तव में एक महान राजा हो । शिवाजी के मस्तिष्क में उचित समझ एवं शर्म महसूस हुई । उन्होंने अपनी पगड़ी उतारी और उसे अपने संपूर्ण राज्य सहित महान गुरु को समर्पित कर दिया । इसके बाद शिवाजी ने अपने राज्य पर इन यादगार वचनों सहित शासन किया कि वे केवल एक निमित्त मात्र हैं लेकिन ईश्वर आश्रयदाता एवं अन्नदाता हैं । 
                                                                                                                        
शिवाजी की तरह बनिए । ईश्वर  के हाँथ का एक निमित्त मात्र बनिए । ईश्वर को हर समय याद करिए । हर समय सीताराम को अपने अन्दर स्पंदित रखिये । जब आप इस तरह से रहते हैं, आप अपना सर्वश्रेष्ठ और अधिकाधिक निष्पादन देंगे और इन सबका परिणाम सर्वॊच्च  शक्ति द्वारा तय किया हुआ होगा ।