नववर्ष की पूर्व संध्या पर, हमें स्वयं का आत्मनिरीक्षण करना चाहिए । हमें देखना चाहिए कि हम कौन हैं और हम कहाँ जा रहे हैं । हमें उचित दिशा में अपने जीवन के पथ पर चलना चाहिए ।
आप सब दिव्य प्राणी हैं । आप दिव्य स्रोत से आते हैं । आप संक्षिप्त ठहराव के लिए यहाँ आये हैं और आप अपने दिव्य प्रकृति एवं दिव्य घर में वापस जाएँगे । प्रथ्वी पर यौन आनन्द का जीवन जीते हुए मात्र एक मनुष्य होकर स्वयं को नीचा न दिखाइये ।
इस ब्रह्माण्ड में 10,000 लोक हैं । उनमे से सबसे ऊँचा वैकुण्ठ लोक भगवान् विष्णु का निवास है । आप में से जो सिद्ध सीता राम मंत्र का जाप करते हैं, इस लोक के पथ पर होते हैं । जिन्होंने कुण्डलिनी महा योग के शक्तिपात को लिया है और निष्ठावान गुरु भक्त हैं, निश्चित रूप से वहां पहुंचेंगे । आप सब इस प्रथ्वी पर कुछ समय के लिए ठहरने आये हैं ।
धरती के निवासी के रूप में, आपको यह याद रखना चाहिए कि आप केवल काल की संक्षिप्त अवधि के लिए यहाँ हैं । आप प्रथ्वी पर एक मेहमान हैं । जब आप किसी के घर पर एक मेहमान के रूप में ठहरते हैं , आपका व्यवहार सबसे अच्छा होता है । आपकी भाषा विनम्र एवं मधुर होती है । आप अपने रहने के क्षेत्र को साफ़ सुथरा रखते हैं । आप अपने मेज़बान की सम्पति की देखभाल करते हैं और उसकी वस्तुओं एवं परिवेश को दूषित या नष्ट नहीं करते हैं ।
प्रथ्वी पर थोड़े समय के लिए एक मेहमान के रूप में, हमे इस संसार में प्रदत्त उपहारों की देखभाल करनी चाहिए। हमे अपनी धरती माता का सम्मान करना चाहिए और उन्हें दूषित या नष्ट नहीं करना चाहिए । हमे हवा एवं पानी का उचित उपयोग करना चाहिए । ये अमूल्य उपहार हैं जो प्रथ्वी पर हमारे जीवन को सहायता एवं सहयोग देते हैं । प्रकृति माता एवं प्रथ्वी हमे हमारी आवश्यकनानुसार पर्याप्त देती हैं । लेकिन जो भी उपहार वह लुटाती है हमारे लालच के कारण पर्याप्त नहीं होते हैं । हमारी लालच इन उपहारों को अधिकाधिक उपयोग करने के लिए बाध्य करती है । हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि केवल हम ही अपने परिवेश के दीघ्रगामी प्रभावों या दूसरों के आवश्यकताओं को देखे बिना प्रकृति के उपहारों का अधिकाधिक लाभ प्राप्त करें ।
हिन्दू प्रथा हमें सम्पूर्ण प्रकृति को ईश्वर के रूप में सम्मान करना सिखाती है । पृथ्वी भू-माता या धरती माता है जो एक सजीव देवी और सबकी माँ हैं । सूर्य सूर्यदेव हैं जो गर्मी, प्रकाश और आभा सबके लिए फैलाते हैं । हवा वायु देवता है जो पृथ्वी पर सभी के लिए जीवन दायिनी साँस है । जल वरुण देवता हैं जिनकी अमृतयुक्त बूँदें जीवन दायिनी होती हैं । वृक्षों की पूजा की जाती है और सभी फूल, पत्तियां, फल पूजा में प्रयोग किये जाते हैं और इस प्रकार सम्मानित किये जाते हैं । संपूर्ण प्रकृति श्रद्धेय है । जब ऐसे सम्मान प्रदर्शित किये जाते हैं और प्रक्रति की पूजा की जाती है, संसाधनों का उचित उपयोग होगा और सभी की आवश्यकतायें पूर्ण होंगी ।
हमें प्रकृति के पूजन के इन सिद्धांतों को वापस पाने की आवश्यकता है, यह सुनिश्चित करने के लिए कि पृथ्वी एवं उसके उपहारों का उचित उपयोग हो और न कि वे प्रदूषित, दुश्पयोगी और बर्बाद हों ।
ओ दिव्य प्राणी, यहाँ पृथ्वी पर रहते हुए याद रखो कि तुम मेहमान हो और जो कुछ तुम्हें प्रदान किया गया है, उसका उपयोग उचित प्रकार से करो और जो कुछ दिया गया है उसको सब में बाँटो । यह उचित दृष्टिकोण अपने बच्चों की भी सिखाओ । कृतज्ञता का रवैया और उपहारों एवं प्रस्तावों का उचित उपयोग अधिकांशतः एक मेहमान का स्वीकार्य व्यवहार होता है ।