Amrit Dhara - Dhyanyogi Omdasji

Amrit Dhara - Dhyanyogi Omdasji

सोमवार, 1 अप्रैल 2013

भय सुधार की कुंजी है


आदमी सामान्यतः अपने परिवार के प्रति अच्छा, कर्तव्यनिष्ठ, और प्रिय होता है । वह स्वयं, अपने रिश्तेदार , समाज, और राष्ट्र का खयाल  रखता है । उससे जो आशा की जाती है वह उसे पूरा करने का प्रयास करता  है    
             
जब स्वयं में सुधार की और स्वयं रूपांतरण की बात आती है, आदमी जानता  है की उसके लिए क्या अच्छा है  लेकिन वह अपनी भावनाओं पर शायद ही क्रियान्वयन  करेगा । स्वास्थ्य के लिए जीवन शैली में बदलाव भी बहुत मुश्किल होता है क्योंकि आदतें बहुत नियमित होती है और मस्तिष्क उस नियमितता को बदलने के लिए मना करता है । वह जानता है कि व्यायाम उसके लिए अच्छा होता है , फिर भी वह नियमित टहलने में कठिनाई महसूस करेगा । तब भी जब चिकित्सक स्वास्थ्य के प्रति सावधान होने एवं भोजन पर नियंत्रण करने के परिप्रेक्ष्य में चेतावनी देता है, मनुष्य फिर भी स्वयं को बदलने में कठिनाई महसूस करेगा । इससे मानव को क्षय और दर्द की पुनरावृत्ति होने लगती है, यह जानने के लिए कि उसे स्वयं में बदलाव करना चाहिए । कभी-2 यह अपनी आदतों एवं मानसिकता में बदलाव के लिए मृत्यु की धमकी भी देता है । भय अच्छा होने के लिए कुंजियों में एक कुंजी है ।
                                                                                 
मित्र एवं परिवार से सम्बन्धो में भय पुनः अच्छे व्यवहार एवं और बेहतर होने का केंद्र बिंदु है । हम लोग अपने माता पिता, भाई, बहन, पति, पत्नी, प्रेमिका, मित्र इत्यादि के प्यार को खोने से डरते है । हममे से अधिकांश उचित कार्य करते है,  ताकि हम उन्हें प्रसन्न रख सकें  इसलिए नहीं की हम उचित कार्य करना चाहते है ।
                                        
अध्यात्मिक मार्ग में भी हम सब जानते है कि हमारे लिए क्या अच्छा है । फिर भी हम अपनी आदतों, मानसिकताओं और विचारों में परिवर्तन के लिए कठिनाई महसूस करते  है । हममे से अधिकांशतः  जानते है कि ईश्वर सर्वत्र व्याप्त हैं  । लेकिन उनका अनुभव  नहीं किया गया है । इसलिए मूर्खतावश हम अनुभव करते है जो वह नहीं जानता है , उससे उन्हें कष्ट नहीं पहुंचेगा  , या कि उससे हमे दुख नहीं होगा ।
                                    
केवल जब किसी के पास ईश्वर और गुरु का असीम प्यार होता है तब स्वेच्छा एवं ढंग से स्वयं  में परिवर्तन होता है । ईश्वर एवं गुरु से प्राप्त प्यार अविश्वसनीय रूप से अधिक मधुर होता है । ऐसे अद्भुत प्रेम एवं कृपा  को खोने का भय हमे सही मार्ग पर चलने के  लिए  प्रेरित करता है । इस बात का भय की यदि हम स्वयं में सुधार व बदलाव नहीं करते हैं तो यह कष्ट या  गुरु / ईश्वर के क्रोध का कारण हो सकता है या गुरु / ईश्वर की कृपा व प्रेम को खोने का भय हमे सही  और  धर्म के दुःखदाई मार्ग पर चलने के लिए  प्रेरित करता है  भय जो हम ईश्वर या गुरु के लिए रखते है, ईश्वर/गुरु के लिए हमारे प्रेम को बढाता है । यह हमे अधिक अच्छा शिष्य , अनुयायी  और भक्त बनाता है।

भय और भक्ति एक दूसरे से सम्बंधित होते है । और यह निश्चित रूप से स्वयं और जीवन में सुधार लाते  है । भय स्वयं में सुधार का कारक होता है ।