Amrit Dhara - Dhyanyogi Omdasji

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शनिवार, 23 मार्च 2013

सत्यम वाद, मधुरं वाद - सत्य बोलिए लेकिन मधुरता से


अच्छे रहने की प्रथम उक्तियों में से एक सत्य बोलना है । यह संसार के सभी धर्मों द्वारा सिखाया जाता है । सत्य ईश्वर  है । ईश्वर सत्य है । उसके लिए (ईश्वर के लिए ) सत्य है । सत्य कभी परिवर्तित नहीं होता है । अतः सत्य बोलने को  प्रोत्साहित किया जाता है ।         

सत्य बोलने के कई लाभ हैं । किसी को केवल सत्य याद रखना है । यह परिवर्तित नहीं होता है । कोई विभिन्न प्रकार के झूठ एवं सभी को बताये गए ' सत्य के संस्करणों ' को याद नहीं रखता है । एक व्यक्ति जो झूठ बोलता है उसे  विभिन्न बातें, विभिन्न लोगों को बोलने के लिए तेज़ यादाश्त की आवश्यकता होती  है ।
                                           
 कई लोग दो टूक सत्य बोलते है । कई बार सत्य दूसरे व्यक्तियों को नीचा दिखाने के लिए या उन्हें कष्ट पहुँचाने के लिए बोला जाता है । ऐसे सत्य को बोलने से पूर्व हम कहते है : " मैं आपको कुछ बताने जा रहा हूँ लेकिन इसके बारे में बुरा ना मानना " तात्पर्य है की मैं आपको कुछ बताने जा रहा हूँ जो आपको बुरा लगेगा ।
                                             
सत्य सदैव प्रेम एवं मधुरता से बोला जाता है । जब आप दूसरे  व्यक्तियों के लिए सम्मान रखते हैं, शब्द सदैव घृणा, विद्वेष या नीचा दिखाने की भावना के बिना बाहर आयेंगे । इस तरह से बोला गया सत्य दूसरों को प्रफुल्लित एवं परिवर्तित करने की शक्ति रखेगा । प्यार एवं सम्मान से बोला गया सत्य स्वयं में विनम्रता रखता है और इस प्रकार इसमें कोई विकार नहीं होता है । सत्य विनम्रता से बोला जाता है । " विनम्रता एवं सम्मान के द्रष्टिकोण के साथ सत्य बोलिए  ।
                                               
जब किसी के आचार और सिद्धांत प्रश्न में होतें है, सत्य  शक्ति, द्रढ़ता और आत्मविश्वास से बोला जाता है । सत्य को चिल्लाने की आवश्क्ता नहीं है । क्योंकि  सत्य स्वयं में शशक्त है ।
                                                
माता पिता हमें सत्य बोलना सिखाते हैं । लोकरूपों एवं घोषणाओं में सत्य की मांग है । इसलिए सत्य बोलना एक कानूनी बाध्यता एवं नैतिकता प्रतीत होता है । जहाँ बाध्यताएं होती हैं वहीँ समझ, धारणाओं एवं व्याख्याओं में भिन्नतायें होती हैं ।
                               
जब सत्य के लिए सत्य बोला जाता है तो इसका पालन करना आसान हो जाता है । यह व्यक्तिगत अभिरूचि  है और किसी पर बाध्यता नहीं है । इसलिए यह एक बाह्य बाध्यता या मजबूरी नहीं है । इसलिए सत्य बोलना अनुसरण एवं सहारा देने के लिए अधिक आसान हो जाता है । जब सत्य आदर एवं मधुरता से बोला जाता है , यह एक जीवन का मार्ग हो जाता है । इस तरह जीवनयापन करना हमारे आन्तरिक मूल्यों में परिपूर्णता जोड़ता है ।
                               
जबकि सत्य एक है, सत्य की समझ हमारी मनोदशा पर, पसन्द, नापसन्द और विकास एवं परिभाषा के स्तर से सराबोर होती है । " जो सत्य है " किसी दूसरे के द्वारा असत्य माना जा सकता है यदि उसके पास सम्पूर्ण जानकारी या समझ का अभाव होता है ।
                                                    
प्यार, सम्मान और नम्रता से बोला गया सत्य आत्म प्रकाश की चमक को बढाता है ।