Amrit Dhara - Dhyanyogi Omdasji

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शुक्रवार, 15 मार्च 2013

पौष मास का महत्त्व


पौष मास प्रारंभ हो गया है । यह 11 दिसम्बर 2011 से आरम्भ होता है और 9 जनवरी 2012 को समाप्त होता है । यह हिन्दू पंचांग में दसवां चंद्रमास है । हिन्दू परंपरा में , यह मास भौतिक कार्यों एवं उन्नति के लिए अशुभ माना जाता है । सामान्यतः कोई विवाह, यज्ञोपवीत समारोह, नवीन गृह प्रवेश इस   मास में नहीं होते हैं । इसका तात्पर्य है की यह मास अध्यात्मिक क्षेत्र में उन्नति के लिए मुक्त है । 
                          
पौष मास के अंतर्गत अध्यात्मिक उत्कृष्टता के लिए प्रयास कीजिये और भौतिक आवश्यकताओं पर प्रकाश डालिए । इस  मास में कई पर्व होते है जिनके अपने अध्यात्मिक मायने है । सकठ चौथ, पौष संक्रांति, सफल एकादशी, शनिश्चरी अमावस्या , वैकुण्ठ एकादशी, पौष पूर्णिमा, इस  मास के पवित्र दिवस हैं, इन दिनों में उपवास रखा जाता है और ईश्वर की आराधना की जाती है । दान भी किया जाता है । शाकम्बरी नवरात्री या पौष नवरात्री उत्तर भारत में मनाई जाती है । 
                          
आपको इस  मास का व्यक्तिगत अध्यात्मिक उत्थान के लिए उपयोग करना चाहिए । इस वातावरण में पवित्र तरंगों का उपयोग कीजिये और पर्वों को मनाइए एवं  स्वयं का उत्थान कीजिये