दर्शन का तात्पर्य देखना होता है । संस्कृत में दर्शन या दर्शाना का आशय देखना, दृष्टि या झलक होता है । यह वस्तु या व्यक्ति को देखना नहीं होता है । यह ईश्वरत्व की ही झलक होती है । इसका तात्पर्य गुरु या मूर्ति
(ईश्वर की आक्रति) को पूजा स्थल पर देखना है । दर्शन का प्रभाव मात्र देखने से दूर तक परे जाना होता है । दर्शन में कोई वार्तालाप या प्रार्थना नहीं होती है । इसमें मौन और संपर्क होता है । इसमें द्रष्टा एवं द्रश्य में, मनुष्य ईश्वर में , निर्माण एवं ईश्वरत्व में सम्बन्ध होता है । प्रारंभिक अवस्था में सम्बन्ध महसूस होता है । बाद की अवस्था में द्रश्य की समझ भाव की समझ का अनुसरण करती है और यह एक दृष्टि या झलक होती है । यह 'आत्म चेतना जो ईश्वर की चेतना सहित है ' से सम्बन्ध होता है । दर्शन से चेतना का विस्तार होता है ।
मन्दिर के सम्पूर्ण क्षेत्र में और विशेष रूप से वह क्षेत्र जहाँ ईश्वर की आकृति या मूर्ति रखी जाती है (गर्भगॄह), अधिक उच्च तरंगों से प्राण प्रतिष्टित की जाती है । हम जब मन्दिर जाते है, हम ईश्वर की मूर्ति को मौन रूप से ध्यान से देखते या देखते रहते हैं । एक संपर्क जुड़ जाता है जिससे हम पर ईश्वर की मूर्ति से एक आशीर्वाद बहता है । इस मौन में कई सत्य स्वयं में प्राप्त किये जाते हैं । ये सत्य जीवन, व्यक्तिगत समस्या, अधिक ऊँची अंतर्द्रष्टि, स्व एवं ईश्वरत्व के बारे में हो सकते हैं । और जब कोई दर्शन के लिए मन्दिर जाता है, यह आशीर्वाद हर समय प्राप्त होता है । उन्नत चरणों में, पूजा स्थल में होने का मात्र ध्यान आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पर्याप्त होता है । बाद के उन्नत चरण यथोचित समय में भी आशीर्वाद प्राप्त करने में परिणाम देते हैं जब पूजा स्थल का कोई दर्शन या ध्यान भी नहीं किया जाता है ।
दर्शन गुरु एवं शिष्य के बीच एक अंतरंग ऐक्य होता है । शिष्य गुरु से प्रसारित औरा में बैठता है । गुरु से उत्पन्न उर्जा शिष्य में उसकी विचार धाराओं एवं चेतना को ऊपर उठाते हुए प्रवेश करती है । जागरूकता के क्षेत्र का निर्माण होता है जिसमे गुरु से शिष्य में आशीर्वाद का आदान प्रदान होता है और वह ऊपर उठता है । शिष्य गुरु के औरा के प्रसारण में बैठते हुए और चक्र उनसे (गुरु से ) उत्पन्न प्रकाश प्राप्त करते हैं और गुरु के औरा से, जीवन के सत्य और निर्माण का आदान प्रदान शिष्य में होता है । काल चक्र से परे ज्ञान, ईश्वरीय सत्य, जीवन के सार्भौमिक सिद्धांतों का बिना प्रयास के शिष्य में आदान प्रदान होता है । इन सब को ईश्वरत्व से सीधे प्राप्त करना प्रायः कठिन होता है क्योंकि एक व्यक्ति पर्याप्त रूप से तैयार नहीं किया जा सकता है । इस प्रकार गुरु की उपस्थिति में सभी कमियों को गुरु द्वारा दूर करने में सहायता प्राप्त की जाती है और गुरु ईश्वरत्व एवं एक व्यक्ति में सेतु बांधता है ।
जब आप मन्दिर जायें या गुरु दर्शन हेतु जाए तो खुले दिल से जायें । अहंकार एवं बड़प्पन को किनारे रखें, गुरु या ईश्वर के सामने शांति से खड़े हो जायें और उनकी जादुई कृपा को अपने अन्दर कार्य करने दें । यह एक ईश्वर से स्वयं का पवित्र अनुभव होता है । उन्नति के प्रकाश में " पुराने रहस्योद्घाटनों को आपने बनाया है " को प्राप्त करने का एक सुअवसर होता है, आपकी वर्तमान वास्विकता, जो जीवन को अधिक तरोताजा सुन्दर एवं उन्नत बनाती है ।