Amrit Dhara - Dhyanyogi Omdasji

Amrit Dhara - Dhyanyogi Omdasji

मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

वैकुण्ठ एकादशी

 यह (वैकुण्ठ एकादशी) भारत के अधिकांश उत्सवों में से एक है और गहरी अध्यात्मिक महत्ता रखता है । यह पौष हिन्दू चन्द्र मास के शुक्ल पक्ष का 11 वाँ  दिवस होता है और यह अगला दिवस - 5 जनवरी 2012 है । पौष मास अध्यात्मिक अभ्यासों को समर्पित होता है । वैकुण्ठ एकादशी  का अनुपालन उपवास रखना और पूजा करना हमें मोक्ष या आजादी का आशीर्वाद प्राप्त करने में सहायता देता है । इसलिए इसे "मोक्षदा एकादशी" भी कहा जाता है । 
                                                    
पदम पुराण - हिन्दू प्रथा के सबसे प्राचीन एवं पवित्र ग्रंथों में से एक - मूरण  नामक दानव की एक कथा एवं उसके द्वारा किये गए देवताओं के उत्पीडन को बताता है । भगवान् शिव ने देवताओं को भगवान् विष्णु की सुरक्षा को ढूँढने का निर्देश दिया । भगवान् विष्णु ने एक लम्बी एवं दुखद लड़ाई दानव मूरण से लड़ी लेकिन उसको हराने में असफल हुए । इसलिए भगवान् ने बद्रीनाथ में हिमावत नामक गुफा में शरण ली जहाँ वे दानवों के विरुद्ध नये हथियारों का निर्माण करने के लिए योगिक अल्प निद्रा में गये । मूरण ने उस स्थान पर भगवान को सोते हुए पाया और उनपर आक्रमण कर दिया । भगवान् में स्त्रीत्व उर्जा या भगवान् की शक्ति प्रज्वलित हो गई और मूरण मात्र देखने से भस्म हो गया । स्त्रीत्व उर्जा एकादशी नामक थी । जब भगवान् द्वारा उसे (एकादशी) को वरदान दिया गया, तो उसने मार्ग दिखाया कि जो लोग भगवान् की रात दिन पूजा अर्चना करते हैं, उपवास रखते हैं और उस दिन भगवान् के मन्दिर  का दर्शन करते हैं, वैकुण्ठ या भगवान् के सबसे ऊँचे निवास के लिये अतिरिक्त आशीर्वाद प्राप्त करते हैं । 
                    
उपवास रखना एवं पूजा अर्चना करना वैकुण्ठ एकादशी का एक अभिन्न हिस्सा होता है । उपवास दोपहर के भोजन के बाद के पूर्व दिन से आरम्भ होता है और पूजा अर्चना वैकुण्ठ एकादशी के बाद पूरे दिन की जाती है । पूजा करने वाले भगवान् के नाम का भजन करते हुए सम्पूर्ण रात्रि जागरण करते हैं और ब्रम्ह मुहूर्त में मंदिर दर्शन हेतु जाते हैं । मंदिर में प्रवेश पर वे एक अलंकृत द्वार से गुजरते हैं जो वैकुण्ठ के प्रवेश जैसा प्रतीकात्मक द्वार होता है । 
                         
वैकुण्ठ एकादशी की महान अध्यात्मिक महत्ता है । आत्मबोध या सर्वोच्च के सबसे ऊँचे स्थान के लिए प्रवेश केवल तभी संभव होता है जब कोई अपने अन्दर के नकारात्मक अवगुणों पर नियंत्रण पा लेता है और मस्तिष्क ईश्वर के लिए प्यार और शांति से परिपूर्ण होता है । दानव मूरण मनुष्य में राजसी एवं तामसी गुणों का प्रतीक माना जाता है । ये अवगुण क्रोध नुकसान, अभिमान,आसक्ति , लालच और ईर्ष्या होते है । इन अवगुणों पर नियंत्रण पा लिया जाता है या नष्ट कर दिया जाता है  और स्वयं में सात्विक गुण मोक्ष या आत्मबोध को प्राप्त करने के लिए स्पष्ट हो जाते हैं ।
                    
आत्मबोध को स्थिर एवं पवित्र मन की आवश्कता होती है । मन को स्थिर करने के लिए, मस्तिष्क का अवलोकन करना पड़ता है । हमें जागरूकता के परिक्षेत्र में होना और स्वयं का निरिक्षण करना चाहिए । यह केवल तभी संभव होता है जब मस्तिष्क की नकारात्मक उर्जाएँ नष्ट हो जाती हैं  और मस्तिष्क की सकारात्मक उर्जाएँ बलवती एवं स्पष्ट हो जाती हैं । उपवास में - क्रमबद्ध रूप से  - चावल जैसे आहार न ग्रहण करना महत्वपूर्ण होता है क्योंकि ऐसे आहार मस्तिष्क को शिथिल बनाते हैं । सम्पूर्ण रात्रि जागरण और भगवान् के नाम का जाप हमें जाग्रत और सचेत बनाता है । जब हम शान्त एवं स्थिर मन से मन्दिर में प्रवेश करते हैं, वास्तविक दर्शन स्थान ग्रहण करता है और आत्मबोध की सम्भावना बढ़ती  है । 
                                                                               
अध्यात्मिक अभ्यास उत्सव के पूर्व दिन से आरम्भ होकर दूसरे दिन तक करने के लिए निश्चित किया जाता है, यह सन्देश देने के लिए कि जाप का पवित्र अभ्यास पवित्र पुस्तकों का पाठन, मंत्र ध्यान  और स्वयं को जाग्रत रखने का नियमित सम्पूर्ण जीवन का अभ्यास मोक्ष या आत्मबोध को प्राप्त करने के लिए करना चाहिए । क्योंकि शान्त एवं स्थिर मस्तिष्क रातोंरात कुछ समय के जप या ध्यान से प्राप्त नहीं होता है । 
                 
जो ब्रहमाण्डीय ऊर्जा वैकुण्ठ एकादशी के दिन वातावरण में बहती है, अध्यात्मिक अभ्यास के लिए प्रेरक होतीं हैं । इस दिन सीता राम मन्त्र का अभ्यास और ध्यान स्वयं के अन्दर और भौतिक मंदिर में भी ईश्वर का दर्शन हमें भारी पुरस्कार के रूप में आशीर्वाद देगा । इस दिन एवं प्रत्येक दिन सीता राम मंत्र आपको आशीर्वाद दे । 




सोमवार, 29 अप्रैल 2013

आप इस लोक के दिव्य प्राणी हो

ब्रम्हाण्ड बहुत विशाल है । इस ब्रम्हाण्ड में लगभग 10,000 लोक हैं और सबसे ऊँचा लोक वैकुण्ठ लोक होता  है । वैकुण्ठ भगवान् विष्णु का निवास है ।  जो लोग सीता राम मंत्र का जाप करते हैं, इस लोक के पथ पर होते हैं और जिन्होंने कुण्डलिनी महा योग का शक्तिपात लिया है और निष्ठावान गुरु भक्त हैं , निश्चित रूप से उस आश्चर्यजनक लोक को प्राप्त करेंगे । वैकुण्ठ लोक के निवासी अव्यक्त से सीधे संपर्क में होते हैं जिसे स्वयं में श्री विष्णु के रूप में स्पष्ट किया गया है । 
                                            
दूसरे लोक भिन्न प्रकार के प्राणियों से बसे हुऐ हैं । वे उन्नति का अलग स्तर और अलग प्रकार का उपहार रखते हैं । प्रत्येक प्राणी अपने लोक के लिए अलग प्रकार  की प्रकृति तथा विशेषताओं सहित अनूठा होता है । भूलोक मिलन का केंद्र होता है - वह स्थान जहाँ भिन्न-२ प्रकार के प्राणी साथ-2  आते हैं एवं सदभाव में सह अस्तित्व में होते हैं ।  ब्रम्हाण्ड में यही एक स्थल है जो सभी सार्वभौमिक संस्कृति को एक सूत्र में पिरोता है । 
                                                    
आप दिव्य प्राणी हैं जो इस लोक के अस्थायी निवासी हैं । आप कुछ उद्देश्य के लिए यहाँ आये हैं और एक बार जब यह संपन्न हो जाता है, आप वैकुण्ठ को वापस लौट जायेंगे । फिर भी याद रखो, आप संक्षिप्त ठहराव के लिए यहाँ हैं और आप यहाँ एक मेहमान हैं ।  आप यहाँ इस लोक के एक किस्म के प्राणियों के साथ रह रहे हैं इसलिये सभी के साथ शांति एवं सदभाव में रहिये । 
                                       
आपको यह याद रखना चाहिए कि प्रत्येक प्राणी आप ही कि तरह अपना अनूठा मार्ग एवं पसन्द एवं नापसन्द रखता है । आपके चारों ओर कुछ  लोग धार्मिक पुस्तकें पढना पसंद करते हैं कुछ लोग मूर्ति पूजा पसन्द करते हैं, कुछ प्रकृति को पूजते हैं, कुछ संगीत एवं कला में ईश्वरत्व को देखते हैं । प्राणियों में कुछ जीवन पथ के रूप में ईश्वरत्व पर ध्यान करते हैं और दूसरे ईश्वर के पवित्र नाम को गाने में विश्वास करते हैं । प्रत्येक प्राणी यहाँ ईश्वर के अपने पथ पर चल रहा है और हमें इनका सम्मान करना चाहिए । हम भी अपने पथ पर चल रहे हैं । इसलिए आपको यहाँ इस पृथ्वी पर दूसरों के प्रति सम्मान एवं समझ के साथ समय व्यतीत करना चाहिए । यह आपके ठहराव को यहाँ आनन्दपूर्ण एवं स्वीकार्य बनाएगा । और हर समय सीता राम मंत्र को जपना याद रखिये जो आपकी सुरक्षा और दूसरे लोक का आज्ञापत्र होता है और जो अद्रितीय रूप से आपका है । 

शनिवार, 27 अप्रैल 2013

नववर्ष का आशीर्वाद

आज, नववर्ष के प्रथम दिवस पर, मेरा आशीर्वाद तुम सब के लिए कि तुम सब स्वस्थ, धनवान और प्रसन्न हो और जो तुम लोग कर रहे हो उन सब में तुम्हे उचित मार्गदर्शन प्राप्त हो । 
                                                                                                             
नववर्ष का आरम्भ हमें अतीत के दर्द और दुःखों से छुटकारा पाने के लिए और पुनः तरोताजा प्रारम्भ करने का अवसर देता  है । स्वयं के अन्दर देखो और अतीत की सभी नकारात्मकता को नष्ट करो स्वयं अपने व्यक्तिगत स्व रूपंतारण के विषय में एक दृढ संकल्प लो । सीता राम की शक्ति और गुरुकृपा तुम्हारे संकल्प को नयी दिशा देगी और उसे सफल बनायेगी । 
                                                                                                                                         
सभी परिवर्तन को अन्दर से आना है । अपने अध्यात्मिक अभ्यासों में अधिक नियमित होने के लिए निष्पक्षता से कृत संकल्प हो । सीता राम का जाप नियमित रूप से करो और नियमित ध्यान करो । अपनी भक्ति में और अधिक कृतसंकल्प हो और ईश्वर और गुरु के प्रति समर्पित हो ।  गुरु भक्त सदैव गुरु द्वारा सुरक्षित होता है और उचित दिशा में मार्गदर्शन पाता है 
                                                                 
गुरु सूरज की तरह हैं । सूरज प्रत्येक पर निष्पक्षता से चमकता है । जो लोग बंद खिड़की एवं दरवाजों के पीछे घरों के अन्दर बैठे हैं, कोई गर्मी या प्रकाश नहीं प्राप्त करेंगे । गुरु निष्पक्ष रूप से सभी पर अपनी कृपा एवं प्रेम को बरसाते हैं । केवल वो लोग जो अपना जाप  एवं ध्यान नियमित रूप से करते हैं, इस अमृततुल्य बौछार को प्राप्त करेंगे । इसलिए प्रत्येक दिन अपने प्रेम एवं विश्वास को बढाने के लिए संकल्प लो और अपने अभ्यास में और अधिक अनुशासित हो एवं गुरु कृपा एवं प्रेम का आनन्द लो । वर्ष 2013 आपको अपने गुरु तथा ईश्वर के प्रति अधिक निकट लाये । 

बुधवार, 24 अप्रैल 2013

नववर्ष की पूर्व संध्या पर संदेश

नववर्ष की पूर्व संध्या पर, हमें स्वयं का आत्मनिरीक्षण करना चाहिए । हमें देखना चाहिए कि हम कौन हैं और हम कहाँ जा रहे हैं । हमें उचित दिशा में अपने जीवन के पथ पर चलना चाहिए । 
                                                                                                                     
आप सब दिव्य प्राणी हैं ।  आप दिव्य स्रोत से आते हैं । आप संक्षिप्त ठहराव के लिए यहाँ आये हैं और आप अपने दिव्य प्रकृति एवं दिव्य घर में वापस जाएँगे । प्रथ्वी पर यौन आनन्द का जीवन जीते हुए मात्र एक मनुष्य होकर स्वयं को नीचा न दिखाइये ।  
                                                                                                                                                      इस ब्रह्माण्ड में 10,000  लोक हैं । उनमे से सबसे ऊँचा वैकुण्ठ लोक भगवान् विष्णु का निवास है । आप में से जो सिद्ध सीता राम मंत्र का जाप करते हैं, इस लोक के पथ पर होते हैं । जिन्होंने कुण्डलिनी महा योग के शक्तिपात को लिया है और निष्ठावान गुरु भक्त हैं, निश्चित रूप से वहां पहुंचेंगे ।  आप सब इस प्रथ्वी पर कुछ समय के लिए ठहरने आये हैं । 
                                     
धरती के निवासी के रूप में, आपको यह याद रखना चाहिए कि आप केवल काल की संक्षिप्त अवधि के लिए यहाँ हैं । आप प्रथ्वी पर एक मेहमान हैं । जब आप किसी के घर पर एक मेहमान के रूप में ठहरते हैं , आपका व्यवहार सबसे अच्छा होता है । आपकी भाषा विनम्र एवं मधुर होती है । आप अपने रहने के क्षेत्र को साफ़ सुथरा रखते हैं । आप अपने मेज़बान की सम्पति की देखभाल करते हैं और उसकी वस्तुओं एवं परिवेश को दूषित या नष्ट नहीं करते हैं । 
                                   
प्रथ्वी पर थोड़े समय के लिए एक मेहमान के रूप में, हमे इस संसार में प्रदत्त उपहारों की देखभाल करनी चाहिए। हमे अपनी धरती माता का सम्मान करना चाहिए  और उन्हें दूषित या नष्ट नहीं करना चाहिए ।  हमे हवा एवं पानी का उचित उपयोग करना चाहिए । ये अमूल्य उपहार हैं जो प्रथ्वी पर हमारे जीवन को सहायता एवं सहयोग देते हैं । प्रकृति माता एवं प्रथ्वी हमे हमारी आवश्यकनानुसार पर्याप्त देती हैं ।  लेकिन जो भी उपहार वह लुटाती  है हमारे लालच के कारण  पर्याप्त नहीं होते हैं । हमारी  लालच इन उपहारों को अधिकाधिक उपयोग करने के लिए बाध्य करती है । हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि केवल हम ही अपने परिवेश के दीघ्रगामी प्रभावों या दूसरों के आवश्यकताओं को देखे बिना प्रकृति के उपहारों का अधिकाधिक लाभ प्राप्त करें । 
                                             
हिन्दू प्रथा हमें सम्पूर्ण प्रकृति को ईश्वर के रूप में सम्मान करना सिखाती है । पृथ्वी भू-माता या धरती माता है जो एक सजीव देवी और सबकी माँ हैं । सूर्य सूर्यदेव हैं जो गर्मी, प्रकाश और आभा सबके लिए फैलाते हैं । हवा वायु देवता है जो पृथ्वी पर सभी के लिए जीवन दायिनी साँस है । जल वरुण देवता हैं जिनकी अमृतयुक्त बूँदें जीवन दायिनी होती हैं । वृक्षों की पूजा की जाती है और सभी फूल, पत्तियां, फल पूजा में प्रयोग किये जाते हैं और इस प्रकार सम्मानित किये जाते हैं । संपूर्ण प्रकृति श्रद्धेय है । जब ऐसे सम्मान प्रदर्शित किये जाते हैं और प्रक्रति की पूजा की जाती है, संसाधनों का उचित उपयोग होगा और सभी की आवश्यकतायें पूर्ण होंगी । 
                                                   
हमें प्रकृति के पूजन के इन सिद्धांतों को वापस पाने की आवश्यकता है, यह सुनिश्चित करने के लिए कि पृथ्वी एवं उसके उपहारों का उचित उपयोग हो और न कि वे प्रदूषित, दुश्पयोगी और बर्बाद हों । 
                                           
ओ दिव्य प्राणी, यहाँ पृथ्वी पर रहते हुए याद रखो कि तुम मेहमान हो और जो कुछ तुम्हें प्रदान किया गया है, उसका उपयोग उचित प्रकार से करो और जो कुछ दिया गया है उसको सब में बाँटो । यह उचित दृष्टिकोण अपने बच्चों की भी सिखाओ । कृतज्ञता का रवैया और उपहारों एवं प्रस्तावों का उचित उपयोग अधिकांशतः एक मेहमान का स्वीकार्य व्यवहार होता है । 

रविवार, 21 अप्रैल 2013

ध्यानयोगी मधुसूदन दास जी के जन्मोत्सव पर सन्देश

 ध्यानयोगी मधुसूदन दास जी महानतम पैदा हुए परमयोगियों में से एक थे उन्होंने लगभग पचास वर्षों तक तपस्या की और स्वयं को पूर्ण किया । सार्वभौमिक शक्ति, शक्तिपात का वरदान और अन्य आशीर्वाद उन्हें प्राप्त हुए । यह परमगुरु करुणा के महासागर थे, उन्होंने मानवता को कष्ट सहते हुए उनकी पीड़ा एवं दुःख को देखा । उन्होंने उन सबको शक्तिपात देने का निश्चय किया जो उनके पास आये और उसे माँगा । उन्होंने जिज्ञासु की राष्ट्रीयता , जाति , पंथ, लिंग को नहीं देखा । उन्होंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि अमुक  व्यक्ति शक्तिपात के आशीर्वाद को प्राप्त करने के योग्य या अयोग्य है । केवल इतना ही पर्याप्त होता था कि  उस व्यक्ति की ईश्वर के प्रति ललक हो और उसने शक्तिपात के लिए कहा हो । अध्यात्मिक जगत में यह नवीन मील का पत्थर होता था जहाँ एक व्यक्ति को इतनी सरलता से शक्तिपात दिया जाता था । अतीत में लोगों ने कई वर्षों तक कठोर साधनाएं एवं तपस्या की तब उनको गुरुओं द्वारा शक्तिपात प्रदान किया गया । 
                                                                                  
 ध्यानयोगी मधुसूदन दास जी परमहंस थे वे सदैव अनंत शक्ति से एकाकार थे , फिर भी इस जगत के थे । वे स्वयं में श्री राम थे । वे बहुत मधुर बोलते थे और क्षमादान करते थे ।  वे अपने संपूर्ण जीवन काल में कई लोगों द्वारा कष्टित एवं अपमानित हुए । उन्होंने सभी को क्षमा किया और अपने शांत मुस्कराहट भरे मार्ग में सतत लगे रहे । उनका अध्यात्मिक कद ऐसा था कि जब उन्होंने सीता राम मंत्र का जाप किया हनुमान जी उनके सामने प्रकट हुए और उन्होंने हनुमान जी से एकांत में वार्तालाप किया । हनुमान जी ने उन्हें नियमित दर्शन दिए और उन्हें वह मार्ग बताया जिससे हम एक दुसरे से मिलते एवं वार्तालाप करते रहें । गुरु जी से निकली हुई तरंगें दुर्लभ थीं । जिन्होंने एक बार भी उनका दर्शन किया, अत्यधिक लाभान्वित हुआ । 
                                                                
कई लोगों ने जिन्होंने उनका गलत विचारधारा, नकारात्मक दृष्टिकोण और नकारात्मक तरंगों सहित दर्शन किया वे यह जानने के अयोग्य हुए कि वे क्या थे । उन्होंने दर्शन नहीं प्राप्त किया और लाभान्वित नहीं हुए । आशीर्वाद जो एक महान साधू से बहता है, उन्हें प्राप्त नहीं हुआ । लघु परिपथ गुरु जी में नहीं था बल्कि उनमें था जो उनके दर्शन हेतु आये थे । 
                                                                          
आज हम इस महान गुरु के सम्मान में उनके एक सौ तैतिसवे जन्मोत्सव पर नमन करते हैं । उनका आशीर्वाद सदैव हम लोगों के साथ बना रहे । 

बुधवार, 17 अप्रैल 2013

आश्रयदाता एवं अन्नदाता - एक ऐतिहासिक कहानी

मनुष्य  अहंकारी होता है  । वह सोंचता है कि वही केवल अकेला है जो सबकुछ करता है । वह सोंचता है कि यह उसके कारण होता है, उसका परिवार खाता एवं फलता फूलता है । वह अडिग विश्वास रखता है कि संपूर्ण संसार उसके चारों ओर घूमता है । 
                         
जीवन मानव से पहले पृथ्वी पर अस्तित्व में आया । पेड़, पौधे, फूल, फल, कीड़े-मकौड़े, मछली, पक्षी हर जगह थे । प्रक्रति ने प्रत्यॆक जीवित प्राणी को भोजन, पानी और आश्रय उपलब्ध कराया । लेकिन जब मनुष्य आया, उसने अन्य दूसरे प्राणियों पर स्वामित्व और नियंत्रण करना आरम्भ कर दिया । उसने यह भ्रम पाला कि वह सबका राजा  है । जिनकी वह निगरानी करता है और वह सभी अनुयायी प्राणियों को भोजन एवं आराम देने वाला और उनकी देखभाल करने वाला है । 
                                                  
कई लोग जो थोड़े या अधिक अधिकारों में निहित होतें है, सोंचते हैं कि वे मानवता के देखभाल करने वाले हैं । राजा या शासक, राष्ट्रपति एवं मंत्री, स्थानीय महापौर और आरक्षक और पारिवारिक व्यक्ति- सभी सोंचते है कि वे मानव एवं मवेशियों के अन्न दाता है । जबकि वे कार्य एवं अपने दायित्वों को निभाते हैं । वास्तव में भोजन एवं जल उपलब्ध कराने का कार्य प्रकृति द्वारा स्वयं किया जाता है । जैसे ही मनुष्य का अहंकार बढ़ता है , वह ईश्वर को भूल जाता है और सोंचने लगता है कि वह स्वयं ईश्वर है । 
                                                                                                                   
महान गुरु मनुष्य को सिखाते हैं कि वह सृजनकर्ता या अन्नदाता नहीं है , बल्कि ईश्वर है । वे मनुष्य के अहंकार का दमन करते हैं और ज्ञानरुपी प्रकाश का मार्ग दिखाते हैं । ऐसे ही एक गुरु श्री स्वामी रामदास जी- वीर शिवाजी महाराज के सद्गुरु थे ।  एक बार जब शिवाजी एक किले में थे जो निर्माणाधीन था, श्री स्वामी राम दास जी वहां पहुंचे । उन्हें देख कर शिवाजी ने एक बहुत ऊँचे कद के गुरु के लिए आभार प्रकट किया । जैसे ही शिवाजी ने श्री स्वामी रामदास जी को किये हुए कार्यों को दिखाते हुए चारों ओर भ्रमण किया, शिवाजी में अहंकार की भावना आ गई कि वह राजा हैं एवं वह आश्रयदाता एवं अन्नदाता हैं । श्री स्वामी रामदास जी ने शिवाजी में उठी हुई इस भावना को पढ़ लिया । उन्होंने देखा कि शिवाजी स्वयं में उच्चकोटि का गुण रखतें हैं और हिन्दू धर्म एवं अपनी जनता के लिए बहुत से अच्छे कार्य कर सकते हैं यदि उन्हें उचित मार्गदर्शन दिया जाये । उन्होंने शिवाजी के अहंकार को तोड़ने का निश्चय किया और जीवन के सत्य को दिखाने का निश्चय किया - कि ईश्वर अन्नदाता हैं और मानव उसके सम्मान का प्राप्तकर्ता  है । भ्रम सम्मान प्राप्त करने की मानव क्षमता का दमन करता है । 
                                            
श्री स्वामी रामदास जी ने एक सुनियोजित चट्टान को वहां के कार्यकर्ताओं में से एक को तोड़ने का आदेश दिया । जब चट्टान दो भागों में टूट गई, उसके अन्दर एक गड्ढा था । और एक मेंढक कूद कर बाहर आया । गड्ढे के अन्दर मेंढक के लिए जल एवं भोजन था " शिवा इस मेंढक को देखो " उन्होने कहा ।  यह तुम्हारी सुरक्षा के कारण पोषित हुआ है तुमने इस मेंढक को भी अन्न दिया है ।  तुम वास्तव में एक महान राजा हो । शिवाजी के मस्तिष्क में उचित समझ एवं शर्म महसूस हुई । उन्होंने अपनी पगड़ी उतारी और उसे अपने संपूर्ण राज्य सहित महान गुरु को समर्पित कर दिया । इसके बाद शिवाजी ने अपने राज्य पर इन यादगार वचनों सहित शासन किया कि वे केवल एक निमित्त मात्र हैं लेकिन ईश्वर आश्रयदाता एवं अन्नदाता हैं । 
                                                                                                                        
शिवाजी की तरह बनिए । ईश्वर  के हाँथ का एक निमित्त मात्र बनिए । ईश्वर को हर समय याद करिए । हर समय सीताराम को अपने अन्दर स्पंदित रखिये । जब आप इस तरह से रहते हैं, आप अपना सर्वश्रेष्ठ और अधिकाधिक निष्पादन देंगे और इन सबका परिणाम सर्वॊच्च  शक्ति द्वारा तय किया हुआ होगा । 


रविवार, 14 अप्रैल 2013

मन्त्र जाप की तीव्रता और उसका आशीर्वाद - द्रौपदी

मन्त्र का जाप ईश्वर में समर्पण को बढाने के सबसे आसान मार्गों में एक है । यह साधारण होता है और यह कोई अधिक कीमत या प्रक्रिया को शामिल नहीं करता है । गुरु द्वारा प्राप्त मन्त्र का जाप दिए गए निर्देशों के अनुसार किया जाता है और मन्त्र का आशीर्वाद बहता है । भगवत गीता में, भगवान योगेश्वर श्री कृष्ण- विभूति योग अध्याय में कहतें हैं :- " योग एवं जाप में मैं ही हूँ "
                                                                
द्रौपदी, जिन्होंने महाभारत में पाँच पांडवों से विवाह किया था, पंच महा कन्याओं में से एक थीं । वह शक्ति स्वरूपा (शक्ति का अवतार ) थीं और उनको पापों से छुटकारा पाने के लिए प्रत्येक प्रातः याद करने का अनुमोदन किया जाता है । ऐसी उनकी शुद्धता एवं भक्ति थी ।  द्रौपदी श्री कृष्ण में गहरा अध्यात्मिक लगाव रखती थी, वह (लगाव ) भगवान द्वारा पूर्णरूप से  प्रतिफल में चुकाया हुआ था । वे ऐसे भक्त और भगवान थे । श्री कृष्ण के प्रति द्रौपदी का प्रेम इतना मजबूत था कि श्री कृष्ण उनके व्यक्तिगत रक्षक उनके अपने जीवन की सभी विपदाओं और अशांतियों में हुए ।
                                                                              
एक राज कुमारी होकर और बाद में एक रानी होकर , द्रौपदी के पास विशाल उत्तरदायित्व एवं कर्त्तव्य थे । वे और उनके पति सदैव अपने चचेरे भाइयों, कौरवों द्वारा निशाना बनाये जाते थे । उनके परिवार को ज़मीन जायदाद के कारण कपट वध , मानहानि , अपदस्थ और निर्वासन के लिए कष्ट सहना पड़ा । इन सभी राजनितिक हलचलों एवं समस्याओं में भी , द्रौपदी सदैव श्री कृष्ण के प्रति  हृदय एवं मस्तिष्क से समर्पित थीं और पूरा दिन उन्हें याद करके अपना कार्य करती थीं । और श्री कृष्ण भी जब कोई संकट होता था प्रत्येक समय उनके बचाव में त्वरित प्रतिफल देते थे ।
                                                                         
सुभद्रा, श्री कृष्ण की बहन द्रौपदी से इर्ष्या करती थीं । वह जानती थीं की उनके भाई द्रौपदी से कितना प्रेम करते हैं । श्री कृष्ण भी द्रौपदी को अपनी बहन मानते थे । वह नहीं समझ सकी की श्री कृष्ण द्रौपदी से इतना प्रेम क्यों करते थे और द्रौपदी ने श्री  कृष्ण से ऐसा प्रेम पाने के लिए क्या किया । श्री कृष्ण इस इर्ष्या को जानते थे और उन्होंने सुभद्रा को सबक सिखाने का निश्चय किया । एक बार जब द्रौपदी श्री कृष्ण दर्शन में थीं , श्री कृष्ण ने सुभद्रा को उनके (द्रौपदी) के केशों को सुखाने में सहायता के लिए और उनके कक्ष में जाने के लिए कहा क्योंकि उन्होंने थोड़ी देर पहले अपने केशों को धोया था ।सुभद्रा ने लटों को सुलझाने के लिए कंघी उठाई । जैसे ही उन्होंने केशों को कंघी किया, उन्होंने द्रौपदी के सिर पर प्रत्येक केशों को कृष्ण-कृष्ण  का भजन करते हुए अनुभव किया । तब सुभद्रा को ज्ञात हुआ कि द्रौपदी का कितना समर्पण था और द्रौपदी श्री कृष्ण से कितना प्रेम करती थीं और क्यों उनके भाई उनसे इतना प्रेम करते थे । और इस प्रकार सभी संकीर्ण हृदयता एवं ईर्ष्या उनके मानस पटल से नष्ट हो गयीं ।
               
सीता राम मंत्र का जाप दो प्रकार से किया जाता है - आसन पर बैठकर और अपने दैनिक कार्यों को करते हुए चारों और भ्रमण करते हुए | कृपया मन्त्र का जाप टहलने, बातचीत करने, बैठने, खाना पकाने, नहाने, खाने, सोने, बुलावे की प्रतीक्षा करने, कम्प्यूटर  इत्यादि पर कार्य करने के दौरान करें । इस प्रकार आप पवित्र नाम पर आसानी से अपने मस्तिष्क के एक हिस्से से बहुआयामी हो सकते है । नाम की तरंगें आपको सुरक्षित रखेंगी और आपको हर समय सर्वोच्च शक्ति से जोड़े रखेंगी । यह आसानी से सम्भव हो जाता है । अब यह केवल स्वयं को ध्यान दिलाने का प्रकरण हो जाता है और तब इस प्रकार नाम का जाप करना भी एक आदत और दूसरी प्रकति हो जाती है । यदि द्रौपदी , अपने सभी उत्तरदायित्वों, कर्तव्यों और समस्याओं सहित हर समय श्री कृष्ण को याद कर सकती थीं तो हम ऐसा आसानी से क्यों नहीं कर सकते हैं ।

गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

क्रिसमस - आनन्द एवं आंतरिक नवीनीकरण का मौसम

पुनः त्यौहार का मौसम है । सभी जगह रंगीन वातावरण और प्रसन्नता है। तेज़ प्रकाश संसार को और अधिक शानदार बनाता है । स्वादिष्ट सुगन्ध रसोईघर से आती है । दुकाने खरीदारी करते और उपहार समेटते हुए लोगों से भरी है । उत्तेजना हवा में गूंजती है ।
                                                          
इस सब के बीच दुःख भी है । अनगिनत ऐसे लोग भी हैं जिनके पास अपने परिवार के लिए उपहार खरीदने के लिए धन नहीं है । बहुत से ऐसे हैं जिनके पास सुगन्धित केक को सेंकने या मिठाई को खरीदने के लिए और स्वादिष्ट भोजन पकाने के लिए धन नहीं है । कुछ ऐसे है जिनका कोई प्रिय उपलब्ध नहीं है । अधिकांश जो अच्छा भोजन कर सकते है, बीमार हैं और आहार प्रतिबंधित  है ।
                                                                                                                                           
यदि आप उनमे से एक हैं जिसने परिवार के लिए उपहार प्राप्त किया है लेकिन अतिरिक्त पाना चाहते हैं, और उनमे में एक जो उपहार को परिवार के लिए इकठ्ठा नहीं कर सकते हैं या उनमें से एक जिनके पास सबकुछ है लेकिन स्वयं को कुछ विशेष उपहार देना चाहते हैं , ये उपहार माने जाते हैं : एक प्यारा हृदय जो दूसरे को समझता एवं गले लगाता है क्योंकि वह वैसा होता है :- किसी अपरिहार्य समय में दूसरों की सहायता एवं धैर्य देने के लिए, उस समय भी बरदाश्त करने के लिए जब आप नहीं समझते हैं, दान के लिए जो घर से आरम्भ होता है , एक अच्छा उदाहरण आपके द्वारा सभी के लिए प्यार और सम्मान बनाये रखना ।
                                                                
इस समय जब ईशु का जन्म हुआ था, सबसे अच्छा उपहार जो आप स्वयं या दूसरों के दे सकते है " अपने को बेहतर बनाना है । अपने अन्तः में जो सुन्दर नहीं है या उससे आपको प्रसन्नता नहीं प्राप्त होती है उसे छोड़ दीजिये । संसार चमत्कारिक होता है जब आप बदलते हैं । सर्वोच्च शक्ति की अनुकम्पा के लिए पूजा एवं अर्चना करें । अपने एवं उन सब के लिए जो आपके चारों ओर रहते हैं, ईशु  से प्रवाहित सम्मान और आशीर्वाद प्राप्त करें ।

मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

अध्यात्मिक अभ्यास सभी के लिए अनिवार्य होता है

एक प्रश्न उठता है - क्या अध्यात्मिक  अभ्यास सभी लोगों के लिए है या केवल उन लोगों के लिए जो आध्यात्मिकता के इच्छुक हैं ?
उत्तर है :- अध्यात्मिक  अभ्यास सभी के लिए होता है, उस स्तर पर जिन पर वे आसानी से अभ्यास कर सकते हैं । केवल अध्यात्मिक  अभ्यास हमारी रक्षा " तेज़ रफ़्तार जिंदगी जिसमें हम वर्तमान में रहते हैं " और उसकी सभी नकारात्मक प्रभावों से करता है ।
                                                    
आज के युग में जबरदस्त प्रतिस्पर्धा एवं तनाव है । गला काट अभ्यास अधिकांश की उच्च पर रहने में और तरक्की करने में सहायता करता है । ऐसे गंभीर अभ्यास शरीर एवं मस्तिष्क को अवसादग्रस्त करते हैं । आधुनिक युग की चूहा दौड़ में कुछ लोग जीतते है या पराजित होते हैं और पराजित व्यक्ति केवल पराजित रहते हैं । जीवन -अधिकार , प्रतिष्ठा , पद ,शक्ति ,लालसा और सांसारिक चमक धमक के चारों और घूमता है । इस दुष्चक्र में पड़कर, मनुष्य को कोई राहत नहीं होती है ।
                                                                                      
प्रत्येक व्यक्ति को विकसित होने और आगे बढ़ने की आवश्यकता होती है । और यह केवल अध्यात्मिक  अभ्यास से संभव होता है " ईश्वरत्व की झलक जो हमारे अन्दर - हमारी अन्तःचेतना में होती है " की मांग जो हमे विकसित करती है और हमें आगे बढाती है । यह तभी संभव होता है जब हम अपने चारों ओर की नकारात्मकता से सुरक्षित होते हैं । हमारे चारों ओर की नकारात्मक ऊर्जाएं एवं प्रभाव हमारे अन्दर की रचनात्मक ऊर्जा को " जिससे उन्नति प्रशस्त होती है " नष्ट करती है और तटस्थ बनाती है ।
                                             
जब हम मंत्र जाप का , धार्मिक पुस्तकों को पढने का, नियमित मन्दिर दर्शन का , श्लोक का सस्वर पाठ, ध्यान का अभ्यास करते हैं , हमारे तन्त्र में उच्चतर चक्र चलायमान हो जाते हैं । समर्पण हमारी भावनाओं और मस्तिष्क को शुद्ध करता है और हमारी विचार धाराओं को  मार्गदर्शन देता है । जब हम प्रेमवश स्वयं को ईश्वर की इच्छा में समर्पित करते हैं तो हमारे समर्पण का आभार बढ़ता है और हम जीवन की नकारात्मकता और अनियमितता से सुरक्षित होते हैं । इस प्रकार हमारा अभ्यास बढ़ता है , और समर्पण पुष्ट होता है और शुद्ध होता है तीसरा नेत्र विकसित होता है । ईश्वर  की इच्छा को देखने और समझने का अन्तर्ज्ञान एवं क्ष्रमता और स्रष्टि की भव्य योजना इस अभ्यास से आती है । हमारे अन्दर का भय, क्रोध, इर्ष्या और दूसरी नकारात्मकता नष्ट होती है | हम प्रत्येक समय अपने को सुरक्षित रखने वाले ईश्वर के अद्रश्य हाथ का अनुभव करते हैं ।
                                                                                                                                                 
सिद्ध मंत्र जाप का अध्यात्मिक अभ्यास - सीता राम और अन्य मन्त्र और ध्यान , गुरु सेवा एक अर्थपूर्ण जीवन को जीने का सबसे सरल मार्ग है। भौतिक एवं अध्यात्मिक जीवन में हमारी उन्नति निर्बाध रूप से जारी रहती है । हम अपने को सुरक्षित रखने वाले  ईश्वर के आशीर्वाद और गुरु के हाथ को हर समय देखते हैं ।

सोमवार, 8 अप्रैल 2013

गुरुदेव से प्रश्न पूछना

 जब शिष्य गुरु के सामने बैठता है, यह दर्शन होता है । मौन दर्शन अत्यधिक लाभकारी होता है । प्रोत्साहन जो कोई गुरु के औरा से प्राप्त करता है , शक्तिशाली होता है और यह मन्त्र जाप और बाद के ध्यान के गुणों को प्रभावित करेगा । गुरु के शरीर से विकिरण का तात्पर्य होता है ॐ  के लौकिक प्रकाश और ध्वनि का अनावरण । गुरु के सामने मौन बैठना शरीर एवं मस्तिष्क को महान शक्ति देता है । गुरु से उत्पन्न प्यार और शांति तंत्र को प्रफ्फुलित करती है और स्वस्थ करती है ।
                            
जब शिष्य गुरु के समीप हो, उसे आदरपूर्ण ढंग से मौन बैठना चाहिए । प्रश्न पूछने की आवश्यकता नहीं है । उसका ध्यान गुरु पर होना चाहिए । जो गुरु जी कह रहे हों उसका संपूर्ण ध्यान उन पर  होना चाहिए । ऐसा कर के वो अनमोल शिक्षा सीखेगा जो सीखना एवं जानना कठिन होता है और किसी अन्य के द्वारा आसानी से नहीं सिखाया जा सकता है । गुरु जानते है की कौन सी जानकारी शिष्य के उन्नति के प्रोत्साहन के लिए आवश्यक होती है और कौन सा ज्ञान प्रदान करना है और किस प्रश्न का उत्तर देना आवश्यक है । इसलिए शिष्य के लिए प्रश्न पूछना आवश्यक नहीं है ।
                              
यदि शिष्य अपने प्रश्नों को पूछने के अवसर को केन्द्रित करके गुरु के सम्मुख बैठता है , दर्शन अपूर्ण माना जायेगा । उसका संपूर्ण ध्यान और ऊर्जा पूछने वाले प्रश्नों पर केन्द्रित होगी और वह प्रश्न पूछने के लिए उचित अवसर का इंतज़ार करेगा । उसका ध्यान उठने वाले प्रश्न और बातचीत के अन्तराल पर होगा, इस बात पर नहीं के गुरु जी क्या बोल रहें हैं । ऐसा कर के वह शब्दों द्वारा प्रदान किये गए दोनों ज्ञान को खो देता है और गुरु से आशीर्वाद और प्रसारण को प्राप्त करने के भी योग्य नहीं होगा क्योंकि  उसमें मौन नहीं है ।
                                                                  
अतः गुरु से प्रश्न पूछने की आवश्यकता नहीं है । वे बिना पूछे हुए अधिकांशतः प्रश्नों का उत्तर देते हैं । यदि गुरु द्वारा प्रश्नों का उत्तर नहीं भी दिया जाता है तो भी दर्शन का आशीर्वाद सदैव समस्याओं पर मरहम लगाता है और समस्या का समाधान उनसे प्राप्त होता है । स्व और अध्यात्मिक उन्नति की वृद्धि के परिणामो के बिना पूछे गए प्रश्नों में सामान्यतः शिष्य अपनी संपूर्ण ऊर्जा एवं ध्यान को बर्बाद करता है । यदि वह कुछ पूछना चाहता है तो  शिष्य को  केवल वही बोलना चाहिए जो गुरु उससे पूछें । 
                                           
गुरु देने की असाधारण क्ष्रमता रखते है । इसलिए शिष्य को मौन बैठना चाहिए और अधिकाधिक जितना वह प्राप्त कर सकता है , प्राप्त करना चाहिए।

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

सीता राम मंत्र


सीता राम मंत्र एक आश्चर्यजनक मंत्र है । जो अंतरिक्ष, समय और शुद्धता की सीमाओं से परे होता है । राम सर्वत्र  सर्वव्यापी चेतना, हमारे अन्दर  एवं  बाहर और पौरुष उर्जा हैं  । सीता ब्रम्हाण्ड की शक्ति और स्त्री उर्जा है । वह (सीता ) कुण्डलिनी शक्ति हैं और राम सत्य एवं सदाचार हैं, अन्तः चेतना हैं , जिसमें लौकिक सत्ता से स्वयं को समाहित करने का अनुभव और प्रबोधन देने के लिए कुण्डलिनी शक्ति समाहित होती है ।
                                                    
हिन्दू परम्परा में राम ' मर्यादा पुरुषोत्तम ' सर्वोत्तम व्यक्ति माने जाते हैं और सीता उनकी पत्नी स्त्री जाति की  सर्वोत्तम उदाहरण हैं । दोनों का उदाहरण सम्पूर्णता की उच्चता के लिए दिया जाता है । जिसे मानव जाति प्राप्त कर सकती है ।
                                     
राम मणिपूरक चक्र का बीज मन्त्र है  । सीता राम का जाप आंतरिक अग्नि को प्रज्वलित करता है, जो सभी शारीरिक, मानसिक और कार्मिक अशुद्धियों को साफ़ करता है । कार्य और प्राप्त करने की इच्छा शक्ति और ऐसा करने के लिए उचित मार्ग का ज्ञान सीता राम नाम के मंत्र के जाप से विकसित होता है । धरती माता से उत्पन्न सीता मूलाधार चक्र का प्रतिनिधित्व करती हैं । वे  हमारी प्रणाली में पृथ्वी तत्व हैं । वह मूलाधार चक्र में विद्यमान कुण्डलिनी शक्ति भी हैं । सीता राम का जाप हमें धन, स्वास्थ और प्रचुरता जीवन में देता है जो मूलाधार चक्र या सीता का आशीर्वाद होता है ।
                                                           
सीता राम मंत्र का नियमित जाप हमारे अध्यात्मिक मार्गों से हमें संपर्क में लाता है और ईश्वर के प्रति हमारी लालसा को बढाता है । सीता राम का आंतरिक जाप तंत्र की सभी नाड़ियों और चक्रों को तंत्रों में स्वच्छता और सामंजस्य स्थापित करते हुए स्पंदित करता है । तरंगें हमारे शारीर से विषाक्त पदार्थों को हटाती हैं और हमारे शरीर के असंतुलन में संतुलन लाती हैं । जैसे ही हम राम नाम का जाप करते हैं , हम शांति एवं विश्राम के गहरे पड़ाव का अनुभव करते हैं । नियमित जाप आदतन खिंचाव एवं तनावों को लुप्त करता है । हमारे नकारात्मक कर्म जलते और लुप्त होते हैं , और हमारा आंतरिक आनंद स्वयं में विकसित होना शुरू हो जाता है । जब हम सीता राम का नियमित एवं अनुशासित ढंग से जाप करते हैं , हम विपुल जीवन शक्ति और स्वयं को प्रदीप्त करते हुए परमानंद प्राप्त करते हैं । भक्ति या ईश्वर के प्रति प्रेम बढ़ता है । अहंकार का क्षय एवं समापन होता है । हम संसार में अपने नियमित कर्तव्यों को करते हुए प्रतीत होते हैं , फिर भी  हम आतंरिक शांति एवं परमानंद में रहते हैं ।
      
सीता ऋणात्मक एवं स्त्रीत्व का पहलू हैं और राम ईश्वरत्व के धनात्मक और पुरुषत्व पहलू का पहलू हैं । जब सीता राम मंत्र का जाप किया जाता है तो स्वयं स्त्रीत्व और पुरुषत्व पहलू  संतुलित हो जाता है । यिन एवं येंग संतुलित एवं स्थिर रहते हैं । मस्तिष्क के दोनों छोर संतुलित रहते हैं । यह चलायमान मस्तिष्क को स्थिर करने में सहायक होता है, मस्तिष्क शान्त हो जाता है और धीरे-धीरे विचार नियंत्रण में हो जाते हैं । यह व्यक्तित्व एवं चरित्र में उन्नति एवं पुष्टता लाता है । हम वाणी , कर्म एवं विचारों से एक हो जाते हैं । जो हम सोंचते हैं वही बोलतें एवं करते हैं । स्वयं में विचार, कर्म एवं वाणी का एकीकरण होता है । व्यवहार एवं आचरण में स्थिरता आती है । हम सरल एवं ज्ञानवान होते हैं । स्वयं में शक्ति बढ़ती है और पूर्णता विकसित होती है । सीता राम भौतिक एवं अध्यात्मिक संसार दोनों में उन्नति और सम्रद्धि लाता है ।
                                
सीता राम की तरंगे एक मज़बूत कवच और ढाल बनाती है , जो हमारे चारों ओर की नकारात्मक से हमें सुरक्षित करती है । हम सभी बुराइयों, मानसिक अवगुणों और संभावित नुकसानों से सुरक्षित होते हैं ।
             
सीता राम मंत्र की शक्ति एवं तरंगे एक व्यक्ति को  सम्पूर्ण  रूप से  परिवर्तित करती है । शान्ति एवं आंतरिक आनन्द चेहरे पर तेज या अध्यात्मिक चमक के रूप में आभाषित होती है । सुधरा हुआ शारीरिक और मानसिक स्वास्थ, सन्तुलन, सम्रद्धि, सुधरा हुआ सम्बन्ध, भीतर के स्व एवं ईश्वर से सम्बन्ध जीवन में पूर्णता लाता है । सीता राम मंत्र अंततः हमे सर्वोच्च आत्मबोध की ओर बढाता है ।



बुधवार, 3 अप्रैल 2013

दर्शन


दर्शन का तात्पर्य देखना होता है । संस्कृत में दर्शन या दर्शाना का आशय देखना, दृष्टि या झलक होता है । यह वस्तु या व्यक्ति को देखना नहीं होता है । यह ईश्वरत्व की ही झलक होती है । इसका तात्पर्य गुरु या मूर्ति 
(ईश्वर की आक्रति) को पूजा स्थल पर देखना है । दर्शन का प्रभाव मात्र देखने से दूर तक परे जाना होता है । दर्शन में कोई वार्तालाप या प्रार्थना नहीं होती है । इसमें मौन और संपर्क होता है । इसमें द्रष्टा एवं द्रश्य में, मनुष्य ईश्वर में , निर्माण एवं ईश्वरत्व में सम्बन्ध होता है । प्रारंभिक अवस्था में सम्बन्ध महसूस होता है । बाद की अवस्था में द्रश्य की समझ भाव की समझ का अनुसरण करती है और यह एक दृष्टि या झलक होती है । यह 'आत्म चेतना जो ईश्वर की चेतना सहित है ' से सम्बन्ध होता है । दर्शन से चेतना का  विस्तार होता है ।
                                                  
मन्दिर  के  सम्पूर्ण  क्षेत्र में और विशेष रूप से वह क्षेत्र जहाँ ईश्वर की आकृति या मूर्ति रखी जाती है (गर्भगॄह), अधिक उच्च तरंगों से प्राण प्रतिष्टित की जाती है । हम जब मन्दिर जाते है, हम ईश्वर की मूर्ति को मौन रूप से ध्यान से देखते या देखते रहते हैं । एक संपर्क जुड़ जाता है जिससे हम पर ईश्वर की मूर्ति से एक आशीर्वाद बहता है । इस मौन में कई सत्य स्वयं में प्राप्त किये जाते हैं । ये सत्य जीवन, व्यक्तिगत समस्या, अधिक ऊँची अंतर्द्रष्टि, स्व एवं ईश्वरत्व के बारे में हो सकते हैं । और जब कोई दर्शन के लिए मन्दिर जाता है, यह आशीर्वाद हर समय प्राप्त होता है । उन्नत चरणों में, पूजा स्थल में होने का मात्र ध्यान आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पर्याप्त होता है । बाद के उन्नत चरण यथोचित समय में भी आशीर्वाद प्राप्त करने में परिणाम देते हैं  जब पूजा स्थल का कोई दर्शन या ध्यान भी नहीं किया जाता है ।
                                                                                                                                   
दर्शन गुरु एवं शिष्य के बीच एक अंतरंग ऐक्य होता है । शिष्य गुरु से प्रसारित औरा में बैठता है । गुरु से उत्पन्न उर्जा शिष्य में उसकी विचार धाराओं एवं चेतना को ऊपर उठाते हुए प्रवेश करती है । जागरूकता के क्षेत्र का निर्माण होता है जिसमे गुरु से शिष्य में आशीर्वाद का आदान प्रदान होता है और वह ऊपर उठता है । शिष्य गुरु के औरा के प्रसारण में बैठते हुए और चक्र उनसे (गुरु से ) उत्पन्न प्रकाश प्राप्त करते हैं और गुरु के औरा से, जीवन के सत्य और निर्माण का आदान प्रदान शिष्य में होता है । काल चक्र से परे ज्ञान, ईश्वरीय सत्य, जीवन के सार्भौमिक सिद्धांतों का बिना प्रयास के शिष्य में आदान प्रदान होता है । इन सब को ईश्वरत्व से सीधे प्राप्त करना प्रायः कठिन होता है क्योंकि एक व्यक्ति पर्याप्त रूप से तैयार नहीं किया जा सकता है । इस प्रकार गुरु की उपस्थिति में सभी कमियों को गुरु द्वारा दूर करने में सहायता प्राप्त की जाती है और गुरु ईश्वरत्व एवं एक व्यक्ति में सेतु बांधता है । 
                                                                                                                             
जब आप मन्दिर जायें या गुरु दर्शन हेतु जाए तो खुले दिल से जायें । अहंकार एवं बड़प्पन को किनारे रखें, गुरु या ईश्वर के सामने शांति से  खड़े हो जायें  और उनकी जादुई कृपा को अपने अन्दर कार्य करने दें । यह एक ईश्वर से स्वयं का पवित्र अनुभव होता है । उन्नति के प्रकाश में " पुराने रहस्योद्घाटनों  को आपने बनाया है " को प्राप्त करने का एक सुअवसर होता है, आपकी वर्तमान वास्विकता, जो जीवन को अधिक तरोताजा सुन्दर एवं उन्नत बनाती है ।

सोमवार, 1 अप्रैल 2013

भय सुधार की कुंजी है


आदमी सामान्यतः अपने परिवार के प्रति अच्छा, कर्तव्यनिष्ठ, और प्रिय होता है । वह स्वयं, अपने रिश्तेदार , समाज, और राष्ट्र का खयाल  रखता है । उससे जो आशा की जाती है वह उसे पूरा करने का प्रयास करता  है    
             
जब स्वयं में सुधार की और स्वयं रूपांतरण की बात आती है, आदमी जानता  है की उसके लिए क्या अच्छा है  लेकिन वह अपनी भावनाओं पर शायद ही क्रियान्वयन  करेगा । स्वास्थ्य के लिए जीवन शैली में बदलाव भी बहुत मुश्किल होता है क्योंकि आदतें बहुत नियमित होती है और मस्तिष्क उस नियमितता को बदलने के लिए मना करता है । वह जानता है कि व्यायाम उसके लिए अच्छा होता है , फिर भी वह नियमित टहलने में कठिनाई महसूस करेगा । तब भी जब चिकित्सक स्वास्थ्य के प्रति सावधान होने एवं भोजन पर नियंत्रण करने के परिप्रेक्ष्य में चेतावनी देता है, मनुष्य फिर भी स्वयं को बदलने में कठिनाई महसूस करेगा । इससे मानव को क्षय और दर्द की पुनरावृत्ति होने लगती है, यह जानने के लिए कि उसे स्वयं में बदलाव करना चाहिए । कभी-2 यह अपनी आदतों एवं मानसिकता में बदलाव के लिए मृत्यु की धमकी भी देता है । भय अच्छा होने के लिए कुंजियों में एक कुंजी है ।
                                                                                 
मित्र एवं परिवार से सम्बन्धो में भय पुनः अच्छे व्यवहार एवं और बेहतर होने का केंद्र बिंदु है । हम लोग अपने माता पिता, भाई, बहन, पति, पत्नी, प्रेमिका, मित्र इत्यादि के प्यार को खोने से डरते है । हममे से अधिकांश उचित कार्य करते है,  ताकि हम उन्हें प्रसन्न रख सकें  इसलिए नहीं की हम उचित कार्य करना चाहते है ।
                                        
अध्यात्मिक मार्ग में भी हम सब जानते है कि हमारे लिए क्या अच्छा है । फिर भी हम अपनी आदतों, मानसिकताओं और विचारों में परिवर्तन के लिए कठिनाई महसूस करते  है । हममे से अधिकांशतः  जानते है कि ईश्वर सर्वत्र व्याप्त हैं  । लेकिन उनका अनुभव  नहीं किया गया है । इसलिए मूर्खतावश हम अनुभव करते है जो वह नहीं जानता है , उससे उन्हें कष्ट नहीं पहुंचेगा  , या कि उससे हमे दुख नहीं होगा ।
                                    
केवल जब किसी के पास ईश्वर और गुरु का असीम प्यार होता है तब स्वेच्छा एवं ढंग से स्वयं  में परिवर्तन होता है । ईश्वर एवं गुरु से प्राप्त प्यार अविश्वसनीय रूप से अधिक मधुर होता है । ऐसे अद्भुत प्रेम एवं कृपा  को खोने का भय हमे सही मार्ग पर चलने के  लिए  प्रेरित करता है । इस बात का भय की यदि हम स्वयं में सुधार व बदलाव नहीं करते हैं तो यह कष्ट या  गुरु / ईश्वर के क्रोध का कारण हो सकता है या गुरु / ईश्वर की कृपा व प्रेम को खोने का भय हमे सही  और  धर्म के दुःखदाई मार्ग पर चलने के लिए  प्रेरित करता है  भय जो हम ईश्वर या गुरु के लिए रखते है, ईश्वर/गुरु के लिए हमारे प्रेम को बढाता है । यह हमे अधिक अच्छा शिष्य , अनुयायी  और भक्त बनाता है।

भय और भक्ति एक दूसरे से सम्बंधित होते है । और यह निश्चित रूप से स्वयं और जीवन में सुधार लाते  है । भय स्वयं में सुधार का कारक होता है ।