Amrit Dhara - Dhyanyogi Omdasji

Amrit Dhara - Dhyanyogi Omdasji

शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

रसोई घर का सहायक जो एक गुरु बना

गुरु अपने सभी शिष्यों को सामान रूप से प्रेम करते हैं एवं मार्गदर्शन देते हैं । लेकिन सभी शिष्य समान रूप से ग्रहणशील नहीं होते हैं । केवल वही शिष्य जो गुरु के प्रति महान प्रेम, निष्ठा विनयशीलता रखते हैं, गुरु की कृपा के लिए ग्रहणशील होते हैं । मात्र शास्त्रों का अध्यन करना एवं प्रार्थना करना एक अच्छा शिष्य नहीं बनाता है । पूर्ण विश्वास एवं अनुशासन एक शिष्य की पात्रता को परिभाषित करता है ।
                    
सिख गरू गुरु नानक के वंश में गुरु रामदास थे । वे चौथे सिख गुरु थे । उनके कई शिष्य थे जो उत्तम एवं योग्य के रूप माने जा सकते थे । सभी शिष्य अपने नियमित कार्य को करने और गुरु के प्रवचन में भाग लेने के लिए जाते थे । उनका (गुरु का ) का सबसे छोटा पुत्र अर्जनदेव भी एक शिष्य था । गुरु रामदास ने उसे रसोई घर में काम करने का तथा बर्तन साफ़ करने का नियत कार्य दिया था । अर्जन देव ने पूरे समर्पण के साथ गुरु सेवा की । उसने कभी भी प्रश्न नहीं किया कि उसे ही क्यों इस निम्न कार्य को करने के लिए कहा जाता था । गुरु का रसोई घर सदैव खुला रहता था और जो कोई भी किसी भी समय आता था उसे गर्मागर्म भोजन परोसा जाता था । अर्जन देव सदैव बर्तनों को  साफ करने में ही व्यस्त रहते थे ।
                                     
दूसरे शिष्य अर्जनदेव के निम्न कार्य के बारे में विचार करते थे । वे उसे चिढ़ाते थे । उन्होंने कहा : अर्जन बर्तनो को माजना बंद करो और आओ तथा प्रवचनों में भाग लो । तुम अपने वर्तमान क्रियाकलाप से गुरु को प्रसन्न नहीं कर सकते हो । आओ तथा दूसरी गुरु सेवा करो । तब तुम गुरु को प्रसन्न रख सकते हो । अर्जन देव ने उत्तर दिया : मेरा कर्तव्य गुरु कि आज्ञा मानना है । मैं अन्य कार्य को करके उन्हें प्रसन्न करने का लक्ष्य नहीं रखता हूँ ।
                               
दूसरे शिष्यों ने सबकुछ अर्जनदेव पर छोड़ दिया एवं उसे अकेला छोड़ दिया । गुरु अर्जनदेव से उसके प्रेम ,निष्ठा और आज्ञाकारिता के कारण बहुत प्रेम करते थे । समय गुज़रता गया । गुरु एवं अन्य शिष्य प्रवचनों, धार्मिक सभाओं एवं अन्य कार्यों में व्यस्त थे । तभी एक शिष्य को गुरु के कार्यों को करने के लिए लाहौर भेजने की आवश्यकता हुई । दूसरे शिष्यों ने अर्जनदेव को भेजने की गुरु से याचना की । वे अर्जनदेव को मार्ग से भ्रमित करना चाहते थे और प्रत्येक शिष्य गुरु का अगला उत्तराधिकारी होना चाहता था । अर्जनदेव ने शान्तिपूर्वक गुरु की उक्ति को स्वीकार किया और लाहौर चला गया । उसे अपने गुरु की कमी अत्यधिक महसूस हुई और उसने दो पत्र गुरु को लिखे । आश्रम में अन्य शिष्यों ने पत्रों को छुपा दिया । जब तीसरा पत्र आया गुरु ने उसे देखा । वे समझ गए कि अर्जनदेव ने भी पहले भी उन्हें लिखा है एवं दूसरे शिष्यों ने उसे छिपाने कि साजिश की है । अर्जनदेव के प्रेम एवं निष्ठा को देखकर उन्होंने उसे लाहौर से वापस बुलाया एवं उसे अपने उत्तराधिकारी के रूप में घोषित किया ।
                           
पूर्ण निष्ठा एवं आज्ञाकारिता जो अर्जनदेव अपने गुरु के प्रति रखते थे " उन्हें अन्य दूसरे शिष्यों के अपेक्षाकृत जो गुरु से भौतिक रूप से अधिक निकट थे और शायद शास्त्रों से अच्छी तरह से अवगत थे उनके (गुरु के ) उत्तराधिकारी के रूप में चुना । गुरु अर्जनदेव एक महान गुरु हुए । वे ईश्वरीय भक्ति, निःस्वार्थ सेवा और सार्वभौमिक प्रेम का अवतार थे । उन्होंने समाज के कल्याण के लिए योगदान दिया । उन्होंने अमृतसर में स्वर्ण मन्दिर का निर्माण कराने में महती भूमिका निभायी । उन्होंने पूर्व गुरुओं की शिक्षाओं को एकत्रित एवं संकलित किया एवं उसे गुरु वाणी का नाम दिया । उन्होंने गुरु वाणी को स्वर्णमन्दिर में स्थापित किया । वे अपने सिद्धांतो पर अडिग रहे जिसमे उन्होंने विश्वास किया और अन्त में उन्होंने अपने जीवन का बलिदान कर दिया मानव जाति के इस इतिहास में अनूठा बलिदान प्राप्त कर लिया ।
             
जब रसोईघर ने उनके गुरु के आशीर्वाद को प्राप्त करने में सहायता प्रदान की, वे वंश के महानतम गुरुओं में से एक में परिवर्तित हो गए ।



रविवार, 20 अक्टूबर 2013

हम प्रसन्नता की खोज क्यों करते हैं

आदि काल से जब से हम पैदा हुए हम प्रसन्नता की खोज करते हैं । हम इसे भोजन, जल ग्रहण करने, शांतिपूर्ण निद्रा, अच्छे कपड़े, अच्छे घर के दौरान सुविधाओं सहित तथा अन्य आरामों में खोजते हैं । हमारा सम्पूर्ण अस्तित्व वासनाओं की पूर्ति एवं प्रसन्न होने की तैयारी में ही लगा रहता हैं ।
                      
प्रसन्नता एक मायावी लक्ष्य होता है । हम इसे खोजते हैं । हम इसके लिए कार्य करते हैं और प्राप्ति हमारी वासनाओं का उद्देश्य होता है । हम कुछ समय के लिए प्रसन्न रहते है । तब प्रसन्नता क्षीण हो जाती है और पुनः हम इसे अन्य वासनाओं की पूर्ति हेतु खोजने लगते हैं । हम इस व्यवहार को एक बहुत छोटे बच्चे में भी देख सकते हैं जो इस बात का कोई ज्ञान नहीं रखता है कि क्या इच्छा या पूर्ति या प्रसन्नता है । कहाँ से बच्चा प्रसन्नता को ढूंढने के लिए सीखता है ? ऐसा क्या है जो हमे सम्पूर्ण जीवन प्रसन्नता की इच्छा करने एवं कार्य करने के लिए विवश करता है । 
                                   
संसार के सभी धर्म शास्त्री ने घोषित किया है कि हम शरीर नहीं है । हम अमर आत्मा हैं, आत्मा की प्रकृति परमानंद है । परमात्मा या ईश्वर अनन्त परमानंद में है । हम उस परमात्मा और अनन्त परमानन्द के हिस्से हैं । अब हम मानव शरीर में है और पृथ्वी पर रह रहे हैं । लेकिन हमारे अन्दर की आत्मा अपने मूल स्वरुप को जानती है और (परमानंद में) वापस जाने के लिए खोजती है । वह आनन्द- ईश्वर के अनन्त  परमानन्द के लिए विवश करती है । हम नहीं जानते हैं कि ईश्वरत्व की ओर कैसे वापस जायें एवं उस शांति एवं आनंद में स्थापित हों । इसलिए हम लोग भौतिक वासनाओं की पूर्ति में प्रसन्नता को ढूंढते हैं । ऐसी प्रसन्नता अनन्त आनन्द की केवल एक छाया मात्र होती है ।
                   
सर्वोच्च शक्ति , जीवात्मा और माया जीवन के अनन्त ब्रह्मांडीय नाटक के तीन स्थायी घटक हैं । ईश्वर जीवात्मा और माया को  नियंत्रित करता है । (द्वंद का भ्रम जो हमें ईश्वर से प्रथक करता है ) इस माया पर काबू पाने के लिए जिससे हम ईश्वर तथा एक दूसरे से प्रथक होते हैं, हमें ईश्वर की सहायता की आवश्यकता होती है ।  ईश्वर हमारी सीधे सहायता नहीं करता है । वह परम गुरु के रूप में आता है जो एक साधित स्वामी होता है एवं हमें मार्ग दिखाता है कि कैसे माया पर नियंत्रण पाया जाय तथा उससे (ईश्वर से) एकाकार हुआ जाए । परम गुरु का अनुसरण करो और ईश्वर को प्राप्त करो तथा सदैव प्रसन्नता एवं परमानंद के क्ष्रेत्र में रहो ।
                                                        
महान स्वामी या परम गुरु हमें ईश्वरत्व की ओर वापस जाने के मार्ग की शिक्षा देते हैं । वे ज्ञान तथा आन्तिरिक अनुभव का मार्ग रखते हैं एवं जानते हैं कि कैसे उस सर्वोच्च स्थिति में पहुंचा जाए । जब हम उनकी शिक्षाओं का अनुसरण करते हैं हम उस परमानंद की स्थिति को प्राप्त करते हैं । सीता राम का मंत्र जाप कुण्डलिनी महा योग प्रणाली, ध्यान और परम गुरु की शिक्षाओं का व्यवस्थित एवं अनुशासित ढंग से अनुसरण करना हमारी परमानंद की स्थिति में पहुँचने में सहायता करता है । भक्ति में रहो और ईश्वरत्व तथा परम गुरु के प्रति समर्पित हो और परमानंद में रहो । एक बार जब हम इस स्थिति में पहुँच जाते हैं, यद्यपि हम इस संसार में रहते हैं, हम भौतिक वासनाओं के पीछे मूर्खतापूर्वक नहीं भागेंगे ।
                                      
सदैव ध्यान रखो कि तुम एक शरीर नहीं हो। तुम अमर आत्मा-ईश्वर की संतान हो । परमानंद तुम्हारे अन्दर है । भौतिक संसार की वैकल्पिक प्रसन्नता में कोई संतुष्टि नहीं है। अपने आधारों का चयन करो और अनुभव करो कि तुम दिव्य प्राणी हो और परमानन्द से परिपूर्ण हो । आज इस शरीर के जन्म दिवस पर तुम सबको आशीर्वाद देता हूँ कि तुम सब ज्ञान प्राप्त करो और देवी सरस्वती से अधिकाधिक ज्ञान प्राप्त हो और सदैव प्रसन्न रहो ।

बसंत पंचमी - देवी सरस्वती का उत्सव

भारत में माघ के माह का हिन्दू चन्द्र दिवस बसन्त  ऋतु  होता है और बसन्त पंचमी बसंत ऋतु की ताजगी एवं खूबसूरती का उत्सव होता है । बसंत ऋतु जीवन के नवीनीकरण का समय, नवीन सम्बन्धों का आशाओं एवं सुधार तथा सफलता के नवीनीकरण का अवसर होता है । बसंत पंचमी का अध्यात्मिक पहलू  भी बहुत महत्वपूर्ण है । यह सरस्वती पूजा होती है । प्रकृति का पुननिर्माण नवीन उन्नति का प्रभावशाली नृत्य, सुन्दरता एवं हमारे चारों ओर का जीवन देवी सरस्वती -शिक्षा की देवी का स्वरुप, लावण्य तथा सुन्दरता होती है । वह लौकिक बुद्धिमत्ता एवं दिव्य भण्डार तथा ज्ञान की अभिव्यक्ति हैं । उत्सव तथा पूजा चन्द्र पखवाड़े के पाँचवे दिन मनाई जाती है । यह सामान्यतः जनवरी के उत्तरार्ध तथा फरवरी के पूर्वार्ध में पड़ता है ।
                                                                                                                             
इस वर्ष बसंत पंचमी 28 जनवरी को है । उत्सव इस बात का भी सूचक होता है की जाड़े का समापन हो गया है एवं बसंत ऋतु का आरम्भ हो गया है । छोटे दिन एवं सर्द रातें समाप्त हो गई है और इसकी गर्मी तथा हवा तरोताजा है । प्रकृति पूर्ण खिले हुए स्वरुप में है । फूल, फल एवं पत्तियां हमारे चारों ओर के संसार को जीवन रंग एवं सुगंध से परिपूर्ण कर देती है । बसंत ऋतु प्रणय तथा प्रेम का प्रतिनिधित्व करता है । हजारों विवाह बसंत पंचमी के दिन पर किये जाते हैं क्योंकि यह दिन बहुत शुभ दिन होता है तथा इस दिन पर विवाह तथा अन्य दूसरे शुभ कार्य बिना हिन्दू पंचांग में उचित दिन को देखे हुए किये जा सकते हैं ।
                                                                                             
क्योंकि बसंत पंचमी एक बहुत शुभ दिन होता है, अतः अन्य दूसरे कार्य भी इस दिन पर किये जाते हैं । बच्चों को वर्णमाला तथा प्रथम शब्द को लिखने की शिक्षा दी जाती है । ब्राह्मणों को घर बुलाया जाता है और उन्हें खिलाया जाता है तथा दान भी दिया जाता है । पितृ तर्पण या काले तिल  एवं चावल तथा जल को पूर्वजों को पूजा के संस्कार के रूप में समर्पित किया जाता है । इस उत्सव में पीला  रंग एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है क्योंकि यह शुभ होता है | यह खेत में पके हुए मक्के का भी रंग होता है। यह फसलीय समय होता है तथा लोग प्रसन्न होते हैं । वे पीला  वस्त्र धारण करते हैं । पीली मिठाइयाँ तैयार की जाती हैं तथा खायी जाती है । देवी सरस्वती को पीला वस्त्र पहनाया जाता है एवं पूजा की जाती है । बच्चे पतंग उड़ाते हैं ।  भारत के कई राज्यों में पतंग उड़ाने का उत्सव मनाया जाता है । इस उत्सव को लोगों द्वारा अत्यधिक उत्साह एवं उमंग से मनाया जाता है ।
                                                      
देवी सरस्वती महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती जैसी तीन देवियों का एक हिस्सा हैं । वे ज्ञान तथा बुद्धि का शीर्ष श्रोत हैं । वे संगीत, सारंगी एवं भाषा की देवी हैं । वे सभी कला, विज्ञान, शिल्प एवं दूसरी योग्यता का प्रतीकत्व करती है । वे विभिन्न नामों से पुकारी जाती हैं - श्री शारदा, वाकदेवी, वीणावादनी इत्यादि । वे सफ़ेद स्वरूपित हैं तथा सफ़ेद वस्त्र धारण करती हैं । वे पद्मासन मुद्रा में एक सफ़ेद कमल में विराजमान होती हैं । वे शुद्धता एवं श्रेष्ठता को प्रस्तुत करती हैं । वे शांत, निर्मल एवं राजसी हैं । उनके चार हाँथ हैं जो शिक्षा में मानव व्यक्तित्व को प्रस्तुत करते हैं :- बुद्धि, ज्ञान, सजगता एवं अहंकार । एक हाँथ में वे एक कमल पकडे हुए हैं जो सच्चे ज्ञान का प्रतीक और दूसरे हाँथ में वे पवित्र ग्रंथों को धारण किये हैं । वे दोनों हाँथ में वीणा धारण किये हुए हैं एवं लौकिक प्रेम एवं बुद्धि की धुन बजाती हैं । उनका वाहन सफ़ेद हंस हैं । हंस पानी एवं दूध के मिश्रण से दूध को प्रथक करने की अपनी क्ष्रमता के लिए प्रसिद्द हैं । हमे भी जीवन में कल्पना से तथ्य को प्रथक करना सीखना चाहिए । उनका दूसरा वाहन मोर हैं जो अहंकार को प्रकट करता है । वे हमे स्मरण कराती हैं कि ज्ञान अहंकार पर काबू पाता है ।
                                                      
सरस्वती पूजा भारत के सभी घरों में की जाती है । सभी शैक्षिक संस्थान, विद्यार्थी, अध्यापक एवं शिक्षाविद उनकी आराधना करते हैं । गायक एवं संगीतकार भी उनकी पूजा करते हैं ।  किताबें एवं वाद्ययंत्र उनकी मूर्ती या तस्वीर के सम्मुख पूजा के दौरान रखे जाते हैं और उनके आशीर्वाद की ज्ञान, बुद्धि एवं ललित कला के लिए मांग की जाती है । बसंत पंचमी के इस पावन  दिवस पर देवी सरस्वती की अपने घर में तथा अपने ह्रदय में आराधना कीजिये । आपको ज्ञान बुद्धि एवं सर्वोच्च सत्य को प्रदान करने के लिए उनका आशीर्वाद लीजिये । हमें उनकी कृपा की जीवन में हर क्षण आवश्यकता है । हम बिना ज्ञान एवं बुद्धि के काम नहीं कर सकते हैं । जब हम ज्ञान का सम्मान तथा आदर करते हैं , हम देवी सरस्वती का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और ज्ञान का उचित उपयोग करने के योग्य होते हैं ।













गुरु सेवा - दीपक

गुरु अपने सभी शिष्यों पर समानरूप से प्रेम बरसाते हैं । लेकिन शिष्य में उनके प्रेम को प्राप्त करने की एवं पकड़े रहने की क्ष्रमता होनी चाहिए । गुरु की ओर से कोई पक्षपात या भेदभाव नहीं होता है जब वे अपना प्यार और आशीर्वाद सब पर बरसाते हैं । गुरु सूर्य की तरह होते हैं । सूर्य सबके ऊपर समान रूप से चमकता है । लेकिन यदि कोई एक कमरे में सभी खिड़की तथा दरवाजे को बंद करके बैठने की हठ करता है, उसे सूर्य की किरण प्राप्त नहीं होगी । सूर्य को इस बात के लिए आरोपित नहीं किया जा सकता है । जब एक शिष्य अपने गुरु के लिए असीम प्रेम रखता है, उनके प्रति निष्ठावान होता है और उचित क्ष्रमता से गुरु सेवा करता है, वह गुरु के प्यार एवं आशीर्वाद को संजोये हुए एक मूल्यवान पात्र हो जाता है एक ऐसी ही कहानी - दीपक और उनके गुरु वेदधर्म की है ।

गुरु वेद धर्म उत्तर भारत में गोदावरी नदी के तट पर रहते थे । उनके कई शिष्य थे, एवं वे समान रूप से सभी को प्रेम करते थे । एक बार उन्होंने परिक्षण करने तथा देखने का निश्चय किया कि उनके शिष्यों में कौन उन्हें सच्चे रूप से प्रेम करता है । उन्होंने सभी को बुलाया एवं घोषणा की : अपने पूर्व जन्म में मैंने एक महान पाप किया है, इस जीवन में अपने ताप तथा अध्यात्मिक अभ्यास के कारण मैंने अपने कुछ बुरे कर्मों को दग्ध कर लिया है । मुझे शेष को शीघ्र ही भोगना पड़ेगा । यह मुझे रोग के रूप में प्रभावित करेगा जिससे मैं  अपंग हो जाऊंगा । ऐसा मेरे साथ दो वर्षों तक रहेगा जिसके बाद मैं सामान्य हो जाऊंगा । मैं इस अवधि के दौरान काशी में रहने की इच्छा रखता हूँ । तुम में से कौन मेरे साथ आएगा एवं इस अवधि में मेरी सेवा करेगा ?
                       
केवल दीपक के अलावा किसी भी शिष्य ने स्वेच्छा से अपने आपको प्रस्तुत नहीं किया । दीपक अपने गुरु का निष्ठावान शिष्य था । वह अपने गुरु से अत्यधिक प्रेम करता था एवं गुरु में ईश्वर को देखता था । उसने गुरु वेदधर्म से कहा : मैं आपके साथ रहूँगा और काशी में इन दो वर्षों तक आपकी सेवा करूँगा । गुरु ने कहा : अपने को प्रस्तुत करने से पूर्व विचार कर लो । मैं बहुत कमज़ोर तथा अपाहिज हो जाऊंगा । मेरी देखभाल करना सरल नहीं होगा । मैं दो वर्षों तक अन्धा  व् लंगड़ा हो जाऊंगा। दीपक ने उत्तर दिया मैं भयभीत नहीं हूँ । क्या मैं दो वर्षों के लिए  काशी जा सकता हूँ, आपके बजाय बीमारी एवं कष्ट की देखभाल कर सकता हूँ ? गुरु दीपक के इस अनुरोध को सुनकर अत्यधिक प्रसन्न हुए । लेकिन उन्होंने इसे मना कर दिया ।  उन्होंने कहा : हममे से प्रत्येक को अपने कर्मों के परिणामों को भोगना पड़ता है । मैं अकेला अपने कर्मों को भोगूँगा । लेकिन तुम आ सकते हो और मेरी सेवा कर सकते हो ।अल्प समय में ही उन्होंने काशी के लिए आश्रम छोड़ दिया । और कुछ दिनों में ही काशी पहुँचने पर गुरु वेदधर्म के शरीर में छाले पड़ गए और वे अपंग तथा अंधे हो गए । दीपक पास के घरों में गया और उन दोनों की देखभाल हेतु याचना की । गुरु अत्यधिक पीड़ा में थे एवं बहुत चिडचिड़े थे । वे क्रोधित हो गए तथा बिना किसी कारण के दीपक पर चिल्लाने लगे । लेकिन दीपक धैर्यवान तथा मुस्कुरा रहा था । उसने गुरु के सभी नखरों को सहा और निष्ठा एवं प्रेम से उनकी सेवा की ।
                  
दीपक की गुरु भक्ति तथा सेवा को देखकर , देवताओं के राजा इंद्र प्रकट हुए । उन्होंने स्वर्ग में दीपक को एक स्थान देने के लिए कहा । दीपक ने उत्तर दिया कि  सर्वोच्च स्वर्ग गुरु की श्री चरणों में तथा गुरु की सेवा करना है और उसने इंद्र को वापस भेज दिया । कुछ समय के पश्चात , दीपक की गुरु सेवा से प्रसन्न होकर भगवान् शिव प्रकट हुए । उन्होंने दीपक से मनचाहा वरदान मांगने को कहा । दीपक ने कहा : कृपया मुझे मेरे गुरु से परामर्श लेने दीजिये । दीपक ने अपने गुरु से पूछा कि क्या वह भगवान से उन्हें निरोग करने के लिए कह सकता है । गुरु ने इन्कार कर दिया और कहा कि यह स्वीकार्य नहीं है । इसलिए दीपक ने भगवान् शिव को वापस भेज दिया ।
                         
कुछ दिनों बाद भगवान् विष्णु प्रकट हुए । वे इस कारण से प्रसन्न थे कि  दीपक ने गुरु में ईश्वर  देखा है एवं गुरु की सेवा की है । जब उन्होंने दीपक को वरदान माँगने को कहा दीपक ने गुरु भक्ति का वरदान माँगा । भगवान  ने उसे विधिवत आशीर्वाद दिया और कहा : तुमने अपनी भक्ति तथा सेवा से ईश्वर तथा गुरु दोनों की महत्ता को जान लिया है ।
                                 
दीपक ने अपने गुरु की सेवा जारी रखी । उसके गुरु सभी दिव्य प्राणियों से अवगत थे जो वहां आये थे एवं दीपक के उन सब के प्रति उत्तरदायित्वों से भी । दीपक को गुरु की परीक्षा से गुजरना पड़ा । गुरु वेदधर्म ने उसे ज्ञान, नाम, प्रसिद्धि और दीर्घायु का आशीर्वाद दिया ।
             
जब शिष्य को गुरु द्वारा कोई सेवा या कार्य दिया जाय, उसका ध्यान सम्पूर्ण रूप से उस पर होना चाहिए तथा उसे पूर्ण करना चाहिए । जो कुछ भी प्रलोभन उसके मार्ग में पुरस्कार या प्रशंसा के रूप में आये, उसे गुरु सेवा को बाधित नहीं करना चाहिए । गुरु के प्रेम के लिए तथा बिना किसी अहंकार से की गयी गुरु सेवा सर्वोच्च आशीर्वाद प्रदान करती है ।







गुरु सेवा का आशीर्वाद - कल्याण

ईश्वर की सर्वोच्च शक्ति ब्रह्माण्ड एवं प्राणियों पर नियंत्रण करती है । यह समझना मात्र नश्वर व्यक्तियों के लिए संभव नहीं होता  है कि ईश्वर कौन या क्या है, उनके नियम क्या हैं, वे कैसे संचालन करते हैं, उनके गुण क्या हैं एवं क्यों वे निश्चित कार्य करते हैं जो हमारे बुद्धि के परे होते हैं । केवल ईश्वर अपने बारे मे सबकुछ समझा सकते हैं । इसलिए ईश्वर अपने बारे में मानव समाज को शिक्षित करने के लिए गुरु के स्वरुप में प्रकट होते हैं । ईश्वर गुरु हैं और गुरु ईश्वर हैं । एक गुरु जिन्होंने अपने अहंकार पर नियंत्रण प्राप्त कर लिया है एवं स्वयं को ईश्वर से एकाकार कर लिया है, स्वयं में ईश्वर होता है ।  ऐसे गुरु की सेवा करना ईश्वर की सेवा करना होता है और ऐसी सेवा का आशीर्वाद तथा पुरस्कार आश्चर्यजनक होता है। समर्थ रामदास एवं कल्याण की इस कथा को समझें :
                                  
समर्थ रामदास एक शक्तिशाली एवं जाने माने गुरु थे । वे सज्जनगढ़ में रहते थे जो एक पहाड़ की चोटी पर था । किले में पानी का कोई भी स्रोत नहीं था । गुरु एवं उनके शिष्यों के लिए नियमित आवश्यकताओं का पानी पहाड़ी की तलहटी में एक गाव से लाना पड़ता था : किले में सभी व्यक्तियों की आवश्यकताओं के लिए पानी लाने एवं भरने का यह कार्य कल्याण नामक एक शिष्य द्वारा संपन्न किया जाता था । कल्याण अपने गुरु के प्रति असीम प्रेम रखता था एवं पानी भरने एवं लाने का कार्य गुरु सेवा की तरह करता था । सभी दूसरे  शिष्य गुरु के चरणों में बैठते थे एवं पवित्र किताबों तथा प्रश्न तथा उत्तर सत्र के माध्यम से ज्ञान अर्जित करते थे ।  कल्याण बहुत मुश्किल से अध्यन के लिए गुरु के श्री चरणों में बैठ पाता था । वह सुबह से शाम तक किले में पानी लाने एवं भरने में ही व्यस्त रहता था । वह गुरु का सबसे प्रिय शिष्य था एवं सभी शिष्य कल्याण से ईर्ष्या तथा द्वेष रखते थे । वे सोंचते थे कि क्योंकि वे गुरु के श्री चरणों में बैठते है तथा मेहनत से अध्यन करते हैं इसलिए वे कल्याण के अपेक्षाकृत अधिक ज्ञान रखते हैं और गुरु को उनसे अधिक प्रगाढ़ता रखनी चाहिए ।
                                      
समर्थ रामदास कल्याण के प्रति दूसरे शिष्यों की भावनाओं से अवगत थे। वे उन्हें कल्याण की प्रतिभा दिखाने के लिए उचित अवसर की प्रतीक्षा में थे । एक दिन अध्यन सत्र के दौरान , गुरु ने विद्यार्थियों से एक तर्कपूर्ण प्रश्न पूछा । उनमे से कोई भी उत्तर देने में सक्षम नहीं था । उसी समय कल्याण पानी की बाल्टियों को ढोते  हुए गुज़र रहा था । गुरु ने उसे पुकारा एवं वही प्रश्न उससे पूछा । कल्याण ने बड़ी सहजता से उचित उत्तर दे दिया ।
                                     
दूसरे विद्यार्थी स्तब्ध थे। उन्होंने गुरु से पूछा : कि कल्याण कैसे इस प्रश्न का उत्तर जानता है ? हमलोग रात दिन आपके सम्मुख बैठते हैं एवं अध्यन करते तथा सीखते हैं । हमलोग इस प्रश्न का उत्तर देने में सक्षम नहीं हुए । कल्याण कभी भी हमलोगों के साथ नहीं बैठता तथा अध्यन करता हैं । फिर भी उसने ठीक उत्तर दे दिया । समर्थ रामदास ने उत्तर दिया : कल्याण ने उचित समझ तथा दृष्टिकोण से गुरु सेवा की । उसके लिए गुरु की सेवा करना एवं किले में यहाँ सभी व्यक्तियों के लिए पानी की आवश्यकता का ध्यान रखना ईश्वर की सेवा करना है । वह इस कार्य को प्रसन्नतापूर्वक एवं निष्ठा पूर्वक करता है ।  उसने इस पर कोई असन्तोष नहीं रखा कि वह सम्पूर्ण दिन पानी ढोता है और आप सब लोग आराम से यहाँ बैठते हैं तथा अध्यन करते हैं । आप सब लोग केवल आद्ध्यात्मिकता का सिद्धांत जानते हैं। आपके लिए उक्ति " आपकी तरह लोगों की सेवा करना ईश्वर की सेवा करना है । एवं "गुरु ईश्वर हैं " केवल एक शब्द है । कल्याण ने अभ्यास से इन उक्तियों की सत्यता को जान लिया है । वह उचित द्रष्टिकोण एवं समझ से इस सेवा को कर रहा है । ईश्वर एवं गुरु का आशीर्वाद उसके ऊपर बरसता है । इसीलिए वह सम्पूर्ण ज्ञान रखता हैं । बाद में समर्थ रामदास ने कल्याण को अपना अधिकारिक लेखक उनके सभी गीतों एवं शिक्षाओं को लेखनबद्ध करने के लिए घोषित किया । समर्थ रामदास ने दसबोध एवं श्री मनाचे श्लोक की तरह कई पुस्तकों को प्रकाशित किया जो आज भी पढ़ी जाती हैं एवं श्रद्धेय है । कल्याण उनकी लेखनी थे ।
                                         
साधुओं एवं दूसरों के द्वारा भाषणों को सुनना एवं पुस्तकों का अध्यन करना हमलोगों को केवल किताबी ज्ञान देता है । सैधांतिक ज्ञानों का कोई उपयोग नहीं होता है । यह स्वादिष्ट व्यंजन को बनाने के तरीके को जानने की तरह होता है । हमलोग सामग्रियों एवं विधियों को जान सकते हैं तथा तैयार व्यंजन के स्वाद का विवरण रख सकते हैं । लेकिन मात्र इस बात को जानने से हमारी भूख शांत नहीं होगी । हमें वास्तविक व्यंजन को खाने की आवश्यकता होती है एवं स्वाद का आनन्द लेने की और अपनी भूख की पूर्ति के लिए भोजन करने की आवश्यकता होती है ।
                  
सीता राम मन्त्र का नियमित जाप कीजिये एवं ध्यान कीजिये । गुरु की शिक्षाओं का अनुसरण कीजिये । यह बात कोई मायने नहीं रखती है कि आप भौतिक रूप से गुरु के समीप हैं या दूर हैं । उनका ध्यान करके गुरु से मानसिक समीप होइये । अपने कार्य को करिए तथा आपको प्रदान किये गए अभ्यासों का अनुसरण कीजिये । यह सबसे अच्छी गुरु सेवा होती है जो आप कर सकते हैं एवं आप आशीर्वाद का फल भोगेंगे । जो कुछ भी आपके जीवन में कमियां होंगी उनकी पूर्ति हो जाएगी और आप में संतोष आएगा । गुरु सेवा कामधेनु की तरह होती है - पवित्र गाय जो सभी इच्छाओं की पूर्ती करती है। सेवा करने के प्रयोजन से गुरु की सेवा कीजिये । गुरु के प्यार के लिए गुरु की सेवा कीजिये । यह संभावित सेवा का सर्वोच्च स्तर हो सकता है ।                   




गुरु सेवा


गुरु सेवा गुरु के प्रति की गयी सेवा है । जब एक शिष्य अपने गुरु से प्रेम करता है वह गुरु की सेवा करता है । "गुरु सेवा जो सभी शिष्यों के लिए सामान्य है"  गुरु की शिक्षाओं का अनुसरण होती है और अध्यात्मिक तकनीकों का नियमित एवं अनुशासित ढंग से अभ्यास करना होती है । सभी शिष्य गुरु के प्रति भौतिक या भौगोलिक सामीप्य नहीं रखते हैं । इसलिए वे गुरु के प्रति व्यक्तिगत सेवा नहीं कर सकते हैं । इसलिए जहाँ कहीं भी शिष्य रहता हो जीवन के किसी भी पड़ाव में निम्नवत शिक्षाओं एवं दिशानिर्देशों द्वारा सेवा कर सकता है ।
                                                    
गुरु के प्रति सच्ची गुरु भक्ति या प्रेम निसंदेह गुरु की शिक्षाओं का अनुसरण करना होता है । एक शिष्य जो गुरु की शिक्षाओं का अभ्यास करता है , वह क्रोध, नुकसान, घमंड, आसक्ति एवं तामसिकता के आंतिरिक लघु परिपथों से ऊपर उठ जाएगा । वह आशीर्वाद के बारे में जो गुरु से प्रवाहित होता है दूसरों के लिए एक उदाहरण होता है । वह अध्यात्मिक रूप से फलता फूलता है एवं उसकी प्रेम एवं सेवा की सुगंध उसके गुरु को प्रदर्शित करती है तथा गौरवान्वित करती है ।
                
कुछ शिष्य होते हैं जो गुरु से सामीप्य या सम्बन्ध रखते हैं । गुरु उनसे अपने लिए कुछ कार्य करने के लिए कह सकते हैं । यह भी गुरु सेवा होती है । यह कोई भी कार्य हो सकता है । यह आश्रम में झाड़ू लगाना, कपड़ों को साफ करना, पौधों की सिंचाई करना, किराने का सामान खरीदना, भोजन पकाना, गुरु के चरणों को दबाना या आगंतुकों का स्वागत करना हो सकता है । शिष्य को इमानदारी एवं समर्पण से वही कार्य करना चाहिए जो उससे कहा जाये । उसे दूसरे को दिए गए कार्य पर ध्यान नहीं देना चाहिए ना ही उसे दूसरों के  द्वारा करने की प्रतीक्षा करनी चाहिए । शिष्य के मस्तिष्क में गुरु के प्रति स्वयं या पक्षपात की हीनता की भावना या अन्य नकारात्मक विचार नहीं होने चाहिए । गुरु द्वारा दिया गया कोई भी कार्य पवित्र होता है एवं उसका निष्पादन सर्वोच्च प्रतिभा के साथ होना चाहिए । प्रत्येक शिष्य को वही कार्य या सेवा दी जाती है जो गुरु द्वारा शिष्य की कार्मिक आवश्यकताओं तथा उनकी व्यक्तिगत योग्यता के आधार पर  भी निर्धारित किया  जाता है । किसी भी शिष्य को दूसरों को दिए गए कार्य को करने की  या ईर्ष्या की भावना नहीं रखनी चाहिए । हम लोगों द्वारा प्रेम एवं निष्ठा के साथ गुरु द्वारा तय  किये गए कार्य को करना सर्वश्रेष्ठ सेवा होती है जो हम कर सकते हैं ।
                                       
गुरु सेवा का आशीर्वाद उन क्षेत्रों को भरता तथा पूर्ण करता है जिसका शिष्य के जीवन में अभाव होता है । गुरु सेवा शिष्य के ऊपर स्वास्थ्य, अच्छे जीवन साथी, संतान, कार्य, धन, ज्ञान, बुद्धिमत्ता, आलौकिक क्ष्रमताओं, ईश्वर का आशीर्वाद  एवं निरपेक्ष से एकाकार के रूप में आशीर्वाद का प्रवाह होता है ।
                                           
राम ने वशिष्ठ ऋषि के प्रति गुरु सेवा को किया तथा उन्हें प्रसन्न किया । उनके गुरु ने उन्हें उन मन्त्रों से अवगत कराया जो युद्ध में विशिष्ट प्रयोजनों में प्रयोग किये जाते हैं । उन्होंने राम को चक्रों, नाड़ियों  तथा कुण्डलिनी शक्ति के ज्ञान से पुरस्कृत किया । उन्होंने राम को शक्तिपात दिया और बाद में राम ने शक्तिपात के इस ज्ञान को लक्ष्मण तथा हनुमान से अवगत कराया । हनुमान चिरंजीवी हैं । इसका तात्पर्य होता है कि वे अनन्त जीवन रखते हैं । हनुमान अब भी मानवता के लाभ के लिए सर्वथा उचित व्यक्ति को इस ज्ञान को देने की प्रतीक्षा करते हैं । ऐसा माना जाता है कि ध्यानयोगी परमेश्वर दास जी जो मेरे गुरु के गुरु हनुमान के रूप हैं, वे मानव जाति के विकास के लिए कुण्डलिनी महायोग के ज्ञान से गुजरे थे ।
                
कृष्ण ने भी अपने गुरु सान्दिपनी के आश्रम में गुरु सेवा की । उन्होंने भूमि को धोया एवं स्वच्छ किया, पूजन सामग्री, अलाव एवं पानी एकत्रित किया । यद्यपि वे भगवान विष्णु के अवतार थे, वे विनीत, आज्ञाकारी तथा समर्पित थे । उन्होंने अन्य दूसरे साधारण विद्यार्थियों की तरह अपने गुरु द्वारा दिए गए समस्त कार्य को सम्पादित किया । परिणाम के रूप में वे चौंसठ दिनों में चौंसठ कलाओं में माहिर हो गए । यह सही दृष्टिकोण से संपादित की गयी गुरु सेवा का आशीर्वाद है ।
                    
जो लोग गुरु सेवा करते हैं उन्हें सेवा उचित इच्छा, तत्परता एवं आज्ञा से तथा दूसरों के प्रति बिना किसी ईर्ष्या की भावना से करना चाहिए जो गुरु से निरन्तर सम्पर्क  में रहते हैं । जो लोग दूर हैं और गुरु से सीधे सम्पर्क नहीं रख सकते हैं , उन्हें नियमित रूप से मंत्र जाप एवं ध्यान करना चाहिए और सिखाये गए अध्यात्मिक अभ्यासों के दूसरे नियमों का अनुसरण करना चाहिए । गुरु सेवा सर्वोच्च सम्भावित पुरस्कारों को प्रदान करती है ।
                    
गुरु सेवा स्वयं में एक पुरस्कार है । सदैव गुरु की सेवा तन, मन, धन , एवं आत्मा से करें ।


















                

















गुरु का आशीर्वाद जीवन में परिपूर्णता लाता है

                                                 
हम सब ईश्वर के प्रति प्रेम रखते हैं । इस बारे में कोई संदेह नहीं है । लेकिन हम शरीर रूप रंग एवं भौतिक संसार के प्रति ईश्वर  के अपेक्षाकृत अधिक प्यार रखते हैं । जब हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं, यह आधी अधूरी ह्रदय की या उससे भी कम प्रार्थना होती है । जीवन में कुछ भी प्राप्त नहीं होता है यदि वह आधे अधूरे दृष्टिकोण या ह्रदय से किया जाता है । यदि हम ईश्वर को सबसे अच्छे मित्र के रूप में और जीवन में स्वयं को मार्गदर्शित होने के लिए चाहते हैं, हमें ईश्वर से सम्पूर्ण शक्ति तथा प्रेम से प्रार्थना करनी चाहिए । केवल तभी वे भी हमें अपनी उपलब्धि तथा प्रेम के साथ उत्तर देंगे ।

हमें उत्कंठा से ईश्वर की इच्छा रखनी चाहिए । ईश्वर के प्रेम के लिए तीव्र इच्छा रखना केन्द्रित होनी चाहिए । यह इतनी शक्तिशाली होनी चाहिए जितना एक प्यासे यात्री को जल की तीव्र आवश्यकता होती है । जो रेगिस्तान में कई दिनों से भटका हुआ है ।  जब मस्तिष्क एवं ह्रदय बेचैन रहते हैं तथा ईश्वर के लिए लालसा प्रज्वलित रहती है, गुरु प्रकट होते हैं और गुरु ईश्वर को प्राप्त करने का मार्ग दिखलाते हैं । गुरु शिष्य की क्ष्रमताओं को जानते हैं और उन्हें प्राप्त करने के लिए उसकी सहायता करते हैं । गुरु लघु परिणामों एवं शिष्य की आवश्यकताओं से अवगत होते हैं और उन्हें अपने आशीर्वाद से परिपूर्ण करते हैं । उनका आशीर्वाद शिष्य के भाग्य एवं कर्म में सभी अन्तरालों को परिपूर्ण कर देता है । जहाँ शिष्य के जीवन में कमी होती है , गुरु उसे पूरा करते हैं एवं परिपूर्ण करते हैं । यह शिष्य के जीवन को निपुण बनाती है एवं संतोष से परिपूर्ण करती हैं । शिष्य अपने जीवन को क्ष्रमताओं एवं महत्वाकांक्षाओं से परिपूर्ण करने में सक्षम हो जाता है और गुरु, ईश्वर एवं मानवता की सेवा पर भी केन्द्रित हो जाता है । शिष्य का जीवन जो आशीर्वादित इस तरह से होता है, सभी  प्रकार से पुरस्कृत एवं परिपूर्ण होता है । महान शिवाजी महाराज एवं उनके शक्तिशाली गुरु समर्थ रामदास की कथा का अवलोकन करें ।
                                                         
समर्थ रामदास एक शक्तिशाली तथा महाराष्ट्र के जाने माने गुरु थे । शिवाजी महाराज उनकी प्रसिद्धि के बारे में सुनने के पश्चात उनसे मिलने के लिए उत्सुक थे । वे कोंधावल चास्म गए जहाँ गुरु ने शिविर लगाया था एवं उनकी (गुरु की ) पूरे दिन प्रतीक्षा की । लेकिन गुरु वहां नहीं थे और शिवाजी को उत्सुकतापूर्वक बिना मिले हुए वापस लौटना पड़ा । उस रात और दूसरे दिन और रात, शिवाजी का मष्तिष्क समर्थ रामदस जी के विचारों में पूरे दिन रहा । जैसे -2 समय व्यतीत हुआ, उनकी गुरु से मिलने की तीव्र इच्छा बढ़ गयी । वे भवानी देवी के मन्दिर में गए एवं प्रार्थना में बैठ गए । उन्हें इस बात का आभास भी नहीं हुआ कि कब वे वहां निद्रा में गिर पड़े । उनके स्वप्न में समर्थ रामदास एक भगवा वस्त्र, खडाऊँ पहने हुए एक माला एवं बैसाखी बांह के निचे धारण किये हुए प्रकट हुए । उनके तेजस्वी स्वरुप को देख कर शिवाजी उनके चरणों में गिर पड़े एवं आशीर्वाद की याचना की । समर्थ रामदास ने उनके सिर को छुआ एवं उन्हें आशीर्वाद दिया । जब प्रातः काल वे जागे, वे एक नारियल पकडे हुए थे । भारत में नारियल गुरु द्वारा शिष्य को आशीर्वाद के रूप में प्रदान किया जाता एवं स्पर्श किया जाता है ।

उस क्षण के बाद से, शिवाजी ने समर्थ रामदास को अपने गुरु के रूप में  माना । गुरु बाद में सिंगनवाडी में उन्हें देखने के लिए आये । शिवाजी ने गुरु के पैरों को धोने की कर्मकाण्ड वाली पूजा की एवं  उन्हें फल एवं पुष्प समर्पित किये । गुरु ने उन्हें आशीर्वाद दिया एवं एक नारियल प्रदान किया। उन्होंने आशीर्वाद के रूप में उन्हें एक मुट्ठी भर कीचड़, कंकड़, एवं कुछ घोड़े की लीद भी दी । उन्होंने उनसे कहा : तुम शासन करने एवं लोगों की सेवा करने के लिए पैदा हुए हो । मेरा आशीर्वाद एवं मार्गदर्शन सदैव तुम्हारे साथ है । जहाँ कही भी तुम मेरा ध्यान करोगे, मैं तुम्हारा साथ दूंगा । बुद्धिमत्तापूर्वक शासन करो ।
                                               
गुरु अच्छी तरह उनके राज्य के शासन के लिए शिवाजी की आवश्यकताओं एवं अपेक्षाओं से अवगत थे ।"मुट्ठी भर वस्तुयें जो उन्होंने शिवाजी को प्रदान किया " ने शिवाजी की आवयश्यकताओं तथा उनकी परिपूर्णता के लिए गुरु के आशीर्वाद को प्रदर्शित किया । मुट्ठी भर कीचड़ ने पृथ्वी या राज्य को प्रदर्शित किया, कंकड़ पहाड़ी किले थे जिन्हें सुरक्षा एवं शत्रुओं से युद्ध की आवयश्यकता थी, घोड़े की लीद ने घोड़ों को प्रस्तुत किया जिन्हें युद्ध के लिए आवागमन के लिए एवं शत्रुओं से रक्षा के लिए प्रयोग किया जाना था तथा नारियल शिवाजी के कल्याण के लिए था ताकि वे मराठा राज्य के महाराज के रूप में तथा अपने व्यक्तिगत जीवन में अच्छा  करें । गुरु के आशीर्वाद ने यह सुनिश्चित किया कि शिवाजी को उनके जीवन में कभी कोई कमी नहीं पड़ेगी ।
                                                                                         
गुरु के प्रति तीव्र तड़प एवं उनके आशीर्वाद ने समर्थ रामदास को शिवाजी की ओर आकर्षित किया । उनके आशीर्वाद ने शिवाजी को एक बुद्धिमान और समर्थ शासक बनाया जिसने महाराष्ट्र में हिन्दू स्वराज्य को पुनः स्थापित किया । शिवाजी के शासन में विदेशी आक्रमणकारी काबू में थे, समाज में महिलाओं की स्थिति तथा सम्मान पुनः स्थापित हुआ, दासता समाप्त कर दी गयी थी । समाज निखरा हुआ था । यह सब शक्तिशाली समर्थ रामदास के आशीर्वाद एवं मार्गदर्शन के कारण था । यही वह कारण है कि गुरु की क्यों आवयश्कता होती है ।



गुरुवार, 3 अक्टूबर 2013

एक गुरु की आवश्यकता - सूरदास

जब शिष्य तैयार हो जाते हैं गुरु का आगमन होता है । शिष्य गुरु की खोज में नहीं जाते हैं । भौतिक सिद्धान्त गुरु को शिष्य के पास भेजते हैं । जब गुरु एवं शिष्य आपस में मिलते हैं, गुरु शिष्य के मज़बूत पक्षों एवं कमियों के प्रति जागरूक होता है । जहाँ कुछ कमियों पर काबू पाने की आवश्यकता होती है, गुरु शिष्य की सहायता करते हैं एवं ज्ञान तथा अध्यात्मिक अभ्यास को प्राप्त करने के लिए तैयार करते हैं । जब शिष्य गुरु के क्रियाकलापों के प्रति सचेत नहीं होगा तो क्यों उसके द्वारा कुछ अतिरिक्त करने के लिए कहा जाता है । जब शिष्य गुरु की निःसंदेह आज्ञा मानता है, वह मार्गदर्शित एवं प्रशिक्षित  होता है ।  उच्च ज्ञान प्राप्त करने के लिए इस प्रकार अब वह पूरी तरह से तैयार हो जाता है । यह कथा सूरदास एवं उनके गुरु की है । 
                                                                  
सूरदास एक युवा साधक ईश्वर के प्रति तीव्र रूप से आसक्त थे । एक गुरु उनके जीवन में प्रकट हुए तथा प्रशिक्षित करने एवं ईश्वर की ओर मार्ग दिखाने का वायदा किया । गुरु अवगत थे कि सूरदास स्वयं में एक अपूर्णता रखते थे । सूरदास अतिशीघ्र एवं तुच्छ सामग्रियों के लिए भी क्रोधित हो जाया करते थे ।  गुरु अवगत थे कि सूरदास का क्रोध आन्तरिक अवरोधों का कारण होगा जिसके कारण सूरदास ईश्वर की समीपता को महसूस नहीं कर पायेंगे ।  उन्होंने सूरदास की क्रोध के अवगुणों पर काबू पाने तथा उन्हें अध्यात्मिक अभ्यासों को प्राप्त  करने में तैयार करने में सहायता के लिए इच्छा की । उन्होंने सूरदास से कहा : अपने समस्त कार्यों एवं गतिविधियों के दौरान रात दिन भगवान् के नाम का एक मास तक जाप करो । नवीन मास  के आरम्भ होने के प्रथम दिन , प्रातः काल स्नान करो तथा मेरे पास आओ । मैं तुम्हे ईश्वर के मार्ग की दीक्षा दूंगा । 
                                                                                                                                                   सूरदास ने गुरु के निर्देशों का पालन किया । उन्होंने ईश्वर के नाम का रात दिन तथा अपनी समस्त गतिविधियों के दौरान जाप किया । नवीन मास के प्रथम दिन वे भोर में नदी की ओर भागे ,स्नान किया , स्वच्छ कपड़ों को पहना तथा गुरु के आश्रम की और प्रस्थान किया । जैसे ही वे आश्रम के समीप पहुंचे एक सफाई कर्मी जो मार्ग की सफाई कर रहा था भूलवश उनके कपड़ों पर धूल को झाड़ दिया और वे गन्दे हो गए । सूरदास ने आत्म संतुलन खो दिया एवं सफाई कर्मी पर चिल्लाने लगे । तुम मूर्ख एवं लापरवाह हो ! तुम्हारे कारण मुझे वापस जाना पड़ेगा तथा दोबारा स्नान करना पड़ेगा ।
                                                           
गुरु आश्रम से इस घटना का अवलोकन कर रहे थे । जब सूरदास उनके पास गए, उन्होंने कहा : प्रिय सूरदास , तुम अभी तैयार नहीं हो । कृपया एक मास तक उन्ही निर्देशों का पालन करो एवं पुनः मेरे पास आओ । सूरदास ने गुरु के आदेशों को स्वीकार किया तथा आश्रम छोड़ दिया । उन्होंने दूसरा मास रात दिन ईश्वर के नाम का जाप करने में व्यतीत किया । नवीन मास के प्रथम दिन वे नदी को गए स्नान किया एवं स्वच्छ कपडे पहने और आश्रम के लिए रवाना हुए । सफाई कर्मी आश्रम के बाहर  कार्य कर रहा था । वह मार्ग की सफाई कर रहा था और भूलवश उसने सूरदास के कपड़ों पर अपने झाड़ू से झाड़ दिया । सूरदास के आवेश की कोई सीमा नहीं रही ! वे सफाई कर्मी पर चिल्लाने लगे और गुरु ने पुनः उन्हें दूसरे मास के जाप करने के लिए भेज दिया । 
                                           
समयावधि की समाप्ति पर, सूरदास ने पुनः स्नान किया एवं गुरु के आश्रम की ओर गए । इस समय कुछ असामान्य घटित हुआ । सफाई कर्मी ने सूरदास को अपनी ओर आते देखा । उसे बिना किसी कारण चिल्लाया जाना स्मरण हो गया । वह आवेग से भर गया । उसने कीचड़ से भरी हुई कचरा टोकरी को उठाया और उसने जान बूझकर सूरदास के ऊपर उड़ेल दिया । और उस समय सूरदास की प्रतिक्रिया बहुत भिन्न थी । उन्होंने अपने हाँथ जोड़े तथा सफाई कर्मी से कहा : आप मेरे अध्यापक हैं । आपने मुझे क्रोध पर काबू पाना सिखाया । मैं आपका आभारी हूँ । 
       
गुरु आश्रम से बाहर आये और सूरदास का गर्मजोशी से स्वागत किया । उन्होंने कहा : तुम अब अंततः अध्यात्मिक शिक्षाओं तथा अभ्यासों को प्राप्त करने के लिए तैयार हो गए हो । 
                                                                                                                  
सफाई कर्मी जिसने सूरदास पर धूल झाड़ दी भूलवश ऐसा किया । उसकी जानबूझकर गलती नहीं थी । फिर भी सूरदास उस पर क्रोधित हो गए । अपने समस्त कार्य एवं गतिविधियों के दौरान लगातार तीन मास तक भगवान्  के नाम का जाप रात दिन करने के कारण, सूरदास अपने क्रोध पर नियंत्रण पा सके । यह सब कुछ गुरु के आशीर्वाद तथा उनके आदेश कि सूरदास को भगवान् के नाम का जाप करना चाहिए के कारण हुआ । सूरदास ने अपने गुरु की आज्ञा मानी एवं पुरस्कृत हुए । उनके गुरु सूरदास की अपनी नकारात्मकता पर नियंत्रण करने में सहायक हुए । क्रोध, नुकसान, लालच, आसक्ति, गर्व, तामसिकता की तरह नकारात्मकता हमारी आत्मा एवं ईश्वर के बीच में दूरियाँ पैदा करती हैं और हम ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करने में सक्षम नहीं हो पायेंगे या अपने अन्दर ईश्वर के प्रेम की मधुरता का आनन्द नहीं ले पायेंगे । एक गुरु का मार्गदर्शन एवं आशीर्वाद आवश्यक होता है । यही वह कारण है कि गुरु की क्यों आवश्यकता होती है । 




सोमवार, 2 सितंबर 2013

एक गुरु की आवश्यकता - नामदेव

"ध्यानमूलम गुरु मूर्ति , पूजा मूलम गुरुर पदम् ,
     मंत्र मूलम गुरुरवाक्यम, मोक्ष मूलम  गुरुकृपा " - गुरु गीता

गुरु के स्वरुप का अवलोकन करते हुए ध्यान कीजिये । गुरु के चरणकमलों  में समर्पित होकर पूजा को सीखिए । गुरु द्वारा बोला गया प्रत्येक शब्द एक मंत्र होता है और प्रबोधन बल्कि गुरु की असीम अनुकम्पा होती है । 
             
गुरु गीता की ये पंक्तियाँ पूर्णतयः गुरु के प्रति प्रेम तथा प्रशंसा की उद्घोषणा हैं । गुरु शिष्य को सर्वॊच्च का अनुभव करने में उसे सहायता प्रदान करता है । महाराष्ट्र में एक साधु नामदेव की कथा गुरु की महत्ता की व्याख्या करती है। 
             
नामदेव अपने जीवन में असामान्य कृपा रखते थे । पंढरपुर के भगवान् विट्ठल (कृष्णा )उनके द्वारा समर्पित आहार को ग्रहण करने हेतु नामदेव के सम्मुख भौतिक स्वरुप में प्रकट हो जाया  करते थे । नामदेव भगवान् से ऐसे बात करते थे जैसे कि हम लोग एक दूसरे से बात करते हैं । भगवान् उनके द्वारा गाये गए भजनों पर नृत्य भी किया करते थे । वे अपने समय के महान साधु माने जाते थे । एक बार कुम्हार संत - गोरा के आवास पर एक जन  समारोह था । उस समय के सभी प्रसिद्द साधु उपस्थित थे - ज्यानानेश्वर निवृत्ति, सोपान, मुक्ताबाई  एवं अन्य दूसरे । ज्यानानेश्वर ने गोरा कुम्हार से कहा कि वे निरिक्षण करे कि सभी बर्तन अच्छी तरह से पक गए हैं । गोरा समझ गए एवं उन्होंने अपनी छड़ी उठाई तथा वहां बैठे हुए सभी साधुओं के सिर पर प्रहार किया ठीक उसी प्रकार जैसे वे अपने मिटटी के बर्तनों को ठीक तरह से पके हुए देखने के लिए निरीक्षण करते थे । किसी ने एक शब्द भी नहीं कहा । लेकिन नामदेव ने रोषपूर्ण शब्दों के साथ आपत्ति की । छडी से सिर पर इस प्रहार से प्रहार करना उन्हें पसंद नहीं आया । मुक्ताबाई ने टिप्पणी  की यह बर्तन ठीक तरह से नहीं पका है । नामदेव क्रोधित हुए एवं उन्होंने आवेश में समूह को छोड़ दिया तथा सीधे विट्ठल के मन्दिर में गए । जब उन्होंने पुकारा भगवान् प्रकट हुए और उन्होंने भगवान् से शिकायत की । उन्हें आराम देने के बजाय, भगवान् ने उनसे कहा :- वह व्यक्ति जिसने गुरु के प्रति समर्पण नहीं किया है एवं गुरु से दीक्षा नहीं ली है, वह अधूरा होता है । राम के रूप में मैं संत वशिष्ठ के प्रति समर्पित हुआ हूँ एवं उनसे अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया है । कृष्ण के रूप  में मैं संत सान्दिपनि के आश्रम में गया एवं उनसे दीक्षा ग्रहण की । गुरु विसोबा के पास जाओ । तुम उन्हें मल्लिकार्जुन के शिव मन्दिर में पाओगे कृपया उनके पास जाओ एवं उनसे दीक्षा लो । यही तुम्हे पूर्ण करेगा । गुरु के श्री चरणों में शरण लेने के अतिरिक्त पूर्ण होने का कोई अन्य मार्ग नहीं है ।
            
इसलिए उनके पास कोई विकल्प नहीं था । नामदेव मल्लिकार्जुन के मन्दिर  में गए एवं उन्होंने गरु का अवलोकन किया । विसोबा शिवलिंग के ऊपर चरण रखकर सो रहे थे । नामदेव स्तब्ध हुए एवं उन्होंने कहा :- मैंने सुना है कि आप एक महान साधु हैं, फिर भी आप ऐसा आचरण कर रहे हैं ? विसोबा ने उत्तर दिया :- मैं एक बूढा व्यक्ति हूँ । मेरे पास शिवलिंग से पैर हटाने की शक्ति नहीं है । कृपया इसे कहीं भी रख दीजिये तथा उत्तम कार्य को करने के लिए पुरस्कृत होइये । नामदेव ने विसोबा के पैर को खींचा तथा उन्हें दूसरी जगह रख दिया । और तभी अचानक शिवलिंग  भूमि से निकल आया एवं बूढ़े व्यक्ति के चरणों को सहारा दे दिया । क्रोधित एवं सशंकित , नामदेव ने बूढ़े साधु के चरणों को उठाया एवं उसे अन्य दूसरे स्थान पर रख दिया । और प्रत्येक जगह एक शिवलिंग विसोबा के चरणों को सहारा देने के लिए निकल जाता था । नामदेव ने अनुभव किया कि विसोबा एक महान गुरु हैं एवं वे उनके चरणों में गिर गए तथा स्वयं को शिष्य बनाने की याचना की । वे समझ गए कि शिवलिंग का चमत्कार स्थान ले लेता था क्योंकि विसोबा शिवलिंग से एकाकार थे एवं जहाँ विसोबा उपस्थित थे - शिव उपस्थित थे । 
                                                                                                    
नामदेव विसोबा के साथ ठहरे एवं उन्होंने अपने गुरु से अध्यात्मिक अभ्यासों को सीखा । उन्होंने अनुभव किया कि सत्य उनके अन्दर है तथा उनके चारों ओर है । उन्होंने  स्वयं को विट्ठल के रूप में तथा संसार को उसी ईश्वर के रूप में अपने चारों ओर देखा। जब वे पंढरपुर वापस आये, एक भोज का आयोजन हो रहा था । नामदेव भी भोजन के लिए नीचे बैठ गए । भकरी- अनाज ज्वार की बनी हुई एक रोटी जो घी के साथ  परोसी गई थी जो पत्तियों से बने एक प्याले में रखी हुई थी । एक कुत्ता आया और उसने नामदेव के पत्तल से भकरी को झपट लिया तथा भागा । नामदेव ने घी का प्याला उठाया तथा कुत्ते के पीछे दौड़ पड़े । वे चिल्लाये :-ओ विट्ठल ऐसी भकरी को मत खाओ । यह बहुत सख्त एवं सूखी हुई है । मुझे इसे घी में भिगो लेने दो एवं आपको प्रदान करने दो । तब इसका स्वाद बेहतर होगा । 
                                         
नामदेव इस सत्य को जान गए थे कि सभी प्राणी उनके भगवान्  विट्ठल के स्वरुप थे । इसलिए वे कुत्ते के पीछे भागे तभी उन्होंने घी में भिगोई हुई भकरी को खिलाने के लिए अपने ईश्वर को सामने देखा । बाद में जब वे भगवान् विट्ठल से मिले एवं उनको गले लगाया, भगवान् ने शिकायत की :- अपने गुरु को पाने के उपरान्त, तुम्हारे पास मेरे लिए समय नहीं रहा । नामदेव ने उत्तर दिया :- मैंने अज्ञानता पर काबू प्राप्त कर लिया है एवं मैं आपको अपने गुरु से प्रथक नहीं देखता हूँ । आप दोनों एक हैं और विट्ठल ने टिप्पणी की : बर्तन अब पक गया है । 
                                           
यद्दपि नामदेव ने भगवान से वार्तालाप की एवं उन्हें अपने हाथों से खिलाया भी था, फिर भी उनका अनुभव अधूरा था क्योंकि उनके पास एक गुरु नहीं था उन्हें शिक्षित करने के लिए कि कैसे अज्ञानता पर काबू पाया जा सकता है एवं सभी प्राणियों को ईश्वर के रूप में देखा जा सकता है । यही वह कारण है कि एक गुरु की क्यों आवश्यकता होती है । 

मंगलवार, 20 अगस्त 2013

एक गुरु की आवश्यकता

 गुरु हमारे अन्दर होते हैं । गुरु को बाहर क्यों ढूंढा जाये ? इन दिनों इन्टरनेट, प्रिंट मीडिया एवं दूसरे प्रकार के मीडिया में सामान्यतः यह वक्तव्य प्रकाशित होता है ।  जो  इन वक्तव्यों को कहते हैं, वे चाहते हैं कि सभी लोगों द्वारा निर्बाध रूप से उनके वक्तव्य को स्वीकार किया जाए । वे यह भी चाहते हैं कि गुरु के रूप में उनके अनुयायियों द्वारा उन्हें स्वीकारा जाय । क्योंकि वे सिखाते हैं कि गुरु अन्दर होता है । 
                                                                                                         
वक्तव्य 'गुरु स्वयं में होता है ' वास्तव में सत्य है । निश्चित रूप से गुरु स्वयं में होता है । एक निश्चित सीमा बाद आन्तिरिक  गुरु विद्द्यार्थी की सहायता करता है । लेकिन इस आन्तिरिक गुरु तक पहुँचना अत्यन्त कठिन है । ईश्वर मौलिक गुरु होते हैं । केवल ईश्वर ईश्वर को जानते हैं । इस प्रकार ईश्वर गुरु का स्वरुप माने जाते हैं एवं उन्हें सर्वोच्च शक्ति के बारे में बताने एवं मार्गदर्शन  देने के लिए मानव समाज के बीच में पैदा होते हैं । 
                            
ईश्वर स्वयं में होते हैं । हम लोगों ने इसे पढ़ा है तथा इसके बाते में बताया है । फिर भी हमलोग क्यों ईश्वर को महसूस करने में सक्षम नहीं होते हैं जो हमलोगों के अन्दर होता है । यह इस कारण होता है कि इस सत्य के बारे में सुनना या पढना अपने अन्दर के इस सत्य को अनुभव करने  से कुछ भिन्न होता है । जब हम इस सत्य को जान जाते हैं कि ईश्वर स्वयं में है और उसका उन तरीकों से अनुभव करते हैं जो हमे पूर्णतयः प्रेरित कर रहे होते हैं, तब हम अपने अन्दर ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करने तथा अपने चारों ओर ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करने में सक्षम हो जायेंगे । इस उदाहरण से समझें 
                                                                                                                  
एक व्यक्ति को मक्खन की सख्त आवश्यकता थी । उसने अपने पड़ोसियों से कुछ मक्खन देने के लिए कहा । किसी ने उसे मक्खन नहीं दिया । तब किसी ने उससे कहा : तुम अपने घर पर एक गाय रखो । तुम स्वयं से मक्खन क्यों नहीं तैयार करते हो ? मैं  तुम्हे बताऊंगा कि इसे कैसे तैयार करना है । वह व्यक्ति इस बात को नहीं जानता था कि मक्खन गाय के दूध से तैयार किया जाता है । उसने दूसरे व्यक्ति से इस विधा  को सीखा कि दूध से कैसे मक्खन निकाला जाता है तथा मक्खन की पर्याप्त मात्रा  को प्राप्त किया। 
                                                     
हम उपरोक्त उदाहरण के उस व्यक्ति की तरह होते हैं । उसके पास गाय थी, उसके पास दूध था । लेकिन वह नहीं जानता था कि दूध से क्रीम को कैसे प्रथक करना है एवं उसे मथना है । उसे उस व्यक्ति से इस विधा को सीखना पड़ा जो उसे जानता था । हमें इस ज्ञान को प्राप्त करने की आवश्यकता होती है कि स्व में निहित इस वास्तविकता (ईश्वर स्वयं में है ) को कैसे प्रथक (स्वयं से अनुभव करना है ) करना है ।  हमें इस सत्य को गुरु से सीखने की आवश्यकता होती है । हमें अपने अन्दर जाने के लिए और मस्तिष्क को स्थिर करने के लिए गुरु के स्पर्श एवं ज्ञान की आवश्यकता होती है । हमें अपने अन्दर स्वयं का मंथन करने के लिए एवं आत्मसाक्षात्कार के रूप में मक्खन को प्राप्त करने के लिए गुरु से ये अध्यात्मिक विधाओं को सीखने एवं अभ्यास करने की आवश्यकता  होती है । हम सब मक्खन - स्वयं में ईश्वर /गुरु  की उपस्थिति लिए हुए हैं लेकिन यह नहीं जानते हैं कि स्व का कैसे मंथन करना है और मक्खन ( स्वयं में विराजमान गुरु / ईश्वर ) की उपस्थिति का स्पष्टीकरण ) को कैसे प्राप्त करना है ।  इसलिये हमें आन्तिरिक गुरु का अनुभव करने के लिए वाह्य गुरु की आवश्यकता होती है । 
                                                                          
समय तथा किये गए प्रयत्नों के साथ-2  किसी भी  प्रकार का ज्ञान अर्जित किया जा सकता है । यह सांसारिक या अध्यात्मिक ज्ञान हो सकता है । लेकिन इसे अर्जित करने में बहुत अधिक समय लगता है एवं आधिकाधिक प्रयत्न स्वयं द्वारा करना पड़ता है । हमें उचित मार्ग में उचित कार्य को सीखने से पूर्व कई कार्य प्रणालियों एवं विधाओं को सीखना पड़ता है । यह एक गुरु से सीखना अत्यधिक सरल होता है जो ज्ञान एवं अनुभव रखते हैं । गुरुओं  ने अपने गुरुओं से इसे सीखा है और ये ज्ञान आदि अनादि काल से प्रदान किये समय के साथ समुचित एवं मिलते जुलते परिणामो को देने के लिये प्रमाणित किये गए हैं । एक सक्षम गुरु से सीखकर हम समुचित ज्ञान प्राप्त करते हैं एवं अल्प समय में ही उचित कार्य प्रणालियों को सीखते हैं ।  स्वयं से सीखने में बहुत अधिक समय लगता है । तथा समय के साथ हमने विशेष रूप से आध्यात्मिकता के मार्ग में विभिन्न तकनीकों का प्रयोग किया है  एवं प्रमाणित किया है । प्राप्त की गई एक तकनीक जो हमें संतोषजनक परिणाम देती है,हम स्वयं एवं शक्ति का बहुत बड़ा हिस्सा खो देंगे तथा अपने समय की समाप्ति से पूर्व अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उसे ( तकनीक  को ) पाना कठिन होगा । 
                                                         
राम, कृष्ण और महान साधुओं की तरह अवतारों ने भी गुरुओं को रखा था । राम ने अपने ज्ञान एवं अध्यात्मिक अच्छाइयों का सम्पूर्ण क्ष्रेय अपने गुरुओं को दिया । एक अवतार के रूप में वे इस संसार में सम्पूर्ण ज्ञान स्वयं द्वारा सीखे हुए आ सकते थे । लेकिन वे गुरु की आवश्यकता एवं महत्ता को संसार को दिखाने के लिए गुरु वशिष्ठ के पास गए । बाद में उन्होंने गुरु विश्वामित्र तथा ऋषि अगस्त्य से ज्ञान अर्जित किया । कृष्ण गुरु सान्दीपनि के पास गए एवं ज्ञान अर्जित किया । गुरु की भूमिका एवं उनकी महानता का वर्णन गुरु गीता में किया गया है । गुरु गीता भगवान् शिव एवं उनकी शक्ति पार्वती देवी के बीच एक वार्तालाप है । इसमें भगवान् शिव ने गुरु की आवश्यकता, उनकी शक्ति एवं गुरु का कैसे अनुसरण करना है के बारे में वर्णन किया है ।          
                                                                       
बहुत कम व्यक्ति स्वयं से अपने अन्दर के गुरु को समझने की योग्यता रखते हैं । स्वयं का गुरु एक रहस्य रहता है जब तक कि तीसरा नेत्र या ज्ञान चक्षु नहीं खुल जाते हैं । हमें अपने तीसरे नेत्र या ज्ञान चक्षु को खोलने में सहायता के लिए एक गुरु की आवश्यकता होती है । बहुत सावधानी से गुरु का चयन करें । तब बिना शर्त के उनकी शिक्षाओं का अनुसरण करें । आपका जीवन परिवर्तित हो जाएगा और आप इस संसार में शान्ति एवं आनन्द से रहेंगे तथा अंततः सर्वोच्च परमानन्द के साथ एकाकार हो जायेंगे । 

बुधवार, 31 जुलाई 2013

अज्ञानता का कोहरा एवं जीवन का उचित अवलोकन

हम सब सर्वोच्च की वास्तविकता तथा जीवन के सत्य के परिप्रेक्ष्य में अज्ञानता के कोहरे में जीते हैं । अज्ञानता की यह पर्त हमें सर्वोच्च के सत्य एवं ब्रह्माण्ड की वास्तविकता से प्रथक करती है । हम सब सम्पूर्ण जीवन इस अज्ञानता से घिरे हुए जीते हैं । हमारे माता पिता एवं दादा दादी भी ऐसी अज्ञानता में जीते रहे हैं । इस प्रकार हमें सर्वोच्च की शक्ति और ईश्वरत्व का कोई ज्ञान नहीं होता है । हम लोग उन लोगों की तरह होते हैं जो स्थाई रूप से धुंधला द्रष्टिकोण रखते हैं और ऐसा कोई ज्ञान या सजगता नहीं रखते हैं जिसमे  अल्प मात्रा में भी स्पष्ट दृष्टिकोण हो ।  हम लोग अपूर्ण जानकारी के गहरे धुंध में जीते हैं एवं अपने जीवन को ध्यानकेंद्रित दृष्टिकोण से परे देखते हैं । यह ध्यानकेंद्रित दृष्टिकोण से परे जीवन हमारे दृष्टिकोण एवं जीवन का लक्ष्य होता है जिसके लिए हमलोग अथक परिश्रम करते हैं और रात दिन दास बने रहते हैं ।

जब परमगुरु हमारे जीवन में आते हैं, वे हमें ज्ञान देते हैं और जीवन का उचित पथ हमें बताते हैं । जीवन का हमारा दृष्टिकोण परिवर्तित हो जाता है क्योंकि हम परम गुरु से ज्ञान को आत्मसात करते हैं ।  परमगुरु द्वारा प्रदान किया गया ज्ञान एवं अध्यात्मिक अभ्यास हमें जीवन के उचित दृष्टिकोण को प्राप्त करने के लिए तैयार करता है । इसे समझिये :-
                     
अर्जुन पांडवों में सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर जानते थे कि कृष्ण सर्वोच्च ईश्वरत्व हैं । कृष्ण पांडवों के अनेक परीक्षणों एवं क्लेशों के कई वर्षों में आधार एवं सहायक थे । अर्जुन कृष्ण की चमत्कारिक शक्ति और उनकी असंभव से संभव करने की योग्यता को देख चुके थे । लेकिन उन्होंने स्वयं में अनुभव नहीं किया था और ना ही जाना था कि कृष्ण सर्वोच्च शक्ति हैं । 
                 
कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन और सेनायें अपनी मात्रभूमि के लिए सभी तरह के युद्ध के लिए तैयार थीं । कृष्ण उनके सारथी थे । अर्जुन ने कृष्ण को स्वयं के लिए रणनीतिक योजना के दृष्टिकोण से दोनों सेनाओं की मजबूती देखने तथा आकलन करने के लिए रथ को दोनों सेनाओं के बीच में केंद्र बिंदु पर ले जाने के लिए कहा । जब वे सुरक्षात्मक स्थिति का अवलोकन कर रहे थे, वे कृष्ण से बात चीत कर रहे थे एवं उन्हें यादव एवं सखा के रूप में संबोधित कर रहे थे - यादव के रूप में कृष्ण यादव जाति से सम्बंधित थे और सखा तात्पर्य मित्र अर्जुन एवं कृष्ण के रूप में जो हम उम्र थे और अर्जुन कृष्ण को अपने सर्वश्रेष्ठ मित्र के रूप में मानते थे । 
                                            
अपनी वार्तालाप के दौरान अर्जुन ने युद्ध न लड़ने का निश्चय किया एवं उन्होंने इस तर्क को प्रस्तुत किया कि वे क्यों युद्ध नहीं करना चाहते हैं और कृष्ण ने उन्हें उनके कर्तव्यों को भगवत गीता के गीत या प्रवचनों के रूप में निर्वाह करने का उपदेश दिया । उन्होंने उन्हें एक ईश्वरत्व के सर्वोच्च सत्य का अनुभव कराया । कृष्ण ने अर्जुन में दिव्य चेतना का संचार किया और इस प्रकार अर्जुन स्वयं से देखने एवं अनुभव करने में सक्षम हुए कि कृष्ण सर्वोच्च ईश्वरत्व हैं जिसमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का निर्माण, पालन पोषण और विनाश होता है । इस दर्शन के बाद, अर्जुन ने कृष्ण को योगियों के योगी एवं जगत गुरु के रूप में संबोधित किया । यही उचित दर्शन एवं ज्ञान हैं जिसने अर्जुन के संबोधन के प्रकार कृष्ण के प्रति यादव एवं सखा से योगियों के योगी तथा जगतगुरु के रूप में परिवर्तित कर दिया ।  
                                                       
अर्जुन एक महान योद्धा थे और उनका निशाना  पक्का था । लेकिन वास्तविकता के प्रति उनका ज्ञान अपूर्ण था । वे जीवन एवं महाभारत के युद्ध में अपनी भूमिका को नहीं जानते थे । उन्हें इस बात का ज्ञान था कि कृष्ण ईश्वर हैं लेकिन इस सत्य को उन्होंने स्वयं में अनुभव नहीं किया । कृष्ण ने उन्हें ईश्वरत्व की सर्वोच्च शक्ति का अनुभव करने में सक्षम किया  । उसके बाद अर्जुन अपने कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्वों को समझने में सक्षम हुए और उन्होंने ठीक तरह से महाभारत के  युद्ध में धर्म के लिए एक योद्धा के रूप में अपनी भूमिका को निभाया । उन्होंने इस बात को भी जाना एवं मूल्यांकन किया कि ईश्वर स्वयं उनके मार्गदर्शक एवं सारथी हैं । 
                
जब परम गुरु हमारे जीवन में आते हैं, वे हमें ज्ञान तथा अध्यात्मिक अभ्यास प्रदान करते हैं । वे कृष्ण की तरह होते हैं और हम अर्जुन की तरह होते हैं । हम अनभिज्ञ होते हैं तथा जीवन में अपनी भूमिकाओं को नहीं जानते हैं ।  परमगुरु हमें उस दिन के लिए तैयार  करते हैं जब हम ईश्वरीय दर्शन प्राप्त करते हैं और स्वयं में सर्वोच्च वास्तविकता का अनुभव करने में सक्षम होते हैं । जैसे ही हम अपने नियमित अभ्यास से अधिक अनुभव प्राप्त करते हैं, हम जीवन में अपनी भूमिकाओं एवं उत्तरदायित्वों को समझने में सक्षम हो जाते हैं, हमारा तीसरा नेत्र या ज्ञान दृष्टि खुल जाती है तथा जीवन के प्रति हमारी विचारधारा परिवर्तित हो जाती है । जीवन  के प्रति हमारी पसंद तथा दृष्टिकोण में परिवर्तन हो जाता है और अधिक आनन्दमयी हो जाता है । अंततः तब हम इस बात को समझते में सक्षम हो जाते हैं कि हम कौन हैं और यह कि हम ईश्वर की सर्वोच्च सत्ता से एकाकार हैं । जब तक कि इस सत्य को नहीं जाना जाता है, हम अज्ञानता के कोहरे में भौतिक आनन्दों का पीछा करते हुए जीते हैं जो एक आरामदायक जीवन के लिए आवश्यक होती है । लेकिन कभी भी हमें परम संतुष्टि नहीं दे सकती है । 
                                  

रविवार, 7 जुलाई 2013

परम गुरु द्वारा निभाई गई भूमिकायें


परम गुरु परम योगी होते हैं जो ब्रह्माण्डीय शक्ति से अपनी आत्मा को जोड़े रहते हैं और उससे एकाकार होते हैं । जैसे कि ईश्वर विभिन्न स्वरूपों के माने जाते हैं एवं अपने भक्त की रक्षा के लिए भिन्न-२ भूमिकायें निभाते हैं । परम गुरु भी विभिन्न भूमिकाओं एवं स्वरूपों में अपने शिष्य तथा समाज की उन्नति के लिए माने जाते हैं । परम योगी शिष्य के लिए सबकुछ होते हैं । वे तत्क्षण की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु विभिन्न भूमिकाओं में माने जाते हैं । वे शिष्य तथा समाज की रक्षा हेतु सभी चार वर्ण/जाति ब्राह्मण (अध्यापक) क्षत्रिय (सुरक्षाकर्मी), वैश्य (किसान और व्यापारी) और शूद्र (सफाई कर्मी और मजदूर ) के रूप में भूमिका निभाते हैं । ये भूमिकाए मूलतः किये गए कार्य या एक व्यक्ति का उक्त कार्य के प्रति झुकाव के आधार पर निश्चित की गई थीं न की उसके जन्म के आधार पर । 
                 
एक ब्राह्मण के रूप में परम गुरु अपने शिष्य तथा संसार को  ज्ञान एवं शिक्षा देते हैं । परमगुरु द्वारा दिया गया ज्ञान प्रमाणित होता है क्योंकि यह आन्तिरिक अनुभवों पर आधारित होता है और कई हज़ार वर्ष पूर्व गुरु से शिष्य को सौंप दिया गया । एक क्षत्रिय के रूप में परमगुरु अपने शिष्य के आश्रयदाता होते हैं तथा एक समुदाय के भी । अतीत में परम गुरुओं ने व्यवहारिक युद्धकालीन कला और हथियारों तथा मंत्रों का प्रयोग करना सिखाया । गुरु वशिष्ठ ने राम को मंत्र के रहस्य और तीरंदाजी में प्रयोग किये जाने वाले मंत्रों को सिखाया था । वे अपने आश्रम के भी प्रभावकारी सुरक्षाकर्ता थे । एक वैश्य के रूप में परमगुरु आश्रम तथा उसके आश्रितों की उन्नति के लिए पर्याप्त धन कोष संग्रह करते हैं । एक शूद्र के रूप में परमगुरु विषाक्त पदार्थों , गंदगी और नकारात्मकता को शिष्य से दूर करते हैं , जो बुद्धिमान एवं अपनी साधना में नियमित होते हैं । परमगुरु का ज्ञान तथा ऊर्जा शिष्य के मानस से विचारों को बाहर निकालती है  और उच्च स्तर का ज्ञान  तथा शिक्षाओं को प्राप्त करने के लिये योग्य बनाती है । 
                               
श्रीकृष्ण परम योगी एवं परमगुरु थे ।  कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में जब उन्होंने भगवत गीता के सिद्धांतों को अर्जुन को सिखाया श्रीकृष्ण ज्ञान देने वाले एक ब्राह्मण थे । भगवत गीता हमें विविध पथों को सिखाती है जिसके द्वारा एक व्यक्ति ईश्वर तथा उन विभिन्न पथों को प्राप्त कर लेता है जिसमे एक व्यक्ति अच्छा तथा सफलतापूर्वक जीवन जीता है । एक क्षत्रिय के रूप में श्रीकृष्ण ने युद्धक्षेत्र में अर्जुन के जीवन को बचाने के लिए सुदर्शन चक्र उठाया । वे एक महान योद्धा तथा तीरंदाज़ थे जिन्हें कई मन्त्रों एवं युद्धकलाओं में महारत हासिल थी । उन्होंने कई युद्ध जरासंध तथा अन्य दानवों से मथुरा, वृन्दावन और उज्जैन के निरपराध उद्देश्यों की रक्षा के लिए किये ।  एक वैश्य के रूप में उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि द्वारका के खजाने में उद्धेश्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति तथा राज्य को चलाने के लिए पर्याप्त धन कोष था । उन्होंने अपने गुरु के आश्रम में सफाई सम्बन्धी कार्य किये एवं एक शूद्र की भूमिका निभाई । 
                 
मूलतः वर्ण व्यवस्था एक व्यक्ति द्वारा अपने व्यक्तिगत गुणों पर आधारित स्वभावों से मेल खाते कार्यों को निभाने के लिए बनाई गई थी । बाद में यह जाति व्यवस्था में परिवर्तित हो गई जिसमें किरदारों को जन्म से परिभाषित किया गया । परमगुरु किसी जाति से सम्बन्धित नहीं होते हैं । वे सभी भूमिका निभाते हैं जिसकी उन्हें आवश्यकता होती है । परमगुरु विशाल रूप से अपने शिष्य तथा मानवता के सुधार के लिए कार्य करते हैं । 

शनिवार, 29 जून 2013

निःस्वार्थ समर्पण बनाम क्रोध


ईश्वर के प्रति भक्ति या समर्पण एक व्यक्ति के चरित्र में मधुरता लाता है । ईश्वर प्रेम है । जब हम ईश्वर को अपने सम्पूर्ण  शक्ति तथा अस्तित्व के साथ प्रेम करते हैं, उनका प्रेम हमें परिपूर्ण  कर देता है । ईश्वर एवं गुरु के प्रेम की मधुरता बहुत मनोहर एवं आकर्षण युक्त  होती है । जिन लोगों ने उस प्रेम का स्वाद चखा है वे कभी भी उससे दूर नहीं हटेंगे । जिन लोगों ने ईश्वर के प्रेम की मधुरता को नहीं जाना है वे उस प्रेम को मानवीय सम्बन्धों में ढूंढेंगे । मानवीय सम्बन्धों का प्रेम ईश्वरीय प्रेम का एक प्रतिविम्ब मात्र होता है बल्कि अपेक्षाओं की अपूर्णता से छायांकित होता है । ईश्वर के प्रति प्रेम या भक्ति हमें शक्ति देती हैं और हमें सुरक्षा प्रदान करती है । ब्रह्माण्ड की असीमित शक्ति हमारा समर्थन करती है जब हमारी भक्ति निःस्वार्थ होती है । हमें ईश्वर के प्रति उनके आशीर्वाद एवं उपहारों के लिए जो हमें दिए गए हैं , कृतज्ञ होना चाहिये ।  हमें ईश्वर के प्रति ईश्वर से प्रेम करना चाहिए न कि उपहारों के खातिर जो वे हम पर बरसाते हैं ।
             
क्रोध अहंकार से आता है । जब हमारी अपेक्षाएं पूर्ण नहीं होती हैं एवं एक व्यक्ति को महत्त्व नहीं दिया जाता है, वह क्रोधित हो जाता है । जब एक व्यक्ति के जीवन के समानुपातों  के अपेक्षाकृत अधिक विशालता के लिए जीवन में घटित सभी घटनाओं का आनन्द लेता है , वह स्वयं को महान के रूप में चित्रित करना चाहता है । वह छोटी-2  घटनाओं को जीवन के अपेक्षाकृत अधिक विशाल बना देता है और क्रोधित हो जाता है तथा अहंकार एवं अनुचित आत्म महत्व से भर जाता है । वह बिना कारण उपेक्षित एवं अपमानित महसूस करता है और उसका क्रोध असीम हो जाता है । यह अंततः केवल उसे ही क्षति पहुंचाता है । भागवत पुराण की इस कथा को समझिये :
                                
राजा अम्बरीश श्रीराम के वंश के थे । वे भगवान विष्णु के महान भक्त थे । वे सत्यवादी एवं एक अच्छे राजा थे । उन्होंने एक यज्ञ का आयोजन किया एवं अपनी पूजा से भगवान् विष्णु को प्रसन्न किया । भगवान् ने उन्हें अपने सुदर्शन चक्र से सुरक्षित रहने का आशीर्वाद दिया (अतुलनीय सटीकता तथा आभासित पैनापन के साथ गोलाकार के रूप में एक हथियार ) । सुदर्शन का तात्पर्य उचित दृश्य होता है । सुदर्शन के आशीर्वाद या उचित दृश्य ने अम्बरीश के राज्य को शान्ति, सम्रद्धि एवं सुरक्षा से परिपूर्ण कर दिया ।
                                                                                                                   
राजा अम्बरीश ने (द्वादशी) व्रत रखा । इस व्रत में यह अनिवार्य होता है कि राजा एकादशी के दिन उपवास रखे और द्वादशी तिथि को उपवास तोड़े तथा समस्त जन समुदाय को भोजन कराये । किये गए उपवास को तोड़ने के समय, दुर्वासा मुनि आये एवं उनका ससम्मान राजशाही स्वागत किया गया । राजा ने उपवास तोड़ने के उपरान्त उनके आतिथ्य को स्वीकारने के लिए कहा । दुर्वासा मुनि सहमत हो गए और राजा से कहा कि वे उनकी तब तक प्रतीक्षा करें जब तक कि  वह स्नान करके वापस न आ जाये , उपवास तोड़ने का शुभ दिन व्यतीत हो गया परन्तु दुर्वासा ऋषि वापस न आये । । राजा जल अथवा भोजन को  ग्रहण नहीं कर सकते थे बिना अपने सम्मानित अतिथि को भोजन कराये । ऋषि वशिष्ठ जो सभा में सम्मानित ऋषि थे , राजा को सलाह दी कि वे अपने उपवास को तुलसी की पत्ती तथा एक चम्मच पानी को ग्रहण करके तोड़ सकते हैं जो पूजा में भगवान् विष्णु को समर्पित किया गया है । राजा ने इस प्रकार से उचित समय पर अपने उपवास को तोडा एवं अपने अतिथि की भोजन कराने के लिए प्रतीक्षा की ।
                                                     
दुर्वासा मुनि अपने त्वरित आवेश तथा क्रोध के लिए प्रसिद्द थे । जिस समय राजा अम्बरीश ने उपवास को तोड़ा ठीक उसी समय वे आये तथा बहुत क्रोधित हुए । उन्होंने अपमानित महसूस किया कि राजा ने उनके आने की प्रतीक्षा नहीं की । उन्होंने महसूस किया कि तुलसी का पत्ता और जल राजा द्वारा ग्रहण करना भोजन करने के समान होता है । बिना अपने अतिथि को भोजन कराये राजा ने कुछ भी ग्रहण नहीं किया था । राजा भला उनके जैसे महान साधु का कैसे अपमान कर सकते थे । राजा के समस्त व्रत्तांत अनसुने कर दिए गए । क्रोध में दुर्वासा मुनि ने एक बाल को तोडा एवं उससे एक दानव का निर्माण किया । उन्होंने दानव को राजा को मारने का आदेश दिया । राजा ने साधारण रूप में अपने हाँथ जोड़े तथा मन्दिर में भगवान् विष्णु की मूर्ति के सामने समर्पित हो कर बैठ गए । सुदर्शन चक्र मूर्ति से घूमता हुआ निकला और दानव पर आक्रमण कर दिया एवं उसे मार डाला। तब चक्र ने दुर्वासा मुनि को मारने के लिए उनका पीछा करना आरम्भ कर दिया । वे भागे तथा छिपने का प्रयास किया परन्तु चक्र ने उनका लगातार पीछा किया । वे जायें तो कहाँ जायें । इसलिए वे ब्रह्म लोक भागे एवं भगवान् ब्रह्मा से सुरक्षित करने की याचना की । भगवान् ब्रह्मा ने उन्हें सुरक्षित करने से मना कर दिया । उन्होंने कहा कि मुनि ने भगवान् विष्णु को नाराज किया है इसलिए वे उनको नहीं बचा सकते हैं । चक्र ने लगातार मुनि का पीछा करना जारी रखा और वे  शिवलोक भागे तथा भगवान् शिव के चरणों में गिर गए । भगवान् शिव ने भी उन्ही कारणों को बताते हुए उनकी सहायता करने से मना कर दिया । अंततः थके हारे एवं भागने तथा छुपने का कोई स्थान न पाकर, दुर्वासा मुनि वैकुण्ठ को भागे तथा भगवान् विष्णु के चरणों में गिर पड़े एवं सुरक्षित करने की कामना की । भगवान् ने कहा कि वे सुदर्शन चक्र को वापस नहीं बुला सकते हैं क्योंकि मुनि ने अम्बरीश के साथ गलत व्यवहार किया है जो उनके प्रति निःस्वार्थ प्रेम रखते हैं । भगवान् ने उन्हें अम्बरीश से क्षमा एवं सुरक्षा पाने के लिए सलाह दी । दुर्वासा मुनि के पास सुदर्शन चक्र से निश्चित मृत्यु से एवं स्वयं को सुरक्षित करने के लिए राजा  के चरणों में गिरने के अलावा कोई विकल्प नहीं था । राजा  अम्बरीश ने कोई क्रोध या द्वेष दुर्वासा के प्रति नहीं रखा । वे ऐसे महान मुनि को अपने जीवन के लिए दौड़ते हुए देख कर करुणा से भर गए । उन्होंने भगवान् विष्णु से सुदर्शन चक्र को वापस बुलाने के लिए और मुनि के जीवन को बचाने के लिए प्रार्थना की ।
                                                                                  
ईश्वर के प्रति निःस्वार्थ प्रेम या भक्ति ब्रह्माण्ड में हमें सुरक्षा का सर्वोच्च स्तर प्रदान करती है । जब सर्वोच्च की कृपा हमें आशीर्वाद देती है हम सुदर्शन या अच्छा दर्शन पाते हैं । तब दूसरों का क्रोध, अपमान, अनादर और दुर्व्यवहार हमारे जीवन में कोई स्थान नहीं रखता है । हम सभी के प्रति प्रिय तथा दयावान हो जाते हैं । हम उचित कार्य तथा उचित भाषा बोलने के लिए मार्गदर्शन प्राप्त करते हैं । हम अपने जीवन में प्रचुरता और सर्वोच्च की कृपा प्राप्त करते हैं ।


गुरुवार, 20 जून 2013

क्रोध पर कैसे नियंत्रण पाया जाए

क्रोध तब आता है जब जीवन में हमारी अपेक्षाएं पूर्ण नहीं होती हैं । हम क्रोध से तब उत्तेजित होते हैं जब हम अनुभव करते हैं कि हम दूसरे  व्यक्ति द्वारा गलत ठहराए गए हैं, जब हम अनुभव करते हैं कि हमारे साथ अन्याय किया गया है । हम अपेक्षाओं के साथ कार्य करते हैं एवं प्रशंसा के माध्यम से पुरस्कृत होने की आशा करते हैं । जब हमें ऐसा नहीं मिलता है हम क्रोधित होते हैं । हमारी कमजोरियां हमें क्रोधित करती हैं । दूसरे व्यक्ति हमारी कमजोरियों का लाभ उठाते हैं और हम स्वयं को रोकने में सक्षम नहीं होते हैं । क्रोध हमारे अन्दर उबलता है और हम या तो उसे अपने अन्दर दबाये रखते हैं या हम उस व्यक्ति पर प्रहार करते हैं जो हमसे कमज़ोर होता है । हम क्रोध का प्रयोग करते हैं अपने द्वारा की गई गलतियों या व्यसनों को उचित ठहराने के लिए जो हमें अपने वश में किये हुए है । अधिकांशतः, क्रोध और धमकी कमजोरियों को गुप्त रखती हैं । जब हम वास्विकता से अनभिज्ञ होते है और हम लोगों या परिस्थितियों के प्रति गुमराह होते हैं, हम स्वयं में क्रोध और शोक का कारण होते हैं । दूसरों की पीड़ा पर वास्तविक क्रोध एक महान शक्ति होता है जिसने एक साधारण मोहनदास को महात्मा- राष्ट्रपिता बनाया । लेकिन ऐसे क्रोध दुर्लभ होते हैं । हम अपने जीवन के अधिकांश हिस्से को असंतोष और आवेग के तुच्छ भंवर में फंसा देते हैं और स्वयं को दु:खदाई बनाते हैं और अपने आस पास के दूसरों के जीवन को मनहूस बनाते हैं । 
                                                                                                                                   
हम जानते हैं कि क्रोध अच्छा नहीं होता है और हमें क्रोधित नहीं होना चाहिए । क्रोध हमारे शरीर एवं मस्तिष्क को क्षति पहुंचाता है । यह हमारी विचारधारा एवं भाषा को दूषित कर देता है । हमलोग तर्क शक्ति, तथ्य परक समझ और न्याय की समझ को खो देते हैं जब हम क्रोधित होते हैं । विचारधाराओं में कोई संतुलन नहीं रहता है । हमारे द्रष्टिकोण में प्रत्येक बात असमंजसपूर्ण बनी रहती है । यह खतरनाक होता है क्योंकि जीवन असमंजस की छाया - दूसरों के अपेक्षाकृत कुछ अधिक धुंधली  होती है । हम कटाक्ष करते हैं जो हमें नहीं करना चाहिए और दूसरों को ठेस नहीं पहुँचाना चाहिये । क्रोध में हम वह कार्य करते हैं जो हमें नहीं करना चाहिए । हम स्वयं एवं दूसरों का अथाह नुकसान करते हैं । बाद में हम पश्चाताप करते हैं लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है । शब्द जो घाव का कारण होते हैं, उन पर कोई समुचित उपचार नहीं होता है । वे (घाव ) हमारे अन्दर बहुत समय तक बने रहते हैं । ऐसे बनाये हुए दुःख, क्रोध तथा बदले के क्रियाकलापों को अतिरिक्त बल देते हैं और दुश्चक्रों का अभी अंत नहीं होता है । 
                                                                                                                                          
हम क्रोध पर कैसे नियंत्रण कर सकते हैं ?अपने क्रोध के कारण को समझें । अपने क्रोध के विरुद्ध सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाएं । अपने कार्य के फलों को ईश्वर एवं गुरु को समर्पित कर दें एवं जो आपके रास्ते में आये दैवीय उपहार की तरह पुरस्कार के रूप में स्वीकार करें । बिना अपेक्षाओं के जीवन जियें । राई के पहाड़ सरीके अहंकार का निर्माण न होने दें । इस बात को समझें कि पृथ्वी आपके चारों ओर नहीं घूमती है बल्कि सूर्य के चारों और घूमती है । इस बात को समझे कि आप इस ब्रह्माण्डीय नाटक का एक हिस्सा मात्र हैं और आप यहाँ सबके लिए प्रिय, दयावान, और सहायक होने के लिए आये हैं  । आप इस एक सांसारिक नियम पर दिव्य प्राणी हो और मात्र एक वह प्राणी नहीं जो क्रोध एवं दुखों में घिरे हुए अपने जीवन को व्यतीत करते है । 
                                                       
एक मजबूत अभिप्राय बनाइये कि शब्दों द्वारा किसी को आहत नहीं करना है । प्रार्थना में महान शक्ति होती है । ईश्वर और गुरु से प्रार्थना करें कि आपको अपनी भाषा में मधुर एवं सत्यवादी होना चाहिए और यह कि आपके शब्द दूसरों को सांत्वना एवं आराम देने वाले होने चाहिए न कि किसी को कष्ट पहुंचाने वाले । सीता राम मंत्र का जाप नियमित करें । यदि आप मंत्र के साथ नियमित साधना करते हैं तो आप महसूस करेंगे कि एक बदलाव आपके अन्दर स्थान ले रहा है । जब आपका क्रोध प्रकट होता है तथा आप प्रतिक्रिया करते हैं । उस समय के मध्य में कुछ क्षणों का एक अंतराल होता है । उस अन्तराल में अन्तरआत्मा की समझदार आवाज़ आपको बोध कराएगी एवं आपको शान्त होने के लिए कहेगी । सीता राम की तरंगें इतनी मजबूत और शक्तिशाली होती हैं कि वे इस आवाज़ को जोर से गुंजायमान करने के लिए एवं उसे आपको सुनने के लिए तथा बल देने के लिए सशक्त बनाती है । सीता राम मंत्र आपको क्रोध पर काबू पाने की शक्ति देता है और उसे जारी रहने देता है । सीता राम मंत्र मस्तिष्क एवं सम्पूर्ण प्रणाली को क्षतिग्रस्त करने के लिए क्रोध की तरंगों की आज्ञा नहीं देगा । वास्तव में क्रोध की तरंगें सीता राम द्वारा परिवर्तित हो जाती हैं । क्रोध की तरंगें सीता राम से एकाकार हो जाती हैं एवं वे शरीर के सभी हिस्सों में शरीर को स्वस्थ करते हुए तथा उसे कल्याणकारी बनाते हुए अन्दर की ओर प्रवाहित होने लगती हैं । क्रोध का बल तथा शक्ति सीता राम मंत्र की तरंगों द्वारा परिवर्तित होता जाती है और यह नवीन उर्जा आपके स्वास्थ्य को वर्धित करेगी, आपको शक्ति एवं दिशा निर्देश कार्य तथा आपके जीवन में क्रांतिकारी बदलाव के लिए प्रदान करेगी । 
                                                                         
क्रोध पर नियंत्रण पाने में कुछ भी उतना प्रभावकारी नहीं  होता है जितना कि सीता राम मंत्र की तरंगें । एक बार भी कभी जाप को न छोड़े । सीता राम मंत्र का नियमित जाप और अधिक करने का अवसर प्राप्त करें । एक समय आता है जब आपका क्रोध कुछ क्षणों में बिखर कर नष्ट हो जाता है और तब आप समझदार एवं संतुलित हो जाते हैं । तब सीता राम मंत्र की पूरी शक्ति प्रत्यक्ष  रूप से आपके स्वास्थ्य, कल्याण तथा बदलाव के लिए क्रोध के कारणों पर काबू पाने के लिए प्रभावकारी  होने के बावजूद उपयोगिता प्राप्त करेगी । 


शनिवार, 15 जून 2013

मकर संक्रान्ति

आज मकर संक्रान्ति का उत्सव है । यह उत्सव सूर्य की स्थिति पर आधारित होता है न कि चन्द्रमा पर । सामान्यतः भारतवर्ष में सभी उत्सव चन्द्र वर्णनावाली  पर आधारित होते हैं । इस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है क्योंकि यह ब्रह्माण्ड में अपने आकाशीय पथ की यात्रा करता है । यह धार्मिक और एक फसलीय उत्सव होता है । इसके भौतिक एवं अध्यात्मिक मायने भी हैं । 
                                                   
यह दिन दक्षिणायन के अन्त का सूचक होता है - छै महीने की वह अवधि जो देवताओं के लिए रात्रि होती है । इस अवधि के दौरान मृत्यु अशुभ मानी जाती है । मकर संक्रान्ति के दिन से उत्तरायण आरम्भ हो जाता है - छै महीने की वह अवधि जो देवताओं के लिए दिन होती है ।  महाभारत के एक प्रसंग में भीष्म पितामह दक्षिणायन की अवधि के समाप्त होने तथा उत्तरायण के आरम्भ होने की प्रतीक्षा में शर शैया पर लेटे हुए थे, ताकि वे अपना शरीर त्याग सकें । आज वह दिन भी होता है जब गंगा ने राजा भागीरथ का अनुसरण किया और महासागर में प्रवेश किया और उनके शुद्ध जल ने राजा सगर के हजारों पुत्रों को मोक्ष प्रदान किया । इस दिन हज़ारों लोग गंगा सागर में स्वयं के पवित्रीकरण के लिए स्नान करते हैं । इस दिन, संक्रान्ति - एक देवता ने शंकरासुर नामक एक राक्षस को मारा था ।  
                   
मकर संक्रान्ति भारत के अधिकांश भागों में एक फसलीय  उत्सव भी होता है । नये फसलीय चावल ताज़े गन्ने के रस में पकाए जाते हैं और दक्षिण भारत में सूर्य एवं गायों को समर्पित किया जाता है । यह व्यंजन पोंगल कहलाता है । उत्तर भारत में, ताजे फसलीय चावल एवं दालें एक खिचड़ी नामक मसालेदार नमकीन व्यंजन के रूप में बनाई जाती है । महाराष्ट्र एवं आन्ध्रप्रदेश में लोग तिल और गुड़ की बनी हुई मिठाई का आदान प्रदान करते हैं और एक दूसरे से मधुर बोलने का अनुरोध करते हैं । गुजरात में लोग सुबह से शाम तक पतंगे उड़ाते हैं और इन दिनों रात में भी । पंजाबी इस उत्सव को लोहड़ी बुलाते हैं और वे अलाव जलाते हैं और उसमें गन्ना और चावल फेंकते हैं । वे प्रसिद्द नृत्य भांगड़ा भी करते हैं और वे इस उत्सव के लिए तैयार किया गया वैभवशाली भोजन भी करते हैं ।  भारत के अधिकांश राज्य इस उत्सव को अपने विशेष तरीकों प्रथाओं और परम्पराओं से मनाते हैं ।  हर जगह वातावरण में उल्लास एवं आनन्दकारी माहौल होता है । 
                                                                     
मकर शनि ग्रह का प्रतीक होता है । इस दिन सूर्य मकर के प्रतीक शनि राशि में प्रवेश करता है । भारतीय किवदंतियों के अनुसार , शनि ग्रह सूर्य के पुत्र हैं । पिता अपने पुत्र से मिलने के लिए उनके घर जाते हैं । ये दोनों ग्रह पराक्रमी एवं शक्तिशाली होते हैं । इनके आशीर्वाद बहुत शुभ होते हैं । हम सूर्य एवं शनि ग्रह के आशीर्वाद से भौतिक एवं अध्यात्मिक दोनों सफलता प्राप्त करते हैं । इस दिन सूर्य एवं शनि ग्रह की पूजा की जाती है । 
इस दिन सुबह से शाम तक वातावरण में दिव्य चेतना का संचार होता है । ये अध्यात्मिक ऊँची तरंगें अध्यात्मिक अभ्यास का आशीर्वाद देती हैं । जब हम अपने  नियमित जाप एवं ध्यान को इस दिन करते हैं और अतिरिक्त अभ्यास भी करते हैं, हम अधिक महान परिणामों को प्राप्त करते हैं ।  
गंगा, यमुना, गोदावरी ,कृष्णा ,कावेरी के पवित्र जल में डुबकी लगाना जो इन नदियों के किनारे पर स्थित श्रद्धेय स्थलों पर है " शुभ माना जाता है और ऊँची अध्यात्मिक योग्यता का होता है । लोग इस दिन दान भी देते हैं और मेधावी कर्मों को करते हैं क्योंकि यह फलदायक माना जाता है । 
                                                                                                      
भारत के उत्सवों एवं संसार के उत्सवों की भी उत्पत्ति ब्रह्माण्डीय मार्गों में तारों एवं ग्रहों की स्थिति से होती हैं ।  ब्रह्माण्ड में ग्रहों एवं तारों के बदलाव के कारण जब तरंगों के स्तर में बदलाव होता है, उत्सव मनाये जाते हैं । भोजन, कपड़ों एवं उल्लास के साथ उत्सव मनाने के अलावा लोगों को प्रार्थना करने के लिए , ध्यान के लिए, पवित्र स्थलों के दर्शन के लिये और आकांक्षी को दान के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता है । भारत में, उत्सव लोगों के दैनिक जीवन का अभिन्न एवं नियमित हिस्सा होते हैं । उत्सव हमारे जीवन में पूजा एवं कृपा के सुनहरे  किस्मों के साथ उत्सव मनाने की रंग बिरंगी किस्मों से जुड़ते हैं । आओ हम लोग एक धन्यवाद की भावना के साथ उत्सव मनायें ।

बुधवार, 12 जून 2013

भाषा की मिठास का आशीर्वाद


सत्यम वाद - मधुरम  वाद - ये वेदों की उक्तियाँ हैं । सत्य बोलिए लेकिन मधुरता से बोलिए । जब आप बोलें अपनी भाषा में विनम्रता एवं सम्मान रखें । हम बिना दूसरों को कष्ट पहुँचाये सत्य बोल सकते है । इन दिनों हम लोग दूसरों को कष्ट पहुँचाने के लिए भाषा का प्रयोग एक हथियार के रूप में करते हैं । हम लोग ऐसे शब्द बोलते हैं जो अन्य व्यक्ति के ह्रदय को विदीर्ण कर देगा । तब हम उक्ति पर आरोप लगाते हैं जो बताती है कि सत्य बोलिए और इसलिए कि ईश्वर सत्य है । हमलोग इसलिये गलत होते हैं क्योंकि हमारा अभिप्राय दूसरों को कष्ट पहुँचाना होता है । भाषा के पीछे का अभिप्राय सत्य को प्रकट करना नहीं होता है बल्कि दूसरों को कष्ट पहुँचाना होता है । सत्य के पीड़ाजनक भागों को भी सम्मान एवं मधुरता से बोला जा सकता है और इससे दूसरों को कष्ट नहीं होगा । ऐसी भाषा दूसरों की उनकी गलतियों को समझने में और उनके व्यवहार को बदलने में सहायता करेगी । ऐसे शब्द कीमत रखते है क्योंकि वे एक व्यक्ति की ज्ञानरूपी प्रकाश को देखने और स्वयं को परिवर्तित करने में सहायता करते हैं । 

जब कोई दूसरों के लिए मधुरता और सम्मान से सत्य बोलता है - शरीर एक मन्दिर हो जाता है और उस मन्दिर में ईश्वर निवास करते हैं । जो लोग इस उक्ति का पालन करते हैं, वे निराली शक्ति एवं आकर्षण रखते हैं - एक प्रतिभा  जो दूसरों को उनकी ओर  आकर्षित करती है । यही सत्य एवं मधुरता की शक्ति है । ईश्वर जो प्रेम एवं सत्य का स्वरुप होते हैं, उनके अन्दर निवास करते हैं । और ईश्वर की आभा उनके चेहरे पर और उनसे चमकती है । 
                                                                 
मैं एक घटना का वर्णन करता हूँ जो मेरे जीवन में घटित हुई जिससे यह सत्य प्रतिविम्बित होता है । ध्यानयोगी मधुसूदनदास जी के अमेरिका से भारत वापस आने के पश्चात, वे अपने आश्रम नहीं रहे । उन्होंने एक शिष्य तथा उसके परिवार के निवास स्थल पर 10x10 फुट के एक छोटे से कमरे को रहने के लिए चुना । उसके बाद उन्होंने मुझे आश्रम में एक शानदार जन समारोह में अपना गादीपति चुना और बनाया । मैंने आश्रम में अपना निवास स्थल बनाया । मैंने ध्यानयोगी मधुसूदनदास जी को आश्रम में आने एवं ठहरने के लिए आमंत्रित किया । उन्होंने मेरे प्रस्ताव को ठुकरा दिया । उन्होंने उत्तर दिया कि वे परिवार के व्यवहार के कारण एक छोटे कक्ष और एक छोटे फ्लैट में उस परिवार के साथ ठहरने का आनन्द ले रहे हैं | वे एक दूसरे  के साथ पूर्णतयः संगठित थे और एक दूसरे  के साथ प्यार एवं सम्मान के साथ बोलते थे । परिवार में कोई अभद्र भाषा, चिल्लाहट , कुतर्क नहीं था । प्यार सम्मान और मधुरता का रिसाव पारिवारिक वातावरण पर होता था । वे उसी प्यार एवं सम्मान के साथ अपने गुरु की सेवा करते थे । सम्पूर्ण परिवार उपासना और श्रद्धा के साथ उनकी देखभाल करता था । उन्होंने कहा कि यह पृथ्वी पर एक स्वर्ग की तरह है और वे इस प्यार के मन्दिर को छोड़ना नहीं चाहते हैं । इसलिए वे उस फ़्लैट और उस कमरे में जीवन के अन्तिम समय तक रहे । 
                                                
गुरु एवं ईश्वर उस घर में निवास करेंगे जहाँ सदस्य प्यार एवं सम्मान एक दूसरे  के प्रति रखेंगे और उसे अपने भाषा एवं व्यवहार में प्रदर्शित करेंगे । ऐसा  घर ईश्वर के निवास का एक भौतिक मन्दिर होता है । जब हम अपने शरीर को मधुरता एवं सत्य के एक मन्दिर में बदलते हैं , गुरु एवं ईश्वर भी हमारे ह्रदय में निवास करेंगे । हमारे ह्रदय में सर्वोच्च शक्ति का प्रकटीकरण हमारे जीवन में आभासित होगा और हमारे चारों और हर जगह प्रकट होगा । अपने भौतिक शरीर को पवित्रतम स्थल में बदलना और रूपांतरित करना हमारे हाँथ में होता है जिसमें गुरु एवं ईश्वर रहने के लिए स्थापित होते हैं । 


शुक्रवार, 7 जून 2013

सत्य सदैव रहता है


सत्य सदैव है और सत्य ईश्वर है । यह संसार के सभी धर्मों द्वारा घोषित किया जा चुका है । सत्य स्वयं द्वारा प्रमाणित होता है और वह प्रकाशित होता है ।  इस प्रकार कोई मुश्किल से ही इसे छुपाने या अस्पष्ट करने का प्रयास कर सकता है । सत्य सदैव स्वयं में अन्त तक प्रकट होता है । सत्य की सदैव विजय होती है । 
                                                                               
आदि अनादि काल से महान गुरूओं, साधुओं और अवतारों ने ज्ञान देने के लिए और सत्य का पाठ पढ़ाने के लिए जन्म लिया है । आदि अनादि काल से वे घोषित किये गए हैं । सदैव ही कुछ जन समुदाय होगा जो ज्ञान को अस्पष्ट करेगा और सत्य को छिपाएगा । ईसा महान अध्यापक और गुरु थे और उन्होंने लोगों को ज्ञान दिया और ईश्वर के बारे में सत्य को घोषित किया । ऐसा करने के कारण , उन्हें शूली पर चढ़ा दिया गया । उन दिनों के अज्ञानी और बुरे लोगों ने यह दिखाना चाहा कि यदि वे वास्तव में ईश्वर के बेटे हैं तो क्या वे मृत्यु को प्राप्त होंगे यदि उन्हें शूली पर लटका दिया जाए । ईसा  ने स्वयं को पुनर्जीवित किया और संसार को दिखाया कि  वे वास्तव में ईश्वर  की संतान हैं और यह कि वे और उनके पिता ( ईश्वर ) एक हैं । 
                                                
जब तक कि मनुष्य परम ज्ञान नहीं प्राप्त करता है और सर्वोच्च सत्य के बारे में नहीं सीखता है और उसे अनुभव नहीं करता है, उसके जीवन का उद्देश्य अधूरा होता है । आदि अनादि काल से ईश्वर ने अपना प्रतीक गुरु के रूप में सर्वोच्च सत्य के बारे में मानव को पाठ पढ़ाने के लिए भेजा है । गुरु ने ईश्वर के बारे में सर्वोच्च सत्य को जाना एवं महसूस किया है और वे इस सत्य को सिखाते हैं और इस ज्ञान को मानव समाज को देते हैं । अध्यात्मिक अभ्यास सिखाये जाते हैं और विद्यार्थी उनका लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अनुसरण करते हैं केवल गुरु द्वारा सिखाया गया तकनीकों एवं परम्पराओं का अनुशासित एवं नियमित अभ्यास ही विद्यार्थी की परम सत्य एवं ज्ञान के लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायता करेगा । 
                                      
आदमी काम करता है और धन, शक्ति, पद, प्रतिष्ठा अर्जित करता है । वह सम्पत्ति और वस्तुयें एकत्रित करता है ।  वह परिवार और मित्र रखता है । फिर भी वह सदैव अप्रसन्न रहता है और अनुभव करता है कि कुछ जीवन में अधूरापन है । वह और अधिक सम्पत्ति , धन और शक्ति के रूप में प्रसन्नता को खोजता है । जब तक कि वह सर्वॊच्च सत्य को जानता और आत्मसात नहीं करता है वह सदैव अप्रसन्न एवं अधूरा बना रहेगा । 

बुधवार, 5 जून 2013

गुरु भक्ति के पुरस्कार

 जब एक शिष्य आस्था और विश्वास से अपने गुरु की आज्ञा मानता है और उनकी सेवा करता है, आशीर्वाद जो गुरु से पुरस्कार के रूप में बहता है, प्रचण्ड  और जीवन परिवर्तित करने वाला होता है । यह प्रसंग एक बहुत प्रसिद्ध गुरु के एक शिष्य के बारे में है जो अपने स्वामी के लिए महान प्रेम रखते थे और नि:संदेह उनकी सेवा करते थे । यह गुरु की कृपा से शिष्य के परिवर्तित होने का एक पूर्ण उदाहरण है । 
                                
आदि शंकरा भारत के महानतम गुरुओं में से एक हैं । वह भगवान् शिव के एक प्रतीक अवतार के रूप में माने जाते हैं । आदि शंकरा हिन्दू दर्शन और धर्म के सुधार के लिए पैदा हुए थे । शंकरा के चार शिष्य थे - सुरेश्वर आचार्य, पदमापदा, हस्तमालका  और त्राटकाचार्य । यह कहानी पदमापदा की है ।
पदमापदा का वास्तविक नाम सदानन्द था । वह शंकरा के पहले शिष्य थे । वह महान गुरु भक्त थे । वह बहुत निष्ठावान और विश्वसनीय  थे और अत्यधिक आज्ञाकारी भी थे । वे दिये गए सभी कामों  को बड़ी प्रसन्नता के साथ करते थे । दूसरे शिष्यों की तुलना में वे थोड़े से बौद्धिक रूप से सुस्त थे । दूसरे शिष्य उनका मजाक उड़ाते थे और कभी-२ अपने हिस्से का कार्य भी उनसे कराते थे । लेकिन वे चुपचाप और प्रसन्नतापूर्वक वह सबकुछ सहते थे । शंकरा सभी घटनाक्रम से अवगत थे और जानते थे कि दूसरे सदानन्द को चिढाते और सताते हैं । उन्होंने अपने आज्ञाकारी विधार्थी की सच्ची कीमत और पूर्ण तन्मयता से की गई गुरु सेवा के आशीर्वाद के  बारे में दूसरों को पाठ पढ़ाने के लिए उचित अवसर की प्रतीक्षा की । 
                                                                                      
एक बार शंकरा और उनके दल ने गंगा नदी के किनारे शिविर लगाया । सदानन्द आदतन कामों  को कर रहे थे । उन्होंने नदी के दूसरे छोर पर गुरु के कपड़ों को धोना सम्पन्न किया । उन्होंने उसको सुखाने के लिए फैलाया और सूखे कपड़ों को एकत्रित करने के लिए और वापस गुरु के पास लाने के लिए प्रतीक्षा कर रहे थे । अचानक एक बाढ़ आई और पानी नदी के किनारे उफनाने लगा । शंकरा सदानन्द के बारे में चिंतित थे । उन्होंने उन्हें तुरंत वापस आने के लिए पुकारा । शीघ्रता से सदानन्द ने सूखे कपड़ों को उठाया और नदी के पानी पर दौड़ पड़े । उन्होंने ध्यान नहीं दिया कि पानी नदी में बढ़ गया है । जब वे गुरु की ओर गंगा के पानी पर दौड़े , उन्होंने गुरु की आवाज के अतिरिक्त किसी बात पर ध्यान नहीं दिया । जैसे ही उन्होंने कदम बढाया, एक कमल उनके पैरों को सहारा देने के लिए पानी की तलहटी से उगा । उनका ध्यान अपने गुरु पर इतना अधिक केन्द्रित था कि उन्होंने अपने पैरों के नीचे कमल के सहारे और स्पर्श को महसूस नहीं किया ।  उन्होंने सुरक्षित नदी को पार किया और अपने गुरु के पास पहुँच गए । वे सभी जिन्होंने इस दुर्लभ भक्ति की उपलब्धि को देखा, उस चमत्कार से स्तब्ध थे जो ठीक अभी घटित हुआ था । 
                                                                             
जब सदानन्द ने अपने गुरु को प्रणाम किया और उन्हें सूखे कपड़े दिए, गुरु ने उनसे पूछा कि कैसे उन्होंने बाढ़ युक्त नदी को पार किया । सदानन्द फिर भी नदी में कमलों को देखने के लिए नहीं मुड़े । उन्होंने उत्तर दिया कि केवल गुरु के नाम का स्मरण ने उनकी भौतिक संसार के महासागर को पार करने में सहायता की। मात्र नदी को पार करना सरल था । तब शंकरा ने उन्हें कमलदलों को दिखाया जो उनके पैरों को सहारा देने के लिए उग आये थे जैसे ही वे नदी पर चले थे। शंकरा ने उन्हें आशीर्वाद दिया और और उनका नाम पदमापदा रखा । (पदम् का तात्पर्य कमल होता है , पद का तात्पर्य पैर ) गुरु का आशीर्वाद पदमापदा में ईश्वरीय ज्ञान और विज्ञान सहित प्रवाहित हो गया । उनका आन्तिरिक परिवर्तन अचरज था । वे शंकरा के सबसे चतुर शिष्य हुए । उन्होंने " प्रजानाम ब्रह्म " नामक एक महान निबन्ध लिखा जिसका आशय ब्राह्मण ज्ञानवान होता है । वे भारत के पूर्वी भाग में गोवर्धन मठ के शीर्ष पदाधिकारी नियुक्त किये गए ।                    
                                                                                                             
गुरु के प्रति गहरा समर्पण और प्रसन्नतापूर्वक की गयी गुरु सेवा ने सुस्त सदानन्द को आशीर्वाद प्रदान किया  और वे पदमापदा हो गए ।  परमगुरु पारसमणि के अपेक्षाकृत वास्तव में अधिक महान होते हैं । पारसमणि शीशे अथवा लोहे को सोने में बदल देती है । लेकिन उसका स्पर्श एक दूसरी पारसमणि नहीं बना सकता है । गुरु पारसमणि के अपेक्षाकृत अधिक महान होते है क्योंकि वे अपनी शक्ति और गुणों को शिष्य में स्थानान्तरित करते हैं और एक बुद्धिमान और ज्ञानवान व्यक्ति बनाते हैं ।