भारत में माघ के माह का हिन्दू चन्द्र दिवस बसन्त ऋतु होता है और बसन्त पंचमी बसंत ऋतु की ताजगी एवं खूबसूरती का उत्सव होता है । बसंत ऋतु जीवन के नवीनीकरण का समय, नवीन सम्बन्धों का आशाओं एवं सुधार तथा सफलता के नवीनीकरण का अवसर होता है । बसंत पंचमी का अध्यात्मिक पहलू भी बहुत महत्वपूर्ण है । यह सरस्वती पूजा होती है । प्रकृति का पुननिर्माण नवीन उन्नति का प्रभावशाली नृत्य, सुन्दरता एवं हमारे चारों ओर का जीवन देवी सरस्वती -शिक्षा की देवी का स्वरुप, लावण्य तथा सुन्दरता होती है । वह लौकिक बुद्धिमत्ता एवं दिव्य भण्डार तथा ज्ञान की अभिव्यक्ति हैं । उत्सव तथा पूजा चन्द्र पखवाड़े के पाँचवे दिन मनाई जाती है । यह सामान्यतः जनवरी के उत्तरार्ध तथा फरवरी के पूर्वार्ध में पड़ता है ।
इस वर्ष बसंत पंचमी 28 जनवरी को है । उत्सव इस बात का भी सूचक होता है की जाड़े का समापन हो गया है एवं बसंत ऋतु का आरम्भ हो गया है । छोटे दिन एवं सर्द रातें समाप्त हो गई है और इसकी गर्मी तथा हवा तरोताजा है । प्रकृति पूर्ण खिले हुए स्वरुप में है । फूल, फल एवं पत्तियां हमारे चारों ओर के संसार को जीवन रंग एवं सुगंध से परिपूर्ण कर देती है । बसंत ऋतु प्रणय तथा प्रेम का प्रतिनिधित्व करता है । हजारों विवाह बसंत पंचमी के दिन पर किये जाते हैं क्योंकि यह दिन बहुत शुभ दिन होता है तथा इस दिन पर विवाह तथा अन्य दूसरे शुभ कार्य बिना हिन्दू पंचांग में उचित दिन को देखे हुए किये जा सकते हैं ।
क्योंकि बसंत पंचमी एक बहुत शुभ दिन होता है, अतः अन्य दूसरे कार्य भी इस दिन पर किये जाते हैं । बच्चों को वर्णमाला तथा प्रथम शब्द को लिखने की शिक्षा दी जाती है । ब्राह्मणों को घर बुलाया जाता है और उन्हें खिलाया जाता है तथा दान भी दिया जाता है । पितृ तर्पण या काले तिल एवं चावल तथा जल को पूर्वजों को पूजा के संस्कार के रूप में समर्पित किया जाता है । इस उत्सव में पीला रंग एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है क्योंकि यह शुभ होता है | यह खेत में पके हुए मक्के का भी रंग होता है। यह फसलीय समय होता है तथा लोग प्रसन्न होते हैं । वे पीला वस्त्र धारण करते हैं । पीली मिठाइयाँ तैयार की जाती हैं तथा खायी जाती है । देवी सरस्वती को पीला वस्त्र पहनाया जाता है एवं पूजा की जाती है । बच्चे पतंग उड़ाते हैं । भारत के कई राज्यों में पतंग उड़ाने का उत्सव मनाया जाता है । इस उत्सव को लोगों द्वारा अत्यधिक उत्साह एवं उमंग से मनाया जाता है ।
देवी सरस्वती महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती जैसी तीन देवियों का एक हिस्सा हैं । वे ज्ञान तथा बुद्धि का शीर्ष श्रोत हैं । वे संगीत, सारंगी एवं भाषा की देवी हैं । वे सभी कला, विज्ञान, शिल्प एवं दूसरी योग्यता का प्रतीकत्व करती है । वे विभिन्न नामों से पुकारी जाती हैं - श्री शारदा, वाकदेवी, वीणावादनी इत्यादि । वे सफ़ेद स्वरूपित हैं तथा सफ़ेद वस्त्र धारण करती हैं । वे पद्मासन मुद्रा में एक सफ़ेद कमल में विराजमान होती हैं । वे शुद्धता एवं श्रेष्ठता को प्रस्तुत करती हैं । वे शांत, निर्मल एवं राजसी हैं । उनके चार हाँथ हैं जो शिक्षा में मानव व्यक्तित्व को प्रस्तुत करते हैं :- बुद्धि, ज्ञान, सजगता एवं अहंकार । एक हाँथ में वे एक कमल पकडे हुए हैं जो सच्चे ज्ञान का प्रतीक और दूसरे हाँथ में वे पवित्र ग्रंथों को धारण किये हैं । वे दोनों हाँथ में वीणा धारण किये हुए हैं एवं लौकिक प्रेम एवं बुद्धि की धुन बजाती हैं । उनका वाहन सफ़ेद हंस हैं । हंस पानी एवं दूध के मिश्रण से दूध को प्रथक करने की अपनी क्ष्रमता के लिए प्रसिद्द हैं । हमे भी जीवन में कल्पना से तथ्य को प्रथक करना सीखना चाहिए । उनका दूसरा वाहन मोर हैं जो अहंकार को प्रकट करता है । वे हमे स्मरण कराती हैं कि ज्ञान अहंकार पर काबू पाता है ।
सरस्वती पूजा भारत के सभी घरों में की जाती है । सभी शैक्षिक संस्थान, विद्यार्थी, अध्यापक एवं शिक्षाविद उनकी आराधना करते हैं । गायक एवं संगीतकार भी उनकी पूजा करते हैं । किताबें एवं वाद्ययंत्र उनकी मूर्ती या तस्वीर के सम्मुख पूजा के दौरान रखे जाते हैं और उनके आशीर्वाद की ज्ञान, बुद्धि एवं ललित कला के लिए मांग की जाती है । बसंत पंचमी के इस पावन दिवस पर देवी सरस्वती की अपने घर में तथा अपने ह्रदय में आराधना कीजिये । आपको ज्ञान बुद्धि एवं सर्वोच्च सत्य को प्रदान करने के लिए उनका आशीर्वाद लीजिये । हमें उनकी कृपा की जीवन में हर क्षण आवश्यकता है । हम बिना ज्ञान एवं बुद्धि के काम नहीं कर सकते हैं । जब हम ज्ञान का सम्मान तथा आदर करते हैं , हम देवी सरस्वती का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और ज्ञान का उचित उपयोग करने के योग्य होते हैं ।