गुरु अपने सभी शिष्यों पर समानरूप से प्रेम बरसाते हैं । लेकिन शिष्य में उनके प्रेम को प्राप्त करने की एवं पकड़े रहने की क्ष्रमता होनी चाहिए । गुरु की ओर से कोई पक्षपात या भेदभाव नहीं होता है जब वे अपना प्यार और आशीर्वाद सब पर बरसाते हैं । गुरु सूर्य की तरह होते हैं । सूर्य सबके ऊपर समान रूप से चमकता है । लेकिन यदि कोई एक कमरे में सभी खिड़की तथा दरवाजे को बंद करके बैठने की हठ करता है, उसे सूर्य की किरण प्राप्त नहीं होगी । सूर्य को इस बात के लिए आरोपित नहीं किया जा सकता है । जब एक शिष्य अपने गुरु के लिए असीम प्रेम रखता है, उनके प्रति निष्ठावान होता है और उचित क्ष्रमता से गुरु सेवा करता है, वह गुरु के प्यार एवं आशीर्वाद को संजोये हुए एक मूल्यवान पात्र हो जाता है एक ऐसी ही कहानी - दीपक और उनके गुरु वेदधर्म की है ।
गुरु वेद धर्म उत्तर भारत में गोदावरी नदी के तट पर रहते थे । उनके कई शिष्य थे, एवं वे समान रूप से सभी को प्रेम करते थे । एक बार उन्होंने परिक्षण करने तथा देखने का निश्चय किया कि उनके शिष्यों में कौन उन्हें सच्चे रूप से प्रेम करता है । उन्होंने सभी को बुलाया एवं घोषणा की : अपने पूर्व जन्म में मैंने एक महान पाप किया है, इस जीवन में अपने ताप तथा अध्यात्मिक अभ्यास के कारण मैंने अपने कुछ बुरे कर्मों को दग्ध कर लिया है । मुझे शेष को शीघ्र ही भोगना पड़ेगा । यह मुझे रोग के रूप में प्रभावित करेगा जिससे मैं अपंग हो जाऊंगा । ऐसा मेरे साथ दो वर्षों तक रहेगा जिसके बाद मैं सामान्य हो जाऊंगा । मैं इस अवधि के दौरान काशी में रहने की इच्छा रखता हूँ । तुम में से कौन मेरे साथ आएगा एवं इस अवधि में मेरी सेवा करेगा ?
केवल दीपक के अलावा किसी भी शिष्य ने स्वेच्छा से अपने आपको प्रस्तुत नहीं किया । दीपक अपने गुरु का निष्ठावान शिष्य था । वह अपने गुरु से अत्यधिक प्रेम करता था एवं गुरु में ईश्वर को देखता था । उसने गुरु वेदधर्म से कहा : मैं आपके साथ रहूँगा और काशी में इन दो वर्षों तक आपकी सेवा करूँगा । गुरु ने कहा : अपने को प्रस्तुत करने से पूर्व विचार कर लो । मैं बहुत कमज़ोर तथा अपाहिज हो जाऊंगा । मेरी देखभाल करना सरल नहीं होगा । मैं दो वर्षों तक अन्धा व् लंगड़ा हो जाऊंगा। दीपक ने उत्तर दिया मैं भयभीत नहीं हूँ । क्या मैं दो वर्षों के लिए काशी जा सकता हूँ, आपके बजाय बीमारी एवं कष्ट की देखभाल कर सकता हूँ ? गुरु दीपक के इस अनुरोध को सुनकर अत्यधिक प्रसन्न हुए । लेकिन उन्होंने इसे मना कर दिया । उन्होंने कहा : हममे से प्रत्येक को अपने कर्मों के परिणामों को भोगना पड़ता है । मैं अकेला अपने कर्मों को भोगूँगा । लेकिन तुम आ सकते हो और मेरी सेवा कर सकते हो ।अल्प समय में ही उन्होंने काशी के लिए आश्रम छोड़ दिया । और कुछ दिनों में ही काशी पहुँचने पर गुरु वेदधर्म के शरीर में छाले पड़ गए और वे अपंग तथा अंधे हो गए । दीपक पास के घरों में गया और उन दोनों की देखभाल हेतु याचना की । गुरु अत्यधिक पीड़ा में थे एवं बहुत चिडचिड़े थे । वे क्रोधित हो गए तथा बिना किसी कारण के दीपक पर चिल्लाने लगे । लेकिन दीपक धैर्यवान तथा मुस्कुरा रहा था । उसने गुरु के सभी नखरों को सहा और निष्ठा एवं प्रेम से उनकी सेवा की ।
दीपक की गुरु भक्ति तथा सेवा को देखकर , देवताओं के राजा इंद्र प्रकट हुए । उन्होंने स्वर्ग में दीपक को एक स्थान देने के लिए कहा । दीपक ने उत्तर दिया कि सर्वोच्च स्वर्ग गुरु की श्री चरणों में तथा गुरु की सेवा करना है और उसने इंद्र को वापस भेज दिया । कुछ समय के पश्चात , दीपक की गुरु सेवा से प्रसन्न होकर भगवान् शिव प्रकट हुए । उन्होंने दीपक से मनचाहा वरदान मांगने को कहा । दीपक ने कहा : कृपया मुझे मेरे गुरु से परामर्श लेने दीजिये । दीपक ने अपने गुरु से पूछा कि क्या वह भगवान से उन्हें निरोग करने के लिए कह सकता है । गुरु ने इन्कार कर दिया और कहा कि यह स्वीकार्य नहीं है । इसलिए दीपक ने भगवान् शिव को वापस भेज दिया ।
कुछ दिनों बाद भगवान् विष्णु प्रकट हुए । वे इस कारण से प्रसन्न थे कि दीपक ने गुरु में ईश्वर देखा है एवं गुरु की सेवा की है । जब उन्होंने दीपक को वरदान माँगने को कहा दीपक ने गुरु भक्ति का वरदान माँगा । भगवान ने उसे विधिवत आशीर्वाद दिया और कहा : तुमने अपनी भक्ति तथा सेवा से ईश्वर तथा गुरु दोनों की महत्ता को जान लिया है ।
दीपक ने अपने गुरु की सेवा जारी रखी । उसके गुरु सभी दिव्य प्राणियों से अवगत थे जो वहां आये थे एवं दीपक के उन सब के प्रति उत्तरदायित्वों से भी । दीपक को गुरु की परीक्षा से गुजरना पड़ा । गुरु वेदधर्म ने उसे ज्ञान, नाम, प्रसिद्धि और दीर्घायु का आशीर्वाद दिया ।
जब शिष्य को गुरु द्वारा कोई सेवा या कार्य दिया जाय, उसका ध्यान सम्पूर्ण रूप से उस पर होना चाहिए तथा उसे पूर्ण करना चाहिए । जो कुछ भी प्रलोभन उसके मार्ग में पुरस्कार या प्रशंसा के रूप में आये, उसे गुरु सेवा को बाधित नहीं करना चाहिए । गुरु के प्रेम के लिए तथा बिना किसी अहंकार से की गयी गुरु सेवा सर्वोच्च आशीर्वाद प्रदान करती है ।