हम सब ईश्वर के प्रति प्रेम रखते हैं । इस बारे में कोई संदेह नहीं है । लेकिन हम शरीर रूप रंग एवं भौतिक संसार के प्रति ईश्वर के अपेक्षाकृत अधिक प्यार रखते हैं । जब हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं, यह आधी अधूरी ह्रदय की या उससे भी कम प्रार्थना होती है । जीवन में कुछ भी प्राप्त नहीं होता है यदि वह आधे अधूरे दृष्टिकोण या ह्रदय से किया जाता है । यदि हम ईश्वर को सबसे अच्छे मित्र के रूप में और जीवन में स्वयं को मार्गदर्शित होने के लिए चाहते हैं, हमें ईश्वर से सम्पूर्ण शक्ति तथा प्रेम से प्रार्थना करनी चाहिए । केवल तभी वे भी हमें अपनी उपलब्धि तथा प्रेम के साथ उत्तर देंगे ।
हमें उत्कंठा से ईश्वर की इच्छा रखनी चाहिए । ईश्वर के प्रेम के लिए तीव्र इच्छा रखना केन्द्रित होनी चाहिए । यह इतनी शक्तिशाली होनी चाहिए जितना एक प्यासे यात्री को जल की तीव्र आवश्यकता होती है । जो रेगिस्तान में कई दिनों से भटका हुआ है । जब मस्तिष्क एवं ह्रदय बेचैन रहते हैं तथा ईश्वर के लिए लालसा प्रज्वलित रहती है, गुरु प्रकट होते हैं और गुरु ईश्वर को प्राप्त करने का मार्ग दिखलाते हैं । गुरु शिष्य की क्ष्रमताओं को जानते हैं और उन्हें प्राप्त करने के लिए उसकी सहायता करते हैं । गुरु लघु परिणामों एवं शिष्य की आवश्यकताओं से अवगत होते हैं और उन्हें अपने आशीर्वाद से परिपूर्ण करते हैं । उनका आशीर्वाद शिष्य के भाग्य एवं कर्म में सभी अन्तरालों को परिपूर्ण कर देता है । जहाँ शिष्य के जीवन में कमी होती है , गुरु उसे पूरा करते हैं एवं परिपूर्ण करते हैं । यह शिष्य के जीवन को निपुण बनाती है एवं संतोष से परिपूर्ण करती हैं । शिष्य अपने जीवन को क्ष्रमताओं एवं महत्वाकांक्षाओं से परिपूर्ण करने में सक्षम हो जाता है और गुरु, ईश्वर एवं मानवता की सेवा पर भी केन्द्रित हो जाता है । शिष्य का जीवन जो आशीर्वादित इस तरह से होता है, सभी प्रकार से पुरस्कृत एवं परिपूर्ण होता है । महान शिवाजी महाराज एवं उनके शक्तिशाली गुरु समर्थ रामदास की कथा का अवलोकन करें ।
समर्थ रामदास एक शक्तिशाली तथा महाराष्ट्र के जाने माने गुरु थे । शिवाजी महाराज उनकी प्रसिद्धि के बारे में सुनने के पश्चात उनसे मिलने के लिए उत्सुक थे । वे कोंधावल चास्म गए जहाँ गुरु ने शिविर लगाया था एवं उनकी (गुरु की ) पूरे दिन प्रतीक्षा की । लेकिन गुरु वहां नहीं थे और शिवाजी को उत्सुकतापूर्वक बिना मिले हुए वापस लौटना पड़ा । उस रात और दूसरे दिन और रात, शिवाजी का मष्तिष्क समर्थ रामदस जी के विचारों में पूरे दिन रहा । जैसे -2 समय व्यतीत हुआ, उनकी गुरु से मिलने की तीव्र इच्छा बढ़ गयी । वे भवानी देवी के मन्दिर में गए एवं प्रार्थना में बैठ गए । उन्हें इस बात का आभास भी नहीं हुआ कि कब वे वहां निद्रा में गिर पड़े । उनके स्वप्न में समर्थ रामदास एक भगवा वस्त्र, खडाऊँ पहने हुए एक माला एवं बैसाखी बांह के निचे धारण किये हुए प्रकट हुए । उनके तेजस्वी स्वरुप को देख कर शिवाजी उनके चरणों में गिर पड़े एवं आशीर्वाद की याचना की । समर्थ रामदास ने उनके सिर को छुआ एवं उन्हें आशीर्वाद दिया । जब प्रातः काल वे जागे, वे एक नारियल पकडे हुए थे । भारत में नारियल गुरु द्वारा शिष्य को आशीर्वाद के रूप में प्रदान किया जाता एवं स्पर्श किया जाता है ।
उस क्षण के बाद से, शिवाजी ने समर्थ रामदास को अपने गुरु के रूप में माना । गुरु बाद में सिंगनवाडी में उन्हें देखने के लिए आये । शिवाजी ने गुरु के पैरों को धोने की कर्मकाण्ड वाली पूजा की एवं उन्हें फल एवं पुष्प समर्पित किये । गुरु ने उन्हें आशीर्वाद दिया एवं एक नारियल प्रदान किया। उन्होंने आशीर्वाद के रूप में उन्हें एक मुट्ठी भर कीचड़, कंकड़, एवं कुछ घोड़े की लीद भी दी । उन्होंने उनसे कहा : तुम शासन करने एवं लोगों की सेवा करने के लिए पैदा हुए हो । मेरा आशीर्वाद एवं मार्गदर्शन सदैव तुम्हारे साथ है । जहाँ कही भी तुम मेरा ध्यान करोगे, मैं तुम्हारा साथ दूंगा । बुद्धिमत्तापूर्वक शासन करो ।
गुरु अच्छी तरह उनके राज्य के शासन के लिए शिवाजी की आवश्यकताओं एवं अपेक्षाओं से अवगत थे ।"मुट्ठी भर वस्तुयें जो उन्होंने शिवाजी को प्रदान किया " ने शिवाजी की आवयश्यकताओं तथा उनकी परिपूर्णता के लिए गुरु के आशीर्वाद को प्रदर्शित किया । मुट्ठी भर कीचड़ ने पृथ्वी या राज्य को प्रदर्शित किया, कंकड़ पहाड़ी किले थे जिन्हें सुरक्षा एवं शत्रुओं से युद्ध की आवयश्यकता थी, घोड़े की लीद ने घोड़ों को प्रस्तुत किया जिन्हें युद्ध के लिए आवागमन के लिए एवं शत्रुओं से रक्षा के लिए प्रयोग किया जाना था तथा नारियल शिवाजी के कल्याण के लिए था ताकि वे मराठा राज्य के महाराज के रूप में तथा अपने व्यक्तिगत जीवन में अच्छा करें । गुरु के आशीर्वाद ने यह सुनिश्चित किया कि शिवाजी को उनके जीवन में कभी कोई कमी नहीं पड़ेगी ।
गुरु के प्रति तीव्र तड़प एवं उनके आशीर्वाद ने समर्थ रामदास को शिवाजी की ओर आकर्षित किया । उनके आशीर्वाद ने शिवाजी को एक बुद्धिमान और समर्थ शासक बनाया जिसने महाराष्ट्र में हिन्दू स्वराज्य को पुनः स्थापित किया । शिवाजी के शासन में विदेशी आक्रमणकारी काबू में थे, समाज में महिलाओं की स्थिति तथा सम्मान पुनः स्थापित हुआ, दासता समाप्त कर दी गयी थी । समाज निखरा हुआ था । यह सब शक्तिशाली समर्थ रामदास के आशीर्वाद एवं मार्गदर्शन के कारण था । यही वह कारण है कि गुरु की क्यों आवयश्कता होती है ।