जब शिष्य तैयार हो जाते हैं गुरु का आगमन होता है । शिष्य गुरु की खोज में नहीं जाते हैं । भौतिक सिद्धान्त गुरु को शिष्य के पास भेजते हैं । जब गुरु एवं शिष्य आपस में मिलते हैं, गुरु शिष्य के मज़बूत पक्षों एवं कमियों के प्रति जागरूक होता है । जहाँ कुछ कमियों पर काबू पाने की आवश्यकता होती है, गुरु शिष्य की सहायता करते हैं एवं ज्ञान तथा अध्यात्मिक अभ्यास को प्राप्त करने के लिए तैयार करते हैं । जब शिष्य गुरु के क्रियाकलापों के प्रति सचेत नहीं होगा तो क्यों उसके द्वारा कुछ अतिरिक्त करने के लिए कहा जाता है । जब शिष्य गुरु की निःसंदेह आज्ञा मानता है, वह मार्गदर्शित एवं प्रशिक्षित होता है । उच्च ज्ञान प्राप्त करने के लिए इस प्रकार अब वह पूरी तरह से तैयार हो जाता है । यह कथा सूरदास एवं उनके गुरु की है ।
सूरदास एक युवा साधक ईश्वर के प्रति तीव्र रूप से आसक्त थे । एक गुरु उनके जीवन में प्रकट हुए तथा प्रशिक्षित करने एवं ईश्वर की ओर मार्ग दिखाने का वायदा किया । गुरु अवगत थे कि सूरदास स्वयं में एक अपूर्णता रखते थे । सूरदास अतिशीघ्र एवं तुच्छ सामग्रियों के लिए भी क्रोधित हो जाया करते थे । गुरु अवगत थे कि सूरदास का क्रोध आन्तरिक अवरोधों का कारण होगा जिसके कारण सूरदास ईश्वर की समीपता को महसूस नहीं कर पायेंगे । उन्होंने सूरदास की क्रोध के अवगुणों पर काबू पाने तथा उन्हें अध्यात्मिक अभ्यासों को प्राप्त करने में तैयार करने में सहायता के लिए इच्छा की । उन्होंने सूरदास से कहा : अपने समस्त कार्यों एवं गतिविधियों के दौरान रात दिन भगवान् के नाम का एक मास तक जाप करो । नवीन मास के आरम्भ होने के प्रथम दिन , प्रातः काल स्नान करो तथा मेरे पास आओ । मैं तुम्हे ईश्वर के मार्ग की दीक्षा दूंगा ।
सूरदास ने गुरु के निर्देशों का पालन किया । उन्होंने ईश्वर के नाम का रात दिन तथा अपनी समस्त गतिविधियों के दौरान जाप किया । नवीन मास के प्रथम दिन वे भोर में नदी की ओर भागे ,स्नान किया , स्वच्छ कपड़ों को पहना तथा गुरु के आश्रम की और प्रस्थान किया । जैसे ही वे आश्रम के समीप पहुंचे एक सफाई कर्मी जो मार्ग की सफाई कर रहा था भूलवश उनके कपड़ों पर धूल को झाड़ दिया और वे गन्दे हो गए । सूरदास ने आत्म संतुलन खो दिया एवं सफाई कर्मी पर चिल्लाने लगे । तुम मूर्ख एवं लापरवाह हो ! तुम्हारे कारण मुझे वापस जाना पड़ेगा तथा दोबारा स्नान करना पड़ेगा ।
गुरु आश्रम से इस घटना का अवलोकन कर रहे थे । जब सूरदास उनके पास गए, उन्होंने कहा : प्रिय सूरदास , तुम अभी तैयार नहीं हो । कृपया एक मास तक उन्ही निर्देशों का पालन करो एवं पुनः मेरे पास आओ । सूरदास ने गुरु के आदेशों को स्वीकार किया तथा आश्रम छोड़ दिया । उन्होंने दूसरा मास रात दिन ईश्वर के नाम का जाप करने में व्यतीत किया । नवीन मास के प्रथम दिन वे नदी को गए स्नान किया एवं स्वच्छ कपडे पहने और आश्रम के लिए रवाना हुए । सफाई कर्मी आश्रम के बाहर कार्य कर रहा था । वह मार्ग की सफाई कर रहा था और भूलवश उसने सूरदास के कपड़ों पर अपने झाड़ू से झाड़ दिया । सूरदास के आवेश की कोई सीमा नहीं रही ! वे सफाई कर्मी पर चिल्लाने लगे और गुरु ने पुनः उन्हें दूसरे मास के जाप करने के लिए भेज दिया ।
समयावधि की समाप्ति पर, सूरदास ने पुनः स्नान किया एवं गुरु के आश्रम की ओर गए । इस समय कुछ असामान्य घटित हुआ । सफाई कर्मी ने सूरदास को अपनी ओर आते देखा । उसे बिना किसी कारण चिल्लाया जाना स्मरण हो गया । वह आवेग से भर गया । उसने कीचड़ से भरी हुई कचरा टोकरी को उठाया और उसने जान बूझकर सूरदास के ऊपर उड़ेल दिया । और उस समय सूरदास की प्रतिक्रिया बहुत भिन्न थी । उन्होंने अपने हाँथ जोड़े तथा सफाई कर्मी से कहा : आप मेरे अध्यापक हैं । आपने मुझे क्रोध पर काबू पाना सिखाया । मैं आपका आभारी हूँ ।
गुरु आश्रम से बाहर आये और सूरदास का गर्मजोशी से स्वागत किया । उन्होंने कहा : तुम अब अंततः अध्यात्मिक शिक्षाओं तथा अभ्यासों को प्राप्त करने के लिए तैयार हो गए हो ।
सफाई कर्मी जिसने सूरदास पर धूल झाड़ दी भूलवश ऐसा किया । उसकी जानबूझकर गलती नहीं थी । फिर भी सूरदास उस पर क्रोधित हो गए । अपने समस्त कार्य एवं गतिविधियों के दौरान लगातार तीन मास तक भगवान् के नाम का जाप रात दिन करने के कारण, सूरदास अपने क्रोध पर नियंत्रण पा सके । यह सब कुछ गुरु के आशीर्वाद तथा उनके आदेश कि सूरदास को भगवान् के नाम का जाप करना चाहिए के कारण हुआ । सूरदास ने अपने गुरु की आज्ञा मानी एवं पुरस्कृत हुए । उनके गुरु सूरदास की अपनी नकारात्मकता पर नियंत्रण करने में सहायक हुए । क्रोध, नुकसान, लालच, आसक्ति, गर्व, तामसिकता की तरह नकारात्मकता हमारी आत्मा एवं ईश्वर के बीच में दूरियाँ पैदा करती हैं और हम ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करने में सक्षम नहीं हो पायेंगे या अपने अन्दर ईश्वर के प्रेम की मधुरता का आनन्द नहीं ले पायेंगे । एक गुरु का मार्गदर्शन एवं आशीर्वाद आवश्यक होता है । यही वह कारण है कि गुरु की क्यों आवश्यकता होती है ।