Amrit Dhara - Dhyanyogi Omdasji

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रविवार, 20 अक्टूबर 2013

गुरु सेवा का आशीर्वाद - कल्याण

ईश्वर की सर्वोच्च शक्ति ब्रह्माण्ड एवं प्राणियों पर नियंत्रण करती है । यह समझना मात्र नश्वर व्यक्तियों के लिए संभव नहीं होता  है कि ईश्वर कौन या क्या है, उनके नियम क्या हैं, वे कैसे संचालन करते हैं, उनके गुण क्या हैं एवं क्यों वे निश्चित कार्य करते हैं जो हमारे बुद्धि के परे होते हैं । केवल ईश्वर अपने बारे मे सबकुछ समझा सकते हैं । इसलिए ईश्वर अपने बारे में मानव समाज को शिक्षित करने के लिए गुरु के स्वरुप में प्रकट होते हैं । ईश्वर गुरु हैं और गुरु ईश्वर हैं । एक गुरु जिन्होंने अपने अहंकार पर नियंत्रण प्राप्त कर लिया है एवं स्वयं को ईश्वर से एकाकार कर लिया है, स्वयं में ईश्वर होता है ।  ऐसे गुरु की सेवा करना ईश्वर की सेवा करना होता है और ऐसी सेवा का आशीर्वाद तथा पुरस्कार आश्चर्यजनक होता है। समर्थ रामदास एवं कल्याण की इस कथा को समझें :
                                  
समर्थ रामदास एक शक्तिशाली एवं जाने माने गुरु थे । वे सज्जनगढ़ में रहते थे जो एक पहाड़ की चोटी पर था । किले में पानी का कोई भी स्रोत नहीं था । गुरु एवं उनके शिष्यों के लिए नियमित आवश्यकताओं का पानी पहाड़ी की तलहटी में एक गाव से लाना पड़ता था : किले में सभी व्यक्तियों की आवश्यकताओं के लिए पानी लाने एवं भरने का यह कार्य कल्याण नामक एक शिष्य द्वारा संपन्न किया जाता था । कल्याण अपने गुरु के प्रति असीम प्रेम रखता था एवं पानी भरने एवं लाने का कार्य गुरु सेवा की तरह करता था । सभी दूसरे  शिष्य गुरु के चरणों में बैठते थे एवं पवित्र किताबों तथा प्रश्न तथा उत्तर सत्र के माध्यम से ज्ञान अर्जित करते थे ।  कल्याण बहुत मुश्किल से अध्यन के लिए गुरु के श्री चरणों में बैठ पाता था । वह सुबह से शाम तक किले में पानी लाने एवं भरने में ही व्यस्त रहता था । वह गुरु का सबसे प्रिय शिष्य था एवं सभी शिष्य कल्याण से ईर्ष्या तथा द्वेष रखते थे । वे सोंचते थे कि क्योंकि वे गुरु के श्री चरणों में बैठते है तथा मेहनत से अध्यन करते हैं इसलिए वे कल्याण के अपेक्षाकृत अधिक ज्ञान रखते हैं और गुरु को उनसे अधिक प्रगाढ़ता रखनी चाहिए ।
                                      
समर्थ रामदास कल्याण के प्रति दूसरे शिष्यों की भावनाओं से अवगत थे। वे उन्हें कल्याण की प्रतिभा दिखाने के लिए उचित अवसर की प्रतीक्षा में थे । एक दिन अध्यन सत्र के दौरान , गुरु ने विद्यार्थियों से एक तर्कपूर्ण प्रश्न पूछा । उनमे से कोई भी उत्तर देने में सक्षम नहीं था । उसी समय कल्याण पानी की बाल्टियों को ढोते  हुए गुज़र रहा था । गुरु ने उसे पुकारा एवं वही प्रश्न उससे पूछा । कल्याण ने बड़ी सहजता से उचित उत्तर दे दिया ।
                                     
दूसरे विद्यार्थी स्तब्ध थे। उन्होंने गुरु से पूछा : कि कल्याण कैसे इस प्रश्न का उत्तर जानता है ? हमलोग रात दिन आपके सम्मुख बैठते हैं एवं अध्यन करते तथा सीखते हैं । हमलोग इस प्रश्न का उत्तर देने में सक्षम नहीं हुए । कल्याण कभी भी हमलोगों के साथ नहीं बैठता तथा अध्यन करता हैं । फिर भी उसने ठीक उत्तर दे दिया । समर्थ रामदास ने उत्तर दिया : कल्याण ने उचित समझ तथा दृष्टिकोण से गुरु सेवा की । उसके लिए गुरु की सेवा करना एवं किले में यहाँ सभी व्यक्तियों के लिए पानी की आवश्यकता का ध्यान रखना ईश्वर की सेवा करना है । वह इस कार्य को प्रसन्नतापूर्वक एवं निष्ठा पूर्वक करता है ।  उसने इस पर कोई असन्तोष नहीं रखा कि वह सम्पूर्ण दिन पानी ढोता है और आप सब लोग आराम से यहाँ बैठते हैं तथा अध्यन करते हैं । आप सब लोग केवल आद्ध्यात्मिकता का सिद्धांत जानते हैं। आपके लिए उक्ति " आपकी तरह लोगों की सेवा करना ईश्वर की सेवा करना है । एवं "गुरु ईश्वर हैं " केवल एक शब्द है । कल्याण ने अभ्यास से इन उक्तियों की सत्यता को जान लिया है । वह उचित द्रष्टिकोण एवं समझ से इस सेवा को कर रहा है । ईश्वर एवं गुरु का आशीर्वाद उसके ऊपर बरसता है । इसीलिए वह सम्पूर्ण ज्ञान रखता हैं । बाद में समर्थ रामदास ने कल्याण को अपना अधिकारिक लेखक उनके सभी गीतों एवं शिक्षाओं को लेखनबद्ध करने के लिए घोषित किया । समर्थ रामदास ने दसबोध एवं श्री मनाचे श्लोक की तरह कई पुस्तकों को प्रकाशित किया जो आज भी पढ़ी जाती हैं एवं श्रद्धेय है । कल्याण उनकी लेखनी थे ।
                                         
साधुओं एवं दूसरों के द्वारा भाषणों को सुनना एवं पुस्तकों का अध्यन करना हमलोगों को केवल किताबी ज्ञान देता है । सैधांतिक ज्ञानों का कोई उपयोग नहीं होता है । यह स्वादिष्ट व्यंजन को बनाने के तरीके को जानने की तरह होता है । हमलोग सामग्रियों एवं विधियों को जान सकते हैं तथा तैयार व्यंजन के स्वाद का विवरण रख सकते हैं । लेकिन मात्र इस बात को जानने से हमारी भूख शांत नहीं होगी । हमें वास्तविक व्यंजन को खाने की आवश्यकता होती है एवं स्वाद का आनन्द लेने की और अपनी भूख की पूर्ति के लिए भोजन करने की आवश्यकता होती है ।
                  
सीता राम मन्त्र का नियमित जाप कीजिये एवं ध्यान कीजिये । गुरु की शिक्षाओं का अनुसरण कीजिये । यह बात कोई मायने नहीं रखती है कि आप भौतिक रूप से गुरु के समीप हैं या दूर हैं । उनका ध्यान करके गुरु से मानसिक समीप होइये । अपने कार्य को करिए तथा आपको प्रदान किये गए अभ्यासों का अनुसरण कीजिये । यह सबसे अच्छी गुरु सेवा होती है जो आप कर सकते हैं एवं आप आशीर्वाद का फल भोगेंगे । जो कुछ भी आपके जीवन में कमियां होंगी उनकी पूर्ति हो जाएगी और आप में संतोष आएगा । गुरु सेवा कामधेनु की तरह होती है - पवित्र गाय जो सभी इच्छाओं की पूर्ती करती है। सेवा करने के प्रयोजन से गुरु की सेवा कीजिये । गुरु के प्यार के लिए गुरु की सेवा कीजिये । यह संभावित सेवा का सर्वोच्च स्तर हो सकता है ।