सत्यम वाद - मधुरम वाद - ये वेदों की उक्तियाँ हैं । सत्य बोलिए लेकिन मधुरता से बोलिए । जब आप बोलें अपनी भाषा में विनम्रता एवं सम्मान रखें । हम बिना दूसरों को कष्ट पहुँचाये सत्य बोल सकते है । इन दिनों हम लोग दूसरों को कष्ट पहुँचाने के लिए भाषा का प्रयोग एक हथियार के रूप में करते हैं । हम लोग ऐसे शब्द बोलते हैं जो अन्य व्यक्ति के ह्रदय को विदीर्ण कर देगा । तब हम उक्ति पर आरोप लगाते हैं जो बताती है कि सत्य बोलिए और इसलिए कि ईश्वर सत्य है । हमलोग इसलिये गलत होते हैं क्योंकि हमारा अभिप्राय दूसरों को कष्ट पहुँचाना होता है । भाषा के पीछे का अभिप्राय सत्य को प्रकट करना नहीं होता है बल्कि दूसरों को कष्ट पहुँचाना होता है । सत्य के पीड़ाजनक भागों को भी सम्मान एवं मधुरता से बोला जा सकता है और इससे दूसरों को कष्ट नहीं होगा । ऐसी भाषा दूसरों की उनकी गलतियों को समझने में और उनके व्यवहार को बदलने में सहायता करेगी । ऐसे शब्द कीमत रखते है क्योंकि वे एक व्यक्ति की ज्ञानरूपी प्रकाश को देखने और स्वयं को परिवर्तित करने में सहायता करते हैं ।
जब कोई दूसरों के लिए मधुरता और सम्मान से सत्य बोलता है - शरीर एक मन्दिर हो जाता है और उस मन्दिर में ईश्वर निवास करते हैं । जो लोग इस उक्ति का पालन करते हैं, वे निराली शक्ति एवं आकर्षण रखते हैं - एक प्रतिभा जो दूसरों को उनकी ओर आकर्षित करती है । यही सत्य एवं मधुरता की शक्ति है । ईश्वर जो प्रेम एवं सत्य का स्वरुप होते हैं, उनके अन्दर निवास करते हैं । और ईश्वर की आभा उनके चेहरे पर और उनसे चमकती है ।
मैं एक घटना का वर्णन करता हूँ जो मेरे जीवन में घटित हुई जिससे यह सत्य प्रतिविम्बित होता है । ध्यानयोगी मधुसूदनदास जी के अमेरिका से भारत वापस आने के पश्चात, वे अपने आश्रम नहीं रहे । उन्होंने एक शिष्य तथा उसके परिवार के निवास स्थल पर 10x10 फुट के एक छोटे से कमरे को रहने के लिए चुना । उसके बाद उन्होंने मुझे आश्रम में एक शानदार जन समारोह में अपना गादीपति चुना और बनाया । मैंने आश्रम में अपना निवास स्थल बनाया । मैंने ध्यानयोगी मधुसूदनदास जी को आश्रम में आने एवं ठहरने के लिए आमंत्रित किया । उन्होंने मेरे प्रस्ताव को ठुकरा दिया । उन्होंने उत्तर दिया कि वे परिवार के व्यवहार के कारण एक छोटे कक्ष और एक छोटे फ्लैट में उस परिवार के साथ ठहरने का आनन्द ले रहे हैं | वे एक दूसरे के साथ पूर्णतयः संगठित थे और एक दूसरे के साथ प्यार एवं सम्मान के साथ बोलते थे । परिवार में कोई अभद्र भाषा, चिल्लाहट , कुतर्क नहीं था । प्यार सम्मान और मधुरता का रिसाव पारिवारिक वातावरण पर होता था । वे उसी प्यार एवं सम्मान के साथ अपने गुरु की सेवा करते थे । सम्पूर्ण परिवार उपासना और श्रद्धा के साथ उनकी देखभाल करता था । उन्होंने कहा कि यह पृथ्वी पर एक स्वर्ग की तरह है और वे इस प्यार के मन्दिर को छोड़ना नहीं चाहते हैं । इसलिए वे उस फ़्लैट और उस कमरे में जीवन के अन्तिम समय तक रहे ।
गुरु एवं ईश्वर उस घर में निवास करेंगे जहाँ सदस्य प्यार एवं सम्मान एक दूसरे के प्रति रखेंगे और उसे अपने भाषा एवं व्यवहार में प्रदर्शित करेंगे । ऐसा घर ईश्वर के निवास का एक भौतिक मन्दिर होता है । जब हम अपने शरीर को मधुरता एवं सत्य के एक मन्दिर में बदलते हैं , गुरु एवं ईश्वर भी हमारे ह्रदय में निवास करेंगे । हमारे ह्रदय में सर्वोच्च शक्ति का प्रकटीकरण हमारे जीवन में आभासित होगा और हमारे चारों और हर जगह प्रकट होगा । अपने भौतिक शरीर को पवित्रतम स्थल में बदलना और रूपांतरित करना हमारे हाँथ में होता है जिसमें गुरु एवं ईश्वर रहने के लिए स्थापित होते हैं ।