आज मकर संक्रान्ति का उत्सव है । यह उत्सव सूर्य की स्थिति पर आधारित होता है न कि चन्द्रमा पर । सामान्यतः भारतवर्ष में सभी उत्सव चन्द्र वर्णनावाली पर आधारित होते हैं । इस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है क्योंकि यह ब्रह्माण्ड में अपने आकाशीय पथ की यात्रा करता है । यह धार्मिक और एक फसलीय उत्सव होता है । इसके भौतिक एवं अध्यात्मिक मायने भी हैं ।
यह दिन दक्षिणायन के अन्त का सूचक होता है - छै महीने की वह अवधि जो देवताओं के लिए रात्रि होती है । इस अवधि के दौरान मृत्यु अशुभ मानी जाती है । मकर संक्रान्ति के दिन से उत्तरायण आरम्भ हो जाता है - छै महीने की वह अवधि जो देवताओं के लिए दिन होती है । महाभारत के एक प्रसंग में भीष्म पितामह दक्षिणायन की अवधि के समाप्त होने तथा उत्तरायण के आरम्भ होने की प्रतीक्षा में शर शैया पर लेटे हुए थे, ताकि वे अपना शरीर त्याग सकें । आज वह दिन भी होता है जब गंगा ने राजा भागीरथ का अनुसरण किया और महासागर में प्रवेश किया और उनके शुद्ध जल ने राजा सगर के हजारों पुत्रों को मोक्ष प्रदान किया । इस दिन हज़ारों लोग गंगा सागर में स्वयं के पवित्रीकरण के लिए स्नान करते हैं । इस दिन, संक्रान्ति - एक देवता ने शंकरासुर नामक एक राक्षस को मारा था ।
मकर संक्रान्ति भारत के अधिकांश भागों में एक फसलीय उत्सव भी होता है । नये फसलीय चावल ताज़े गन्ने के रस में पकाए जाते हैं और दक्षिण भारत में सूर्य एवं गायों को समर्पित किया जाता है । यह व्यंजन पोंगल कहलाता है । उत्तर भारत में, ताजे फसलीय चावल एवं दालें एक खिचड़ी नामक मसालेदार नमकीन व्यंजन के रूप में बनाई जाती है । महाराष्ट्र एवं आन्ध्रप्रदेश में लोग तिल और गुड़ की बनी हुई मिठाई का आदान प्रदान करते हैं और एक दूसरे से मधुर बोलने का अनुरोध करते हैं । गुजरात में लोग सुबह से शाम तक पतंगे उड़ाते हैं और इन दिनों रात में भी । पंजाबी इस उत्सव को लोहड़ी बुलाते हैं और वे अलाव जलाते हैं और उसमें गन्ना और चावल फेंकते हैं । वे प्रसिद्द नृत्य भांगड़ा भी करते हैं और वे इस उत्सव के लिए तैयार किया गया वैभवशाली भोजन भी करते हैं । भारत के अधिकांश राज्य इस उत्सव को अपने विशेष तरीकों प्रथाओं और परम्पराओं से मनाते हैं । हर जगह वातावरण में उल्लास एवं आनन्दकारी माहौल होता है ।
मकर शनि ग्रह का प्रतीक होता है । इस दिन सूर्य मकर के प्रतीक शनि राशि में प्रवेश करता है । भारतीय किवदंतियों के अनुसार , शनि ग्रह सूर्य के पुत्र हैं । पिता अपने पुत्र से मिलने के लिए उनके घर जाते हैं । ये दोनों ग्रह पराक्रमी एवं शक्तिशाली होते हैं । इनके आशीर्वाद बहुत शुभ होते हैं । हम सूर्य एवं शनि ग्रह के आशीर्वाद से भौतिक एवं अध्यात्मिक दोनों सफलता प्राप्त करते हैं । इस दिन सूर्य एवं शनि ग्रह की पूजा की जाती है ।
इस दिन सुबह से शाम तक वातावरण में दिव्य चेतना का संचार होता है । ये अध्यात्मिक ऊँची तरंगें अध्यात्मिक अभ्यास का आशीर्वाद देती हैं । जब हम अपने नियमित जाप एवं ध्यान को इस दिन करते हैं और अतिरिक्त अभ्यास भी करते हैं, हम अधिक महान परिणामों को प्राप्त करते हैं ।
गंगा, यमुना, गोदावरी ,कृष्णा ,कावेरी के पवित्र जल में डुबकी लगाना जो इन नदियों के किनारे पर स्थित श्रद्धेय स्थलों पर है " शुभ माना जाता है और ऊँची अध्यात्मिक योग्यता का होता है । लोग इस दिन दान भी देते हैं और मेधावी कर्मों को करते हैं क्योंकि यह फलदायक माना जाता है ।
भारत के उत्सवों एवं संसार के उत्सवों की भी उत्पत्ति ब्रह्माण्डीय मार्गों में तारों एवं ग्रहों की स्थिति से होती हैं । ब्रह्माण्ड में ग्रहों एवं तारों के बदलाव के कारण जब तरंगों के स्तर में बदलाव होता है, उत्सव मनाये जाते हैं । भोजन, कपड़ों एवं उल्लास के साथ उत्सव मनाने के अलावा लोगों को प्रार्थना करने के लिए , ध्यान के लिए, पवित्र स्थलों के दर्शन के लिये और आकांक्षी को दान के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता है । भारत में, उत्सव लोगों के दैनिक जीवन का अभिन्न एवं नियमित हिस्सा होते हैं । उत्सव हमारे जीवन में पूजा एवं कृपा के सुनहरे किस्मों के साथ उत्सव मनाने की रंग बिरंगी किस्मों से जुड़ते हैं । आओ हम लोग एक धन्यवाद की भावना के साथ उत्सव मनायें ।