जब एक शिष्य आस्था और विश्वास से अपने गुरु की आज्ञा मानता है और उनकी सेवा करता है, आशीर्वाद जो गुरु से पुरस्कार के रूप में बहता है, प्रचण्ड और जीवन परिवर्तित करने वाला होता है । यह प्रसंग एक बहुत प्रसिद्ध गुरु के एक शिष्य के बारे में है जो अपने स्वामी के लिए महान प्रेम रखते थे और नि:संदेह उनकी सेवा करते थे । यह गुरु की कृपा से शिष्य के परिवर्तित होने का एक पूर्ण उदाहरण है ।
आदि शंकरा भारत के महानतम गुरुओं में से एक हैं । वह भगवान् शिव के एक प्रतीक अवतार के रूप में माने जाते हैं । आदि शंकरा हिन्दू दर्शन और धर्म के सुधार के लिए पैदा हुए थे । शंकरा के चार शिष्य थे - सुरेश्वर आचार्य, पदमापदा, हस्तमालका और त्राटकाचार्य । यह कहानी पदमापदा की है ।
पदमापदा का वास्तविक नाम सदानन्द था । वह शंकरा के पहले शिष्य थे । वह महान गुरु भक्त थे । वह बहुत निष्ठावान और विश्वसनीय थे और अत्यधिक आज्ञाकारी भी थे । वे दिये गए सभी कामों को बड़ी प्रसन्नता के साथ करते थे । दूसरे शिष्यों की तुलना में वे थोड़े से बौद्धिक रूप से सुस्त थे । दूसरे शिष्य उनका मजाक उड़ाते थे और कभी-२ अपने हिस्से का कार्य भी उनसे कराते थे । लेकिन वे चुपचाप और प्रसन्नतापूर्वक वह सबकुछ सहते थे । शंकरा सभी घटनाक्रम से अवगत थे और जानते थे कि दूसरे सदानन्द को चिढाते और सताते हैं । उन्होंने अपने आज्ञाकारी विधार्थी की सच्ची कीमत और पूर्ण तन्मयता से की गई गुरु सेवा के आशीर्वाद के बारे में दूसरों को पाठ पढ़ाने के लिए उचित अवसर की प्रतीक्षा की ।
एक बार शंकरा और उनके दल ने गंगा नदी के किनारे शिविर लगाया । सदानन्द आदतन कामों को कर रहे थे । उन्होंने नदी के दूसरे छोर पर गुरु के कपड़ों को धोना सम्पन्न किया । उन्होंने उसको सुखाने के लिए फैलाया और सूखे कपड़ों को एकत्रित करने के लिए और वापस गुरु के पास लाने के लिए प्रतीक्षा कर रहे थे । अचानक एक बाढ़ आई और पानी नदी के किनारे उफनाने लगा । शंकरा सदानन्द के बारे में चिंतित थे । उन्होंने उन्हें तुरंत वापस आने के लिए पुकारा । शीघ्रता से सदानन्द ने सूखे कपड़ों को उठाया और नदी के पानी पर दौड़ पड़े । उन्होंने ध्यान नहीं दिया कि पानी नदी में बढ़ गया है । जब वे गुरु की ओर गंगा के पानी पर दौड़े , उन्होंने गुरु की आवाज के अतिरिक्त किसी बात पर ध्यान नहीं दिया । जैसे ही उन्होंने कदम बढाया, एक कमल उनके पैरों को सहारा देने के लिए पानी की तलहटी से उगा । उनका ध्यान अपने गुरु पर इतना अधिक केन्द्रित था कि उन्होंने अपने पैरों के नीचे कमल के सहारे और स्पर्श को महसूस नहीं किया । उन्होंने सुरक्षित नदी को पार किया और अपने गुरु के पास पहुँच गए । वे सभी जिन्होंने इस दुर्लभ भक्ति की उपलब्धि को देखा, उस चमत्कार से स्तब्ध थे जो ठीक अभी घटित हुआ था ।
जब सदानन्द ने अपने गुरु को प्रणाम किया और उन्हें सूखे कपड़े दिए, गुरु ने उनसे पूछा कि कैसे उन्होंने बाढ़ युक्त नदी को पार किया । सदानन्द फिर भी नदी में कमलों को देखने के लिए नहीं मुड़े । उन्होंने उत्तर दिया कि केवल गुरु के नाम का स्मरण ने उनकी भौतिक संसार के महासागर को पार करने में सहायता की। मात्र नदी को पार करना सरल था । तब शंकरा ने उन्हें कमलदलों को दिखाया जो उनके पैरों को सहारा देने के लिए उग आये थे जैसे ही वे नदी पर चले थे। शंकरा ने उन्हें आशीर्वाद दिया और और उनका नाम पदमापदा रखा । (पदम् का तात्पर्य कमल होता है , पद का तात्पर्य पैर ) गुरु का आशीर्वाद पदमापदा में ईश्वरीय ज्ञान और विज्ञान सहित प्रवाहित हो गया । उनका आन्तिरिक परिवर्तन अचरज था । वे शंकरा के सबसे चतुर शिष्य हुए । उन्होंने " प्रजानाम ब्रह्म " नामक एक महान निबन्ध लिखा जिसका आशय ब्राह्मण ज्ञानवान होता है । वे भारत के पूर्वी भाग में गोवर्धन मठ के शीर्ष पदाधिकारी नियुक्त किये गए ।
गुरु के प्रति गहरा समर्पण और प्रसन्नतापूर्वक की गयी गुरु सेवा ने सुस्त सदानन्द को आशीर्वाद प्रदान किया और वे पदमापदा हो गए । परमगुरु पारसमणि के अपेक्षाकृत वास्तव में अधिक महान होते हैं । पारसमणि शीशे अथवा लोहे को सोने में बदल देती है । लेकिन उसका स्पर्श एक दूसरी पारसमणि नहीं बना सकता है । गुरु पारसमणि के अपेक्षाकृत अधिक महान होते है क्योंकि वे अपनी शक्ति और गुणों को शिष्य में स्थानान्तरित करते हैं और एक बुद्धिमान और ज्ञानवान व्यक्ति बनाते हैं ।