Amrit Dhara - Dhyanyogi Omdasji

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शुक्रवार, 7 जून 2013

सत्य सदैव रहता है


सत्य सदैव है और सत्य ईश्वर है । यह संसार के सभी धर्मों द्वारा घोषित किया जा चुका है । सत्य स्वयं द्वारा प्रमाणित होता है और वह प्रकाशित होता है ।  इस प्रकार कोई मुश्किल से ही इसे छुपाने या अस्पष्ट करने का प्रयास कर सकता है । सत्य सदैव स्वयं में अन्त तक प्रकट होता है । सत्य की सदैव विजय होती है । 
                                                                               
आदि अनादि काल से महान गुरूओं, साधुओं और अवतारों ने ज्ञान देने के लिए और सत्य का पाठ पढ़ाने के लिए जन्म लिया है । आदि अनादि काल से वे घोषित किये गए हैं । सदैव ही कुछ जन समुदाय होगा जो ज्ञान को अस्पष्ट करेगा और सत्य को छिपाएगा । ईसा महान अध्यापक और गुरु थे और उन्होंने लोगों को ज्ञान दिया और ईश्वर के बारे में सत्य को घोषित किया । ऐसा करने के कारण , उन्हें शूली पर चढ़ा दिया गया । उन दिनों के अज्ञानी और बुरे लोगों ने यह दिखाना चाहा कि यदि वे वास्तव में ईश्वर के बेटे हैं तो क्या वे मृत्यु को प्राप्त होंगे यदि उन्हें शूली पर लटका दिया जाए । ईसा  ने स्वयं को पुनर्जीवित किया और संसार को दिखाया कि  वे वास्तव में ईश्वर  की संतान हैं और यह कि वे और उनके पिता ( ईश्वर ) एक हैं । 
                                                
जब तक कि मनुष्य परम ज्ञान नहीं प्राप्त करता है और सर्वोच्च सत्य के बारे में नहीं सीखता है और उसे अनुभव नहीं करता है, उसके जीवन का उद्देश्य अधूरा होता है । आदि अनादि काल से ईश्वर ने अपना प्रतीक गुरु के रूप में सर्वोच्च सत्य के बारे में मानव को पाठ पढ़ाने के लिए भेजा है । गुरु ने ईश्वर के बारे में सर्वोच्च सत्य को जाना एवं महसूस किया है और वे इस सत्य को सिखाते हैं और इस ज्ञान को मानव समाज को देते हैं । अध्यात्मिक अभ्यास सिखाये जाते हैं और विद्यार्थी उनका लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अनुसरण करते हैं केवल गुरु द्वारा सिखाया गया तकनीकों एवं परम्पराओं का अनुशासित एवं नियमित अभ्यास ही विद्यार्थी की परम सत्य एवं ज्ञान के लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायता करेगा । 
                                      
आदमी काम करता है और धन, शक्ति, पद, प्रतिष्ठा अर्जित करता है । वह सम्पत्ति और वस्तुयें एकत्रित करता है ।  वह परिवार और मित्र रखता है । फिर भी वह सदैव अप्रसन्न रहता है और अनुभव करता है कि कुछ जीवन में अधूरापन है । वह और अधिक सम्पत्ति , धन और शक्ति के रूप में प्रसन्नता को खोजता है । जब तक कि वह सर्वॊच्च सत्य को जानता और आत्मसात नहीं करता है वह सदैव अप्रसन्न एवं अधूरा बना रहेगा ।