माँ का प्रेम पृथ्वी पर सबसे अधिक ऊँचा होता है । वह अपने बच्चे का शरीर के अन्दर नौ महीने से अधिक पालन व पोषण करती है और तब उसे जन्म देती है । वह अपने बच्चे को अपने दूध से आहार देती है और उसकी अत्यधिक देखभाल करती है । बच्चे के लिए माँ का प्यार और बलिदान तब से आरम्भ हो जाता है जब से माँ गर्भ धारण करती है और तब तक जारी रहता है जब तक वह अपना शरीर नहीं छोड़ देती है । माना गया या वास्तविक है कि किसी भी खतरे से अपने बच्चे को बचाने के लिए माँ अपना जीवन आसानी से त्याग देगी । माँ ईश्वरत्व के रूप में श्रद्धेय है, क्योंकि वह ईश्वर की तरह अपने बच्चे को जन्म देती है, पालन, पोषण और रक्षा करती है । ईश्वर भी ब्रह्माण्ड को जन्म देते हैं और पालन पोषण करते हैं । माँ बच्चे की देखभाल करने के लिए भरसक संघर्ष करती है और उसकी रक्षा करती है जब तक वह जीवित रहती है । अपने बच्चे के प्रति जबरदस्त प्रेम के बावजूद, इस बात का कोई आश्वासन नहीं होता है कि वह पुनः उसकी माँ बनेगी । माँ की मृत्यु के बाद, कर्म के सिद्धांत माँ को अपने बच्चों से दूर ले जा सकते हैं और उसे ब्रह्माण्ड में दूसरी कही जगह स्थान दे सकते हैं ।
परम गुरु माँ की तरह होते हैं । वे शिष्य का पालन पोषण एवं देखभाल करते हैं । परमगुरु एक बहुत महत्वपूर्ण मार्ग में माँ से भिन्न होते हैं । जब एक शिष्य गुरु भक्त होता है और अपने गुरु से प्रेम करता है, परमगुरु अपने शिष्य की इस जीवन में तथा सभी दूसरे जीवनों में भी देखभाल करते हैं । परमगुरु शरीर नहीं होते हैं । वे सर्वोच्च दिव्य प्रकृति का सिद्धान्त होते हैं जो स्वयं को किसी समय पञ्च तत्वों या अपने संयोजनों से स्पष्ट करता है । परम गुरु शिष्य के सम्पूर्ण जीवन में उसके वर्तमान शरीर में और मृत्यु के बाद उसके आगामी शरीरों में भी उसके साथ होते हैं और उसको सर्वोच्च के लिए मार्ग दर्शन देते हैं । शिष्य को परम गुरु के प्रति प्रेम से परिपूर्ण होना चाहिए और व्यवस्थित ढंग से रहना चाहिये जो उसको सहायता देने में परमगुरु को सहायता देता है ।
इस कहानी को समझिये । एक नदी में कई मछलियाँ थीं । कुछ छोटी और कुछ विशाल थीं । वे विविध प्रकार के तरीकों,रंगों,विशेषताओं और गुणों की थीं । इन मछलियों के बीच में एक विशाल मछली रहती थी जो सदैव मछुआरे के आक्रमण से जीवित बच जाती थी जो नदी पर मछली का शिकार करने के लिए और अपने जालों को फैलाने के लिए आता था । यह मछली उन मछलियों के बीच में उत्तम नायक मानी जाती थी । एक बार एक छोटी मछली ने उससे पूछा कि उसने अबतक अपने आप को कैसे बचाया है । उत्तम नायक मछली ने उत्तर दिया :- तुम्हे क्रोध, लालच और अनभिज्ञता से मुक्त होना चाहिए । प्रत्येक समय मछुआरे मछली पकड़ने के जाल और चारे सहित अन्दर आते हैं , अपने को शिकंजे में लाने के लिए लालची न बनो और चारे को पकड़ने और उसे खाने के लिए मत भागो । यदि तुम ऐसा करती हो , तुम कांटे में फंस जाओगी । जब मछुआरा जाल फैलाता है , यह मत सोंचो कि तुम उससे अधिक चतुर हो और जाल से बच सकती हो । यदि तुम ऐसा सोंचती हो और लापरवाह होती हो , वह तुम्हे पकड़ लेगा यदि तुम उसके चारे या प्रलोभन के बहुत निकट हो , स्वयं को उससे बचा के रखो, तुम जाल या मछली पकड़ने के संजाल द्वारा पकड़ी नहीं जाओगी जब वह उसे फैलाता है मैंने इस नियम का अनुसरण किया है और स्वयं को अब तक मछुआरे की पकड़ से बचाया है ।
हमें उत्तम नायक मछली की तरह होना चाहिए । हमें क्रोध, लालच,गर्व,प्रतिशोध एवं आसक्ति के प्रति लालसा से छुटकारा पाना चाहिए । हमें परमगुरु के बताये हुए मार्गों के सदैव निकट होना चाहिए । हमें उनके पीछे चलना चाहिए । तब संसार के प्रलोभन और खतरे हमें नहीं उलझाएंगे । भौतिक संसार के प्रलोभन, निराशावादी इच्छाएँ, आसक्ति जो हमें उलझाये रख सकती हैं और जन्म एवं मृत्यु के चक्रों में जकड़े रख सकती हैं, यदि हम परम गुरु के बताये हुए मार्गों पर होते हैं और उनकी शिक्षाओं का अनुसरण करते हैं, उक्त चीजें हमें फंसाने के योग्य नहीं होंगी । गुरु के बताये मार्ग पर होना महज एक शारीरिक कार्य नहीं होता है । यह गुरु के अन्दर की सर्वोच्च शक्ति के प्रति मानसिक समर्पण होता है जो हमें उचित ढंग से सर्वोच्च के प्रति मार्गदर्शन देता है ।
परम गुरु के बताये हुए मार्गों के प्रति समर्पित हो और उनका अनुसरण करो । तब आप इस संसार के बहकावे की सीमाओं एवं जन्म मृत्यु के चक्रों के जाल से सुरक्षित होते हैं ।