Amrit Dhara - Dhyanyogi Omdasji

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रविवार, 7 जुलाई 2013

परम गुरु द्वारा निभाई गई भूमिकायें


परम गुरु परम योगी होते हैं जो ब्रह्माण्डीय शक्ति से अपनी आत्मा को जोड़े रहते हैं और उससे एकाकार होते हैं । जैसे कि ईश्वर विभिन्न स्वरूपों के माने जाते हैं एवं अपने भक्त की रक्षा के लिए भिन्न-२ भूमिकायें निभाते हैं । परम गुरु भी विभिन्न भूमिकाओं एवं स्वरूपों में अपने शिष्य तथा समाज की उन्नति के लिए माने जाते हैं । परम योगी शिष्य के लिए सबकुछ होते हैं । वे तत्क्षण की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु विभिन्न भूमिकाओं में माने जाते हैं । वे शिष्य तथा समाज की रक्षा हेतु सभी चार वर्ण/जाति ब्राह्मण (अध्यापक) क्षत्रिय (सुरक्षाकर्मी), वैश्य (किसान और व्यापारी) और शूद्र (सफाई कर्मी और मजदूर ) के रूप में भूमिका निभाते हैं । ये भूमिकाए मूलतः किये गए कार्य या एक व्यक्ति का उक्त कार्य के प्रति झुकाव के आधार पर निश्चित की गई थीं न की उसके जन्म के आधार पर । 
                 
एक ब्राह्मण के रूप में परम गुरु अपने शिष्य तथा संसार को  ज्ञान एवं शिक्षा देते हैं । परमगुरु द्वारा दिया गया ज्ञान प्रमाणित होता है क्योंकि यह आन्तिरिक अनुभवों पर आधारित होता है और कई हज़ार वर्ष पूर्व गुरु से शिष्य को सौंप दिया गया । एक क्षत्रिय के रूप में परमगुरु अपने शिष्य के आश्रयदाता होते हैं तथा एक समुदाय के भी । अतीत में परम गुरुओं ने व्यवहारिक युद्धकालीन कला और हथियारों तथा मंत्रों का प्रयोग करना सिखाया । गुरु वशिष्ठ ने राम को मंत्र के रहस्य और तीरंदाजी में प्रयोग किये जाने वाले मंत्रों को सिखाया था । वे अपने आश्रम के भी प्रभावकारी सुरक्षाकर्ता थे । एक वैश्य के रूप में परमगुरु आश्रम तथा उसके आश्रितों की उन्नति के लिए पर्याप्त धन कोष संग्रह करते हैं । एक शूद्र के रूप में परमगुरु विषाक्त पदार्थों , गंदगी और नकारात्मकता को शिष्य से दूर करते हैं , जो बुद्धिमान एवं अपनी साधना में नियमित होते हैं । परमगुरु का ज्ञान तथा ऊर्जा शिष्य के मानस से विचारों को बाहर निकालती है  और उच्च स्तर का ज्ञान  तथा शिक्षाओं को प्राप्त करने के लिये योग्य बनाती है । 
                               
श्रीकृष्ण परम योगी एवं परमगुरु थे ।  कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में जब उन्होंने भगवत गीता के सिद्धांतों को अर्जुन को सिखाया श्रीकृष्ण ज्ञान देने वाले एक ब्राह्मण थे । भगवत गीता हमें विविध पथों को सिखाती है जिसके द्वारा एक व्यक्ति ईश्वर तथा उन विभिन्न पथों को प्राप्त कर लेता है जिसमे एक व्यक्ति अच्छा तथा सफलतापूर्वक जीवन जीता है । एक क्षत्रिय के रूप में श्रीकृष्ण ने युद्धक्षेत्र में अर्जुन के जीवन को बचाने के लिए सुदर्शन चक्र उठाया । वे एक महान योद्धा तथा तीरंदाज़ थे जिन्हें कई मन्त्रों एवं युद्धकलाओं में महारत हासिल थी । उन्होंने कई युद्ध जरासंध तथा अन्य दानवों से मथुरा, वृन्दावन और उज्जैन के निरपराध उद्देश्यों की रक्षा के लिए किये ।  एक वैश्य के रूप में उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि द्वारका के खजाने में उद्धेश्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति तथा राज्य को चलाने के लिए पर्याप्त धन कोष था । उन्होंने अपने गुरु के आश्रम में सफाई सम्बन्धी कार्य किये एवं एक शूद्र की भूमिका निभाई । 
                 
मूलतः वर्ण व्यवस्था एक व्यक्ति द्वारा अपने व्यक्तिगत गुणों पर आधारित स्वभावों से मेल खाते कार्यों को निभाने के लिए बनाई गई थी । बाद में यह जाति व्यवस्था में परिवर्तित हो गई जिसमें किरदारों को जन्म से परिभाषित किया गया । परमगुरु किसी जाति से सम्बन्धित नहीं होते हैं । वे सभी भूमिका निभाते हैं जिसकी उन्हें आवश्यकता होती है । परमगुरु विशाल रूप से अपने शिष्य तथा मानवता के सुधार के लिए कार्य करते हैं ।