भारत में प्रत्येक वर्ष विभिन्न प्रकार की नवरात्रि मनाई जाती है । ये नौ दिनों का उत्सव होता है जो सर्वोच्च शक्ति-माता देवी को समर्पित किया जाता है । इन नौ दिनों के उत्सव के दौरान, आयोजनों के साथ लोगों के द्वारा अत्यधिक अध्यात्मिक अभ्यास किये जाते हैं । वातावरण स्वर्ग की दैवीय तरंगों एवं लोगों का प्रेम एवं विश्वास की तरंगों से स्पंदित होता है । शाकम्बरी नवरात्रि पौष के हिंदू माह की पूर्णिमा को होता है । इस वर्ष यह 9 जनवरी - 2012 को पड़ी है ।
देवी भागवतम हिंदू धर्म का पवित्र धार्मिक ग्रन्थ, शाकम्बरी देवी की कथा का वर्णन करता है । दुर्गम नामक एक दानव ने प्रचण्ड तपस्या की और चारों वेदों को प्राप्त कर लिया तथा यह आशीर्वाद भी प्राप्त कर लिया कि देवताओं को समर्पित समस्त पूजा उसे प्राप्त होनी चाहिये । जिससे कि वह अविनाशी हो जाये । शक्तिशाली दुर्गम ने लोगों पर अत्याचार करना आरम्भ कर दिया और धर्म के क्षय ने गंभीर सूखे को जन्म दिया और सौ वर्षों तक कोई वर्षा नहीं हुई ।
ऋषि और मुनि हिमालय की कन्दराओं में छिप गए और अपने को सुरक्षित एवं बचाने के लिए तथा माता देवी को प्रकट करने के लिए कठोर तपस्या की । उनके संताप के करुण क्रन्दन से विचलित होकर, ईश्वरी- माता देवी-फल, सब्जी, जड़ी-बूटी, अनाज, दाल और घास फूस लिए हुए प्रकट हुईं ,शाक का तात्पर्य सब्जी होता है , इस प्रकार माता देवी शाकम्बरी के नाम से जानी गयीं । वे अनगिनत आँखें भी रखती थीं । इसलिए उन्हें सताक्षी के नाम से पुकारा गया । ऋषियों और लोगों की दुर्दशा को देख कर उनकी अनगिनत आँखों से लगातार नौ दिन एवं रात्रि तक आँसू बहते रहे । यह (आँसू ) एक नदी में परिवर्तित हो गए जिससे सूखे का समापन हो गया ।
संसार के ऋषि एवं लोगों को बचाने के लिये, शाकम्बरी देवी ने दुर्गम से युद्ध किया । अपने शरीर से उन्होंने दस शक्तियाँ उत्पन्न की जिन्होंने युद्ध में उनकी सहायता की । उन्होंने अंततः अपने भाले से दुर्गम को मार डाला । ऋषियों की सभी शक्तियां जो दुर्गम द्वारा शोषित कर ली गई थीं दस हजार सूर्यों के बराबर एक चमकदार सुनहरे प्रकाश में परिवर्तित हो गयीं और शाकम्बरी देवी के शरीर में प्रवेश कर गयीं । तब उन्होंने वेदों या ज्ञान की पुस्तक को देवताओं को वापस कर दिया । तब माता देवी या ईश्वरी का नाम दुर्गा हुआ क्योंकि उन्होंने दानव दुर्गम को मारा था ।
शाकम्बरी नवरात्रि का उत्सव पौष शुक्ल अष्टमी से आरम्भ होकर पौष की पूर्णिमा को समाप्त होता है । यह राजस्थान, मध्य प्रदेश, हिमांचल प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु में मनाया जाता है । भारत के इन राज्यों के मन्दिरों में विशाल आयोजन सर्वोच्च माता की आराधना हेतु होता है जो अपने बच्चों को भोजन उपलब्ध कराती है । सब देखते हुए माता (दुर्गा) जानतीं हैं कि क्या और कब उनके बच्चों की आवश्यकता है । जब उनके बच्चे रोते हैं, वे अपने अनाज, दाल,सब्जी, एवं फलों के उपहारों सहित दौड़ी चली आतीं हैं। यह उत्सव प्रक्रति माता तथा सर्वोच्च माता की कृतज्ञता का एक आयोजन होता है ।