परम गुरुओं के बारे में कहानियां प्रचुर मात्रा में हैं जिन्होंने अपने शिष्यों के जीवन में चमत्कार किये हैं । हम ऐसी कहानियों को पढ़ कर आनन्द पाते हैं और उनसे प्रेरणा लेते हैं । इस बारे में पढना या सुनना सदैव अच्छा लगता है कि कैसे एक लापरवाह व्यक्ति अचानक एक बुद्धिमान या सजग व्यक्ति में रूपांतरित हो जाता है ।
केवल परम गुरु ही वह व्यक्ति हैं जो शिष्य के जीवन को लापरवाही और अज्ञानता रुपी अन्धकार से ऊपर उठाते हैं । परम गुरु ज्ञान, सत्य और वास्विकता के आन्तिरिक अनुभव, प्रेम एवं दया के सैलाब से परिपूर्ण होते हैं । वे शिष्य की सहायता करने और शिक्षित करने के लिए वहां होते हैं कि कैसे भौतिक संसार और अध्यात्मिक संसार में भी एक सम्पूर्ण जीवन को जीना है । वे सर्वोच्च वास्विकता और ईश्वर के प्रेम एवं दया से साक्षात्कार करने में शिष्य को सक्षम करते हैं । वे शिष्य को अध्यात्मिक अभ्यास में स्वयं को पवित्र करने में सहायता देना आरम्भ करते हैं और अंततः उसको सर्वोच्च में समाहित कराते हैं । हमने परम गुरु के अनुग्रह के बारे में देखा और पढ़ा है जिससे एक अव्यवस्थित व्यक्ति एक दक्ष व्यक्ति में रूपान्तरित हो जाता है ,जो साहस एवं सौहार्द्र से जीवन जीता है ।
परम गुरु की तुलना पारसमणि से की जाती है । पारसमणि एक काल्पनिक पत्थर होता है जिसे शीशे जैसी खोटी धातु को सोने में परिवर्तित करने के लिए माना जाता है । इसे एक अमृत होना भी कहा जाता है जिससे शरीर की कायाकल्प हो जाती है । इसे स्वर्गीय आनंद और अंततः अमरत्व को प्रदान करने के लिए भी माना जाता है । अपनी शक्ति के कारण, यह पश्चिमी रसायन शास्त्र का केन्द्रीय प्रतिक होता है ।
जब पारसमणि खोटी धातु शीशे अथवा लोहे की तरह के संपर्क में आती है, यह उनको सोने में बदल देती है । सोना शीशे अथवा लोहे के अपेक्षाकृत काफी अधिक मूल्यवान होता है । सोना दुर्लभ तथा आसानी से उपलब्ध न होने वाला भी होता है । यह काफी अधिक कीमती तथा मूल्यवान होता है । ठीक उसी प्रकार से, जब एक लापरवाह व्यक्ति परमगुरु से संपर्क में आता है, वह एक सजग व्यक्ति में परिवर्तित हो जाता है, जो जान जाता है कि इस संसार में ठीक तरह से कैसे जीना है । ऐसे व्यक्ति समाज के लिए एक सम्पत्ति होते हैं । क्योंकि उनको लोहे की तरह सोने में परिवर्तित कर दिया गया है । बुद्धिमान या सजग व्यक्ति समाज में दुर्लभ तथा मूल्यवान होते हैं ।
पारसमणि एवं परम गुरु की यह तुलना अपूर्ण तथा त्रुटिपूर्ण है । जब पारसमणि एक खोटी धातु से संपर्क में आती है, यह खोटी धातु को सोने में बदल देती है । लेकिन यह खोटी धातु को पारसमणि में नहीं बदलती है । यह अपने गुणों को खोटी धातु में डालने में सक्षम नहीं होती है । जब एक मूर्ख व्यक्ति परम गुरु के संपर्क में आता है, वह सजग और ज्ञानवान हो जाता है । परमगुरु अपने गुणों को शिष्य में डालते हैं और उसे अपने जैसा बनाते हैं -शिष्य को एक दूसरा गुरु बनाते हैं । यह संभव होता है क्योंकि परमगुरु आत्मसाक्षात्कार का मार्ग बताते हैं । इसलिए परमगुरु पारसमणि से कहीं अधिक कीमती होते हैं ।
परमगुरु कई बुद्धिमान शिष्यों का निर्माण करते हैं । वे अपनी तरह अनेकों गुरु भी उत्पन्न करते हैं । ये बुद्धिमान शिष्य और गुरु समाज और मानवता की सेवा करते हैं । ये अन्य दूसरों को अपने बदले में उत्पन्न करते हैं , जो मानवताके लिए वंश व्यवस्था और सेवा जारी रखते हैं । परम गुरु वास्तव में समाज के लिए अधिक मूल्यवान होते हैं और उनकी मांग पारसमणि की अपेक्षाकृत अधिक होती है ।