Amrit Dhara - Dhyanyogi Omdasji

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सोमवार, 27 मई 2013

परम गुरु और पारस मणि


परम गुरुओं के बारे में कहानियां प्रचुर मात्रा में हैं जिन्होंने अपने शिष्यों के जीवन में चमत्कार किये हैं । हम ऐसी कहानियों को पढ़ कर आनन्द पाते हैं और उनसे प्रेरणा लेते हैं । इस बारे में पढना या सुनना सदैव अच्छा लगता है कि कैसे एक लापरवाह व्यक्ति अचानक एक बुद्धिमान या सजग व्यक्ति में रूपांतरित हो जाता है । 
                                                                               
केवल परम गुरु ही वह व्यक्ति हैं जो शिष्य के जीवन को लापरवाही और अज्ञानता रुपी अन्धकार से ऊपर उठाते हैं । परम गुरु ज्ञान, सत्य और वास्विकता के आन्तिरिक अनुभव, प्रेम एवं दया के सैलाब से परिपूर्ण होते हैं । वे शिष्य की सहायता करने और शिक्षित करने के लिए वहां होते हैं कि कैसे भौतिक संसार और अध्यात्मिक संसार में भी एक सम्पूर्ण जीवन को जीना है । वे सर्वोच्च वास्विकता और ईश्वर के प्रेम एवं दया से साक्षात्कार करने में शिष्य को सक्षम करते हैं । वे शिष्य को अध्यात्मिक अभ्यास में स्वयं को पवित्र करने में सहायता देना आरम्भ करते हैं और अंततः उसको  सर्वोच्च में समाहित कराते हैं । हमने परम गुरु के अनुग्रह के बारे में देखा और पढ़ा है जिससे एक अव्यवस्थित व्यक्ति एक दक्ष व्यक्ति में रूपान्तरित हो जाता है ,जो साहस एवं सौहार्द्र से जीवन जीता  है । 
                                                                                      
परम गुरु की तुलना पारसमणि से की जाती है । पारसमणि एक काल्पनिक पत्थर होता है जिसे शीशे जैसी खोटी धातु को सोने में परिवर्तित करने के लिए माना जाता है । इसे एक अमृत होना भी कहा जाता है जिससे शरीर की कायाकल्प हो जाती है । इसे स्वर्गीय आनंद और अंततः अमरत्व को प्रदान करने के लिए भी माना जाता है । अपनी शक्ति के कारण, यह पश्चिमी रसायन शास्त्र का केन्द्रीय प्रतिक होता है । 
                                                                                                                            
जब पारसमणि खोटी धातु शीशे अथवा लोहे की तरह के संपर्क में आती है, यह उनको सोने में बदल देती है । सोना शीशे अथवा लोहे के अपेक्षाकृत काफी अधिक मूल्यवान होता है । सोना दुर्लभ तथा आसानी से उपलब्ध न होने वाला भी होता है । यह काफी अधिक कीमती तथा मूल्यवान होता है । ठीक उसी प्रकार से, जब एक लापरवाह व्यक्ति परमगुरु से संपर्क में आता है, वह एक सजग व्यक्ति में परिवर्तित हो जाता है, जो जान जाता है कि इस संसार में ठीक तरह से कैसे जीना है । ऐसे व्यक्ति समाज के लिए एक सम्पत्ति होते हैं । क्योंकि उनको लोहे की तरह सोने में परिवर्तित कर दिया गया है । बुद्धिमान या सजग व्यक्ति समाज में दुर्लभ तथा मूल्यवान होते हैं । 
                                                                                                        
पारसमणि एवं परम गुरु की यह तुलना अपूर्ण तथा त्रुटिपूर्ण है । जब पारसमणि एक खोटी धातु से संपर्क में आती है, यह खोटी धातु को सोने में बदल देती है । लेकिन यह खोटी धातु को पारसमणि में नहीं बदलती है । यह अपने गुणों को खोटी धातु में डालने में सक्षम नहीं होती है । जब एक मूर्ख  व्यक्ति परम गुरु के संपर्क में आता है, वह सजग और ज्ञानवान हो जाता है । परमगुरु अपने गुणों को शिष्य में डालते हैं और उसे अपने जैसा बनाते हैं -शिष्य को एक दूसरा गुरु बनाते हैं । यह संभव होता है क्योंकि परमगुरु आत्मसाक्षात्कार का मार्ग बताते हैं । इसलिए परमगुरु पारसमणि से कहीं अधिक कीमती होते हैं । 
                                                         
परमगुरु कई बुद्धिमान शिष्यों का निर्माण करते हैं । वे अपनी तरह अनेकों गुरु भी उत्पन्न करते हैं । ये बुद्धिमान शिष्य और गुरु समाज और मानवता की सेवा करते हैं । ये अन्य दूसरों को अपने बदले में उत्पन्न करते हैं , जो मानवताके लिए वंश व्यवस्था और सेवा जारी रखते हैं । परम गुरु वास्तव में समाज के लिए अधिक मूल्यवान होते हैं और उनकी मांग पारसमणि की अपेक्षाकृत अधिक होती है ।     

बुधवार, 22 मई 2013

जीवन की अज्ञानता एवं पवित्रीकरण

हम ईश्वर की संतान हैं । हम सब स्वीकार करते हैं कि ईश्वर एक है और वे हमारे माता पिता हैं । फिर भी हम लोग अपने ईश्वरीय स्रोतों को भूल जाते हैं और अज्ञानता एवं कष्ट में रहते हैं । हम यौन आनन्दों में डूबे हुए रहते हैं और हमारी आकांक्षा जीवन की तुच्छ वस्तुओं की होती है । हमारा सम्पूर्ण जीवन संघर्ष में गुजरता है और हम स्वयं को एक शरीर के रूप में महसूस करते हैं और हमारा अहंकार हम पर नियंत्रण करता है और दिशा निर्देश देता है । हमारी आत्मा जो ईश्वरत्व की झलक होती है, उपेक्षित और विस्म्रत हो जाती है । 
                                                                                                                       
परम गुरु हमारे जीवन में ईश्वर और हमारे ईश्वरीय प्रकृति का स्मरण करने का पाठ पढ़ाने के लिये आते हैं और आत्म साक्षात्कार के अन्तिम लक्ष्य तक पहुँचाते हैं । परम गुरु की ज्ञानवाणी और उनकी उपस्थिति हमें इस बात का स्मरण कराती है कि हम वास्तव में क्या हैं और कौन सी बुलन्दियों को हम प्राप्त कर सकतें हैं 
                                                                           
ओ दिव्य प्राणी, आप केवल शरीर नहीं हैं । स्वयं को  इन्द्रियों के कोलाहल और शरीर से न पहचाने । अपने शरीर को ईश्वरत्व एवं सम्पूर्ण समय अधिक ऊँचे उद्देश्य के साथ पहचानें ।  धूप एवं हवा में ईश्वर की कृपा के लिए सचेत रहें इस प्रकार ज्ञानरूपी प्रकाश आपके चेहरे को कान्तिमान बनाएगा या आप स्वांस लेते हैं, उसमें ईश्वर की उपस्थिति आपको पूर्ण करेगी । जब आप जल की एक घूँट लेते हैं, उसकी ताजगी एवं मधुरता के प्रति सचेत रहें जो ईश्वर और गुरु के प्यार की तरह होती है । जब आप अपना भोजन पकाते हैं अपने मन में  सीता राम का जाप करें । भोजन का स्वाद और अधिक बेहतर होता है । इस प्रकार के भोजन को ईश्वर और गुरू को समर्पित करें और तब उसको ग्रहण करें। इसका स्वाद और भी बेहतर होता है । सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड आपके शरीर के अन्दर होता है । ईश्वरत्व उपस्थित होता है, देवी और देवता आपके शरीर के चक्रों में उपस्थित होते हैं | ईश्वरत्व की झलक आपके ह्रदयरुपी  मन्दिर  में कृपा बनाये रखती है । प्राण शक्ति आपके शरीर के सूक्ष्म कार्य प्रणाली का ईधन होती है  । भोजन जो आप ग्रहण करते हैं, अंततः सौर उर्जा से बनाया जाता है और आपके शरीर का पोषण करता है । हमारे जीवन के चमत्कार ब्रह्मांडीय अनुग्रह पर आधारित होते हैं । 
                                                                   
अपने जीवन को लगातार ईश्वर की कृपा को याद करते हुए पवित्र करें । प्रत्येक स्वांस जो आप लेते हैं, जल की प्रत्येक घूँट जो आप ग्रहण करते हैं, भोजन जो आप खाते हैं, उर्जा जो आपके शरीर के अन्दर और चारों और स्पंदित होती है, तर्क और बुद्धि जो आपके अन्दर कार्य करती है, ये सब ईश्वर का उपहार होते हैं। अपने जीवन के इस प्रत्येक क्षण का स्मरण करें और सीता राम मंत्र का जाप करें और तब आप सांसारिक अस्तित्व से ऊपर उठेंगे एवं अपने जीवन को पवित्र करेंगे, सांसारिकता को समझेंगे और आत्मसाक्षात्कार  के अंतिम लक्ष्य को प्राप्त करेंगे 

रविवार, 19 मई 2013

शाकम्बरी नवरात्रि


भारत में प्रत्येक वर्ष विभिन्न प्रकार की नवरात्रि मनाई जाती है । ये नौ दिनों का उत्सव होता है जो सर्वोच्च शक्ति-माता देवी को समर्पित किया जाता है । इन नौ दिनों के उत्सव के दौरान, आयोजनों के साथ लोगों के द्वारा अत्यधिक अध्यात्मिक अभ्यास किये जाते हैं । वातावरण स्वर्ग की दैवीय तरंगों एवं लोगों का प्रेम एवं विश्वास की तरंगों से स्पंदित होता है । शाकम्बरी नवरात्रि पौष के हिंदू माह की पूर्णिमा को होता है । इस वर्ष यह 9 जनवरी - 2012  को पड़ी है । 
                               
देवी भागवतम हिंदू धर्म का पवित्र धार्मिक ग्रन्थ, शाकम्बरी देवी की कथा का वर्णन करता है । दुर्गम नामक एक दानव ने प्रचण्ड तपस्या की और चारों वेदों को प्राप्त कर लिया तथा यह आशीर्वाद भी प्राप्त कर लिया कि देवताओं को समर्पित समस्त पूजा उसे प्राप्त होनी चाहिये । जिससे कि वह अविनाशी हो जाये । शक्तिशाली दुर्गम ने लोगों पर अत्याचार करना आरम्भ कर दिया और धर्म के क्षय ने गंभीर सूखे को जन्म दिया और सौ वर्षों तक कोई वर्षा नहीं हुई । 
                                                      
ऋषि और मुनि हिमालय की कन्दराओं में छिप गए और अपने को सुरक्षित एवं बचाने के लिए तथा माता देवी को प्रकट करने के लिए कठोर तपस्या की । उनके संताप के करुण क्रन्दन से विचलित होकर, ईश्वरी- माता देवी-फल, सब्जी, जड़ी-बूटी, अनाज, दाल और घास फूस लिए हुए प्रकट हुईं ,शाक का तात्पर्य सब्जी होता है , इस प्रकार माता देवी शाकम्बरी के नाम से जानी गयीं । वे अनगिनत आँखें भी रखती थीं । इसलिए उन्हें सताक्षी के नाम से पुकारा गया । ऋषियों और लोगों की दुर्दशा को देख कर उनकी अनगिनत आँखों से लगातार नौ दिन एवं रात्रि तक आँसू  बहते रहे । यह (आँसू ) एक नदी में परिवर्तित हो गए जिससे सूखे का समापन हो गया । 
                                     
संसार के ऋषि एवं लोगों को बचाने के लिये, शाकम्बरी देवी ने दुर्गम से युद्ध किया । अपने शरीर से उन्होंने दस शक्तियाँ उत्पन्न की जिन्होंने युद्ध में उनकी सहायता की । उन्होंने अंततः अपने भाले से दुर्गम को मार डाला । ऋषियों की सभी शक्तियां जो दुर्गम द्वारा शोषित कर ली गई थीं दस हजार सूर्यों के बराबर एक चमकदार सुनहरे प्रकाश में परिवर्तित हो गयीं  और शाकम्बरी देवी के शरीर में प्रवेश कर गयीं । तब उन्होंने वेदों या ज्ञान की पुस्तक को देवताओं को वापस कर दिया । तब माता देवी या ईश्वरी का नाम दुर्गा हुआ क्योंकि उन्होंने दानव दुर्गम को मारा था । 
                                   
शाकम्बरी नवरात्रि का उत्सव पौष शुक्ल अष्टमी से आरम्भ होकर पौष की  पूर्णिमा को समाप्त होता है । यह राजस्थान, मध्य प्रदेश, हिमांचल प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु में मनाया जाता है । भारत के इन राज्यों के मन्दिरों में विशाल आयोजन सर्वोच्च माता की आराधना हेतु होता है जो अपने बच्चों को भोजन उपलब्ध कराती है । सब देखते हुए माता (दुर्गा) जानतीं हैं कि क्या और कब उनके बच्चों की आवश्यकता है । जब उनके बच्चे रोते हैं, वे अपने अनाज, दाल,सब्जी, एवं फलों के उपहारों सहित दौड़ी चली आतीं हैं। यह उत्सव प्रक्रति माता तथा सर्वोच्च माता की कृतज्ञता का एक आयोजन होता है । 

सोमवार, 13 मई 2013

नन्दानर- आर्द्र दर्शन


कल आर्द्र दर्शन का दिवस है । यह हिन्दू पंचांग के पौष माह में पूर्णिमा का दिन होता है । यह भारत में वर्ष की सबसे बड़ी रात्रि होती है । भोर के पूर्व के समय, जब आकाशीय सितारा -थिरुवादरी /आर्द्र आकाश में उगता है, दक्षिण भारत में सभी शिव मन्दिरों में भगवान् शिव की पूजा की जाती है । यह नन्दानर, दक्षिण भारत के एक साधु की की मुक्ति का दिन भी होता है । नन्दानर भगवान् शिव में गहरी आस्था एवं विश्वास के लिए और अपने भक्तों पर प्रभु की महान दया के लिए जाने जाते है । 
                                            
नन्दानर दक्षिण भारत में पैदा हुए एक साधु थे । वह अछूत के रूप में पैदा हुए थे और एक मजदूर की तरह अपने मालिक के धान के खेतों में काम करते थे जो एक ब्राह्मण था । नन्दानर एक मेहनती मजदूर थे और अपने मालिक के लिए अथक परिश्रम करते थे  लेकिन उनके मालिक ने कभी नन्दानर द्वारा प्रदर्शित निष्ठा की सराहना नहीं की । प्रतिदिन मालिक नन्दानर के कार्य का निरिक्षण किया करता था और भगवान शिव की महानता तथा उनके चमत्कारों का बखान किया करता था। हर समय भगवान् शिव की सहानुभूति एवं प्रेम के बारे में सुनकर नन्दानर में भगवान् शिव के प्रति भक्ति उत्पन्न हुई । 
                                                                                                   
नन्दानर ने अपने दिल एवं दिमाग में भगवान् शिव के लिए ऐसा प्रचण्ड प्रेम उत्पन्न किया कि उनके मन में शिव-शिव के अतिरिक्त कोई विचार नहीं रहा । यह उनकी चिदम्बरम के मन्दिर के दर्शन हेतु प्रचण्ड भक्ति थी । वे चिदम्बरम के  भगवान् शिव के मन्दिर दर्शन हेतु स्वीकृति के लिए अपने मालिक से कहा करते थे और उनका मालिक अक्सर मन कर देता था । एक बार उन्होंने अपने मालिक को इतना अधिक तंग किया कि  उनका मालिक आवेशित हो गया और उनसे एक दिन में विशाल खेत को जोतने के लिए कहा और काम को सफलतापूर्वक पूर्ण कर लेने पर वे चिदम्बरम में दर्शन हेतु जा सकते हैं । 
                                                                                                                                            
नन्दानर असहाय थे क्योंकि इस कार्य को पूरा करना मानवीय रूप से संभव नहीं था । उन्होंने भगवान् शिव से दया हेतु करुण क्रंदन किया । वे  भगवान के प्रति अपनी प्रार्थना में इतना तल्लीन थे कि  उन्होंने गुज़रे हुए समय का भी ध्यान नहीं दिया । दूसरे प्रातः जब वे खेत पर गये, चमत्कारिक रूप से, सभी धान कटा हुआ था और ढेरों में बँधा हुआ था और बड़े करीने से खड़ा हुआ था और ब्राह्मण चिदम्बरम में मन्दिर दर्शन हेतु नन्दानर को स्वीकृति देने के लिए बाध्य था । 
                                             
इस प्रकार नन्दानर ने चिदम्बरम की ओर कदम बढाया, उन्होंने एक शिव मन्दिर को देखा । एक अछूत के रूप में, उन्हें अन्दर जाने की आज्ञा नहीं थी । दरवाजे पर खड़े होकर, उन्होंने अन्दर प्रभु के दर्शन की चेष्टा की । वे अन्दर शिवलिंग को नहीं देख सके क्योंकि नन्दी की मूर्ति दर्शन को बाधित कर रही थी । नन्दी एक बैल हैं  और वे  भगवान् शिव के महान भक्त हैं  और उन्होंने आशीर्वाद प्राप्त किया है कि वे भगवान् की नज़रों के सामने और सीधी रेखा में सदैव खड़े होंगे । नन्दानर के कष्ट और दर्शन हेतु उसकी उत्कंठा को देखकर , भगवान् शिव ने नन्दी को एक ओर हटने के लिए कहा और नन्दानर को दर्शन प्राप्त करने की स्वीकृति दी और नन्दी की पत्थर की मूर्ति एक ओर हट गई और नन्दानर पवित्रतम स्थल के अन्दर शिवलिंग का दर्शन प्राप्त कर सके । उस दिन से नन्दी की मूर्ति  उस मंदिर में केंद्र बिंदु से थोडा दूर है। 
                                                               
जब नन्दानर चिदम्बरम पहुंचे, उन्हें मन्दिर के अन्दर प्रवेश की आज्ञा नहीं दी गई क्योंकि वे नीची जाति के थे । मन्दिर के ब्राम्हणों ने उनसे कहा कि यदि वे आग में स्नान करे केवल तभी वे मन्दिर में प्रवेश के लिए पूर्णतयः शुद्ध होंगे । नन्दानर ने अग्नि को प्रज्वलित किया और उसमे प्रवेश कर गए । जैसे ही वे बाहर आये वे चमकीले सुनहरे प्रकाश में रूपांतरित थे । उन्होंने मन्दिर में प्रवेश किया और भगवान् के दर्शन किये ।  भगवान् शिव के प्रति उनकी लालसा इतनी अधिक थी कि वे शिवलिंग में समाहित हो गए और शिव की सार्वभौमिक चेतना के साथ एकाकार हो गए । 
                                             
नन्दानर और भगवान् शिव के लिए उनकी भक्ति सभी शिव मन्दिरों में अमरत्व प्राप्त किये हुए है । वे 63 वे नयन मार्श के रूप में से एक भगवान् शिव के महान भक्त हैं और उनको सभी शिव मन्दिरों में ईश्वर के द्वारा सबसे धन्य के रूप में पूजा जाता है । नन्दानर ने हमें शिक्षा दी कि यह बात कोई मायने नहीं रखती कि हमारा जन्म का स्तर , शिक्षा , धन या पद समाज में क्या है । यह मायने रखता है कि ईश्वर के प्रति हम कितना प्रेम रखते हैं । सीता राम आपकी भक्ति को बढायें और नन्दानर की तरह आपको आशीर्वाद प्रदान करें । 



गुरुवार, 9 मई 2013

ईश्वर को हर समय कैसे याद रखना है

शान्ति जीवन में अनिवार्य है । हम बिना शान्ति के नहीं रह सकते । शान्ति जीवन में आनंद एवं संतोष लाती है ।  शान्ति जीवन को अर्थपूर्ण जीना सिखाती है । हम इच्छाओं की पूर्ति से अल्प समय के लिए शान्ति पाते हैं । इच्छाओं की पूर्ति हर समय नहीं की जा सकती है । एक इच्छा की पूर्ति और अधिक इच्छाओं को जन्म देती है ।  जीवन इच्छाओं का चिरकालिक चक्र होता है और उनकी पूर्ति हेतु कार्यरत रहता है । तो क्या शान्ति जीवन में वास्तव में संभव है ?
                                 
शान्ति ईश्वर एवं गुरु के सम्मान से हमे मिलती है । इस सम्मान को पाने के लिए हमे हर समय ईश्वर एवं गुरु के जाप, ध्यान और स्मरण का अध्यात्मिक अभ्यास करना चाहिये । ईश्वर और उनके पवित्र नाम का स्मरण हमारे अन्दर ईश्वरीय तरंग पैदा करता है जो हमे शान्ति एवं आनंद से परिपूर्ण कर देती है । क्या ऐसे व्यस्त कार्यक्रम और जीवन शैली युक्त आधुनिक संसार में हर समय ईश्वर को याद करना संभव है ?
                                                                       
हमारी जीवन शैली आज उन गतिविधियों में लिप्त है जिनको 24 घंटे से अधिक समय में पूरा किया  जा सकता है । हम अधिकांशतः समय यात्रा करने में, काम करने में, अध्यन करने में, नेट पर और अपनी पसंदीदा शौकों पर व्यतीत करते हैं । ईश्वर और उनके पवित्र नाम के स्मरण के लिए समय निकालना अत्यंत कठिन है । हम अनुभव करते हैं कि कुछ समय के लिए जाप या ध्यान में बैठना या हमारे दैनिक जीवन की भागमभाग के दौरान ईश्वर का स्मरण मात्र भी संभव नहीं है ।
                                                                                                       
हमारे संपूर्ण दिन की गतिविधियाँ हमें तनाव एवं असंतुष्टि देती है और कोई आंतरिक शान्ति नहीं होती है । हमे इस सत्य को समझना चाहिये, समय और कार्यक्रम को प्रार्थमिकता देनी  चाहिए । हमे प्रातःकाल मंत्र जाप और ध्यान में बैठकर समय व्यतीत करना चाहिये । यह हमें स्थिर करेगा और हमें शान्ति तथा उद्देश्य से परिपूर्ण करेगा और हम ध्यान केन्द्रित तरीकों में अपने कार्य को करने के योग्य होंगे । रात्रि को सोने से पूर्व हमें थोडा समय मंत्र का जाप करने में समय व्यतीत करना चाहिये । यह हमें शान्त एवं स्थिर करेगा और शुभ रात्रि निद्रा के लिए आरामप्रद करेगा । तब हम तरोताजा और उल्लासपूर्ण होकर जागेंगे । 
                                                        
ईश्वर के नाम के स्मरण में पूरे दिन हमें बहुआयामी होना चाहिये । हम पूरी तरह बहुकार्यों पर शानदार रहते हैं । उदाहरण के तौर पर जब हम अपनी कार चलाते हैं, गलत चालकों पर, यातायात प्रकाश पर, आरक्षक पर,  मोबाइल पर बात करते हुए, संगीत सुनते हुए , नाश्ते के लिये योजना बनाते हुए, मस्तिष्क में एक रूपरेखा बनाते हुए, निगरानी रखते हैं और यातायात के नियमों का पालन करने में भी पर्याप्त ध्यान केन्द्रित होते हैं, सुरक्षित वाहन चलाते हैं और दुर्घटना से बचते हैं । उसी प्रकार  हमें उन्ही दैनिक कार्यों में संलग्न रहते हुए ईश्वर को हर समय स्मरण करने में स्वयं को प्रशिक्षित करना चाहिये । पूरे दिन के कार्य एवं गतिविधियों के दौरान, हमें मस्तिष्क की प्रष्ठभूमि में हर समय ईश्वर के नाम का स्मरण करना चाहिये या मानसिक जाप करना चाहिये । इस प्रकार हम ईश्वर के हर समय स्मरण की आदत को बढ़ाते हैं । यह हमारे कार्यों से हमे विचलित नहीं करेगा और हम कुशलतापूर्वक कार्य का निष्पादन कर सकते हैं । हमारे अन्दर उपस्थित पवित्र तरंगे हर समय हमें तनाव, थके एवं बुझे हुए चेहरे पर नियंत्रण पाने में मदद करती है और अधिक नियंत्रित, ध्यानकेंद्रित और सुधरे हुए ढंग से कार्य करती है । 
         
आप सब सीता-राम मंत्र का रात दिन हर समय स्मरण करें और शान्ति  से रहें । 

मंगलवार, 7 मई 2013

शान्ति


 हम सब  शान्ति ढूंढते हैं । हम स्वयं में और परिवार के साथ  शान्ति से रहना चाहते हैं । हम अपने मित्रों, समुदाय और राष्ट्र के साथ  शान्ति से रहना चाहते हैं । हम अनुभव करते हैं कि जब हमारी इच्छाऐं पूर्ण हो जाती हैं, हम शान्ति से हो जायेंगे । 
                       
कुछ लोग अधिकाधिक धन कमाने में  शान्ति ढूंढते हैं, कुछ लोग अधिक बड़ी कार एवं घर खरीदकर अपनी इच्छाओं की पूर्ति करते हैं,  दूसरे अधिकाधिक कपडे खरीदते हैं और कुछ लोग जेवर खरीदते हैं । बहुत से लोग दूसरों पर शासन करके शान्ति खोजते हैं । कुछ लोग दूसरों पर  शक्ति का संचालन करने में और कुछ लोग अपने भविष्य को आकार  एवं दिशा निर्देश देने में  शान्ति एवं पूर्ति को खोजते हैं । अमीरी, आराम, सुविधा, शक्ति, नियंत्रण, प्रतिष्ठा, अल्प अवधि के लिए थोड़ी पूर्ति एवं  शान्ति दे सकते हैं । 
                                                                                                          
जब इच्छाओं की पूर्ति हो जाती है, कुछ समय के लिए  शान्ति होती है । लेकिन वह शान्ति लम्बे समय तक चरम पर नहीं होती है क्योंकि इच्छाऐं बारम्बार जाग्रत होती हैं । हम अनुभव करते हैं कि हमने शान्ति को प्राप्त कर लिया है । परन्तु क्या मानव इच्छाओं की पूर्ति मात्र से  शान्ति प्राप्त कर सकता है? नहीं । जब एक इच्छा पूरी होती है उसके बाद दूसरी इच्छा अपना स्थान ले लेती है । विज्ञापन एवं प्रकाशन के इस आधुनिक संसार में हमारी इच्छाऐं तेजी से बढती है । वे कभी भी कम नहीं होती हैं । जब हम सदैव बेचैन रहते हैं, हम कैसे  शान्ति पा सकते हैं ?
                                                                                             
जहाँ इच्छाऐं, शक्ति, नियंत्रण,प्रतिष्ठा इत्यादि होती हैं, वहाँ सदैव भय होता है । इस बात का भय होता है कि शक्ति, अमीरी और प्रतिष्ठा हमसे छिन जायेंगी । जहाँ धन, शक्ति, और प्रतिष्ठा उपस्थित होती है, वहाँ हिंसा का कलंक, कष्ट एवं दबाववश भय का कब्ज़ा भी होता है । कोई कैसे जान सकता है कि उसके जीवन में कितना पर्याप्त है ? हम कैसे संतोष का निर्देश चिन्ह निश्चित कर सकते हैं ? मस्तिष्क एवं प्रसन्नता को शान्ति के लिए कितना धन, शक्ति या प्रतिष्ठा संतोषजनक होती है ?
                
आपके संतोष के स्तर का पैमाना वह होता है जो अन्दर से आता है । ईश्वरत्व का आन्तरिक मार्गदर्शन उसे निश्चित करता है । जब कोई सीता राम मंत्र का जाप और ध्यान करने में स्थिर, अनुशासित और नियमित होता है, यह मार्गदर्शन स्वयं से आता है और आप "अपनी इच्छाओं को कैसे सम्हालना है और स्वयं में और जीवन में कैसे संतुष्ट होना है" जान जाते हैं । ईश्वर का प्रेम जो संपूर्ण  जीवन का आधार होता है और शान्ति किसी को मन्त्र की तरंगों से परिपूर्ण करती है। सीता राम मन्त्र  क्रोध, इर्ष्या, नुक्सान, भय, आसक्ति,अभिमान एवं घृणा के तीखे और भद्दे अवगुणों पर कार्य करता है और उनका समापन कर देता है । जब कोई इन भद्दे अवगुणों से छुटकारा पाता है केवल तभी वह अपने अन्दर से उठती हुई शान्ति और संतोष की मधुरता को पाता है और जीवन को अर्थपूर्ण जीना बनाता है । सम्मान जो अध्यात्मिक अभ्यास के दृढ एवं नियमित प्रयत्न से प्रवाहित होता है और सीता राम मन्त्र आपके जीवन को शान्ति से परिपूर्ण कर देगा जो लम्बे समय तक चलने वाली, अपरिवर्तित और चिरकालिक होती है । 

शुक्रवार, 3 मई 2013

धोखा एवं आदर्श जीवन

हमलोग काल की अल्प अवधि के लिए पृथ्वी पर यहाँ हैं । मानव जीवन इस संसार में लगभग 70 से 80 वर्ष का होता है । कभी-2  यह कम भी होता है । ओ दिव्य प्राणी, आप पृथ्वी पर एक अस्थायी निवासी हो । आप यहाँ मेहमान हो । अपने व्यवहार को तदानुसार आदर्श बनाइये ।
                                                                   
आपको व्यवहार के उदाहरणों में एक धोखे से दृढ़ता पूर्वक बचने की आवश्यकता है ।  किसी को धोखा न दीजिये और केवल अपने किये हुए कार्य हेतु उनसे सम्पर्क कीजिये  । यह भयानक रूप से अनुचित होता है और ऐसे आचरणों के  कार्मिक परिणाम भय उत्पन्न करने वाले होते  है । कोई व्यक्ति धोखा खाना एवं दूसरे के द्वारा अनुचित दबाव डालने को पसन्द नहीं करता है । इसलिए दूसरों के प्रति ऐसा न करने के प्रति सावधान रहना चाहिए एवं दूसरों के द्वारा धोखे का शिकार भी नहीं होना चाहिए ।
                                                                   
किसी के लिए किये गए कार्य में उसपर  दबाव डालना अनुचित होता है । आपके प्रति किये गए कार्य में एक व्यक्ति को धोखा देना जब वह अनिच्छुक हो, उसे धोखा देना होता है ।  भावात्मक धोखा सबसे निम्न स्तर का धोखा होता है । प्रेम का प्रयोग करना, आपके प्रति किये गए कार्य में भावात्मक निर्भरता या मित्रता और दूसरे के लिए चाल चलना/ धोखा देना पूर्णतयः अनुचित होता है । आचरण के ऐसे अनचाहे स्वरूपों में आसक्त न होइये ताकि बाद के भयंकर कार्मिक परिणामों के कष्ट को न सहना पड़े  ।
                                 
कपट और दिखावटीपन शर्मनाक होते हैं और उनलोगों के लिए मूल्यहीन होते हैं जो सीता राम मन्त्र का जाप करते हैं एवं जो कुण्डलिनी योग का ध्यान करते हैं । ऐसे आचरण किसी मेहमान के लिए मूल्यहीन होते हैं जब वह अल्प अवधि के लिए ठहरने मेजबान के घर में आया हो । स्वयं का सावधानी पूर्वक आकलन कीजिये और अपने विचार एवं आचरण को सुधारिये । अपने विचार, वाणी एवं कार्य सभी में प्यार, स्नेह और निष्कपटता लाइए सीता राम मन्त्र आपकी सदैव रक्षा करे ।