आदि काल से जब से हम पैदा हुए हम प्रसन्नता की खोज करते हैं । हम इसे भोजन, जल ग्रहण करने, शांतिपूर्ण निद्रा, अच्छे कपड़े, अच्छे घर के दौरान सुविधाओं सहित तथा अन्य आरामों में खोजते हैं । हमारा सम्पूर्ण अस्तित्व वासनाओं की पूर्ति एवं प्रसन्न होने की तैयारी में ही लगा रहता हैं ।
प्रसन्नता एक मायावी लक्ष्य होता है । हम इसे खोजते हैं । हम इसके लिए कार्य करते हैं और प्राप्ति हमारी वासनाओं का उद्देश्य होता है । हम कुछ समय के लिए प्रसन्न रहते है । तब प्रसन्नता क्षीण हो जाती है और पुनः हम इसे अन्य वासनाओं की पूर्ति हेतु खोजने लगते हैं । हम इस व्यवहार को एक बहुत छोटे बच्चे में भी देख सकते हैं जो इस बात का कोई ज्ञान नहीं रखता है कि क्या इच्छा या पूर्ति या प्रसन्नता है । कहाँ से बच्चा प्रसन्नता को ढूंढने के लिए सीखता है ? ऐसा क्या है जो हमे सम्पूर्ण जीवन प्रसन्नता की इच्छा करने एवं कार्य करने के लिए विवश करता है ।
संसार के सभी धर्म शास्त्री ने घोषित किया है कि हम शरीर नहीं है । हम अमर आत्मा हैं, आत्मा की प्रकृति परमानंद है । परमात्मा या ईश्वर अनन्त परमानंद में है । हम उस परमात्मा और अनन्त परमानन्द के हिस्से हैं । अब हम मानव शरीर में है और पृथ्वी पर रह रहे हैं । लेकिन हमारे अन्दर की आत्मा अपने मूल स्वरुप को जानती है और (परमानंद में) वापस जाने के लिए खोजती है । वह आनन्द- ईश्वर के अनन्त परमानन्द के लिए विवश करती है । हम नहीं जानते हैं कि ईश्वरत्व की ओर कैसे वापस जायें एवं उस शांति एवं आनंद में स्थापित हों । इसलिए हम लोग भौतिक वासनाओं की पूर्ति में प्रसन्नता को ढूंढते हैं । ऐसी प्रसन्नता अनन्त आनन्द की केवल एक छाया मात्र होती है ।
सर्वोच्च शक्ति , जीवात्मा और माया जीवन के अनन्त ब्रह्मांडीय नाटक के तीन स्थायी घटक हैं । ईश्वर जीवात्मा और माया को नियंत्रित करता है । (द्वंद का भ्रम जो हमें ईश्वर से प्रथक करता है ) इस माया पर काबू पाने के लिए जिससे हम ईश्वर तथा एक दूसरे से प्रथक होते हैं, हमें ईश्वर की सहायता की आवश्यकता होती है । ईश्वर हमारी सीधे सहायता नहीं करता है । वह परम गुरु के रूप में आता है जो एक साधित स्वामी होता है एवं हमें मार्ग दिखाता है कि कैसे माया पर नियंत्रण पाया जाय तथा उससे (ईश्वर से) एकाकार हुआ जाए । परम गुरु का अनुसरण करो और ईश्वर को प्राप्त करो तथा सदैव प्रसन्नता एवं परमानंद के क्ष्रेत्र में रहो ।
महान स्वामी या परम गुरु हमें ईश्वरत्व की ओर वापस जाने के मार्ग की शिक्षा देते हैं । वे ज्ञान तथा आन्तिरिक अनुभव का मार्ग रखते हैं एवं जानते हैं कि कैसे उस सर्वोच्च स्थिति में पहुंचा जाए । जब हम उनकी शिक्षाओं का अनुसरण करते हैं हम उस परमानंद की स्थिति को प्राप्त करते हैं । सीता राम का मंत्र जाप कुण्डलिनी महा योग प्रणाली, ध्यान और परम गुरु की शिक्षाओं का व्यवस्थित एवं अनुशासित ढंग से अनुसरण करना हमारी परमानंद की स्थिति में पहुँचने में सहायता करता है । भक्ति में रहो और ईश्वरत्व तथा परम गुरु के प्रति समर्पित हो और परमानंद में रहो । एक बार जब हम इस स्थिति में पहुँच जाते हैं, यद्यपि हम इस संसार में रहते हैं, हम भौतिक वासनाओं के पीछे मूर्खतापूर्वक नहीं भागेंगे ।
सदैव ध्यान रखो कि तुम एक शरीर नहीं हो। तुम अमर आत्मा-ईश्वर की संतान हो । परमानंद तुम्हारे अन्दर है । भौतिक संसार की वैकल्पिक प्रसन्नता में कोई संतुष्टि नहीं है। अपने आधारों का चयन करो और अनुभव करो कि तुम दिव्य प्राणी हो और परमानन्द से परिपूर्ण हो । आज इस शरीर के जन्म दिवस पर तुम सबको आशीर्वाद देता हूँ कि तुम सब ज्ञान प्राप्त करो और देवी सरस्वती से अधिकाधिक ज्ञान प्राप्त हो और सदैव प्रसन्न रहो ।