Amrit Dhara - Dhyanyogi Omdasji

Amrit Dhara - Dhyanyogi Omdasji

रविवार, 20 अक्टूबर 2013

हम प्रसन्नता की खोज क्यों करते हैं

आदि काल से जब से हम पैदा हुए हम प्रसन्नता की खोज करते हैं । हम इसे भोजन, जल ग्रहण करने, शांतिपूर्ण निद्रा, अच्छे कपड़े, अच्छे घर के दौरान सुविधाओं सहित तथा अन्य आरामों में खोजते हैं । हमारा सम्पूर्ण अस्तित्व वासनाओं की पूर्ति एवं प्रसन्न होने की तैयारी में ही लगा रहता हैं ।
                      
प्रसन्नता एक मायावी लक्ष्य होता है । हम इसे खोजते हैं । हम इसके लिए कार्य करते हैं और प्राप्ति हमारी वासनाओं का उद्देश्य होता है । हम कुछ समय के लिए प्रसन्न रहते है । तब प्रसन्नता क्षीण हो जाती है और पुनः हम इसे अन्य वासनाओं की पूर्ति हेतु खोजने लगते हैं । हम इस व्यवहार को एक बहुत छोटे बच्चे में भी देख सकते हैं जो इस बात का कोई ज्ञान नहीं रखता है कि क्या इच्छा या पूर्ति या प्रसन्नता है । कहाँ से बच्चा प्रसन्नता को ढूंढने के लिए सीखता है ? ऐसा क्या है जो हमे सम्पूर्ण जीवन प्रसन्नता की इच्छा करने एवं कार्य करने के लिए विवश करता है । 
                                   
संसार के सभी धर्म शास्त्री ने घोषित किया है कि हम शरीर नहीं है । हम अमर आत्मा हैं, आत्मा की प्रकृति परमानंद है । परमात्मा या ईश्वर अनन्त परमानंद में है । हम उस परमात्मा और अनन्त परमानन्द के हिस्से हैं । अब हम मानव शरीर में है और पृथ्वी पर रह रहे हैं । लेकिन हमारे अन्दर की आत्मा अपने मूल स्वरुप को जानती है और (परमानंद में) वापस जाने के लिए खोजती है । वह आनन्द- ईश्वर के अनन्त  परमानन्द के लिए विवश करती है । हम नहीं जानते हैं कि ईश्वरत्व की ओर कैसे वापस जायें एवं उस शांति एवं आनंद में स्थापित हों । इसलिए हम लोग भौतिक वासनाओं की पूर्ति में प्रसन्नता को ढूंढते हैं । ऐसी प्रसन्नता अनन्त आनन्द की केवल एक छाया मात्र होती है ।
                   
सर्वोच्च शक्ति , जीवात्मा और माया जीवन के अनन्त ब्रह्मांडीय नाटक के तीन स्थायी घटक हैं । ईश्वर जीवात्मा और माया को  नियंत्रित करता है । (द्वंद का भ्रम जो हमें ईश्वर से प्रथक करता है ) इस माया पर काबू पाने के लिए जिससे हम ईश्वर तथा एक दूसरे से प्रथक होते हैं, हमें ईश्वर की सहायता की आवश्यकता होती है ।  ईश्वर हमारी सीधे सहायता नहीं करता है । वह परम गुरु के रूप में आता है जो एक साधित स्वामी होता है एवं हमें मार्ग दिखाता है कि कैसे माया पर नियंत्रण पाया जाय तथा उससे (ईश्वर से) एकाकार हुआ जाए । परम गुरु का अनुसरण करो और ईश्वर को प्राप्त करो तथा सदैव प्रसन्नता एवं परमानंद के क्ष्रेत्र में रहो ।
                                                        
महान स्वामी या परम गुरु हमें ईश्वरत्व की ओर वापस जाने के मार्ग की शिक्षा देते हैं । वे ज्ञान तथा आन्तिरिक अनुभव का मार्ग रखते हैं एवं जानते हैं कि कैसे उस सर्वोच्च स्थिति में पहुंचा जाए । जब हम उनकी शिक्षाओं का अनुसरण करते हैं हम उस परमानंद की स्थिति को प्राप्त करते हैं । सीता राम का मंत्र जाप कुण्डलिनी महा योग प्रणाली, ध्यान और परम गुरु की शिक्षाओं का व्यवस्थित एवं अनुशासित ढंग से अनुसरण करना हमारी परमानंद की स्थिति में पहुँचने में सहायता करता है । भक्ति में रहो और ईश्वरत्व तथा परम गुरु के प्रति समर्पित हो और परमानंद में रहो । एक बार जब हम इस स्थिति में पहुँच जाते हैं, यद्यपि हम इस संसार में रहते हैं, हम भौतिक वासनाओं के पीछे मूर्खतापूर्वक नहीं भागेंगे ।
                                      
सदैव ध्यान रखो कि तुम एक शरीर नहीं हो। तुम अमर आत्मा-ईश्वर की संतान हो । परमानंद तुम्हारे अन्दर है । भौतिक संसार की वैकल्पिक प्रसन्नता में कोई संतुष्टि नहीं है। अपने आधारों का चयन करो और अनुभव करो कि तुम दिव्य प्राणी हो और परमानन्द से परिपूर्ण हो । आज इस शरीर के जन्म दिवस पर तुम सबको आशीर्वाद देता हूँ कि तुम सब ज्ञान प्राप्त करो और देवी सरस्वती से अधिकाधिक ज्ञान प्राप्त हो और सदैव प्रसन्न रहो ।

बसंत पंचमी - देवी सरस्वती का उत्सव

भारत में माघ के माह का हिन्दू चन्द्र दिवस बसन्त  ऋतु  होता है और बसन्त पंचमी बसंत ऋतु की ताजगी एवं खूबसूरती का उत्सव होता है । बसंत ऋतु जीवन के नवीनीकरण का समय, नवीन सम्बन्धों का आशाओं एवं सुधार तथा सफलता के नवीनीकरण का अवसर होता है । बसंत पंचमी का अध्यात्मिक पहलू  भी बहुत महत्वपूर्ण है । यह सरस्वती पूजा होती है । प्रकृति का पुननिर्माण नवीन उन्नति का प्रभावशाली नृत्य, सुन्दरता एवं हमारे चारों ओर का जीवन देवी सरस्वती -शिक्षा की देवी का स्वरुप, लावण्य तथा सुन्दरता होती है । वह लौकिक बुद्धिमत्ता एवं दिव्य भण्डार तथा ज्ञान की अभिव्यक्ति हैं । उत्सव तथा पूजा चन्द्र पखवाड़े के पाँचवे दिन मनाई जाती है । यह सामान्यतः जनवरी के उत्तरार्ध तथा फरवरी के पूर्वार्ध में पड़ता है ।
                                                                                                                             
इस वर्ष बसंत पंचमी 28 जनवरी को है । उत्सव इस बात का भी सूचक होता है की जाड़े का समापन हो गया है एवं बसंत ऋतु का आरम्भ हो गया है । छोटे दिन एवं सर्द रातें समाप्त हो गई है और इसकी गर्मी तथा हवा तरोताजा है । प्रकृति पूर्ण खिले हुए स्वरुप में है । फूल, फल एवं पत्तियां हमारे चारों ओर के संसार को जीवन रंग एवं सुगंध से परिपूर्ण कर देती है । बसंत ऋतु प्रणय तथा प्रेम का प्रतिनिधित्व करता है । हजारों विवाह बसंत पंचमी के दिन पर किये जाते हैं क्योंकि यह दिन बहुत शुभ दिन होता है तथा इस दिन पर विवाह तथा अन्य दूसरे शुभ कार्य बिना हिन्दू पंचांग में उचित दिन को देखे हुए किये जा सकते हैं ।
                                                                                             
क्योंकि बसंत पंचमी एक बहुत शुभ दिन होता है, अतः अन्य दूसरे कार्य भी इस दिन पर किये जाते हैं । बच्चों को वर्णमाला तथा प्रथम शब्द को लिखने की शिक्षा दी जाती है । ब्राह्मणों को घर बुलाया जाता है और उन्हें खिलाया जाता है तथा दान भी दिया जाता है । पितृ तर्पण या काले तिल  एवं चावल तथा जल को पूर्वजों को पूजा के संस्कार के रूप में समर्पित किया जाता है । इस उत्सव में पीला  रंग एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है क्योंकि यह शुभ होता है | यह खेत में पके हुए मक्के का भी रंग होता है। यह फसलीय समय होता है तथा लोग प्रसन्न होते हैं । वे पीला  वस्त्र धारण करते हैं । पीली मिठाइयाँ तैयार की जाती हैं तथा खायी जाती है । देवी सरस्वती को पीला वस्त्र पहनाया जाता है एवं पूजा की जाती है । बच्चे पतंग उड़ाते हैं ।  भारत के कई राज्यों में पतंग उड़ाने का उत्सव मनाया जाता है । इस उत्सव को लोगों द्वारा अत्यधिक उत्साह एवं उमंग से मनाया जाता है ।
                                                      
देवी सरस्वती महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती जैसी तीन देवियों का एक हिस्सा हैं । वे ज्ञान तथा बुद्धि का शीर्ष श्रोत हैं । वे संगीत, सारंगी एवं भाषा की देवी हैं । वे सभी कला, विज्ञान, शिल्प एवं दूसरी योग्यता का प्रतीकत्व करती है । वे विभिन्न नामों से पुकारी जाती हैं - श्री शारदा, वाकदेवी, वीणावादनी इत्यादि । वे सफ़ेद स्वरूपित हैं तथा सफ़ेद वस्त्र धारण करती हैं । वे पद्मासन मुद्रा में एक सफ़ेद कमल में विराजमान होती हैं । वे शुद्धता एवं श्रेष्ठता को प्रस्तुत करती हैं । वे शांत, निर्मल एवं राजसी हैं । उनके चार हाँथ हैं जो शिक्षा में मानव व्यक्तित्व को प्रस्तुत करते हैं :- बुद्धि, ज्ञान, सजगता एवं अहंकार । एक हाँथ में वे एक कमल पकडे हुए हैं जो सच्चे ज्ञान का प्रतीक और दूसरे हाँथ में वे पवित्र ग्रंथों को धारण किये हैं । वे दोनों हाँथ में वीणा धारण किये हुए हैं एवं लौकिक प्रेम एवं बुद्धि की धुन बजाती हैं । उनका वाहन सफ़ेद हंस हैं । हंस पानी एवं दूध के मिश्रण से दूध को प्रथक करने की अपनी क्ष्रमता के लिए प्रसिद्द हैं । हमे भी जीवन में कल्पना से तथ्य को प्रथक करना सीखना चाहिए । उनका दूसरा वाहन मोर हैं जो अहंकार को प्रकट करता है । वे हमे स्मरण कराती हैं कि ज्ञान अहंकार पर काबू पाता है ।
                                                      
सरस्वती पूजा भारत के सभी घरों में की जाती है । सभी शैक्षिक संस्थान, विद्यार्थी, अध्यापक एवं शिक्षाविद उनकी आराधना करते हैं । गायक एवं संगीतकार भी उनकी पूजा करते हैं ।  किताबें एवं वाद्ययंत्र उनकी मूर्ती या तस्वीर के सम्मुख पूजा के दौरान रखे जाते हैं और उनके आशीर्वाद की ज्ञान, बुद्धि एवं ललित कला के लिए मांग की जाती है । बसंत पंचमी के इस पावन  दिवस पर देवी सरस्वती की अपने घर में तथा अपने ह्रदय में आराधना कीजिये । आपको ज्ञान बुद्धि एवं सर्वोच्च सत्य को प्रदान करने के लिए उनका आशीर्वाद लीजिये । हमें उनकी कृपा की जीवन में हर क्षण आवश्यकता है । हम बिना ज्ञान एवं बुद्धि के काम नहीं कर सकते हैं । जब हम ज्ञान का सम्मान तथा आदर करते हैं , हम देवी सरस्वती का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और ज्ञान का उचित उपयोग करने के योग्य होते हैं ।













गुरु सेवा - दीपक

गुरु अपने सभी शिष्यों पर समानरूप से प्रेम बरसाते हैं । लेकिन शिष्य में उनके प्रेम को प्राप्त करने की एवं पकड़े रहने की क्ष्रमता होनी चाहिए । गुरु की ओर से कोई पक्षपात या भेदभाव नहीं होता है जब वे अपना प्यार और आशीर्वाद सब पर बरसाते हैं । गुरु सूर्य की तरह होते हैं । सूर्य सबके ऊपर समान रूप से चमकता है । लेकिन यदि कोई एक कमरे में सभी खिड़की तथा दरवाजे को बंद करके बैठने की हठ करता है, उसे सूर्य की किरण प्राप्त नहीं होगी । सूर्य को इस बात के लिए आरोपित नहीं किया जा सकता है । जब एक शिष्य अपने गुरु के लिए असीम प्रेम रखता है, उनके प्रति निष्ठावान होता है और उचित क्ष्रमता से गुरु सेवा करता है, वह गुरु के प्यार एवं आशीर्वाद को संजोये हुए एक मूल्यवान पात्र हो जाता है एक ऐसी ही कहानी - दीपक और उनके गुरु वेदधर्म की है ।

गुरु वेद धर्म उत्तर भारत में गोदावरी नदी के तट पर रहते थे । उनके कई शिष्य थे, एवं वे समान रूप से सभी को प्रेम करते थे । एक बार उन्होंने परिक्षण करने तथा देखने का निश्चय किया कि उनके शिष्यों में कौन उन्हें सच्चे रूप से प्रेम करता है । उन्होंने सभी को बुलाया एवं घोषणा की : अपने पूर्व जन्म में मैंने एक महान पाप किया है, इस जीवन में अपने ताप तथा अध्यात्मिक अभ्यास के कारण मैंने अपने कुछ बुरे कर्मों को दग्ध कर लिया है । मुझे शेष को शीघ्र ही भोगना पड़ेगा । यह मुझे रोग के रूप में प्रभावित करेगा जिससे मैं  अपंग हो जाऊंगा । ऐसा मेरे साथ दो वर्षों तक रहेगा जिसके बाद मैं सामान्य हो जाऊंगा । मैं इस अवधि के दौरान काशी में रहने की इच्छा रखता हूँ । तुम में से कौन मेरे साथ आएगा एवं इस अवधि में मेरी सेवा करेगा ?
                       
केवल दीपक के अलावा किसी भी शिष्य ने स्वेच्छा से अपने आपको प्रस्तुत नहीं किया । दीपक अपने गुरु का निष्ठावान शिष्य था । वह अपने गुरु से अत्यधिक प्रेम करता था एवं गुरु में ईश्वर को देखता था । उसने गुरु वेदधर्म से कहा : मैं आपके साथ रहूँगा और काशी में इन दो वर्षों तक आपकी सेवा करूँगा । गुरु ने कहा : अपने को प्रस्तुत करने से पूर्व विचार कर लो । मैं बहुत कमज़ोर तथा अपाहिज हो जाऊंगा । मेरी देखभाल करना सरल नहीं होगा । मैं दो वर्षों तक अन्धा  व् लंगड़ा हो जाऊंगा। दीपक ने उत्तर दिया मैं भयभीत नहीं हूँ । क्या मैं दो वर्षों के लिए  काशी जा सकता हूँ, आपके बजाय बीमारी एवं कष्ट की देखभाल कर सकता हूँ ? गुरु दीपक के इस अनुरोध को सुनकर अत्यधिक प्रसन्न हुए । लेकिन उन्होंने इसे मना कर दिया ।  उन्होंने कहा : हममे से प्रत्येक को अपने कर्मों के परिणामों को भोगना पड़ता है । मैं अकेला अपने कर्मों को भोगूँगा । लेकिन तुम आ सकते हो और मेरी सेवा कर सकते हो ।अल्प समय में ही उन्होंने काशी के लिए आश्रम छोड़ दिया । और कुछ दिनों में ही काशी पहुँचने पर गुरु वेदधर्म के शरीर में छाले पड़ गए और वे अपंग तथा अंधे हो गए । दीपक पास के घरों में गया और उन दोनों की देखभाल हेतु याचना की । गुरु अत्यधिक पीड़ा में थे एवं बहुत चिडचिड़े थे । वे क्रोधित हो गए तथा बिना किसी कारण के दीपक पर चिल्लाने लगे । लेकिन दीपक धैर्यवान तथा मुस्कुरा रहा था । उसने गुरु के सभी नखरों को सहा और निष्ठा एवं प्रेम से उनकी सेवा की ।
                  
दीपक की गुरु भक्ति तथा सेवा को देखकर , देवताओं के राजा इंद्र प्रकट हुए । उन्होंने स्वर्ग में दीपक को एक स्थान देने के लिए कहा । दीपक ने उत्तर दिया कि  सर्वोच्च स्वर्ग गुरु की श्री चरणों में तथा गुरु की सेवा करना है और उसने इंद्र को वापस भेज दिया । कुछ समय के पश्चात , दीपक की गुरु सेवा से प्रसन्न होकर भगवान् शिव प्रकट हुए । उन्होंने दीपक से मनचाहा वरदान मांगने को कहा । दीपक ने कहा : कृपया मुझे मेरे गुरु से परामर्श लेने दीजिये । दीपक ने अपने गुरु से पूछा कि क्या वह भगवान से उन्हें निरोग करने के लिए कह सकता है । गुरु ने इन्कार कर दिया और कहा कि यह स्वीकार्य नहीं है । इसलिए दीपक ने भगवान् शिव को वापस भेज दिया ।
                         
कुछ दिनों बाद भगवान् विष्णु प्रकट हुए । वे इस कारण से प्रसन्न थे कि  दीपक ने गुरु में ईश्वर  देखा है एवं गुरु की सेवा की है । जब उन्होंने दीपक को वरदान माँगने को कहा दीपक ने गुरु भक्ति का वरदान माँगा । भगवान  ने उसे विधिवत आशीर्वाद दिया और कहा : तुमने अपनी भक्ति तथा सेवा से ईश्वर तथा गुरु दोनों की महत्ता को जान लिया है ।
                                 
दीपक ने अपने गुरु की सेवा जारी रखी । उसके गुरु सभी दिव्य प्राणियों से अवगत थे जो वहां आये थे एवं दीपक के उन सब के प्रति उत्तरदायित्वों से भी । दीपक को गुरु की परीक्षा से गुजरना पड़ा । गुरु वेदधर्म ने उसे ज्ञान, नाम, प्रसिद्धि और दीर्घायु का आशीर्वाद दिया ।
             
जब शिष्य को गुरु द्वारा कोई सेवा या कार्य दिया जाय, उसका ध्यान सम्पूर्ण रूप से उस पर होना चाहिए तथा उसे पूर्ण करना चाहिए । जो कुछ भी प्रलोभन उसके मार्ग में पुरस्कार या प्रशंसा के रूप में आये, उसे गुरु सेवा को बाधित नहीं करना चाहिए । गुरु के प्रेम के लिए तथा बिना किसी अहंकार से की गयी गुरु सेवा सर्वोच्च आशीर्वाद प्रदान करती है ।







गुरु सेवा का आशीर्वाद - कल्याण

ईश्वर की सर्वोच्च शक्ति ब्रह्माण्ड एवं प्राणियों पर नियंत्रण करती है । यह समझना मात्र नश्वर व्यक्तियों के लिए संभव नहीं होता  है कि ईश्वर कौन या क्या है, उनके नियम क्या हैं, वे कैसे संचालन करते हैं, उनके गुण क्या हैं एवं क्यों वे निश्चित कार्य करते हैं जो हमारे बुद्धि के परे होते हैं । केवल ईश्वर अपने बारे मे सबकुछ समझा सकते हैं । इसलिए ईश्वर अपने बारे में मानव समाज को शिक्षित करने के लिए गुरु के स्वरुप में प्रकट होते हैं । ईश्वर गुरु हैं और गुरु ईश्वर हैं । एक गुरु जिन्होंने अपने अहंकार पर नियंत्रण प्राप्त कर लिया है एवं स्वयं को ईश्वर से एकाकार कर लिया है, स्वयं में ईश्वर होता है ।  ऐसे गुरु की सेवा करना ईश्वर की सेवा करना होता है और ऐसी सेवा का आशीर्वाद तथा पुरस्कार आश्चर्यजनक होता है। समर्थ रामदास एवं कल्याण की इस कथा को समझें :
                                  
समर्थ रामदास एक शक्तिशाली एवं जाने माने गुरु थे । वे सज्जनगढ़ में रहते थे जो एक पहाड़ की चोटी पर था । किले में पानी का कोई भी स्रोत नहीं था । गुरु एवं उनके शिष्यों के लिए नियमित आवश्यकताओं का पानी पहाड़ी की तलहटी में एक गाव से लाना पड़ता था : किले में सभी व्यक्तियों की आवश्यकताओं के लिए पानी लाने एवं भरने का यह कार्य कल्याण नामक एक शिष्य द्वारा संपन्न किया जाता था । कल्याण अपने गुरु के प्रति असीम प्रेम रखता था एवं पानी भरने एवं लाने का कार्य गुरु सेवा की तरह करता था । सभी दूसरे  शिष्य गुरु के चरणों में बैठते थे एवं पवित्र किताबों तथा प्रश्न तथा उत्तर सत्र के माध्यम से ज्ञान अर्जित करते थे ।  कल्याण बहुत मुश्किल से अध्यन के लिए गुरु के श्री चरणों में बैठ पाता था । वह सुबह से शाम तक किले में पानी लाने एवं भरने में ही व्यस्त रहता था । वह गुरु का सबसे प्रिय शिष्य था एवं सभी शिष्य कल्याण से ईर्ष्या तथा द्वेष रखते थे । वे सोंचते थे कि क्योंकि वे गुरु के श्री चरणों में बैठते है तथा मेहनत से अध्यन करते हैं इसलिए वे कल्याण के अपेक्षाकृत अधिक ज्ञान रखते हैं और गुरु को उनसे अधिक प्रगाढ़ता रखनी चाहिए ।
                                      
समर्थ रामदास कल्याण के प्रति दूसरे शिष्यों की भावनाओं से अवगत थे। वे उन्हें कल्याण की प्रतिभा दिखाने के लिए उचित अवसर की प्रतीक्षा में थे । एक दिन अध्यन सत्र के दौरान , गुरु ने विद्यार्थियों से एक तर्कपूर्ण प्रश्न पूछा । उनमे से कोई भी उत्तर देने में सक्षम नहीं था । उसी समय कल्याण पानी की बाल्टियों को ढोते  हुए गुज़र रहा था । गुरु ने उसे पुकारा एवं वही प्रश्न उससे पूछा । कल्याण ने बड़ी सहजता से उचित उत्तर दे दिया ।
                                     
दूसरे विद्यार्थी स्तब्ध थे। उन्होंने गुरु से पूछा : कि कल्याण कैसे इस प्रश्न का उत्तर जानता है ? हमलोग रात दिन आपके सम्मुख बैठते हैं एवं अध्यन करते तथा सीखते हैं । हमलोग इस प्रश्न का उत्तर देने में सक्षम नहीं हुए । कल्याण कभी भी हमलोगों के साथ नहीं बैठता तथा अध्यन करता हैं । फिर भी उसने ठीक उत्तर दे दिया । समर्थ रामदास ने उत्तर दिया : कल्याण ने उचित समझ तथा दृष्टिकोण से गुरु सेवा की । उसके लिए गुरु की सेवा करना एवं किले में यहाँ सभी व्यक्तियों के लिए पानी की आवश्यकता का ध्यान रखना ईश्वर की सेवा करना है । वह इस कार्य को प्रसन्नतापूर्वक एवं निष्ठा पूर्वक करता है ।  उसने इस पर कोई असन्तोष नहीं रखा कि वह सम्पूर्ण दिन पानी ढोता है और आप सब लोग आराम से यहाँ बैठते हैं तथा अध्यन करते हैं । आप सब लोग केवल आद्ध्यात्मिकता का सिद्धांत जानते हैं। आपके लिए उक्ति " आपकी तरह लोगों की सेवा करना ईश्वर की सेवा करना है । एवं "गुरु ईश्वर हैं " केवल एक शब्द है । कल्याण ने अभ्यास से इन उक्तियों की सत्यता को जान लिया है । वह उचित द्रष्टिकोण एवं समझ से इस सेवा को कर रहा है । ईश्वर एवं गुरु का आशीर्वाद उसके ऊपर बरसता है । इसीलिए वह सम्पूर्ण ज्ञान रखता हैं । बाद में समर्थ रामदास ने कल्याण को अपना अधिकारिक लेखक उनके सभी गीतों एवं शिक्षाओं को लेखनबद्ध करने के लिए घोषित किया । समर्थ रामदास ने दसबोध एवं श्री मनाचे श्लोक की तरह कई पुस्तकों को प्रकाशित किया जो आज भी पढ़ी जाती हैं एवं श्रद्धेय है । कल्याण उनकी लेखनी थे ।
                                         
साधुओं एवं दूसरों के द्वारा भाषणों को सुनना एवं पुस्तकों का अध्यन करना हमलोगों को केवल किताबी ज्ञान देता है । सैधांतिक ज्ञानों का कोई उपयोग नहीं होता है । यह स्वादिष्ट व्यंजन को बनाने के तरीके को जानने की तरह होता है । हमलोग सामग्रियों एवं विधियों को जान सकते हैं तथा तैयार व्यंजन के स्वाद का विवरण रख सकते हैं । लेकिन मात्र इस बात को जानने से हमारी भूख शांत नहीं होगी । हमें वास्तविक व्यंजन को खाने की आवश्यकता होती है एवं स्वाद का आनन्द लेने की और अपनी भूख की पूर्ति के लिए भोजन करने की आवश्यकता होती है ।
                  
सीता राम मन्त्र का नियमित जाप कीजिये एवं ध्यान कीजिये । गुरु की शिक्षाओं का अनुसरण कीजिये । यह बात कोई मायने नहीं रखती है कि आप भौतिक रूप से गुरु के समीप हैं या दूर हैं । उनका ध्यान करके गुरु से मानसिक समीप होइये । अपने कार्य को करिए तथा आपको प्रदान किये गए अभ्यासों का अनुसरण कीजिये । यह सबसे अच्छी गुरु सेवा होती है जो आप कर सकते हैं एवं आप आशीर्वाद का फल भोगेंगे । जो कुछ भी आपके जीवन में कमियां होंगी उनकी पूर्ति हो जाएगी और आप में संतोष आएगा । गुरु सेवा कामधेनु की तरह होती है - पवित्र गाय जो सभी इच्छाओं की पूर्ती करती है। सेवा करने के प्रयोजन से गुरु की सेवा कीजिये । गुरु के प्यार के लिए गुरु की सेवा कीजिये । यह संभावित सेवा का सर्वोच्च स्तर हो सकता है ।                   




गुरु सेवा


गुरु सेवा गुरु के प्रति की गयी सेवा है । जब एक शिष्य अपने गुरु से प्रेम करता है वह गुरु की सेवा करता है । "गुरु सेवा जो सभी शिष्यों के लिए सामान्य है"  गुरु की शिक्षाओं का अनुसरण होती है और अध्यात्मिक तकनीकों का नियमित एवं अनुशासित ढंग से अभ्यास करना होती है । सभी शिष्य गुरु के प्रति भौतिक या भौगोलिक सामीप्य नहीं रखते हैं । इसलिए वे गुरु के प्रति व्यक्तिगत सेवा नहीं कर सकते हैं । इसलिए जहाँ कहीं भी शिष्य रहता हो जीवन के किसी भी पड़ाव में निम्नवत शिक्षाओं एवं दिशानिर्देशों द्वारा सेवा कर सकता है ।
                                                    
गुरु के प्रति सच्ची गुरु भक्ति या प्रेम निसंदेह गुरु की शिक्षाओं का अनुसरण करना होता है । एक शिष्य जो गुरु की शिक्षाओं का अभ्यास करता है , वह क्रोध, नुकसान, घमंड, आसक्ति एवं तामसिकता के आंतिरिक लघु परिपथों से ऊपर उठ जाएगा । वह आशीर्वाद के बारे में जो गुरु से प्रवाहित होता है दूसरों के लिए एक उदाहरण होता है । वह अध्यात्मिक रूप से फलता फूलता है एवं उसकी प्रेम एवं सेवा की सुगंध उसके गुरु को प्रदर्शित करती है तथा गौरवान्वित करती है ।
                
कुछ शिष्य होते हैं जो गुरु से सामीप्य या सम्बन्ध रखते हैं । गुरु उनसे अपने लिए कुछ कार्य करने के लिए कह सकते हैं । यह भी गुरु सेवा होती है । यह कोई भी कार्य हो सकता है । यह आश्रम में झाड़ू लगाना, कपड़ों को साफ करना, पौधों की सिंचाई करना, किराने का सामान खरीदना, भोजन पकाना, गुरु के चरणों को दबाना या आगंतुकों का स्वागत करना हो सकता है । शिष्य को इमानदारी एवं समर्पण से वही कार्य करना चाहिए जो उससे कहा जाये । उसे दूसरे को दिए गए कार्य पर ध्यान नहीं देना चाहिए ना ही उसे दूसरों के  द्वारा करने की प्रतीक्षा करनी चाहिए । शिष्य के मस्तिष्क में गुरु के प्रति स्वयं या पक्षपात की हीनता की भावना या अन्य नकारात्मक विचार नहीं होने चाहिए । गुरु द्वारा दिया गया कोई भी कार्य पवित्र होता है एवं उसका निष्पादन सर्वोच्च प्रतिभा के साथ होना चाहिए । प्रत्येक शिष्य को वही कार्य या सेवा दी जाती है जो गुरु द्वारा शिष्य की कार्मिक आवश्यकताओं तथा उनकी व्यक्तिगत योग्यता के आधार पर  भी निर्धारित किया  जाता है । किसी भी शिष्य को दूसरों को दिए गए कार्य को करने की  या ईर्ष्या की भावना नहीं रखनी चाहिए । हम लोगों द्वारा प्रेम एवं निष्ठा के साथ गुरु द्वारा तय  किये गए कार्य को करना सर्वश्रेष्ठ सेवा होती है जो हम कर सकते हैं ।
                                       
गुरु सेवा का आशीर्वाद उन क्षेत्रों को भरता तथा पूर्ण करता है जिसका शिष्य के जीवन में अभाव होता है । गुरु सेवा शिष्य के ऊपर स्वास्थ्य, अच्छे जीवन साथी, संतान, कार्य, धन, ज्ञान, बुद्धिमत्ता, आलौकिक क्ष्रमताओं, ईश्वर का आशीर्वाद  एवं निरपेक्ष से एकाकार के रूप में आशीर्वाद का प्रवाह होता है ।
                                           
राम ने वशिष्ठ ऋषि के प्रति गुरु सेवा को किया तथा उन्हें प्रसन्न किया । उनके गुरु ने उन्हें उन मन्त्रों से अवगत कराया जो युद्ध में विशिष्ट प्रयोजनों में प्रयोग किये जाते हैं । उन्होंने राम को चक्रों, नाड़ियों  तथा कुण्डलिनी शक्ति के ज्ञान से पुरस्कृत किया । उन्होंने राम को शक्तिपात दिया और बाद में राम ने शक्तिपात के इस ज्ञान को लक्ष्मण तथा हनुमान से अवगत कराया । हनुमान चिरंजीवी हैं । इसका तात्पर्य होता है कि वे अनन्त जीवन रखते हैं । हनुमान अब भी मानवता के लाभ के लिए सर्वथा उचित व्यक्ति को इस ज्ञान को देने की प्रतीक्षा करते हैं । ऐसा माना जाता है कि ध्यानयोगी परमेश्वर दास जी जो मेरे गुरु के गुरु हनुमान के रूप हैं, वे मानव जाति के विकास के लिए कुण्डलिनी महायोग के ज्ञान से गुजरे थे ।
                
कृष्ण ने भी अपने गुरु सान्दिपनी के आश्रम में गुरु सेवा की । उन्होंने भूमि को धोया एवं स्वच्छ किया, पूजन सामग्री, अलाव एवं पानी एकत्रित किया । यद्यपि वे भगवान विष्णु के अवतार थे, वे विनीत, आज्ञाकारी तथा समर्पित थे । उन्होंने अन्य दूसरे साधारण विद्यार्थियों की तरह अपने गुरु द्वारा दिए गए समस्त कार्य को सम्पादित किया । परिणाम के रूप में वे चौंसठ दिनों में चौंसठ कलाओं में माहिर हो गए । यह सही दृष्टिकोण से संपादित की गयी गुरु सेवा का आशीर्वाद है ।
                    
जो लोग गुरु सेवा करते हैं उन्हें सेवा उचित इच्छा, तत्परता एवं आज्ञा से तथा दूसरों के प्रति बिना किसी ईर्ष्या की भावना से करना चाहिए जो गुरु से निरन्तर सम्पर्क  में रहते हैं । जो लोग दूर हैं और गुरु से सीधे सम्पर्क नहीं रख सकते हैं , उन्हें नियमित रूप से मंत्र जाप एवं ध्यान करना चाहिए और सिखाये गए अध्यात्मिक अभ्यासों के दूसरे नियमों का अनुसरण करना चाहिए । गुरु सेवा सर्वोच्च सम्भावित पुरस्कारों को प्रदान करती है ।
                    
गुरु सेवा स्वयं में एक पुरस्कार है । सदैव गुरु की सेवा तन, मन, धन , एवं आत्मा से करें ।


















                

















गुरु का आशीर्वाद जीवन में परिपूर्णता लाता है

                                                 
हम सब ईश्वर के प्रति प्रेम रखते हैं । इस बारे में कोई संदेह नहीं है । लेकिन हम शरीर रूप रंग एवं भौतिक संसार के प्रति ईश्वर  के अपेक्षाकृत अधिक प्यार रखते हैं । जब हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं, यह आधी अधूरी ह्रदय की या उससे भी कम प्रार्थना होती है । जीवन में कुछ भी प्राप्त नहीं होता है यदि वह आधे अधूरे दृष्टिकोण या ह्रदय से किया जाता है । यदि हम ईश्वर को सबसे अच्छे मित्र के रूप में और जीवन में स्वयं को मार्गदर्शित होने के लिए चाहते हैं, हमें ईश्वर से सम्पूर्ण शक्ति तथा प्रेम से प्रार्थना करनी चाहिए । केवल तभी वे भी हमें अपनी उपलब्धि तथा प्रेम के साथ उत्तर देंगे ।

हमें उत्कंठा से ईश्वर की इच्छा रखनी चाहिए । ईश्वर के प्रेम के लिए तीव्र इच्छा रखना केन्द्रित होनी चाहिए । यह इतनी शक्तिशाली होनी चाहिए जितना एक प्यासे यात्री को जल की तीव्र आवश्यकता होती है । जो रेगिस्तान में कई दिनों से भटका हुआ है ।  जब मस्तिष्क एवं ह्रदय बेचैन रहते हैं तथा ईश्वर के लिए लालसा प्रज्वलित रहती है, गुरु प्रकट होते हैं और गुरु ईश्वर को प्राप्त करने का मार्ग दिखलाते हैं । गुरु शिष्य की क्ष्रमताओं को जानते हैं और उन्हें प्राप्त करने के लिए उसकी सहायता करते हैं । गुरु लघु परिणामों एवं शिष्य की आवश्यकताओं से अवगत होते हैं और उन्हें अपने आशीर्वाद से परिपूर्ण करते हैं । उनका आशीर्वाद शिष्य के भाग्य एवं कर्म में सभी अन्तरालों को परिपूर्ण कर देता है । जहाँ शिष्य के जीवन में कमी होती है , गुरु उसे पूरा करते हैं एवं परिपूर्ण करते हैं । यह शिष्य के जीवन को निपुण बनाती है एवं संतोष से परिपूर्ण करती हैं । शिष्य अपने जीवन को क्ष्रमताओं एवं महत्वाकांक्षाओं से परिपूर्ण करने में सक्षम हो जाता है और गुरु, ईश्वर एवं मानवता की सेवा पर भी केन्द्रित हो जाता है । शिष्य का जीवन जो आशीर्वादित इस तरह से होता है, सभी  प्रकार से पुरस्कृत एवं परिपूर्ण होता है । महान शिवाजी महाराज एवं उनके शक्तिशाली गुरु समर्थ रामदास की कथा का अवलोकन करें ।
                                                         
समर्थ रामदास एक शक्तिशाली तथा महाराष्ट्र के जाने माने गुरु थे । शिवाजी महाराज उनकी प्रसिद्धि के बारे में सुनने के पश्चात उनसे मिलने के लिए उत्सुक थे । वे कोंधावल चास्म गए जहाँ गुरु ने शिविर लगाया था एवं उनकी (गुरु की ) पूरे दिन प्रतीक्षा की । लेकिन गुरु वहां नहीं थे और शिवाजी को उत्सुकतापूर्वक बिना मिले हुए वापस लौटना पड़ा । उस रात और दूसरे दिन और रात, शिवाजी का मष्तिष्क समर्थ रामदस जी के विचारों में पूरे दिन रहा । जैसे -2 समय व्यतीत हुआ, उनकी गुरु से मिलने की तीव्र इच्छा बढ़ गयी । वे भवानी देवी के मन्दिर में गए एवं प्रार्थना में बैठ गए । उन्हें इस बात का आभास भी नहीं हुआ कि कब वे वहां निद्रा में गिर पड़े । उनके स्वप्न में समर्थ रामदास एक भगवा वस्त्र, खडाऊँ पहने हुए एक माला एवं बैसाखी बांह के निचे धारण किये हुए प्रकट हुए । उनके तेजस्वी स्वरुप को देख कर शिवाजी उनके चरणों में गिर पड़े एवं आशीर्वाद की याचना की । समर्थ रामदास ने उनके सिर को छुआ एवं उन्हें आशीर्वाद दिया । जब प्रातः काल वे जागे, वे एक नारियल पकडे हुए थे । भारत में नारियल गुरु द्वारा शिष्य को आशीर्वाद के रूप में प्रदान किया जाता एवं स्पर्श किया जाता है ।

उस क्षण के बाद से, शिवाजी ने समर्थ रामदास को अपने गुरु के रूप में  माना । गुरु बाद में सिंगनवाडी में उन्हें देखने के लिए आये । शिवाजी ने गुरु के पैरों को धोने की कर्मकाण्ड वाली पूजा की एवं  उन्हें फल एवं पुष्प समर्पित किये । गुरु ने उन्हें आशीर्वाद दिया एवं एक नारियल प्रदान किया। उन्होंने आशीर्वाद के रूप में उन्हें एक मुट्ठी भर कीचड़, कंकड़, एवं कुछ घोड़े की लीद भी दी । उन्होंने उनसे कहा : तुम शासन करने एवं लोगों की सेवा करने के लिए पैदा हुए हो । मेरा आशीर्वाद एवं मार्गदर्शन सदैव तुम्हारे साथ है । जहाँ कही भी तुम मेरा ध्यान करोगे, मैं तुम्हारा साथ दूंगा । बुद्धिमत्तापूर्वक शासन करो ।
                                               
गुरु अच्छी तरह उनके राज्य के शासन के लिए शिवाजी की आवश्यकताओं एवं अपेक्षाओं से अवगत थे ।"मुट्ठी भर वस्तुयें जो उन्होंने शिवाजी को प्रदान किया " ने शिवाजी की आवयश्यकताओं तथा उनकी परिपूर्णता के लिए गुरु के आशीर्वाद को प्रदर्शित किया । मुट्ठी भर कीचड़ ने पृथ्वी या राज्य को प्रदर्शित किया, कंकड़ पहाड़ी किले थे जिन्हें सुरक्षा एवं शत्रुओं से युद्ध की आवयश्यकता थी, घोड़े की लीद ने घोड़ों को प्रस्तुत किया जिन्हें युद्ध के लिए आवागमन के लिए एवं शत्रुओं से रक्षा के लिए प्रयोग किया जाना था तथा नारियल शिवाजी के कल्याण के लिए था ताकि वे मराठा राज्य के महाराज के रूप में तथा अपने व्यक्तिगत जीवन में अच्छा  करें । गुरु के आशीर्वाद ने यह सुनिश्चित किया कि शिवाजी को उनके जीवन में कभी कोई कमी नहीं पड़ेगी ।
                                                                                         
गुरु के प्रति तीव्र तड़प एवं उनके आशीर्वाद ने समर्थ रामदास को शिवाजी की ओर आकर्षित किया । उनके आशीर्वाद ने शिवाजी को एक बुद्धिमान और समर्थ शासक बनाया जिसने महाराष्ट्र में हिन्दू स्वराज्य को पुनः स्थापित किया । शिवाजी के शासन में विदेशी आक्रमणकारी काबू में थे, समाज में महिलाओं की स्थिति तथा सम्मान पुनः स्थापित हुआ, दासता समाप्त कर दी गयी थी । समाज निखरा हुआ था । यह सब शक्तिशाली समर्थ रामदास के आशीर्वाद एवं मार्गदर्शन के कारण था । यही वह कारण है कि गुरु की क्यों आवयश्कता होती है ।



गुरुवार, 3 अक्टूबर 2013

एक गुरु की आवश्यकता - सूरदास

जब शिष्य तैयार हो जाते हैं गुरु का आगमन होता है । शिष्य गुरु की खोज में नहीं जाते हैं । भौतिक सिद्धान्त गुरु को शिष्य के पास भेजते हैं । जब गुरु एवं शिष्य आपस में मिलते हैं, गुरु शिष्य के मज़बूत पक्षों एवं कमियों के प्रति जागरूक होता है । जहाँ कुछ कमियों पर काबू पाने की आवश्यकता होती है, गुरु शिष्य की सहायता करते हैं एवं ज्ञान तथा अध्यात्मिक अभ्यास को प्राप्त करने के लिए तैयार करते हैं । जब शिष्य गुरु के क्रियाकलापों के प्रति सचेत नहीं होगा तो क्यों उसके द्वारा कुछ अतिरिक्त करने के लिए कहा जाता है । जब शिष्य गुरु की निःसंदेह आज्ञा मानता है, वह मार्गदर्शित एवं प्रशिक्षित  होता है ।  उच्च ज्ञान प्राप्त करने के लिए इस प्रकार अब वह पूरी तरह से तैयार हो जाता है । यह कथा सूरदास एवं उनके गुरु की है । 
                                                                  
सूरदास एक युवा साधक ईश्वर के प्रति तीव्र रूप से आसक्त थे । एक गुरु उनके जीवन में प्रकट हुए तथा प्रशिक्षित करने एवं ईश्वर की ओर मार्ग दिखाने का वायदा किया । गुरु अवगत थे कि सूरदास स्वयं में एक अपूर्णता रखते थे । सूरदास अतिशीघ्र एवं तुच्छ सामग्रियों के लिए भी क्रोधित हो जाया करते थे ।  गुरु अवगत थे कि सूरदास का क्रोध आन्तरिक अवरोधों का कारण होगा जिसके कारण सूरदास ईश्वर की समीपता को महसूस नहीं कर पायेंगे ।  उन्होंने सूरदास की क्रोध के अवगुणों पर काबू पाने तथा उन्हें अध्यात्मिक अभ्यासों को प्राप्त  करने में तैयार करने में सहायता के लिए इच्छा की । उन्होंने सूरदास से कहा : अपने समस्त कार्यों एवं गतिविधियों के दौरान रात दिन भगवान् के नाम का एक मास तक जाप करो । नवीन मास  के आरम्भ होने के प्रथम दिन , प्रातः काल स्नान करो तथा मेरे पास आओ । मैं तुम्हे ईश्वर के मार्ग की दीक्षा दूंगा । 
                                                                                                                                                   सूरदास ने गुरु के निर्देशों का पालन किया । उन्होंने ईश्वर के नाम का रात दिन तथा अपनी समस्त गतिविधियों के दौरान जाप किया । नवीन मास के प्रथम दिन वे भोर में नदी की ओर भागे ,स्नान किया , स्वच्छ कपड़ों को पहना तथा गुरु के आश्रम की और प्रस्थान किया । जैसे ही वे आश्रम के समीप पहुंचे एक सफाई कर्मी जो मार्ग की सफाई कर रहा था भूलवश उनके कपड़ों पर धूल को झाड़ दिया और वे गन्दे हो गए । सूरदास ने आत्म संतुलन खो दिया एवं सफाई कर्मी पर चिल्लाने लगे । तुम मूर्ख एवं लापरवाह हो ! तुम्हारे कारण मुझे वापस जाना पड़ेगा तथा दोबारा स्नान करना पड़ेगा ।
                                                           
गुरु आश्रम से इस घटना का अवलोकन कर रहे थे । जब सूरदास उनके पास गए, उन्होंने कहा : प्रिय सूरदास , तुम अभी तैयार नहीं हो । कृपया एक मास तक उन्ही निर्देशों का पालन करो एवं पुनः मेरे पास आओ । सूरदास ने गुरु के आदेशों को स्वीकार किया तथा आश्रम छोड़ दिया । उन्होंने दूसरा मास रात दिन ईश्वर के नाम का जाप करने में व्यतीत किया । नवीन मास के प्रथम दिन वे नदी को गए स्नान किया एवं स्वच्छ कपडे पहने और आश्रम के लिए रवाना हुए । सफाई कर्मी आश्रम के बाहर  कार्य कर रहा था । वह मार्ग की सफाई कर रहा था और भूलवश उसने सूरदास के कपड़ों पर अपने झाड़ू से झाड़ दिया । सूरदास के आवेश की कोई सीमा नहीं रही ! वे सफाई कर्मी पर चिल्लाने लगे और गुरु ने पुनः उन्हें दूसरे मास के जाप करने के लिए भेज दिया । 
                                           
समयावधि की समाप्ति पर, सूरदास ने पुनः स्नान किया एवं गुरु के आश्रम की ओर गए । इस समय कुछ असामान्य घटित हुआ । सफाई कर्मी ने सूरदास को अपनी ओर आते देखा । उसे बिना किसी कारण चिल्लाया जाना स्मरण हो गया । वह आवेग से भर गया । उसने कीचड़ से भरी हुई कचरा टोकरी को उठाया और उसने जान बूझकर सूरदास के ऊपर उड़ेल दिया । और उस समय सूरदास की प्रतिक्रिया बहुत भिन्न थी । उन्होंने अपने हाँथ जोड़े तथा सफाई कर्मी से कहा : आप मेरे अध्यापक हैं । आपने मुझे क्रोध पर काबू पाना सिखाया । मैं आपका आभारी हूँ । 
       
गुरु आश्रम से बाहर आये और सूरदास का गर्मजोशी से स्वागत किया । उन्होंने कहा : तुम अब अंततः अध्यात्मिक शिक्षाओं तथा अभ्यासों को प्राप्त करने के लिए तैयार हो गए हो । 
                                                                                                                  
सफाई कर्मी जिसने सूरदास पर धूल झाड़ दी भूलवश ऐसा किया । उसकी जानबूझकर गलती नहीं थी । फिर भी सूरदास उस पर क्रोधित हो गए । अपने समस्त कार्य एवं गतिविधियों के दौरान लगातार तीन मास तक भगवान्  के नाम का जाप रात दिन करने के कारण, सूरदास अपने क्रोध पर नियंत्रण पा सके । यह सब कुछ गुरु के आशीर्वाद तथा उनके आदेश कि सूरदास को भगवान् के नाम का जाप करना चाहिए के कारण हुआ । सूरदास ने अपने गुरु की आज्ञा मानी एवं पुरस्कृत हुए । उनके गुरु सूरदास की अपनी नकारात्मकता पर नियंत्रण करने में सहायक हुए । क्रोध, नुकसान, लालच, आसक्ति, गर्व, तामसिकता की तरह नकारात्मकता हमारी आत्मा एवं ईश्वर के बीच में दूरियाँ पैदा करती हैं और हम ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करने में सक्षम नहीं हो पायेंगे या अपने अन्दर ईश्वर के प्रेम की मधुरता का आनन्द नहीं ले पायेंगे । एक गुरु का मार्गदर्शन एवं आशीर्वाद आवश्यक होता है । यही वह कारण है कि गुरु की क्यों आवश्यकता होती है ।