ईश्वर के प्रति भक्ति या समर्पण एक व्यक्ति के चरित्र में मधुरता लाता है । ईश्वर प्रेम है । जब हम ईश्वर को अपने सम्पूर्ण शक्ति तथा अस्तित्व के साथ प्रेम करते हैं, उनका प्रेम हमें परिपूर्ण कर देता है । ईश्वर एवं गुरु के प्रेम की मधुरता बहुत मनोहर एवं आकर्षण युक्त होती है । जिन लोगों ने उस प्रेम का स्वाद चखा है वे कभी भी उससे दूर नहीं हटेंगे । जिन लोगों ने ईश्वर के प्रेम की मधुरता को नहीं जाना है वे उस प्रेम को मानवीय सम्बन्धों में ढूंढेंगे । मानवीय सम्बन्धों का प्रेम ईश्वरीय प्रेम का एक प्रतिविम्ब मात्र होता है बल्कि अपेक्षाओं की अपूर्णता से छायांकित होता है । ईश्वर के प्रति प्रेम या भक्ति हमें शक्ति देती हैं और हमें सुरक्षा प्रदान करती है । ब्रह्माण्ड की असीमित शक्ति हमारा समर्थन करती है जब हमारी भक्ति निःस्वार्थ होती है । हमें ईश्वर के प्रति उनके आशीर्वाद एवं उपहारों के लिए जो हमें दिए गए हैं , कृतज्ञ होना चाहिये । हमें ईश्वर के प्रति ईश्वर से प्रेम करना चाहिए न कि उपहारों के खातिर जो वे हम पर बरसाते हैं ।
क्रोध अहंकार से आता है । जब हमारी अपेक्षाएं पूर्ण नहीं होती हैं एवं एक व्यक्ति को महत्त्व नहीं दिया जाता है, वह क्रोधित हो जाता है । जब एक व्यक्ति के जीवन के समानुपातों के अपेक्षाकृत अधिक विशालता के लिए जीवन में घटित सभी घटनाओं का आनन्द लेता है , वह स्वयं को महान के रूप में चित्रित करना चाहता है । वह छोटी-2 घटनाओं को जीवन के अपेक्षाकृत अधिक विशाल बना देता है और क्रोधित हो जाता है तथा अहंकार एवं अनुचित आत्म महत्व से भर जाता है । वह बिना कारण उपेक्षित एवं अपमानित महसूस करता है और उसका क्रोध असीम हो जाता है । यह अंततः केवल उसे ही क्षति पहुंचाता है । भागवत पुराण की इस कथा को समझिये :
राजा अम्बरीश श्रीराम के वंश के थे । वे भगवान विष्णु के महान भक्त थे । वे सत्यवादी एवं एक अच्छे राजा थे । उन्होंने एक यज्ञ का आयोजन किया एवं अपनी पूजा से भगवान् विष्णु को प्रसन्न किया । भगवान् ने उन्हें अपने सुदर्शन चक्र से सुरक्षित रहने का आशीर्वाद दिया (अतुलनीय सटीकता तथा आभासित पैनापन के साथ गोलाकार के रूप में एक हथियार ) । सुदर्शन का तात्पर्य उचित दृश्य होता है । सुदर्शन के आशीर्वाद या उचित दृश्य ने अम्बरीश के राज्य को शान्ति, सम्रद्धि एवं सुरक्षा से परिपूर्ण कर दिया ।
राजा अम्बरीश ने (द्वादशी) व्रत रखा । इस व्रत में यह अनिवार्य होता है कि राजा एकादशी के दिन उपवास रखे और द्वादशी तिथि को उपवास तोड़े तथा समस्त जन समुदाय को भोजन कराये । किये गए उपवास को तोड़ने के समय, दुर्वासा मुनि आये एवं उनका ससम्मान राजशाही स्वागत किया गया । राजा ने उपवास तोड़ने के उपरान्त उनके आतिथ्य को स्वीकारने के लिए कहा । दुर्वासा मुनि सहमत हो गए और राजा से कहा कि वे उनकी तब तक प्रतीक्षा करें जब तक कि वह स्नान करके वापस न आ जाये , उपवास तोड़ने का शुभ दिन व्यतीत हो गया परन्तु दुर्वासा ऋषि वापस न आये । । राजा जल अथवा भोजन को ग्रहण नहीं कर सकते थे बिना अपने सम्मानित अतिथि को भोजन कराये । ऋषि वशिष्ठ जो सभा में सम्मानित ऋषि थे , राजा को सलाह दी कि वे अपने उपवास को तुलसी की पत्ती तथा एक चम्मच पानी को ग्रहण करके तोड़ सकते हैं जो पूजा में भगवान् विष्णु को समर्पित किया गया है । राजा ने इस प्रकार से उचित समय पर अपने उपवास को तोडा एवं अपने अतिथि की भोजन कराने के लिए प्रतीक्षा की ।
दुर्वासा मुनि अपने त्वरित आवेश तथा क्रोध के लिए प्रसिद्द थे । जिस समय राजा अम्बरीश ने उपवास को तोड़ा ठीक उसी समय वे आये तथा बहुत क्रोधित हुए । उन्होंने अपमानित महसूस किया कि राजा ने उनके आने की प्रतीक्षा नहीं की । उन्होंने महसूस किया कि तुलसी का पत्ता और जल राजा द्वारा ग्रहण करना भोजन करने के समान होता है । बिना अपने अतिथि को भोजन कराये राजा ने कुछ भी ग्रहण नहीं किया था । राजा भला उनके जैसे महान साधु का कैसे अपमान कर सकते थे । राजा के समस्त व्रत्तांत अनसुने कर दिए गए । क्रोध में दुर्वासा मुनि ने एक बाल को तोडा एवं उससे एक दानव का निर्माण किया । उन्होंने दानव को राजा को मारने का आदेश दिया । राजा ने साधारण रूप में अपने हाँथ जोड़े तथा मन्दिर में भगवान् विष्णु की मूर्ति के सामने समर्पित हो कर बैठ गए । सुदर्शन चक्र मूर्ति से घूमता हुआ निकला और दानव पर आक्रमण कर दिया एवं उसे मार डाला। तब चक्र ने दुर्वासा मुनि को मारने के लिए उनका पीछा करना आरम्भ कर दिया । वे भागे तथा छिपने का प्रयास किया परन्तु चक्र ने उनका लगातार पीछा किया । वे जायें तो कहाँ जायें । इसलिए वे ब्रह्म लोक भागे एवं भगवान् ब्रह्मा से सुरक्षित करने की याचना की । भगवान् ब्रह्मा ने उन्हें सुरक्षित करने से मना कर दिया । उन्होंने कहा कि मुनि ने भगवान् विष्णु को नाराज किया है इसलिए वे उनको नहीं बचा सकते हैं । चक्र ने लगातार मुनि का पीछा करना जारी रखा और वे शिवलोक भागे तथा भगवान् शिव के चरणों में गिर गए । भगवान् शिव ने भी उन्ही कारणों को बताते हुए उनकी सहायता करने से मना कर दिया । अंततः थके हारे एवं भागने तथा छुपने का कोई स्थान न पाकर, दुर्वासा मुनि वैकुण्ठ को भागे तथा भगवान् विष्णु के चरणों में गिर पड़े एवं सुरक्षित करने की कामना की । भगवान् ने कहा कि वे सुदर्शन चक्र को वापस नहीं बुला सकते हैं क्योंकि मुनि ने अम्बरीश के साथ गलत व्यवहार किया है जो उनके प्रति निःस्वार्थ प्रेम रखते हैं । भगवान् ने उन्हें अम्बरीश से क्षमा एवं सुरक्षा पाने के लिए सलाह दी । दुर्वासा मुनि के पास सुदर्शन चक्र से निश्चित मृत्यु से एवं स्वयं को सुरक्षित करने के लिए राजा के चरणों में गिरने के अलावा कोई विकल्प नहीं था । राजा अम्बरीश ने कोई क्रोध या द्वेष दुर्वासा के प्रति नहीं रखा । वे ऐसे महान मुनि को अपने जीवन के लिए दौड़ते हुए देख कर करुणा से भर गए । उन्होंने भगवान् विष्णु से सुदर्शन चक्र को वापस बुलाने के लिए और मुनि के जीवन को बचाने के लिए प्रार्थना की ।
ईश्वर के प्रति निःस्वार्थ प्रेम या भक्ति ब्रह्माण्ड में हमें सुरक्षा का सर्वोच्च स्तर प्रदान करती है । जब सर्वोच्च की कृपा हमें आशीर्वाद देती है हम सुदर्शन या अच्छा दर्शन पाते हैं । तब दूसरों का क्रोध, अपमान, अनादर और दुर्व्यवहार हमारे जीवन में कोई स्थान नहीं रखता है । हम सभी के प्रति प्रिय तथा दयावान हो जाते हैं । हम उचित कार्य तथा उचित भाषा बोलने के लिए मार्गदर्शन प्राप्त करते हैं । हम अपने जीवन में प्रचुरता और सर्वोच्च की कृपा प्राप्त करते हैं ।