Amrit Dhara - Dhyanyogi Omdasji

Amrit Dhara - Dhyanyogi Omdasji

शनिवार, 29 जून 2013

निःस्वार्थ समर्पण बनाम क्रोध


ईश्वर के प्रति भक्ति या समर्पण एक व्यक्ति के चरित्र में मधुरता लाता है । ईश्वर प्रेम है । जब हम ईश्वर को अपने सम्पूर्ण  शक्ति तथा अस्तित्व के साथ प्रेम करते हैं, उनका प्रेम हमें परिपूर्ण  कर देता है । ईश्वर एवं गुरु के प्रेम की मधुरता बहुत मनोहर एवं आकर्षण युक्त  होती है । जिन लोगों ने उस प्रेम का स्वाद चखा है वे कभी भी उससे दूर नहीं हटेंगे । जिन लोगों ने ईश्वर के प्रेम की मधुरता को नहीं जाना है वे उस प्रेम को मानवीय सम्बन्धों में ढूंढेंगे । मानवीय सम्बन्धों का प्रेम ईश्वरीय प्रेम का एक प्रतिविम्ब मात्र होता है बल्कि अपेक्षाओं की अपूर्णता से छायांकित होता है । ईश्वर के प्रति प्रेम या भक्ति हमें शक्ति देती हैं और हमें सुरक्षा प्रदान करती है । ब्रह्माण्ड की असीमित शक्ति हमारा समर्थन करती है जब हमारी भक्ति निःस्वार्थ होती है । हमें ईश्वर के प्रति उनके आशीर्वाद एवं उपहारों के लिए जो हमें दिए गए हैं , कृतज्ञ होना चाहिये ।  हमें ईश्वर के प्रति ईश्वर से प्रेम करना चाहिए न कि उपहारों के खातिर जो वे हम पर बरसाते हैं ।
             
क्रोध अहंकार से आता है । जब हमारी अपेक्षाएं पूर्ण नहीं होती हैं एवं एक व्यक्ति को महत्त्व नहीं दिया जाता है, वह क्रोधित हो जाता है । जब एक व्यक्ति के जीवन के समानुपातों  के अपेक्षाकृत अधिक विशालता के लिए जीवन में घटित सभी घटनाओं का आनन्द लेता है , वह स्वयं को महान के रूप में चित्रित करना चाहता है । वह छोटी-2  घटनाओं को जीवन के अपेक्षाकृत अधिक विशाल बना देता है और क्रोधित हो जाता है तथा अहंकार एवं अनुचित आत्म महत्व से भर जाता है । वह बिना कारण उपेक्षित एवं अपमानित महसूस करता है और उसका क्रोध असीम हो जाता है । यह अंततः केवल उसे ही क्षति पहुंचाता है । भागवत पुराण की इस कथा को समझिये :
                                
राजा अम्बरीश श्रीराम के वंश के थे । वे भगवान विष्णु के महान भक्त थे । वे सत्यवादी एवं एक अच्छे राजा थे । उन्होंने एक यज्ञ का आयोजन किया एवं अपनी पूजा से भगवान् विष्णु को प्रसन्न किया । भगवान् ने उन्हें अपने सुदर्शन चक्र से सुरक्षित रहने का आशीर्वाद दिया (अतुलनीय सटीकता तथा आभासित पैनापन के साथ गोलाकार के रूप में एक हथियार ) । सुदर्शन का तात्पर्य उचित दृश्य होता है । सुदर्शन के आशीर्वाद या उचित दृश्य ने अम्बरीश के राज्य को शान्ति, सम्रद्धि एवं सुरक्षा से परिपूर्ण कर दिया ।
                                                                                                                   
राजा अम्बरीश ने (द्वादशी) व्रत रखा । इस व्रत में यह अनिवार्य होता है कि राजा एकादशी के दिन उपवास रखे और द्वादशी तिथि को उपवास तोड़े तथा समस्त जन समुदाय को भोजन कराये । किये गए उपवास को तोड़ने के समय, दुर्वासा मुनि आये एवं उनका ससम्मान राजशाही स्वागत किया गया । राजा ने उपवास तोड़ने के उपरान्त उनके आतिथ्य को स्वीकारने के लिए कहा । दुर्वासा मुनि सहमत हो गए और राजा से कहा कि वे उनकी तब तक प्रतीक्षा करें जब तक कि  वह स्नान करके वापस न आ जाये , उपवास तोड़ने का शुभ दिन व्यतीत हो गया परन्तु दुर्वासा ऋषि वापस न आये । । राजा जल अथवा भोजन को  ग्रहण नहीं कर सकते थे बिना अपने सम्मानित अतिथि को भोजन कराये । ऋषि वशिष्ठ जो सभा में सम्मानित ऋषि थे , राजा को सलाह दी कि वे अपने उपवास को तुलसी की पत्ती तथा एक चम्मच पानी को ग्रहण करके तोड़ सकते हैं जो पूजा में भगवान् विष्णु को समर्पित किया गया है । राजा ने इस प्रकार से उचित समय पर अपने उपवास को तोडा एवं अपने अतिथि की भोजन कराने के लिए प्रतीक्षा की ।
                                                     
दुर्वासा मुनि अपने त्वरित आवेश तथा क्रोध के लिए प्रसिद्द थे । जिस समय राजा अम्बरीश ने उपवास को तोड़ा ठीक उसी समय वे आये तथा बहुत क्रोधित हुए । उन्होंने अपमानित महसूस किया कि राजा ने उनके आने की प्रतीक्षा नहीं की । उन्होंने महसूस किया कि तुलसी का पत्ता और जल राजा द्वारा ग्रहण करना भोजन करने के समान होता है । बिना अपने अतिथि को भोजन कराये राजा ने कुछ भी ग्रहण नहीं किया था । राजा भला उनके जैसे महान साधु का कैसे अपमान कर सकते थे । राजा के समस्त व्रत्तांत अनसुने कर दिए गए । क्रोध में दुर्वासा मुनि ने एक बाल को तोडा एवं उससे एक दानव का निर्माण किया । उन्होंने दानव को राजा को मारने का आदेश दिया । राजा ने साधारण रूप में अपने हाँथ जोड़े तथा मन्दिर में भगवान् विष्णु की मूर्ति के सामने समर्पित हो कर बैठ गए । सुदर्शन चक्र मूर्ति से घूमता हुआ निकला और दानव पर आक्रमण कर दिया एवं उसे मार डाला। तब चक्र ने दुर्वासा मुनि को मारने के लिए उनका पीछा करना आरम्भ कर दिया । वे भागे तथा छिपने का प्रयास किया परन्तु चक्र ने उनका लगातार पीछा किया । वे जायें तो कहाँ जायें । इसलिए वे ब्रह्म लोक भागे एवं भगवान् ब्रह्मा से सुरक्षित करने की याचना की । भगवान् ब्रह्मा ने उन्हें सुरक्षित करने से मना कर दिया । उन्होंने कहा कि मुनि ने भगवान् विष्णु को नाराज किया है इसलिए वे उनको नहीं बचा सकते हैं । चक्र ने लगातार मुनि का पीछा करना जारी रखा और वे  शिवलोक भागे तथा भगवान् शिव के चरणों में गिर गए । भगवान् शिव ने भी उन्ही कारणों को बताते हुए उनकी सहायता करने से मना कर दिया । अंततः थके हारे एवं भागने तथा छुपने का कोई स्थान न पाकर, दुर्वासा मुनि वैकुण्ठ को भागे तथा भगवान् विष्णु के चरणों में गिर पड़े एवं सुरक्षित करने की कामना की । भगवान् ने कहा कि वे सुदर्शन चक्र को वापस नहीं बुला सकते हैं क्योंकि मुनि ने अम्बरीश के साथ गलत व्यवहार किया है जो उनके प्रति निःस्वार्थ प्रेम रखते हैं । भगवान् ने उन्हें अम्बरीश से क्षमा एवं सुरक्षा पाने के लिए सलाह दी । दुर्वासा मुनि के पास सुदर्शन चक्र से निश्चित मृत्यु से एवं स्वयं को सुरक्षित करने के लिए राजा  के चरणों में गिरने के अलावा कोई विकल्प नहीं था । राजा  अम्बरीश ने कोई क्रोध या द्वेष दुर्वासा के प्रति नहीं रखा । वे ऐसे महान मुनि को अपने जीवन के लिए दौड़ते हुए देख कर करुणा से भर गए । उन्होंने भगवान् विष्णु से सुदर्शन चक्र को वापस बुलाने के लिए और मुनि के जीवन को बचाने के लिए प्रार्थना की ।
                                                                                  
ईश्वर के प्रति निःस्वार्थ प्रेम या भक्ति ब्रह्माण्ड में हमें सुरक्षा का सर्वोच्च स्तर प्रदान करती है । जब सर्वोच्च की कृपा हमें आशीर्वाद देती है हम सुदर्शन या अच्छा दर्शन पाते हैं । तब दूसरों का क्रोध, अपमान, अनादर और दुर्व्यवहार हमारे जीवन में कोई स्थान नहीं रखता है । हम सभी के प्रति प्रिय तथा दयावान हो जाते हैं । हम उचित कार्य तथा उचित भाषा बोलने के लिए मार्गदर्शन प्राप्त करते हैं । हम अपने जीवन में प्रचुरता और सर्वोच्च की कृपा प्राप्त करते हैं ।


गुरुवार, 20 जून 2013

क्रोध पर कैसे नियंत्रण पाया जाए

क्रोध तब आता है जब जीवन में हमारी अपेक्षाएं पूर्ण नहीं होती हैं । हम क्रोध से तब उत्तेजित होते हैं जब हम अनुभव करते हैं कि हम दूसरे  व्यक्ति द्वारा गलत ठहराए गए हैं, जब हम अनुभव करते हैं कि हमारे साथ अन्याय किया गया है । हम अपेक्षाओं के साथ कार्य करते हैं एवं प्रशंसा के माध्यम से पुरस्कृत होने की आशा करते हैं । जब हमें ऐसा नहीं मिलता है हम क्रोधित होते हैं । हमारी कमजोरियां हमें क्रोधित करती हैं । दूसरे व्यक्ति हमारी कमजोरियों का लाभ उठाते हैं और हम स्वयं को रोकने में सक्षम नहीं होते हैं । क्रोध हमारे अन्दर उबलता है और हम या तो उसे अपने अन्दर दबाये रखते हैं या हम उस व्यक्ति पर प्रहार करते हैं जो हमसे कमज़ोर होता है । हम क्रोध का प्रयोग करते हैं अपने द्वारा की गई गलतियों या व्यसनों को उचित ठहराने के लिए जो हमें अपने वश में किये हुए है । अधिकांशतः, क्रोध और धमकी कमजोरियों को गुप्त रखती हैं । जब हम वास्विकता से अनभिज्ञ होते है और हम लोगों या परिस्थितियों के प्रति गुमराह होते हैं, हम स्वयं में क्रोध और शोक का कारण होते हैं । दूसरों की पीड़ा पर वास्तविक क्रोध एक महान शक्ति होता है जिसने एक साधारण मोहनदास को महात्मा- राष्ट्रपिता बनाया । लेकिन ऐसे क्रोध दुर्लभ होते हैं । हम अपने जीवन के अधिकांश हिस्से को असंतोष और आवेग के तुच्छ भंवर में फंसा देते हैं और स्वयं को दु:खदाई बनाते हैं और अपने आस पास के दूसरों के जीवन को मनहूस बनाते हैं । 
                                                                                                                                   
हम जानते हैं कि क्रोध अच्छा नहीं होता है और हमें क्रोधित नहीं होना चाहिए । क्रोध हमारे शरीर एवं मस्तिष्क को क्षति पहुंचाता है । यह हमारी विचारधारा एवं भाषा को दूषित कर देता है । हमलोग तर्क शक्ति, तथ्य परक समझ और न्याय की समझ को खो देते हैं जब हम क्रोधित होते हैं । विचारधाराओं में कोई संतुलन नहीं रहता है । हमारे द्रष्टिकोण में प्रत्येक बात असमंजसपूर्ण बनी रहती है । यह खतरनाक होता है क्योंकि जीवन असमंजस की छाया - दूसरों के अपेक्षाकृत कुछ अधिक धुंधली  होती है । हम कटाक्ष करते हैं जो हमें नहीं करना चाहिए और दूसरों को ठेस नहीं पहुँचाना चाहिये । क्रोध में हम वह कार्य करते हैं जो हमें नहीं करना चाहिए । हम स्वयं एवं दूसरों का अथाह नुकसान करते हैं । बाद में हम पश्चाताप करते हैं लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है । शब्द जो घाव का कारण होते हैं, उन पर कोई समुचित उपचार नहीं होता है । वे (घाव ) हमारे अन्दर बहुत समय तक बने रहते हैं । ऐसे बनाये हुए दुःख, क्रोध तथा बदले के क्रियाकलापों को अतिरिक्त बल देते हैं और दुश्चक्रों का अभी अंत नहीं होता है । 
                                                                                                                                          
हम क्रोध पर कैसे नियंत्रण कर सकते हैं ?अपने क्रोध के कारण को समझें । अपने क्रोध के विरुद्ध सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाएं । अपने कार्य के फलों को ईश्वर एवं गुरु को समर्पित कर दें एवं जो आपके रास्ते में आये दैवीय उपहार की तरह पुरस्कार के रूप में स्वीकार करें । बिना अपेक्षाओं के जीवन जियें । राई के पहाड़ सरीके अहंकार का निर्माण न होने दें । इस बात को समझें कि पृथ्वी आपके चारों ओर नहीं घूमती है बल्कि सूर्य के चारों और घूमती है । इस बात को समझे कि आप इस ब्रह्माण्डीय नाटक का एक हिस्सा मात्र हैं और आप यहाँ सबके लिए प्रिय, दयावान, और सहायक होने के लिए आये हैं  । आप इस एक सांसारिक नियम पर दिव्य प्राणी हो और मात्र एक वह प्राणी नहीं जो क्रोध एवं दुखों में घिरे हुए अपने जीवन को व्यतीत करते है । 
                                                       
एक मजबूत अभिप्राय बनाइये कि शब्दों द्वारा किसी को आहत नहीं करना है । प्रार्थना में महान शक्ति होती है । ईश्वर और गुरु से प्रार्थना करें कि आपको अपनी भाषा में मधुर एवं सत्यवादी होना चाहिए और यह कि आपके शब्द दूसरों को सांत्वना एवं आराम देने वाले होने चाहिए न कि किसी को कष्ट पहुंचाने वाले । सीता राम मंत्र का जाप नियमित करें । यदि आप मंत्र के साथ नियमित साधना करते हैं तो आप महसूस करेंगे कि एक बदलाव आपके अन्दर स्थान ले रहा है । जब आपका क्रोध प्रकट होता है तथा आप प्रतिक्रिया करते हैं । उस समय के मध्य में कुछ क्षणों का एक अंतराल होता है । उस अन्तराल में अन्तरआत्मा की समझदार आवाज़ आपको बोध कराएगी एवं आपको शान्त होने के लिए कहेगी । सीता राम की तरंगें इतनी मजबूत और शक्तिशाली होती हैं कि वे इस आवाज़ को जोर से गुंजायमान करने के लिए एवं उसे आपको सुनने के लिए तथा बल देने के लिए सशक्त बनाती है । सीता राम मंत्र आपको क्रोध पर काबू पाने की शक्ति देता है और उसे जारी रहने देता है । सीता राम मंत्र मस्तिष्क एवं सम्पूर्ण प्रणाली को क्षतिग्रस्त करने के लिए क्रोध की तरंगों की आज्ञा नहीं देगा । वास्तव में क्रोध की तरंगें सीता राम द्वारा परिवर्तित हो जाती हैं । क्रोध की तरंगें सीता राम से एकाकार हो जाती हैं एवं वे शरीर के सभी हिस्सों में शरीर को स्वस्थ करते हुए तथा उसे कल्याणकारी बनाते हुए अन्दर की ओर प्रवाहित होने लगती हैं । क्रोध का बल तथा शक्ति सीता राम मंत्र की तरंगों द्वारा परिवर्तित होता जाती है और यह नवीन उर्जा आपके स्वास्थ्य को वर्धित करेगी, आपको शक्ति एवं दिशा निर्देश कार्य तथा आपके जीवन में क्रांतिकारी बदलाव के लिए प्रदान करेगी । 
                                                                         
क्रोध पर नियंत्रण पाने में कुछ भी उतना प्रभावकारी नहीं  होता है जितना कि सीता राम मंत्र की तरंगें । एक बार भी कभी जाप को न छोड़े । सीता राम मंत्र का नियमित जाप और अधिक करने का अवसर प्राप्त करें । एक समय आता है जब आपका क्रोध कुछ क्षणों में बिखर कर नष्ट हो जाता है और तब आप समझदार एवं संतुलित हो जाते हैं । तब सीता राम मंत्र की पूरी शक्ति प्रत्यक्ष  रूप से आपके स्वास्थ्य, कल्याण तथा बदलाव के लिए क्रोध के कारणों पर काबू पाने के लिए प्रभावकारी  होने के बावजूद उपयोगिता प्राप्त करेगी । 


शनिवार, 15 जून 2013

मकर संक्रान्ति

आज मकर संक्रान्ति का उत्सव है । यह उत्सव सूर्य की स्थिति पर आधारित होता है न कि चन्द्रमा पर । सामान्यतः भारतवर्ष में सभी उत्सव चन्द्र वर्णनावाली  पर आधारित होते हैं । इस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है क्योंकि यह ब्रह्माण्ड में अपने आकाशीय पथ की यात्रा करता है । यह धार्मिक और एक फसलीय उत्सव होता है । इसके भौतिक एवं अध्यात्मिक मायने भी हैं । 
                                                   
यह दिन दक्षिणायन के अन्त का सूचक होता है - छै महीने की वह अवधि जो देवताओं के लिए रात्रि होती है । इस अवधि के दौरान मृत्यु अशुभ मानी जाती है । मकर संक्रान्ति के दिन से उत्तरायण आरम्भ हो जाता है - छै महीने की वह अवधि जो देवताओं के लिए दिन होती है ।  महाभारत के एक प्रसंग में भीष्म पितामह दक्षिणायन की अवधि के समाप्त होने तथा उत्तरायण के आरम्भ होने की प्रतीक्षा में शर शैया पर लेटे हुए थे, ताकि वे अपना शरीर त्याग सकें । आज वह दिन भी होता है जब गंगा ने राजा भागीरथ का अनुसरण किया और महासागर में प्रवेश किया और उनके शुद्ध जल ने राजा सगर के हजारों पुत्रों को मोक्ष प्रदान किया । इस दिन हज़ारों लोग गंगा सागर में स्वयं के पवित्रीकरण के लिए स्नान करते हैं । इस दिन, संक्रान्ति - एक देवता ने शंकरासुर नामक एक राक्षस को मारा था ।  
                   
मकर संक्रान्ति भारत के अधिकांश भागों में एक फसलीय  उत्सव भी होता है । नये फसलीय चावल ताज़े गन्ने के रस में पकाए जाते हैं और दक्षिण भारत में सूर्य एवं गायों को समर्पित किया जाता है । यह व्यंजन पोंगल कहलाता है । उत्तर भारत में, ताजे फसलीय चावल एवं दालें एक खिचड़ी नामक मसालेदार नमकीन व्यंजन के रूप में बनाई जाती है । महाराष्ट्र एवं आन्ध्रप्रदेश में लोग तिल और गुड़ की बनी हुई मिठाई का आदान प्रदान करते हैं और एक दूसरे से मधुर बोलने का अनुरोध करते हैं । गुजरात में लोग सुबह से शाम तक पतंगे उड़ाते हैं और इन दिनों रात में भी । पंजाबी इस उत्सव को लोहड़ी बुलाते हैं और वे अलाव जलाते हैं और उसमें गन्ना और चावल फेंकते हैं । वे प्रसिद्द नृत्य भांगड़ा भी करते हैं और वे इस उत्सव के लिए तैयार किया गया वैभवशाली भोजन भी करते हैं ।  भारत के अधिकांश राज्य इस उत्सव को अपने विशेष तरीकों प्रथाओं और परम्पराओं से मनाते हैं ।  हर जगह वातावरण में उल्लास एवं आनन्दकारी माहौल होता है । 
                                                                     
मकर शनि ग्रह का प्रतीक होता है । इस दिन सूर्य मकर के प्रतीक शनि राशि में प्रवेश करता है । भारतीय किवदंतियों के अनुसार , शनि ग्रह सूर्य के पुत्र हैं । पिता अपने पुत्र से मिलने के लिए उनके घर जाते हैं । ये दोनों ग्रह पराक्रमी एवं शक्तिशाली होते हैं । इनके आशीर्वाद बहुत शुभ होते हैं । हम सूर्य एवं शनि ग्रह के आशीर्वाद से भौतिक एवं अध्यात्मिक दोनों सफलता प्राप्त करते हैं । इस दिन सूर्य एवं शनि ग्रह की पूजा की जाती है । 
इस दिन सुबह से शाम तक वातावरण में दिव्य चेतना का संचार होता है । ये अध्यात्मिक ऊँची तरंगें अध्यात्मिक अभ्यास का आशीर्वाद देती हैं । जब हम अपने  नियमित जाप एवं ध्यान को इस दिन करते हैं और अतिरिक्त अभ्यास भी करते हैं, हम अधिक महान परिणामों को प्राप्त करते हैं ।  
गंगा, यमुना, गोदावरी ,कृष्णा ,कावेरी के पवित्र जल में डुबकी लगाना जो इन नदियों के किनारे पर स्थित श्रद्धेय स्थलों पर है " शुभ माना जाता है और ऊँची अध्यात्मिक योग्यता का होता है । लोग इस दिन दान भी देते हैं और मेधावी कर्मों को करते हैं क्योंकि यह फलदायक माना जाता है । 
                                                                                                      
भारत के उत्सवों एवं संसार के उत्सवों की भी उत्पत्ति ब्रह्माण्डीय मार्गों में तारों एवं ग्रहों की स्थिति से होती हैं ।  ब्रह्माण्ड में ग्रहों एवं तारों के बदलाव के कारण जब तरंगों के स्तर में बदलाव होता है, उत्सव मनाये जाते हैं । भोजन, कपड़ों एवं उल्लास के साथ उत्सव मनाने के अलावा लोगों को प्रार्थना करने के लिए , ध्यान के लिए, पवित्र स्थलों के दर्शन के लिये और आकांक्षी को दान के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता है । भारत में, उत्सव लोगों के दैनिक जीवन का अभिन्न एवं नियमित हिस्सा होते हैं । उत्सव हमारे जीवन में पूजा एवं कृपा के सुनहरे  किस्मों के साथ उत्सव मनाने की रंग बिरंगी किस्मों से जुड़ते हैं । आओ हम लोग एक धन्यवाद की भावना के साथ उत्सव मनायें ।

बुधवार, 12 जून 2013

भाषा की मिठास का आशीर्वाद


सत्यम वाद - मधुरम  वाद - ये वेदों की उक्तियाँ हैं । सत्य बोलिए लेकिन मधुरता से बोलिए । जब आप बोलें अपनी भाषा में विनम्रता एवं सम्मान रखें । हम बिना दूसरों को कष्ट पहुँचाये सत्य बोल सकते है । इन दिनों हम लोग दूसरों को कष्ट पहुँचाने के लिए भाषा का प्रयोग एक हथियार के रूप में करते हैं । हम लोग ऐसे शब्द बोलते हैं जो अन्य व्यक्ति के ह्रदय को विदीर्ण कर देगा । तब हम उक्ति पर आरोप लगाते हैं जो बताती है कि सत्य बोलिए और इसलिए कि ईश्वर सत्य है । हमलोग इसलिये गलत होते हैं क्योंकि हमारा अभिप्राय दूसरों को कष्ट पहुँचाना होता है । भाषा के पीछे का अभिप्राय सत्य को प्रकट करना नहीं होता है बल्कि दूसरों को कष्ट पहुँचाना होता है । सत्य के पीड़ाजनक भागों को भी सम्मान एवं मधुरता से बोला जा सकता है और इससे दूसरों को कष्ट नहीं होगा । ऐसी भाषा दूसरों की उनकी गलतियों को समझने में और उनके व्यवहार को बदलने में सहायता करेगी । ऐसे शब्द कीमत रखते है क्योंकि वे एक व्यक्ति की ज्ञानरूपी प्रकाश को देखने और स्वयं को परिवर्तित करने में सहायता करते हैं । 

जब कोई दूसरों के लिए मधुरता और सम्मान से सत्य बोलता है - शरीर एक मन्दिर हो जाता है और उस मन्दिर में ईश्वर निवास करते हैं । जो लोग इस उक्ति का पालन करते हैं, वे निराली शक्ति एवं आकर्षण रखते हैं - एक प्रतिभा  जो दूसरों को उनकी ओर  आकर्षित करती है । यही सत्य एवं मधुरता की शक्ति है । ईश्वर जो प्रेम एवं सत्य का स्वरुप होते हैं, उनके अन्दर निवास करते हैं । और ईश्वर की आभा उनके चेहरे पर और उनसे चमकती है । 
                                                                 
मैं एक घटना का वर्णन करता हूँ जो मेरे जीवन में घटित हुई जिससे यह सत्य प्रतिविम्बित होता है । ध्यानयोगी मधुसूदनदास जी के अमेरिका से भारत वापस आने के पश्चात, वे अपने आश्रम नहीं रहे । उन्होंने एक शिष्य तथा उसके परिवार के निवास स्थल पर 10x10 फुट के एक छोटे से कमरे को रहने के लिए चुना । उसके बाद उन्होंने मुझे आश्रम में एक शानदार जन समारोह में अपना गादीपति चुना और बनाया । मैंने आश्रम में अपना निवास स्थल बनाया । मैंने ध्यानयोगी मधुसूदनदास जी को आश्रम में आने एवं ठहरने के लिए आमंत्रित किया । उन्होंने मेरे प्रस्ताव को ठुकरा दिया । उन्होंने उत्तर दिया कि वे परिवार के व्यवहार के कारण एक छोटे कक्ष और एक छोटे फ्लैट में उस परिवार के साथ ठहरने का आनन्द ले रहे हैं | वे एक दूसरे  के साथ पूर्णतयः संगठित थे और एक दूसरे  के साथ प्यार एवं सम्मान के साथ बोलते थे । परिवार में कोई अभद्र भाषा, चिल्लाहट , कुतर्क नहीं था । प्यार सम्मान और मधुरता का रिसाव पारिवारिक वातावरण पर होता था । वे उसी प्यार एवं सम्मान के साथ अपने गुरु की सेवा करते थे । सम्पूर्ण परिवार उपासना और श्रद्धा के साथ उनकी देखभाल करता था । उन्होंने कहा कि यह पृथ्वी पर एक स्वर्ग की तरह है और वे इस प्यार के मन्दिर को छोड़ना नहीं चाहते हैं । इसलिए वे उस फ़्लैट और उस कमरे में जीवन के अन्तिम समय तक रहे । 
                                                
गुरु एवं ईश्वर उस घर में निवास करेंगे जहाँ सदस्य प्यार एवं सम्मान एक दूसरे  के प्रति रखेंगे और उसे अपने भाषा एवं व्यवहार में प्रदर्शित करेंगे । ऐसा  घर ईश्वर के निवास का एक भौतिक मन्दिर होता है । जब हम अपने शरीर को मधुरता एवं सत्य के एक मन्दिर में बदलते हैं , गुरु एवं ईश्वर भी हमारे ह्रदय में निवास करेंगे । हमारे ह्रदय में सर्वोच्च शक्ति का प्रकटीकरण हमारे जीवन में आभासित होगा और हमारे चारों और हर जगह प्रकट होगा । अपने भौतिक शरीर को पवित्रतम स्थल में बदलना और रूपांतरित करना हमारे हाँथ में होता है जिसमें गुरु एवं ईश्वर रहने के लिए स्थापित होते हैं । 


शुक्रवार, 7 जून 2013

सत्य सदैव रहता है


सत्य सदैव है और सत्य ईश्वर है । यह संसार के सभी धर्मों द्वारा घोषित किया जा चुका है । सत्य स्वयं द्वारा प्रमाणित होता है और वह प्रकाशित होता है ।  इस प्रकार कोई मुश्किल से ही इसे छुपाने या अस्पष्ट करने का प्रयास कर सकता है । सत्य सदैव स्वयं में अन्त तक प्रकट होता है । सत्य की सदैव विजय होती है । 
                                                                               
आदि अनादि काल से महान गुरूओं, साधुओं और अवतारों ने ज्ञान देने के लिए और सत्य का पाठ पढ़ाने के लिए जन्म लिया है । आदि अनादि काल से वे घोषित किये गए हैं । सदैव ही कुछ जन समुदाय होगा जो ज्ञान को अस्पष्ट करेगा और सत्य को छिपाएगा । ईसा महान अध्यापक और गुरु थे और उन्होंने लोगों को ज्ञान दिया और ईश्वर के बारे में सत्य को घोषित किया । ऐसा करने के कारण , उन्हें शूली पर चढ़ा दिया गया । उन दिनों के अज्ञानी और बुरे लोगों ने यह दिखाना चाहा कि यदि वे वास्तव में ईश्वर के बेटे हैं तो क्या वे मृत्यु को प्राप्त होंगे यदि उन्हें शूली पर लटका दिया जाए । ईसा  ने स्वयं को पुनर्जीवित किया और संसार को दिखाया कि  वे वास्तव में ईश्वर  की संतान हैं और यह कि वे और उनके पिता ( ईश्वर ) एक हैं । 
                                                
जब तक कि मनुष्य परम ज्ञान नहीं प्राप्त करता है और सर्वोच्च सत्य के बारे में नहीं सीखता है और उसे अनुभव नहीं करता है, उसके जीवन का उद्देश्य अधूरा होता है । आदि अनादि काल से ईश्वर ने अपना प्रतीक गुरु के रूप में सर्वोच्च सत्य के बारे में मानव को पाठ पढ़ाने के लिए भेजा है । गुरु ने ईश्वर के बारे में सर्वोच्च सत्य को जाना एवं महसूस किया है और वे इस सत्य को सिखाते हैं और इस ज्ञान को मानव समाज को देते हैं । अध्यात्मिक अभ्यास सिखाये जाते हैं और विद्यार्थी उनका लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अनुसरण करते हैं केवल गुरु द्वारा सिखाया गया तकनीकों एवं परम्पराओं का अनुशासित एवं नियमित अभ्यास ही विद्यार्थी की परम सत्य एवं ज्ञान के लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायता करेगा । 
                                      
आदमी काम करता है और धन, शक्ति, पद, प्रतिष्ठा अर्जित करता है । वह सम्पत्ति और वस्तुयें एकत्रित करता है ।  वह परिवार और मित्र रखता है । फिर भी वह सदैव अप्रसन्न रहता है और अनुभव करता है कि कुछ जीवन में अधूरापन है । वह और अधिक सम्पत्ति , धन और शक्ति के रूप में प्रसन्नता को खोजता है । जब तक कि वह सर्वॊच्च सत्य को जानता और आत्मसात नहीं करता है वह सदैव अप्रसन्न एवं अधूरा बना रहेगा । 

बुधवार, 5 जून 2013

गुरु भक्ति के पुरस्कार

 जब एक शिष्य आस्था और विश्वास से अपने गुरु की आज्ञा मानता है और उनकी सेवा करता है, आशीर्वाद जो गुरु से पुरस्कार के रूप में बहता है, प्रचण्ड  और जीवन परिवर्तित करने वाला होता है । यह प्रसंग एक बहुत प्रसिद्ध गुरु के एक शिष्य के बारे में है जो अपने स्वामी के लिए महान प्रेम रखते थे और नि:संदेह उनकी सेवा करते थे । यह गुरु की कृपा से शिष्य के परिवर्तित होने का एक पूर्ण उदाहरण है । 
                                
आदि शंकरा भारत के महानतम गुरुओं में से एक हैं । वह भगवान् शिव के एक प्रतीक अवतार के रूप में माने जाते हैं । आदि शंकरा हिन्दू दर्शन और धर्म के सुधार के लिए पैदा हुए थे । शंकरा के चार शिष्य थे - सुरेश्वर आचार्य, पदमापदा, हस्तमालका  और त्राटकाचार्य । यह कहानी पदमापदा की है ।
पदमापदा का वास्तविक नाम सदानन्द था । वह शंकरा के पहले शिष्य थे । वह महान गुरु भक्त थे । वह बहुत निष्ठावान और विश्वसनीय  थे और अत्यधिक आज्ञाकारी भी थे । वे दिये गए सभी कामों  को बड़ी प्रसन्नता के साथ करते थे । दूसरे शिष्यों की तुलना में वे थोड़े से बौद्धिक रूप से सुस्त थे । दूसरे शिष्य उनका मजाक उड़ाते थे और कभी-२ अपने हिस्से का कार्य भी उनसे कराते थे । लेकिन वे चुपचाप और प्रसन्नतापूर्वक वह सबकुछ सहते थे । शंकरा सभी घटनाक्रम से अवगत थे और जानते थे कि दूसरे सदानन्द को चिढाते और सताते हैं । उन्होंने अपने आज्ञाकारी विधार्थी की सच्ची कीमत और पूर्ण तन्मयता से की गई गुरु सेवा के आशीर्वाद के  बारे में दूसरों को पाठ पढ़ाने के लिए उचित अवसर की प्रतीक्षा की । 
                                                                                      
एक बार शंकरा और उनके दल ने गंगा नदी के किनारे शिविर लगाया । सदानन्द आदतन कामों  को कर रहे थे । उन्होंने नदी के दूसरे छोर पर गुरु के कपड़ों को धोना सम्पन्न किया । उन्होंने उसको सुखाने के लिए फैलाया और सूखे कपड़ों को एकत्रित करने के लिए और वापस गुरु के पास लाने के लिए प्रतीक्षा कर रहे थे । अचानक एक बाढ़ आई और पानी नदी के किनारे उफनाने लगा । शंकरा सदानन्द के बारे में चिंतित थे । उन्होंने उन्हें तुरंत वापस आने के लिए पुकारा । शीघ्रता से सदानन्द ने सूखे कपड़ों को उठाया और नदी के पानी पर दौड़ पड़े । उन्होंने ध्यान नहीं दिया कि पानी नदी में बढ़ गया है । जब वे गुरु की ओर गंगा के पानी पर दौड़े , उन्होंने गुरु की आवाज के अतिरिक्त किसी बात पर ध्यान नहीं दिया । जैसे ही उन्होंने कदम बढाया, एक कमल उनके पैरों को सहारा देने के लिए पानी की तलहटी से उगा । उनका ध्यान अपने गुरु पर इतना अधिक केन्द्रित था कि उन्होंने अपने पैरों के नीचे कमल के सहारे और स्पर्श को महसूस नहीं किया ।  उन्होंने सुरक्षित नदी को पार किया और अपने गुरु के पास पहुँच गए । वे सभी जिन्होंने इस दुर्लभ भक्ति की उपलब्धि को देखा, उस चमत्कार से स्तब्ध थे जो ठीक अभी घटित हुआ था । 
                                                                             
जब सदानन्द ने अपने गुरु को प्रणाम किया और उन्हें सूखे कपड़े दिए, गुरु ने उनसे पूछा कि कैसे उन्होंने बाढ़ युक्त नदी को पार किया । सदानन्द फिर भी नदी में कमलों को देखने के लिए नहीं मुड़े । उन्होंने उत्तर दिया कि केवल गुरु के नाम का स्मरण ने उनकी भौतिक संसार के महासागर को पार करने में सहायता की। मात्र नदी को पार करना सरल था । तब शंकरा ने उन्हें कमलदलों को दिखाया जो उनके पैरों को सहारा देने के लिए उग आये थे जैसे ही वे नदी पर चले थे। शंकरा ने उन्हें आशीर्वाद दिया और और उनका नाम पदमापदा रखा । (पदम् का तात्पर्य कमल होता है , पद का तात्पर्य पैर ) गुरु का आशीर्वाद पदमापदा में ईश्वरीय ज्ञान और विज्ञान सहित प्रवाहित हो गया । उनका आन्तिरिक परिवर्तन अचरज था । वे शंकरा के सबसे चतुर शिष्य हुए । उन्होंने " प्रजानाम ब्रह्म " नामक एक महान निबन्ध लिखा जिसका आशय ब्राह्मण ज्ञानवान होता है । वे भारत के पूर्वी भाग में गोवर्धन मठ के शीर्ष पदाधिकारी नियुक्त किये गए ।                    
                                                                                                             
गुरु के प्रति गहरा समर्पण और प्रसन्नतापूर्वक की गयी गुरु सेवा ने सुस्त सदानन्द को आशीर्वाद प्रदान किया  और वे पदमापदा हो गए ।  परमगुरु पारसमणि के अपेक्षाकृत वास्तव में अधिक महान होते हैं । पारसमणि शीशे अथवा लोहे को सोने में बदल देती है । लेकिन उसका स्पर्श एक दूसरी पारसमणि नहीं बना सकता है । गुरु पारसमणि के अपेक्षाकृत अधिक महान होते है क्योंकि वे अपनी शक्ति और गुणों को शिष्य में स्थानान्तरित करते हैं और एक बुद्धिमान और ज्ञानवान व्यक्ति बनाते हैं ।

रविवार, 2 जून 2013

परम गुरु का अनुसरण

माँ का प्रेम पृथ्वी पर सबसे अधिक ऊँचा होता है । वह अपने बच्चे का शरीर के अन्दर नौ महीने से अधिक  पालन व पोषण करती है और तब उसे जन्म देती है । वह अपने बच्चे को अपने दूध से आहार देती है और उसकी अत्यधिक देखभाल करती है । बच्चे के लिए माँ का प्यार और बलिदान तब से आरम्भ हो जाता है जब से माँ गर्भ धारण करती है और तब तक जारी रहता है जब तक वह अपना शरीर नहीं छोड़ देती है । माना गया या वास्तविक है कि  किसी भी खतरे से अपने बच्चे  को बचाने के लिए माँ अपना जीवन आसानी से त्याग देगी । माँ ईश्वरत्व के रूप में श्रद्धेय है, क्योंकि वह ईश्वर की तरह अपने बच्चे को जन्म देती है, पालन, पोषण और रक्षा करती है । ईश्वर भी ब्रह्माण्ड को जन्म देते हैं और पालन पोषण करते हैं । माँ बच्चे की देखभाल करने के लिए भरसक संघर्ष करती है और उसकी रक्षा करती है जब तक वह जीवित रहती है । अपने बच्चे के प्रति जबरदस्त प्रेम के बावजूद, इस बात का कोई आश्वासन नहीं होता है कि वह पुनः उसकी माँ बनेगी । माँ की मृत्यु के बाद, कर्म के सिद्धांत माँ को अपने बच्चों से दूर ले जा सकते हैं और उसे ब्रह्माण्ड में दूसरी कही जगह स्थान दे सकते हैं । 
                                                                              
परम गुरु माँ की तरह होते हैं । वे शिष्य का पालन पोषण एवं देखभाल करते हैं । परमगुरु एक बहुत महत्वपूर्ण मार्ग में माँ से भिन्न होते हैं । जब एक शिष्य गुरु भक्त  होता है और अपने गुरु से प्रेम करता है, परमगुरु अपने शिष्य की इस जीवन में तथा सभी दूसरे जीवनों में भी देखभाल करते हैं । परमगुरु शरीर नहीं होते हैं । वे सर्वोच्च दिव्य प्रकृति का सिद्धान्त  होते हैं जो स्वयं को किसी समय पञ्च तत्वों या अपने संयोजनों से स्पष्ट करता है । परम गुरु शिष्य के सम्पूर्ण जीवन में उसके वर्तमान शरीर में और मृत्यु के बाद उसके आगामी शरीरों में भी उसके साथ होते हैं और उसको सर्वोच्च के लिए मार्ग दर्शन देते हैं । शिष्य को परम गुरु के प्रति प्रेम से परिपूर्ण होना चाहिए और व्यवस्थित ढंग से रहना चाहिये जो उसको सहायता देने में परमगुरु को सहायता देता है । 
                             
इस कहानी को समझिये । एक नदी में कई मछलियाँ थीं । कुछ छोटी और कुछ विशाल थीं । वे विविध प्रकार के तरीकों,रंगों,विशेषताओं और गुणों की थीं । इन मछलियों के बीच में एक विशाल मछली रहती थी जो सदैव मछुआरे के आक्रमण से जीवित बच  जाती थी जो नदी पर मछली का शिकार करने के  लिए और अपने जालों को फैलाने के लिए आता था । यह मछली उन मछलियों के बीच में उत्तम नायक मानी जाती थी । एक बार एक छोटी मछली ने उससे पूछा कि उसने अबतक अपने आप को कैसे बचाया है । उत्तम नायक मछली ने उत्तर दिया :- तुम्हे क्रोध, लालच और अनभिज्ञता से मुक्त होना चाहिए ।  प्रत्येक समय मछुआरे मछली पकड़ने के जाल और चारे सहित अन्दर आते हैं , अपने को शिकंजे में लाने के लिए लालची न बनो और चारे को पकड़ने और उसे खाने के लिए मत भागो । यदि तुम ऐसा करती हो , तुम कांटे में फंस जाओगी । जब मछुआरा  जाल फैलाता है , यह मत सोंचो कि  तुम उससे अधिक चतुर हो और जाल से बच सकती हो । यदि तुम ऐसा सोंचती हो और लापरवाह होती हो , वह तुम्हे पकड़ लेगा यदि तुम उसके चारे या प्रलोभन के बहुत निकट हो , स्वयं को उससे बचा के रखो, तुम जाल या मछली पकड़ने के संजाल द्वारा पकड़ी नहीं जाओगी जब वह उसे फैलाता है मैंने इस नियम का अनुसरण किया है और स्वयं को  अब तक मछुआरे की पकड़ से बचाया है । 
       
हमें उत्तम नायक मछली की तरह होना चाहिए । हमें क्रोध, लालच,गर्व,प्रतिशोध एवं आसक्ति के प्रति लालसा से छुटकारा पाना चाहिए । हमें परमगुरु के बताये हुए मार्गों के सदैव निकट होना चाहिए । हमें उनके पीछे चलना चाहिए । तब संसार के प्रलोभन और खतरे हमें नहीं उलझाएंगे । भौतिक संसार के प्रलोभन, निराशावादी  इच्छाएँ, आसक्ति जो हमें उलझाये रख सकती हैं और जन्म एवं मृत्यु के चक्रों में जकड़े रख सकती हैं, यदि हम परम गुरु के बताये हुए मार्गों पर होते हैं और उनकी शिक्षाओं का अनुसरण करते हैं, उक्त चीजें हमें फंसाने के योग्य नहीं होंगी । गुरु के बताये मार्ग पर होना महज एक शारीरिक कार्य नहीं होता है । यह गुरु के अन्दर की सर्वोच्च शक्ति के प्रति मानसिक समर्पण होता है जो हमें उचित ढंग से सर्वोच्च के प्रति मार्गदर्शन देता है । 
                                    
परम गुरु के बताये हुए मार्गों के प्रति समर्पित हो और उनका अनुसरण करो । तब आप इस संसार के बहकावे की सीमाओं एवं जन्म मृत्यु के चक्रों के जाल से सुरक्षित होते हैं ।