Amrit Dhara - Dhyanyogi Omdasji

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बुधवार, 26 मार्च 2014

प्रसन्न कैसे रहा जाये


जब हम स्वयं से पूछते हैं कि हम  जीवन में क्या चाहते हैं ? सदैव उत्तर होता है : मैं प्रसन्न रहना चाहता हूँ । प्रत्येक एकल व्यक्ति प्रसन्न रहना चाहता है । हम सब लोगों के पास जीवन में यथोचित आराम होता है - एक घर, परिवार, सम्बन्ध, एक नौकरी, हमारा नियमित आहार एवं अन्य सुविधाएँ । फिर भी हम लोग स्वयं को अधिकांशतः अप्रसन्न पाते हैं । हमलोग अत्यधिक चिड़चिड़े होते हैं । हमलोग चिल्लाते हैं । हम लोग धैर्य नहीं रखते हैं । हमलोग स्वयं की दूसरों से तुलना करते हैं और सदैव स्वयं को लालसा युक्त पाते हैं । ये चीज़े प्रसन्न व्यक्तियों कि सूचक नहीं होती हैं ।

प्रसन्नता एक  मायावी वस्तु है । हमारी प्रसन्नता परिवेश से सम्बंधित सभी बातों पर निर्भर होती प्रतीत होती है जैसे कि कितनी अच्छी तरह हमारे वस्त्र प्रेस किये गए हैं । जब हम चारों ओर का अवलोकन करते हैं, हम देखते हैं कि धन प्रसन्नता की कुंजी नहीं होती है या अच्छा स्वास्थ्य या एक बड़ा सा घर या द्रुतगामी कार या अत्याधुनिक आईपैड भी नहीं । कुछलोग ऐसे होते हैं जिनके पास सबकुछ होता है और कभी प्रसन्न नहीं रहते हैं । और ऐसे भी कुछ लोग होते हैं जिनके पास अपेक्षाकृत कम भौतिक संसाधन होते हैं एवं फिर भी वे प्रसन्न रहते हैं । अंतर व्यक्तियों के दृष्टिकोण का होता है ।
                
आओ हमलोग अपने जीवन को अपेक्षाकृत अधिक सरल बनायें । प्रत्येक सप्ताह अपने घर के एक हिस्से में दो घण्टे व्यतीत करें एवं अव्यवस्थाओं को समाप्त करें । दान स्वरुप दे जिन्हें  आपको दान के लिए आवश्यकता नहीं होती है । एक स्वच्छ घर प्रसन्नचित्त चेहरों एवं बेहतर जप और ध्यान से बनाया जाता है । अपने लिए घर या कार्य क्ष्रेत्र में जितना सम्भव हो सके काम का बोझ न लादें । इस बात के लिए न कहना सीखें ।
                  
स्वयं को स्वस्थ बनाएं । संतुलित आहार लें । प्रतिदिन तेज़ी से टहलने जाएँ । पर्याप्त घण्टे नींद लें । यह बातें आपको शारीरिक रूप से अच्छी तरह रखेंगी । नकारात्मक न हों । हर समय चिल्लायें नहीं और न ही आलोचना करें । अपने मत या सुझावों को सामान्य रूप से प्रस्तुत करें जो अनुमानित नहीं है । भाषा में मधुरता एवं कोमलता रखें तथा घर पर सभी का सम्मान करें । हमें सम्मान प्राप्त करने के लिए सर्वप्रथम सम्मान देना चाहिए । जब हम प्रसन्नचित्त भी न हों , हमें दूसरों पर अपना क्षोभ नहीं उतारना चाहिए । यदि आप स्वयं को सतर्कता पूर्वक शान्त व प्रसन्नचित्त करने के लिए बल देंगे आप स्वयं को उस मार्ग में प्राप्त करेंगे । यह आपकी घर में मित्रों के साथ तथा कार्यक्षेत्र में अच्छा सम्बन्ध रखने में सहायता करेगा ।
                   
बुरे समाचारों या बुरी द्रश्य घटनाओं पर हर समय ध्यान केंद्रित न करें । बुरी द्रश्य घटनाओं से ध्यान हटा कर रखें और अच्छी किताबें या प्रेरणादायक लेख पढ़ें । ऐसी आदत डालें जो आपको प्रसन्नता देती हो ।
                  
अधिकांश महत्वपूर्ण परिवर्तन जो हमें स्वयं में सराहना करना सीखना होता है जो हमारे पास होता है एवं जीवन में जिससे हमें अत्यधिक सन्तुष्टि मिलती है । इसका यह तात्पर्य कतई नहीं होता है कि हम कठिन परिश्रम न करें । हमें कठिन परिश्रम करना चाहिए और ईश्वर के आशीर्वाद के रूप में अपने प्रयासों के परिणामों को स्वीकार करना चाहिए । प्रशंसा एवं संतोष जो हमें प्रदान किया गया है, हमारे जीवन को प्रसन्न बनाएगा । हमें प्रसन्न होने के परिप्रेक्ष में खोजने की या प्राप्त करने की  या अधिकाधिक पाने की लालसा नहीं रखनी चाहिए । हम अब प्रसन्न रह सकते हैं । आभार उसके लिए जो हमारे पास है एवं संतोष महान शान्ति देता है । हम एक भलाई का सर्वोच्च भाव रखेंगे ।
                    
इस कथा में किसान की पत्नी के जीवन का अवलोकन करें : एक किसान अपनी पत्नी और तीन बच्चों के साथ एक छोटे से गाँव में रहता था । उसका घर छोटा और आरामदायक था और उसके पास पर्याप्त भूमि तथा अच्छा जीवन जीने के लिए उत्पादन था । अचानक एक समस्या के कारण उनके बुजुर्ग माता पिता को उसके साथ रहना पड़ा । चल सामग्री, लोग और स्थान को घर में स्थानान्तरित करना पड़ा और माता पिता के लिए स्थान को पुनः स्थापित करना पड़ा । इसने उसकी पत्नी को अवसादग्रस्त एवं अप्रसन्न कर दिया । कुछ समय बाद वह गाँव के एक बुद्धिमान व्यक्ति के पास गयी और न्याय माँगा । उसने उसकी बातों को सुना और कहा : तुम्हारी समस्या का हल बहुत आसान है । कृपया एक सप्ताह के लिए अपने रहने योग्य कमरे में एक दर्जन मुर्गी रखो ।
                    
महिला आश्चर्यचकित हुई परन्तु उसने आदेशों का पालन किया । मुर्गियां हर समय कुड़कुड़ाती थीं । वे पंख तथा गंदगी रहने वाले कमरे में छोड़ती थीं । उनका भोजन और जल प्रत्येक जगह बिखरा हुआ था । एक सप्ताह बाद महिला तंग हो गयी और बुद्धिमान व्यक्ति के पास गयी । उसने ( बुद्धिमान व्यक्ति ) ने उस महिला से कहा : समाधान अभी पूर्ण नहीं हुआ है । तुम्हें अपने ठहरने वाले कमरे में 6 बकरियाँ और रखनी चाहिए । ऐसा करने के पश्चात्, कृपया मुझे बताओ कि कैसा घटित हुआ ।
                      
लगातार बकरियों का मिमियाना और विष्टा करना, उनकी देह की गंध, भोजन एवं विष्टा प्रत्येक जगह बिखरा हुआ था । और मुर्गियों ने ठहरने वाले कमरे को अपना बसेरा बनाया हुआ था । पुनः एक सप्ताह बाद महिला बुद्धिमान व्यक्ति के पास गयी और शिकायत की । बुद्धिमान व्यक्ति ने कहा केवल एक कार्य और करो और प्रक्रिया संपन्न हो जायेगी । और उसके बाद तुम अधिक प्रसन्न रहोगी । अपने ठहरने वाले कमरे में तीन गाय और रखो । और वैसा ही महिला ने किया ।
                     
ठहरने वाले कमरे में कोलाहल था । गाय, बकरियाँ, मुर्गियाँ प्रत्येक जगह प्रतीत होते थे । मवेशियों का शोर एवं गंध असहनीय थी । एक सप्ताह में ही महिला तंग आ गयी । उसने बुद्धिमान व्यक्ति से समाधान खोजने का मन बनाया तथा अपने ठहरने योग्य कमरे में सभी अव्यव्यस्थाओं और पशुओं से छुटकारा पाने का मन बनाया । वह बुद्धिमान व्यक्ति के पास गयी और शिकायत की : किस प्रकार की सलाह आप मुझे देते हैं ? मेरा जीवन नरक हो गया है । मुझे सभी पशुओं से छुटकारा पाना है । मैं पुनः अपने ठहरने वाले कमरे को स्वच्छ एवं व्यवस्थित करना चाहती हूँ । बुद्धिमान व्यक्ति ने कहा । हाँ कृपया ऐसा करें ।  इससे प्रक्रिया पूर्ण हो जायेगी ।
                    
महिला वापस गयी और सभी मुर्गियों, बकरियों तथा गायों को अपने ठहरने वाले कमरे से हटा दिया । उसने कुछ पुराना कूड़ा भी फेंका । उसने अपने ठहरने वाले कमरे को झाड़ा और स्वच्छ किया तथा उसे सुन्दर बनाया । उसने दूसरे कमरों को भी साफ़ किया । घर स्वच्छ तथा तरोताजा हो गया और वह बहुत प्रसन्न हो गयी । वह बुद्धिमान व्यक्ति के पास गयी और कहा आपके उपचार ने काम किया । मेरा घर विशाल एवं सुन्दर हो गया है और मैं प्रसन्न हूँ ।
                  
बुद्धिमान व्यक्ति मुस्कुराया और उसने कहा : तुम्हारा घर परिवर्तित नहीं हुआ है । वह वैसा ही है । तुमने जो तुम्हारे पास है उसकी सराहना करना सीख लिया है । इसने तुम्हे प्रसन्न तथा संतोषप्रद बनाया है । सराहना उसकी जो हमारे पास है मूल मंत्र (कुंजी) है ।
                       
अंततः हमें अपनी आत्मा का ध्यान रखना चाहिए । इस बात को जानो कि तुम एक शरीर नहीं हो बल्कि एक आत्मा हो । परमानन्द में रहना आत्मा की प्रकृति है । तुम इस परमानन्द को नियमित ध्यान तथा सीता राम मंत्र के जाप से एवं एक परमगुरु की अन्य अध्यात्मिक शिक्षाओं का अनुकरण करके खोल सकते हो ।