पुराने दिनों में, गुरु के शिष्य गुरु के साथ उनके आश्रम में रहते थे । वे अध्यन करते थे तथा गुरु द्वारा उनको दिए गए अन्य काम करते थे । अधिकांश आश्रम आत्मनिर्भर इकाईयां थे । वे दूध के लिए गाय, सब्ज़ी फल एवं फूलों के लिए बगीचे, अग्नि के लिए लकड़ियों को एकत्रित करने के लिए जंगल और अनाजों एवं दालों को उगाने के लिए खेत रखते थे । शिष्य विविध प्रकार के कार्यों को करते थे तथा आश्रम को सुचारु रूप से चलाते थे । उन्हें दिए गए भौतिक कार्य एवं उत्तरदायित्व शिष्यों को शारीरिक रूप से मजबूत तथा निर्भीक एवं मानसिक रूप से परिपक्व भी बनाते थे और उन्हें दिए गए कार्यों को अनुशासित ढंग से करने के योग्य बनाते थे । शिष्यों के बीच में आवंटित किये गए कार्यों के लिए कोई मतभेद नहीं था । वे जीवन में किसी भी पद से आ सकते थे । सभी के साथ समान रूप से व्यवहार होता था ।
शिष्यों में प्रत्यक्ष प्रगति एवं उन्नति के अतिरिक्त एक दूसरा उत्थान होता है जो स्थान लेता है लेकिन सामान्यतः स्पष्ट नहीं होता है । यह तब प्रकट होता है जब कुछ असामान्य घटनाऐं स्थान लेती है । एक शिष्य जो निष्ठावान, प्रिय होता है एवं साहित्य व विद्या के लिए गुरु की उक्तियों का अनुसरण करता है, सूक्ष्म स्तर पर उन्नति करता है । भौतिक शरीर ताज़ी हवा, अच्छे आहार एवं कठोर शारीरिक परिश्रम से फलता फूलता है, मानसिक शरीर का आश्रम में ज्ञानार्जन करने से विकास होता है एवं सूक्ष्म शरीर का उत्थान होता है जब शिष्य गुरु के प्रति असीम प्रेम के साथ कार्य करता है एवं निसंदेह आज्ञाकारी एवं निष्ठावान होता है । समय की अवधि में यह उत्थान सूक्ष्म शरीर को तैयार करता है कि जब गुरु आदेश देता है या आशीर्वाद देता है अचानक एक कायापलट हो जाती है और शिष्य पूर्ण रूप से परिवर्तित हो जाता है । इस घटना को समझें :
ऋषि आयोद धौम्य अपने आश्रम में गायों, बगीचों और खेतों सहित रहते थे । वे प्रसिद्द थे क्योंकि वे धर्मपरायण तथा शक्तिवान थे और अपने शिष्यों की ऐसे देखभाल करते थे जैसे माता अपने बच्चों की देखभाल करती है । आश्रम में उनकी देखरेख में कई शिष्य थे । उन्ही में से एक अरुणि नामक शिष्य था । अरुणि बहुत विनम्र था और अपने गुरु से अत्यधिक प्रेम करता था । वह परिश्रमी था तथा स्वयं को दिए हुए कार्यों को गुरु सेवा के रूप में संपन्न करता था । वह बिना किसी प्रतिउत्तर के गुरु के आदेशों का पालन प्रसन्नतापूर्वक करता था ।
एक बार गुरु ने खेतों की देखभाल हेतु अरुणि को भेजा । जैसे ही अरुणि खेतों पर पहुंचा, बदल घिर आये और बारिश होने लगी । खेतों में तेज़ी से पानी भर गया । खेत के छोरों पर मेढ़ें पानी को पकड़ने में और पानी के बहाव को रोकने में तथा मिटटी के कटाव को रोकने में असमर्थ थी । जैसे ही अरुणि निरीक्षण कर रहा था, उसने देखा कि पानी का उफान बढ़ गया है और मेढ़ के एक छोर में दरार पड़ गयी है । पानी और मिटटी खेतों से बाहर बहुत तेज़ी से बह रही थी । अरुणि भयभीत हो गया कि मिटटी के कटाव के कारण क्षति अत्यधिक भयानक होगी । उसने पानी के बहाव को रोकने कि भरसक कोशिश की । उसने कटाव में कीचड़ और पत्थर को पानी के बहाव को रोकने के लिए रखा । लेकिन यह सब व्यर्थ था । अरुणि ने खेतों की देखभाल करने के गुरु के आदेशों को याद किया । इसलिए उसने स्वयं को अवरोधक के रूप में कटाव में स्थापित किया और बहते हुए पानी को रोक दिया । वह पूरी रात अकड़ा एवं शीतग्रस्त उस स्थान पर पड़ा रहा लेकिन उसने गुरु के खेतों की रक्षा की ।
प्रातः काल जब सभी शिष्य प्रातःकालीन प्रार्थना हेतु एकत्रित हुए, अरुणि उपस्थित नहीं था । गुरु एवं कुछ शिष्य खेत की ओर अरुणि को पुकारते हुए भागे । अरुणि ने सुना कि उसके गुरु उसे बुला रहे हैं और वह ठण्ड से कांपते हुए खड़ा हो गया । गुरु के चरणों को स्पर्श करके उसने पूछा - गुरुदेव मेरे लिए आपका क्या आदेश है ?
गुरु ने चारों ओर देखा और समझ गए कि अरुणि ने खेतों को बचाने के लिए क्या किया है । उनका ह्रदय करुणा से भर गया । प्रेम एवं कृपा गुरु से शिष्य की ओर बहना आरम्भ हो गयी और अरुणि परिवर्तित हो गया । उसे सभी शास्त्रों का स्वतः ज्ञान प्राप्त हो गया । गुरु ने उसे उद्धालक अरुणि का नया नाम दिया ।
अरुणि एक महान विद्वान ऋषि हुए । उन्होंने समाज के कल्याण के लिए कार्य किया । उन्होंने भोजन कराने वाले असंख्य समुदायों को स्थापित किया । उन्होंने वैदिक एवं उपनिवेदिक विचारों को व्यवस्थित किया । यह सबकुछ उनके गुरु के आशीर्वाद के कारण हुआ ।