ज्ञान अध्यन करने से, प्रश्न एवं उत्तर सत्र, व्यवहारिक शिक्षा और अनुभव से अर्जित किया जाता है । ज्ञान विनम्रता देता है । विनम्रता चरित्र और पात्रता विद्यार्थी को देती है । एक योग्य छात्र अपने कार्य से धन प्राप्त करता है । धन से जीवन में धर्म का कार्य करना चाहिए । और जब एक व्यक्ति धर्म के साथ जीता है वह प्रसन्नता में रहता है । और हम सब प्रसन्नता में जीने की कामना करते हैं । ज्ञान हमें आशीर्वाद का पुलिंदा प्रदान करता है जो भली भांति हमारे भौतिक जीवन को जीने में हमारी सहायता करता है । वेदों एवं अन्य पवित्र ग्रंथों का ज्ञान विद्यार्थियों को सभी उपरोक्त आशीर्वाद प्रदान करता है और आत्म साक्षात्कार का मार्ग भी दिखाता है।
केवल किताबी ज्ञान या सैद्धान्तिक ज्ञान का कोई उपयोग नहीं होता है । ज्ञान अनुभव के माध्यम से भलीभाँति होना चाहिए । ज्ञान का पूर्ण आशीर्वाद भी हमलोगों के लिए उपयोगी नहीं होता है । हम अपने चारों ओर लोगों में अभिमान देखते हैं जब वे उच्च शिक्षा प्राप्त कर लेते हैं | पण्डितों/पुजारियों और धार्मिक वक्ताओं ने पवित्र ग्रंथों की बिना रत्ती भर के आंतरिक ज्ञान के व्याख्या की है । ऐसे लोग कविताओं को उदाहरणार्थ प्रस्तुत करते हैं , शब्दों को बिना उन्हें भलीभाँति समझे हुए सुनाते हैं और यह अहंकार को बढ़ाने का कार्य करता है । अहंकार अपने तर्कों को अधिक श्रेष्ठ सिद्ध करना और दिग्भ्रमित करना उचित ज्ञान से परे ले जाने के लिए पसंद करता है । ऐसे लोग दूसरों को कुशलता से बरगलातें हैं एवं उनपर हावी होते हैं और उनमे डर पैदा करते हैं । ज्ञान को अर्जित करने का सही द्रष्टिकोण और उसके उपयोग का उचित ढंग शिष्यों में आरम्भ से डाला जाना चाहिए ।
तीन वर्ष की छोटी उम्र में एक व्यवस्थित पाठ्यक्रम एक वो शिष्य तैयार करता है जो बीस वर्ष से अधिक आयु तक उच्च श्रेणी के ज्ञान को अर्जित करने के लिए नियमित रूप से कठोर परिश्रम करता है । चारों वेदों के आचार्यत्व को पाने की आवश्यकता का मानसिक द्रष्टिकोण एवं तैयारी का स्तर अत्यधिक उच्च एवं कठिन है । चारों वेदों में से प्रत्येक कई हज़ार पदों को रखते हैं एवं जो काल के दिनों में श्रवण करने एवं रटने से सीखे गए थे ।
एक दिव्य आत्मा से चारों वेदों पर आचार्यत्व प्राप्त करना अल्प अवधि में एक अत्यधिक असंभव कार्य है । ऐसे कार्य केवल तभी संभव होते हैं जहाँ एक शिष्य अपनी ग्रहणशीलता को उचित ढंग से जीवन व्यतीत करने से, गुरु सेवा और ईश्वर के पवित्र नाम का स्मरण करने से तैयार करता है एवं गुरु तथा देवत्व द्वारा आशिर्वादित होता है । यह एक ऐसे शिष्य सत्यकाम एवं उसके गुरु गौतम की कथा है -
महान साधु गौतम के आश्रम में कई शिष्य थे । वे आश्रम की आवश्यकता हेतु दूध एवं मक्खन उपलब्ध कराने के लिए कई गाय भी रखते थे । एक बार सूखे के कारण गायों को पीने हेतु जल तथा खाने की घास के लिए अत्यधिक कष्ट सहना पड़ा । गुरु ने प्रार्थना की कि उनके शिष्यों में से एक गायों को सुदूर घाटी में ले जाने के लिए अपने आपको प्रस्तुत करे और वहां तब तक ठहरे जब तक कि सूखा समाप्त न हो जाए और तब गायों सहित वापस आ जाए । कोई भी विद्यार्थी आश्रम के आराम को छोड़ने के लिए एवं गायों के बीच में अनजान भूमि में सुदूर रहने के लिए तैयार नहीं हुआ । उनमें से किसी ने सिवाय सत्यकाम के इस कार्य को करने हेतु स्वयं को प्रस्तुत नहीं किया । गुरु ने लड़के को आशीर्वाद दिया और ४०० गायों सहित उसे भेजा तथा निर्देश दिया कि जब मवेशी कुल संख्या में १००० हो जाएँ, वह आश्रम आ जाये ।
सत्यकाम हरी भरी घाटी में पशुओं को सुरक्षित ले गया । वह प्रातः काल जाग जाता था स्नान करता था एवं सूर्य देवता की पूजा अर्चना करता था । और अपनी प्रार्थना का वर्णन करता था । पूरे दिन वह गायों की देखभाल करता था तथा ईश्वर के नाम का जाप करता था । उसने गायों की सेवा को ईश्वर तथा गुरु की सेवा के रूप में की | उसने कभी अकेला महसूस नहीं किया और वह मानसिक रूप से गुरु और ईश्वर के साथ रहता था | पवित्र तरंगें जो उससे निकलती थीं, ने देवताओं के राजा इंद्र को आकर्षित किया । वे लड़के की कर्त्तव्य निष्ठा तथा गुरु सेवा से अत्यधिक प्रसन्न हुए एवं उसे आशीर्वाद देने का निश्चय किया । वे लड़के के सामने प्रकट हुए और उसे सूचित किया कि मवेशी स्वस्थ हो गए हैं तथा एक हज़ार की संख्या में भी हो गये हैं और वह उनको लेकर अपने गुरु के आश्रम में जाए ।
सत्यकाम ने भगवान् इन्द्र को साष्टांग प्रणाम किया और गायों को एकत्रित किया एवं गुरु के आश्रम में वापस जाना आरम्भ किया । सत्यकाम एवं भगवान् इंद्र ने चार भिन्न भिन्न स्थानों पर चार रातें व्यतीत की | प्रत्येक सुबह भगवन इंद्र एक वेद के सार को सत्यकाम को सिखाते थे । इस प्रकार निश्चित समय पर वह गुरु के आश्रम में पहुंच गया । तथा समय के साथ -साथ उसने चारों वेदों में आचार्यत्व प्राप्त कर लिया । उसका चेहरा वैदिक स्पष्टीकरण के परिणाम के रूप में एक अद्भुत वैभव से चमकने लगा जो उसने दिव्य प्राणी से प्राप्त किया था । भगवान् इंद्र युवक पर अपनी कृपा बरसाकर गायब हो गए ।
सत्यकाम एक हज़ार गायों सहित गुरु के आश्रम में पहुंचा । उसका गुरु एवं अन्य शिष्यों के द्वारा गर्मजोशी से स्वागत किया गया । वह अपने गुरु के पैर पर गिर गया और उनके आशीर्वाद की याचना की । गुरु दिव्य अंतर्द्रष्टि रखते थे जो कुछ भी घटित हुआ । उन्होंने अपनी गुरु सेवा के लिए लड़के को आशीर्वाद दिया और सभी तथ्यों की घोषणा की कि सत्यकाम ने इंद्र को ( स्वर्ग के देवता ) अपने प्रेम एवं गुरु के प्रति निष्ठा से प्रसन्न किया और चार वेदों के विशाल ज्ञान को प्राप्त करने की क्षमता को पाया ।
उचित द्रष्टिकोण एवं सेवा के प्रति ललक हमें उचित दिशा में उच्च शिक्षा का प्रयोग करने एवं अर्जित करने में भी आशिर्वादित करेगा ।