Amrit Dhara - Dhyanyogi Omdasji

Amrit Dhara - Dhyanyogi Omdasji

मंगलवार, 24 जून 2014

गुरु और परमगुरु

संसार आज विभिन्न प्रकार के गुरुओं से भरा है | हम प्रत्येक जगह विभिन्न प्रकार के गुरु पाते हैं | मंदिर में पुजारी ज्योतिषी , हस्त योग शिक्षक, हठ योग शिक्षक, संगीत/नृत्य शिक्षक, प्राणायाम शिक्षक , सभी गुरु कहे जाते हैं | मठों और आश्रमों के प्रमुख गुरु पुकारे जाते हैं | अब हम अब तक के नवीन एवं अनजान क्षेत्रों में उभरते हुए गुरुओं के पाते हैं जैसे कि प्रबंधन गुरु, आनलाइन गुरु, पत्राचार गुरु, गुरु जो जन वर्गों को शिक्षित करते हैं , गुरु जो एकल शिक्षित करते हैं |

चारों ओर इतने सारे गुरुओं से असमंजस की स्थिति उत्पन्न होती है | कौन एक गुरु है तथा क्या उसके कार्यक्षेत्र हैं ? क्या वो प्रत्येक जो कुछ भी पढाता है, एक गुरु होता है ? क्या वो प्रत्येक जो कुछ भी नया पढाता हैं (बिना किसी विचारों के कि अद्द्यापन उचित या अनुचित है) गुरु है ?

हम कैसे यह जाने कि कौन एक गुरु है एवं कौन एक परमगुरु है ? गुरु एवं परमगुरु के बीच में भिन्नताएं क्या हैं ? " इस मुद्दे पर आइये हम लोग सबसे विशेषज्ञ राय जो भगवान् शिव की है " का अवलोकन करें |

 एक बार देवी पार्वती ने भगवान् शिव को परम गुरु को प्रणाम करते हुए देखा | वे आश्चर्यचकित हुईं क्योंकि भगवान् शिव महादेव के नाम से - महान ईश्वर पुकारे जाते हैं | जब उन्होंने (पार्वती जी ने ) उनसे (भगवान् शिव से) प्रश्न किया, उन्होंने (शिव ने ) उनको (पार्वती जी को) परम गुरु के बारे में बताया | गुरु के बारे में भगवान् शिव की शिक्षाएं, गुरु के गुण एवं कार्य गुरु गीता में दी गई है | 'गुरुगीता' गुरुओं का सात वर्गीकरण करती हैं |

वर्गीकरण गुरुओं के कार्य, गुण एवं क्ष्रमताओं पर आधारित हैं |

सुचका गुरु :-
            जो पूर्णतयः जानकार (पूर्णतयः शिक्षित ) हो तथा कम से कम एक वाह्य सांसारिक विज्ञान पर आचार्यत्व रखता हो | जैसे कि वह किसी एक विज्ञान या कला जैसे कि ज्योतिष, गणित, प्रबंधन इत्यादि में आचार्यत्व रखता हो |

वाचका गुरु :-
             विभिन्न प्रकार कि श्रेणियों तथा आज्ञाओं (वर्ण एवं आश्रम) धर्म, अधर्म के कर्तव्यों का प्रशिक्षक इत्यादि 'वाचका' प्रकार का होता है |

बोधका गुरु :-
              गुरु जो शिष्य को पंचाक्षरी मंत्र इत्यादि की दीक्षा देता है बोधका क्ष्रेणी का गुरु होता है तथा वाचका तथा सुचिका श्रेणी के गुरु से उच्च होता है |

निषिद्ध गुरु :- प्रतिबंधित गुरु :-
                       गुरु जो किसी निम्न क्ष्रेणी की विद्याओं जैसे कि मोहनी, मारण, वशीकरण, इत्यादि की दीक्षा देता है निषिद्ध गुरु के नाम से पुकारा जाता है और प्रतिबंधित गुरु होता है |

विहिता गुरु :-
"संसार अस्थायी है तथा आपदाओं का निवास है " - संसार को दुखों के निवास के रूप में देखना, गुरु जो वैराग्य (विराग) की ओर अग्रसर होने का मार्ग दिखाता है विहिता गुरु के रूप में जाना जाता है

'करनाख्या' गुरु :-
              गुरु जो शिष्य को महावाक्य, तत्वमसि (तू वह है) इत्यादि, की दीक्षा देता है, वह "करनाख्या गुरु" कहा जाता है | वह इस लौकिक संसार की व्याधियों को हटाने वाला होता है |

"परमगुरु":-
           वह जो सभी प्रकार की आशंकाओं की समूल मुक्ति में सक्षम होता है और जो जन्म मृत्यु के भय से मुक्त कराता है "परमगुरु" या सर्वोच्च गुरु माना जाता है |
            
परमगुरु आत्मसाक्षात्कार प्राप्त होता है और ईश्वर का मार्ग जानता है | हम परम गुरु या सर्वोच्च गुरु कई जन्मों में अर्जित पुण्यों के परिणाम के रूप में पाते हैं | ऐसे गुरु को प्राप्त कर के शिष्य सांसारिक बंधनों की आकांक्षाओं में (भौतिक संसार एवं उसके बंधन ) कभी नहीं पड़ता है, और सदा के लिए विमुक्त होता है |
               
सर्वोच्च शक्ति हमारी आवश्यकताओं एवं उत्थान की क्ष्रेणीयों के अनुसार हमें विभिन्न प्रकार के गुरुओं के पास भेजती हैं | जब हमारी भौतिक एवं आध्यात्मिक उत्थान की क्ष्रेणी फलती फूलती और विकसित होती है, हम अपने जीवन में नए गुरुओं को पाते हैं | ये गुरु हमें शिक्षित करते हैं और हमें उस श्रेणी का आवश्यकतानुसार ज्ञान देते हैं और तब वह उसपर चलते हैं |
               
अपने क्रमागत उन्नति के चक्र में, आत्मा कई शरीर धारण करती है एवं कई जीवनों को जीती है | जब वह जन्म तथा मृत्यु के चक्रों में घूमती है, आत्मा जीवन, ईश्वर तथा उसके (ईश्वर के) प्रेम को समझती है |
जब ईश्वर के लिए तड़प अत्यधिक शक्तिशाली होती है और आत्मा ईश्वर को पाने के लिए आध्यात्मिक अभ्यासों को करती हैं और तब आत्मा को गुरु ईश्वर का मार्ग दिखाते हैं |
        
 हमें उन सभी गुरुओं का सम्मान करना चाहिए जो हमारे चारों ओर हैं |
         
प्रत्येक गुरु लोगों की उनके चारों ओर की आवश्यकताओं की पूर्ति करता है | एक गुरु की महानता का आकलन अनुयाइयों की भीड़ से नहीं किया जाता है | भौतिक एवं प्रारम्भिक अध्यात्मिक ज्ञान की आवश्यकता ईश्वर की प्राप्ति हेतु ईश्वर के प्रति तड़प तथा आवश्यकता से और अधिक दूर कर देती है |
           
आकलन एवं तुलना करने की कोई आवश्यकता नहीं है | विभिन्न गुरुओं से ज्ञान अर्जित करिए परन्तु ईश्वर के प्रति गहरी भक्ति की ओर कार्य करिए | तब परमगुरु आपके पास आयेंगे | केवल परमगुरु जो आत्मसाक्षात्कार प्राप्त होते हैं और जानते हैं कि वे ईश्वर से एकाकार हैं, आपको ईश्वर की ओर ले जा सकता हैं |

बुधवार, 9 अप्रैल 2014

सम्बन्धों में कुंठाओं पर काबू पाना

हम जीवन में कई समस्याओं का सामना करते हैं | उनमे से एक संबंधों में कुंठा है | हम नहीं जानते हैं कि उनसे कैसे निपटा जाए | ऐसी कुंठायें हमारे मस्तिष्क में स्वयं से रात दिन बार-२ आती हैं और हमें शांति से रहने नहीं देती या रात्रि में सोने नहीं देती हैं | वे हमारी प्रगति के लिए भौतिक एवं आध्यात्मिक जीवन में बाधाएं हैं | हम अपने मस्तिष्क में इतनी अधिक कुंठाओं के साथ मंत्र जाप एवं ध्यान नहीं कर सकते हैं | हम सभी को अपने सम्बन्धों को सुद्रढ़ करने के लिए, अपने जीवन के उत्थान के लिए एवं अपने आध्यात्मिक जीवन को सुधारने के लिए उनसे (कुंठाओं से) सामना करना सीखना चाहिए |
                                        
कुंठा क्रोध का एक स्वरुप होता है | क्रोध तब आता है जब लोग हमारी आशाओं के अनुरुप बोलते, कार्य करते या प्रदर्शन नहीं करते हैं | कुंठा चरमोत्कर्ष पर होती है जब हम आशानुरूप परिणाम नहीं प्राप्त करते हैं जो हम लोगों में ढूंढते हैं | हम स्वयं को कुंठाग्रस्त पाते हैं जब हम अपनी योजनानुसार प्राप्त करने, कार्य करने या आचरण में भविष्यवाणी करने में या इच्छाओं में अक्षम होते हैं | यह अत्यंत कष्टप्रद होता है | क्योंकि यह असफलता का सूचक होता है | हम योजना बनाते हैं और सावधानी से उस पर अमल करते हैं और आशानुरूप अपेक्षित परिणाम नहीं पाते हैं |  हम असफल जैसा महसूस करते हैं | हम अपना आत्म सम्मान एवं आत्मविश्वास खो देते हैं | और यह हमारे जीवन में और अधिक क्रोध तथा कुंठा भर देता है |
           
सम्बन्धों में कुंठा पर काबू पाने के लिए हमें दो बातों को समझना चाहिए : अतीत को परिवर्तित या पूर्ववत नहीं किया जा सकता है और लोगों को बदला नहीं जा सकता है |
       
इसलिए हमें अतीत से बाहर आना सीखना चाहिए और इस बात को पकड़े नहीं बैठना चाहिए कि वहां क्या किया गया है या किया जा सकता है | हम अतीत का विश्लेषण करने में अधिकाधिक समय व्यतीत करते हैं | हम स्वयं को या दूसरों को अतीत की पीड़ा के लिए या अतीत में परिणामों के अभाव के लिए दोषारोपित करते हैं | लेकिन अतीत अतीत होता है | गुज़रे हुए अतीत का कोई भाग किसी की सहायता नहीं कर सकता है | यह केवल हमारे रक्तचाप को बढाता है और हम जो किया जा सकता था उसके अन्तहीन तर्क वितर्कों में लिप्त रहते हैं | इस बात को समझें कि कुछ भी नहीं किया जा सकता है उसके बारे में जो समाप्त हो चुका है | हम केवल अतीत से शिक्षा ले सकते हैं और उसपर क्रियान्वन कर सकते हैं | लेकिन अतीत को पूर्ववत नहीं किया जा सकता है | माता पिता को एक दूसरे पर , बच्चों पर या परिवार में अन्य पर अतीत की घटनाओं के लिए दोषारोपण नहीं करना चाहिए | हमें अतीत की घटनाओ एवं उनके परिणामों को स्वीकारना चाहिए जो पहले ही घटित हो चुका है और जा चुका है  |
                          
लोग परिवर्तित नहीं होते हैं | हमें इस कठोर सच्चाई को सीखना एवं स्वीकार करना चाहिए | हम स्वयं को परिवर्तित करने में इसमें असमर्थ पाते हैं | हम दूसरों से उनको परिवर्तित करने की आशा कैसे कर सकते हैं | हमें स्वयं को परिवर्तित करना सीखना चाहिए ताकि हम इस बात से आहत ना हों कि कैसे दूसरे जीवन में व्यवहार करते हैं या कार्य करते हैं | माता बच्चे को कठोर परिश्रमी, आज्ञाकारी, प्रिय, कुशाग्र एवं विद्यालय में मेधावी बना हुआ चाहती हैं | बच्चा माता को कम चिड़चिड़ी, मधुर भाषी, उसके प्रिय आहार को पकाने वाली और उन बातों के पीछे ना पड़ने वाली जो वह चाहता न हो , चाहता है | पति अपनी पत्नी को अधिक शान्तिप्रिय, प्रसन्नचित्त, स्वच्छ, नम्र तथा एक बेहतर रसोइया चाहता है | पत्नी स्वयं के पीछे चलने वाला, खर्राटे न भरने वाला , अधिक कमाने वाला एवं घर के काम में हाँथ बंटाने वाला पति चाहती है | परिवार में सभी सदस्यों के प्रति हमारी आशाओं की सूची अंतहीन होती है | हम अपनी शक्ति एवं पद का दुरुप्रयोग करते हैं और दूसरों को गंभीर परिणामों के साथ धमकाते हैं यदि वे परिवर्तित नहीं होते हैं | भावात्मक, विश्वासघात एक दूसरा हथियार है जो दूसरों को स्वीकार्य व्यवहारिक स्वरूपों में बाध्य किया करता है | लिंग भेद में - मैं पुरुष हूँ और तुम्हे मेरा अनुसरण करना चाहिए या मैं स्त्री हूँ तथा मैं कमज़ोर हूँ और इस प्रकार तुम्हे यह कार्य करना चाहिए | उम्र में - मैं बड़ा हूँ और तुम्हें मेरी आज्ञा माननी चाहिए या में छोटा हूँ और यह नहीं कर सकता हूँ | रोना, हिंसा, धमकी एवं अन्य दूसरे व्यवहार दूसरों को निशाना बनाते हैं और उनपर अपनी इच्छाओं को थोपते हैं | कोई कार्य जो इस प्रकार दूसरों पर थोपा जाता है , दीघ्रकालीन एक सकारात्मक परिणाम नहीं देगा |
                                
इस बात को समझना चाहिए कि अतीत परिवर्तित नहीं किया जा सकता है और लोग बदलते नहीं हैं , आओ हम लोग जीवन में यथार्थवादी लक्ष्य बनाएं | एक बार हम लोगों को उनकी क्ष्रमताओं एवं कमजोरियों के साथ स्वीकारते हैं, हम अधिक अच्छी तरह से प्रत्येक परिस्थिति में परिणामों का आकलन करने में सक्षम होंगे | व्यक्ति की क्ष्रमताओं पर प्रकाश डालना सीखें लेकिन उसकी कमजोरियों के विरुद्ध अपने आधार को सुरक्षित करना सीखें और जब परिणामों में लघु परिपथ होता है, हम निराश होने के बजाय अधिकाधिक उचित तरह से संतुलन बनाये रखने में एवं स्वीकार करने में सक्षम होंगे | जब हम दूसरों से जुड़ने के दौरान व्यवहार एवं परिणामों में छोटे-२ और अधिक से अधिक यथार्थवादी लक्ष्य बनाते हैं, यह नियमित रूप से सकारात्मक परिणाम देता है | जब एक सफल व्यावहारिक ढंग स्थापित होता है अधिक शांति, प्रसन्नता एवं संबंधों में पूर्णता आती है | जब लोगो के विचारों को समझें, हमें अधिक प्रिय नामों एवं संगठनों के साथ अपने मस्तिष्क में उन्हें पुनर्स्थापित करना चाहिए | अपने पिता को " तानाशाह " न कहें | जब आप उनके बारे में सोंचे उन्हें "डेडी " उसी प्यार से पुकारें जो आप रखते थे जब आप बच्चे थे | उनके कल्याण के लिए प्रार्थना करें | और आप स्वयं को उनके साथ एक सुधरे हुए मानसिक सम्बन्ध में पाएंगे | यह उनके साथ एक सुधरे हुए सम्बन्धों में आभासित करेगा |
                                
स्वयं में या दूसरों में यह बदलाव स्थापित करना आसान नहीं होता है | लेकिन आप स्वयं पर थोडा सा नियंत्रण रखते हैं | स्वयं को , अपने विचारों , शब्दों या आचरणों को नियंत्रित करने में कुंठा को ना आने दें | अपने स्वयं के जीवन पर नियंत्रण रखें और किसी को स्वयं पर दबाव बनाने के लिए या नकारात्मक प्रतिक्रियाओं में हेर फेर करने छूट न दें | अपने विचारों एवं प्रतिक्रियाओं पर नियंत्रण रखें एवं अपनी व्यक्तिगत शक्ति को पकड़े रखें | आपको विचार करना एवं निर्णय लेना चाहिए जो आप सोंचना एवं अनुभव करना चाहते हैं |
                             
जब आप सीता राम मंत्र का जाप करते हैं, मंत्र की तरंगे आपको आवश्यक इच्छा शक्ति, समझ , योग्यता आत्मनियंत्रण का अभ्यास करने में प्रदान करेंगी | विशेष परिस्थितियों में भी आप अपने प्रसन्नचित्त को नहीं खोएंगे और वैसा ही व्यवहार करेंगे जैसा कि आप सामान्यतः करते हैं | सीता राम मंत्र की तरंगे आपके चारों ओर एक सुरक्षा कवच बनायेंगी और आप दूसरों के क्रोधयुक्त तरंगों से प्रभावित नहीं होंगे | तब आपकी प्रतिक्रियाएं वैसी ही होंगी जैसा कि आप उसे होने देना - आध्यात्मिक रूप से विकसित हुआ चाहते हैं |

बुधवार, 26 मार्च 2014

मनोवृत्ति और उच्च शिक्षा के लिए दृष्टिकोण


ज्ञान  अध्यन करने से, प्रश्न एवं उत्तर सत्र, व्यवहारिक शिक्षा और अनुभव से अर्जित किया जाता है । ज्ञान विनम्रता देता है । विनम्रता चरित्र और पात्रता विद्यार्थी को देती है । एक योग्य छात्र अपने कार्य से धन प्राप्त करता है । धन से जीवन में धर्म का कार्य करना चाहिए । और जब एक व्यक्ति धर्म के साथ जीता है वह प्रसन्नता में रहता है । और हम सब प्रसन्नता में जीने की कामना करते हैं । ज्ञान हमें आशीर्वाद का पुलिंदा प्रदान करता है जो भली भांति हमारे भौतिक जीवन को जीने में हमारी सहायता करता है । वेदों एवं अन्य पवित्र ग्रंथों का ज्ञान विद्यार्थियों को सभी उपरोक्त आशीर्वाद प्रदान करता है और आत्म साक्षात्कार का मार्ग भी दिखाता है।

केवल किताबी ज्ञान या सैद्धान्तिक ज्ञान का कोई उपयोग नहीं होता है । ज्ञान अनुभव के माध्यम से भलीभाँति होना चाहिए  । ज्ञान का पूर्ण आशीर्वाद भी हमलोगों के लिए उपयोगी नहीं होता है । हम अपने चारों ओर लोगों में अभिमान देखते हैं जब वे उच्च शिक्षा प्राप्त कर लेते हैं | पण्डितों/पुजारियों और धार्मिक वक्ताओं ने पवित्र ग्रंथों की बिना रत्ती भर के आंतरिक ज्ञान के व्याख्या की है । ऐसे लोग कविताओं को उदाहरणार्थ प्रस्तुत करते हैं , शब्दों को बिना उन्हें भलीभाँति समझे हुए सुनाते हैं और यह अहंकार को बढ़ाने का कार्य करता है । अहंकार अपने तर्कों को अधिक श्रेष्ठ सिद्ध करना और दिग्भ्रमित करना उचित ज्ञान से परे ले जाने के लिए पसंद करता है । ऐसे लोग दूसरों को कुशलता से बरगलातें हैं एवं उनपर हावी होते हैं और उनमे डर पैदा करते हैं । ज्ञान को अर्जित करने का सही द्रष्टिकोण और उसके उपयोग का उचित ढंग शिष्यों में आरम्भ से डाला जाना चाहिए ।

तीन वर्ष की छोटी उम्र में एक व्यवस्थित पाठ्यक्रम एक वो शिष्य तैयार करता है जो बीस वर्ष से अधिक आयु तक उच्च श्रेणी के ज्ञान को अर्जित करने के लिए नियमित रूप से कठोर परिश्रम करता है । चारों वेदों के आचार्यत्व को पाने की आवश्यकता का मानसिक द्रष्टिकोण एवं तैयारी का स्तर अत्यधिक उच्च एवं कठिन है । चारों वेदों में से प्रत्येक कई हज़ार पदों को रखते हैं एवं जो काल के दिनों में श्रवण करने एवं रटने से सीखे गए थे ।

एक दिव्य आत्मा से चारों वेदों पर आचार्यत्व प्राप्त करना अल्प अवधि में एक अत्यधिक असंभव कार्य है । ऐसे कार्य केवल तभी संभव होते हैं जहाँ एक शिष्य अपनी ग्रहणशीलता को उचित ढंग से जीवन व्यतीत करने से, गुरु सेवा और ईश्वर के पवित्र नाम का स्मरण करने से तैयार करता है एवं गुरु तथा देवत्व द्वारा आशिर्वादित होता है । यह एक ऐसे शिष्य सत्यकाम एवं उसके गुरु गौतम की कथा है -

 महान साधु गौतम के आश्रम में कई शिष्य थे । वे आश्रम की आवश्यकता हेतु दूध एवं मक्खन उपलब्ध कराने के लिए कई गाय भी रखते थे । एक बार सूखे के कारण गायों को पीने हेतु जल तथा खाने की घास के  लिए अत्यधिक कष्ट सहना पड़ा । गुरु ने प्रार्थना की कि उनके शिष्यों में से एक गायों को सुदूर घाटी में ले जाने के लिए अपने आपको प्रस्तुत करे और वहां तब तक ठहरे जब तक कि सूखा समाप्त न हो जाए और तब गायों सहित वापस आ जाए । कोई भी विद्यार्थी आश्रम के आराम को छोड़ने के लिए एवं गायों के बीच में अनजान भूमि में सुदूर रहने के लिए तैयार नहीं हुआ । उनमें से किसी ने सिवाय सत्यकाम के इस कार्य को करने हेतु स्वयं को प्रस्तुत नहीं किया । गुरु ने लड़के को आशीर्वाद दिया और ४०० गायों सहित उसे भेजा तथा निर्देश दिया कि जब मवेशी कुल संख्या में १००० हो जाएँ, वह आश्रम आ जाये ।

सत्यकाम हरी भरी घाटी में पशुओं को सुरक्षित ले गया । वह प्रातः काल जाग जाता था स्नान करता था एवं सूर्य देवता की पूजा अर्चना करता था । और अपनी प्रार्थना का वर्णन करता था । पूरे दिन वह गायों की देखभाल करता था तथा ईश्वर के नाम का  जाप करता था । उसने गायों की सेवा को ईश्वर तथा गुरु की सेवा के रूप में की |  उसने कभी अकेला महसूस नहीं किया और वह मानसिक रूप से गुरु और ईश्वर के साथ रहता था | पवित्र तरंगें जो उससे निकलती थीं, ने देवताओं के राजा इंद्र को आकर्षित किया । वे लड़के की कर्त्तव्य निष्ठा तथा गुरु सेवा से अत्यधिक प्रसन्न हुए एवं उसे आशीर्वाद देने का निश्चय किया । वे लड़के के सामने प्रकट हुए और उसे सूचित किया कि मवेशी स्वस्थ हो गए हैं तथा एक हज़ार की संख्या में भी हो गये हैं और वह उनको लेकर अपने गुरु के आश्रम में जाए ।

सत्यकाम ने भगवान् इन्द्र को साष्टांग प्रणाम किया और गायों को एकत्रित किया एवं गुरु के आश्रम में वापस जाना आरम्भ किया । सत्यकाम एवं भगवान् इंद्र ने चार भिन्न भिन्न स्थानों पर चार रातें व्यतीत की | प्रत्येक सुबह भगवन इंद्र एक वेद के सार को सत्यकाम को सिखाते थे । इस प्रकार निश्चित समय पर वह गुरु के आश्रम में पहुंच गया । तथा समय के साथ -साथ उसने चारों वेदों में आचार्यत्व प्राप्त कर लिया । उसका चेहरा वैदिक स्पष्टीकरण के परिणाम के रूप में एक अद्भुत वैभव से चमकने लगा जो उसने दिव्य प्राणी से प्राप्त किया था । भगवान् इंद्र युवक पर अपनी कृपा बरसाकर गायब हो गए ।

सत्यकाम एक हज़ार गायों सहित गुरु के आश्रम में पहुंचा । उसका गुरु एवं अन्य शिष्यों के द्वारा गर्मजोशी से स्वागत किया गया । वह अपने गुरु के पैर पर गिर गया और उनके आशीर्वाद की याचना की । गुरु दिव्य अंतर्द्रष्टि रखते थे जो कुछ भी घटित हुआ । उन्होंने अपनी गुरु सेवा के लिए लड़के को आशीर्वाद दिया और सभी तथ्यों की घोषणा की कि सत्यकाम ने इंद्र को ( स्वर्ग के देवता ) अपने प्रेम एवं गुरु के प्रति निष्ठा से प्रसन्न किया और चार वेदों के विशाल ज्ञान को प्राप्त करने की क्षमता को पाया ।

उचित द्रष्टिकोण एवं सेवा के प्रति ललक हमें उचित दिशा में उच्च शिक्षा का प्रयोग करने एवं अर्जित करने में भी आशिर्वादित करेगा ।


प्रसन्न कैसे रहा जाये


जब हम स्वयं से पूछते हैं कि हम  जीवन में क्या चाहते हैं ? सदैव उत्तर होता है : मैं प्रसन्न रहना चाहता हूँ । प्रत्येक एकल व्यक्ति प्रसन्न रहना चाहता है । हम सब लोगों के पास जीवन में यथोचित आराम होता है - एक घर, परिवार, सम्बन्ध, एक नौकरी, हमारा नियमित आहार एवं अन्य सुविधाएँ । फिर भी हम लोग स्वयं को अधिकांशतः अप्रसन्न पाते हैं । हमलोग अत्यधिक चिड़चिड़े होते हैं । हमलोग चिल्लाते हैं । हम लोग धैर्य नहीं रखते हैं । हमलोग स्वयं की दूसरों से तुलना करते हैं और सदैव स्वयं को लालसा युक्त पाते हैं । ये चीज़े प्रसन्न व्यक्तियों कि सूचक नहीं होती हैं ।

प्रसन्नता एक  मायावी वस्तु है । हमारी प्रसन्नता परिवेश से सम्बंधित सभी बातों पर निर्भर होती प्रतीत होती है जैसे कि कितनी अच्छी तरह हमारे वस्त्र प्रेस किये गए हैं । जब हम चारों ओर का अवलोकन करते हैं, हम देखते हैं कि धन प्रसन्नता की कुंजी नहीं होती है या अच्छा स्वास्थ्य या एक बड़ा सा घर या द्रुतगामी कार या अत्याधुनिक आईपैड भी नहीं । कुछलोग ऐसे होते हैं जिनके पास सबकुछ होता है और कभी प्रसन्न नहीं रहते हैं । और ऐसे भी कुछ लोग होते हैं जिनके पास अपेक्षाकृत कम भौतिक संसाधन होते हैं एवं फिर भी वे प्रसन्न रहते हैं । अंतर व्यक्तियों के दृष्टिकोण का होता है ।
                
आओ हमलोग अपने जीवन को अपेक्षाकृत अधिक सरल बनायें । प्रत्येक सप्ताह अपने घर के एक हिस्से में दो घण्टे व्यतीत करें एवं अव्यवस्थाओं को समाप्त करें । दान स्वरुप दे जिन्हें  आपको दान के लिए आवश्यकता नहीं होती है । एक स्वच्छ घर प्रसन्नचित्त चेहरों एवं बेहतर जप और ध्यान से बनाया जाता है । अपने लिए घर या कार्य क्ष्रेत्र में जितना सम्भव हो सके काम का बोझ न लादें । इस बात के लिए न कहना सीखें ।
                  
स्वयं को स्वस्थ बनाएं । संतुलित आहार लें । प्रतिदिन तेज़ी से टहलने जाएँ । पर्याप्त घण्टे नींद लें । यह बातें आपको शारीरिक रूप से अच्छी तरह रखेंगी । नकारात्मक न हों । हर समय चिल्लायें नहीं और न ही आलोचना करें । अपने मत या सुझावों को सामान्य रूप से प्रस्तुत करें जो अनुमानित नहीं है । भाषा में मधुरता एवं कोमलता रखें तथा घर पर सभी का सम्मान करें । हमें सम्मान प्राप्त करने के लिए सर्वप्रथम सम्मान देना चाहिए । जब हम प्रसन्नचित्त भी न हों , हमें दूसरों पर अपना क्षोभ नहीं उतारना चाहिए । यदि आप स्वयं को सतर्कता पूर्वक शान्त व प्रसन्नचित्त करने के लिए बल देंगे आप स्वयं को उस मार्ग में प्राप्त करेंगे । यह आपकी घर में मित्रों के साथ तथा कार्यक्षेत्र में अच्छा सम्बन्ध रखने में सहायता करेगा ।
                   
बुरे समाचारों या बुरी द्रश्य घटनाओं पर हर समय ध्यान केंद्रित न करें । बुरी द्रश्य घटनाओं से ध्यान हटा कर रखें और अच्छी किताबें या प्रेरणादायक लेख पढ़ें । ऐसी आदत डालें जो आपको प्रसन्नता देती हो ।
                  
अधिकांश महत्वपूर्ण परिवर्तन जो हमें स्वयं में सराहना करना सीखना होता है जो हमारे पास होता है एवं जीवन में जिससे हमें अत्यधिक सन्तुष्टि मिलती है । इसका यह तात्पर्य कतई नहीं होता है कि हम कठिन परिश्रम न करें । हमें कठिन परिश्रम करना चाहिए और ईश्वर के आशीर्वाद के रूप में अपने प्रयासों के परिणामों को स्वीकार करना चाहिए । प्रशंसा एवं संतोष जो हमें प्रदान किया गया है, हमारे जीवन को प्रसन्न बनाएगा । हमें प्रसन्न होने के परिप्रेक्ष में खोजने की या प्राप्त करने की  या अधिकाधिक पाने की लालसा नहीं रखनी चाहिए । हम अब प्रसन्न रह सकते हैं । आभार उसके लिए जो हमारे पास है एवं संतोष महान शान्ति देता है । हम एक भलाई का सर्वोच्च भाव रखेंगे ।
                    
इस कथा में किसान की पत्नी के जीवन का अवलोकन करें : एक किसान अपनी पत्नी और तीन बच्चों के साथ एक छोटे से गाँव में रहता था । उसका घर छोटा और आरामदायक था और उसके पास पर्याप्त भूमि तथा अच्छा जीवन जीने के लिए उत्पादन था । अचानक एक समस्या के कारण उनके बुजुर्ग माता पिता को उसके साथ रहना पड़ा । चल सामग्री, लोग और स्थान को घर में स्थानान्तरित करना पड़ा और माता पिता के लिए स्थान को पुनः स्थापित करना पड़ा । इसने उसकी पत्नी को अवसादग्रस्त एवं अप्रसन्न कर दिया । कुछ समय बाद वह गाँव के एक बुद्धिमान व्यक्ति के पास गयी और न्याय माँगा । उसने उसकी बातों को सुना और कहा : तुम्हारी समस्या का हल बहुत आसान है । कृपया एक सप्ताह के लिए अपने रहने योग्य कमरे में एक दर्जन मुर्गी रखो ।
                    
महिला आश्चर्यचकित हुई परन्तु उसने आदेशों का पालन किया । मुर्गियां हर समय कुड़कुड़ाती थीं । वे पंख तथा गंदगी रहने वाले कमरे में छोड़ती थीं । उनका भोजन और जल प्रत्येक जगह बिखरा हुआ था । एक सप्ताह बाद महिला तंग हो गयी और बुद्धिमान व्यक्ति के पास गयी । उसने ( बुद्धिमान व्यक्ति ) ने उस महिला से कहा : समाधान अभी पूर्ण नहीं हुआ है । तुम्हें अपने ठहरने वाले कमरे में 6 बकरियाँ और रखनी चाहिए । ऐसा करने के पश्चात्, कृपया मुझे बताओ कि कैसा घटित हुआ ।
                      
लगातार बकरियों का मिमियाना और विष्टा करना, उनकी देह की गंध, भोजन एवं विष्टा प्रत्येक जगह बिखरा हुआ था । और मुर्गियों ने ठहरने वाले कमरे को अपना बसेरा बनाया हुआ था । पुनः एक सप्ताह बाद महिला बुद्धिमान व्यक्ति के पास गयी और शिकायत की । बुद्धिमान व्यक्ति ने कहा केवल एक कार्य और करो और प्रक्रिया संपन्न हो जायेगी । और उसके बाद तुम अधिक प्रसन्न रहोगी । अपने ठहरने वाले कमरे में तीन गाय और रखो । और वैसा ही महिला ने किया ।
                     
ठहरने वाले कमरे में कोलाहल था । गाय, बकरियाँ, मुर्गियाँ प्रत्येक जगह प्रतीत होते थे । मवेशियों का शोर एवं गंध असहनीय थी । एक सप्ताह में ही महिला तंग आ गयी । उसने बुद्धिमान व्यक्ति से समाधान खोजने का मन बनाया तथा अपने ठहरने योग्य कमरे में सभी अव्यव्यस्थाओं और पशुओं से छुटकारा पाने का मन बनाया । वह बुद्धिमान व्यक्ति के पास गयी और शिकायत की : किस प्रकार की सलाह आप मुझे देते हैं ? मेरा जीवन नरक हो गया है । मुझे सभी पशुओं से छुटकारा पाना है । मैं पुनः अपने ठहरने वाले कमरे को स्वच्छ एवं व्यवस्थित करना चाहती हूँ । बुद्धिमान व्यक्ति ने कहा । हाँ कृपया ऐसा करें ।  इससे प्रक्रिया पूर्ण हो जायेगी ।
                    
महिला वापस गयी और सभी मुर्गियों, बकरियों तथा गायों को अपने ठहरने वाले कमरे से हटा दिया । उसने कुछ पुराना कूड़ा भी फेंका । उसने अपने ठहरने वाले कमरे को झाड़ा और स्वच्छ किया तथा उसे सुन्दर बनाया । उसने दूसरे कमरों को भी साफ़ किया । घर स्वच्छ तथा तरोताजा हो गया और वह बहुत प्रसन्न हो गयी । वह बुद्धिमान व्यक्ति के पास गयी और कहा आपके उपचार ने काम किया । मेरा घर विशाल एवं सुन्दर हो गया है और मैं प्रसन्न हूँ ।
                  
बुद्धिमान व्यक्ति मुस्कुराया और उसने कहा : तुम्हारा घर परिवर्तित नहीं हुआ है । वह वैसा ही है । तुमने जो तुम्हारे पास है उसकी सराहना करना सीख लिया है । इसने तुम्हे प्रसन्न तथा संतोषप्रद बनाया है । सराहना उसकी जो हमारे पास है मूल मंत्र (कुंजी) है ।
                       
अंततः हमें अपनी आत्मा का ध्यान रखना चाहिए । इस बात को जानो कि तुम एक शरीर नहीं हो बल्कि एक आत्मा हो । परमानन्द में रहना आत्मा की प्रकृति है । तुम इस परमानन्द को नियमित ध्यान तथा सीता राम मंत्र के जाप से एवं एक परमगुरु की अन्य अध्यात्मिक शिक्षाओं का अनुकरण करके खोल सकते हो ।

अरुणि एवं बाढ़ग्रस्त खेत


पुराने दिनों में, गुरु के शिष्य गुरु के साथ उनके आश्रम में रहते थे । वे अध्यन करते थे तथा गुरु द्वारा उनको दिए गए अन्य काम करते थे । अधिकांश आश्रम आत्मनिर्भर इकाईयां थे । वे दूध के लिए गाय, सब्ज़ी फल एवं फूलों के लिए बगीचे, अग्नि के लिए लकड़ियों को एकत्रित करने के लिए जंगल और अनाजों एवं  दालों को उगाने के लिए खेत रखते थे । शिष्य विविध प्रकार के कार्यों को करते थे तथा आश्रम को सुचारु रूप से चलाते थे । उन्हें दिए गए भौतिक कार्य एवं उत्तरदायित्व शिष्यों को शारीरिक रूप से मजबूत तथा निर्भीक एवं मानसिक रूप से परिपक्व भी बनाते थे और उन्हें दिए गए कार्यों को अनुशासित ढंग से करने के योग्य बनाते थे । शिष्यों के बीच में आवंटित किये गए कार्यों के लिए कोई मतभेद नहीं था । वे जीवन में किसी भी पद से आ सकते थे । सभी के साथ समान रूप से व्यवहार होता था ।
      
शिष्यों में प्रत्यक्ष प्रगति एवं उन्नति के अतिरिक्त एक दूसरा उत्थान होता है जो स्थान लेता है लेकिन सामान्यतः स्पष्ट नहीं होता है । यह तब प्रकट  होता है जब कुछ असामान्य घटनाऐं स्थान लेती है । एक शिष्य जो निष्ठावान, प्रिय होता है एवं साहित्य व विद्या के लिए गुरु की उक्तियों का अनुसरण करता है, सूक्ष्म स्तर पर उन्नति करता है । भौतिक शरीर ताज़ी हवा, अच्छे आहार एवं कठोर शारीरिक परिश्रम से फलता फूलता है, मानसिक शरीर का आश्रम में ज्ञानार्जन करने से विकास होता है एवं सूक्ष्म शरीर का उत्थान होता है जब शिष्य गुरु के प्रति असीम प्रेम के साथ कार्य करता है एवं निसंदेह आज्ञाकारी एवं निष्ठावान होता है । समय की अवधि में यह उत्थान सूक्ष्म शरीर को तैयार करता है कि जब गुरु आदेश देता है या आशीर्वाद देता है अचानक एक कायापलट हो जाती है और शिष्य पूर्ण रूप से परिवर्तित हो जाता है । इस घटना को समझें :

ऋषि आयोद धौम्य अपने आश्रम में गायों, बगीचों और खेतों सहित रहते थे । वे प्रसिद्द थे क्योंकि वे धर्मपरायण तथा शक्तिवान थे और अपने शिष्यों की ऐसे देखभाल करते थे जैसे माता अपने बच्चों की देखभाल करती है । आश्रम में उनकी देखरेख में कई शिष्य थे । उन्ही में से एक अरुणि नामक शिष्य था । अरुणि बहुत विनम्र था और अपने गुरु से अत्यधिक प्रेम करता था । वह परिश्रमी था तथा स्वयं को दिए हुए कार्यों को गुरु सेवा के रूप में संपन्न करता था । वह बिना किसी प्रतिउत्तर के गुरु के आदेशों का पालन प्रसन्नतापूर्वक करता था ।
                        
एक बार गुरु ने खेतों की देखभाल हेतु अरुणि को भेजा । जैसे ही अरुणि खेतों पर पहुंचा, बदल घिर आये और बारिश होने लगी । खेतों में तेज़ी से पानी भर गया । खेत के छोरों पर मेढ़ें पानी को पकड़ने में और पानी के बहाव को रोकने में तथा मिटटी के कटाव को रोकने में असमर्थ थी । जैसे ही अरुणि निरीक्षण कर रहा था, उसने देखा कि पानी का उफान बढ़ गया है और मेढ़ के एक छोर में दरार पड़ गयी है । पानी और मिटटी खेतों से बाहर बहुत तेज़ी से बह रही थी । अरुणि भयभीत हो गया कि मिटटी के कटाव के कारण क्षति अत्यधिक भयानक होगी । उसने पानी के बहाव को रोकने कि भरसक कोशिश की । उसने कटाव में कीचड़ और पत्थर को पानी के बहाव को रोकने के लिए रखा । लेकिन यह सब व्यर्थ था । अरुणि ने खेतों की देखभाल करने के गुरु के आदेशों को याद किया । इसलिए उसने स्वयं को अवरोधक के रूप में कटाव में स्थापित किया और बहते हुए पानी को रोक दिया । वह पूरी रात अकड़ा एवं शीतग्रस्त उस स्थान पर  पड़ा रहा लेकिन उसने गुरु के खेतों की रक्षा की ।

प्रातः काल जब सभी शिष्य प्रातःकालीन प्रार्थना हेतु एकत्रित हुए, अरुणि उपस्थित नहीं था । गुरु एवं कुछ शिष्य खेत की ओर अरुणि को पुकारते हुए भागे । अरुणि ने सुना कि उसके गुरु उसे बुला रहे हैं और वह ठण्ड से कांपते हुए खड़ा हो गया । गुरु के चरणों को स्पर्श करके उसने पूछा - गुरुदेव मेरे लिए आपका क्या आदेश है ?
गुरु ने चारों ओर देखा और समझ गए कि अरुणि ने खेतों को बचाने के लिए क्या किया है । उनका ह्रदय करुणा से भर गया । प्रेम एवं कृपा गुरु से शिष्य की ओर बहना आरम्भ हो गयी और अरुणि परिवर्तित हो गया । उसे सभी शास्त्रों का स्वतः ज्ञान प्राप्त हो गया । गुरु ने उसे उद्धालक अरुणि का नया नाम दिया ।

अरुणि एक महान विद्वान ऋषि हुए । उन्होंने समाज के कल्याण के लिए कार्य किया । उन्होंने भोजन कराने वाले असंख्य समुदायों को स्थापित किया । उन्होंने वैदिक एवं उपनिवेदिक विचारों को व्यवस्थित किया । यह सबकुछ उनके गुरु के आशीर्वाद के कारण हुआ ।