Amrit Dhara - Dhyanyogi Omdasji

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बुधवार, 31 जुलाई 2013

अज्ञानता का कोहरा एवं जीवन का उचित अवलोकन

हम सब सर्वोच्च की वास्तविकता तथा जीवन के सत्य के परिप्रेक्ष्य में अज्ञानता के कोहरे में जीते हैं । अज्ञानता की यह पर्त हमें सर्वोच्च के सत्य एवं ब्रह्माण्ड की वास्तविकता से प्रथक करती है । हम सब सम्पूर्ण जीवन इस अज्ञानता से घिरे हुए जीते हैं । हमारे माता पिता एवं दादा दादी भी ऐसी अज्ञानता में जीते रहे हैं । इस प्रकार हमें सर्वोच्च की शक्ति और ईश्वरत्व का कोई ज्ञान नहीं होता है । हम लोग उन लोगों की तरह होते हैं जो स्थाई रूप से धुंधला द्रष्टिकोण रखते हैं और ऐसा कोई ज्ञान या सजगता नहीं रखते हैं जिसमे  अल्प मात्रा में भी स्पष्ट दृष्टिकोण हो ।  हम लोग अपूर्ण जानकारी के गहरे धुंध में जीते हैं एवं अपने जीवन को ध्यानकेंद्रित दृष्टिकोण से परे देखते हैं । यह ध्यानकेंद्रित दृष्टिकोण से परे जीवन हमारे दृष्टिकोण एवं जीवन का लक्ष्य होता है जिसके लिए हमलोग अथक परिश्रम करते हैं और रात दिन दास बने रहते हैं ।

जब परमगुरु हमारे जीवन में आते हैं, वे हमें ज्ञान देते हैं और जीवन का उचित पथ हमें बताते हैं । जीवन का हमारा दृष्टिकोण परिवर्तित हो जाता है क्योंकि हम परम गुरु से ज्ञान को आत्मसात करते हैं ।  परमगुरु द्वारा प्रदान किया गया ज्ञान एवं अध्यात्मिक अभ्यास हमें जीवन के उचित दृष्टिकोण को प्राप्त करने के लिए तैयार करता है । इसे समझिये :-
                     
अर्जुन पांडवों में सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर जानते थे कि कृष्ण सर्वोच्च ईश्वरत्व हैं । कृष्ण पांडवों के अनेक परीक्षणों एवं क्लेशों के कई वर्षों में आधार एवं सहायक थे । अर्जुन कृष्ण की चमत्कारिक शक्ति और उनकी असंभव से संभव करने की योग्यता को देख चुके थे । लेकिन उन्होंने स्वयं में अनुभव नहीं किया था और ना ही जाना था कि कृष्ण सर्वोच्च शक्ति हैं । 
                 
कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन और सेनायें अपनी मात्रभूमि के लिए सभी तरह के युद्ध के लिए तैयार थीं । कृष्ण उनके सारथी थे । अर्जुन ने कृष्ण को स्वयं के लिए रणनीतिक योजना के दृष्टिकोण से दोनों सेनाओं की मजबूती देखने तथा आकलन करने के लिए रथ को दोनों सेनाओं के बीच में केंद्र बिंदु पर ले जाने के लिए कहा । जब वे सुरक्षात्मक स्थिति का अवलोकन कर रहे थे, वे कृष्ण से बात चीत कर रहे थे एवं उन्हें यादव एवं सखा के रूप में संबोधित कर रहे थे - यादव के रूप में कृष्ण यादव जाति से सम्बंधित थे और सखा तात्पर्य मित्र अर्जुन एवं कृष्ण के रूप में जो हम उम्र थे और अर्जुन कृष्ण को अपने सर्वश्रेष्ठ मित्र के रूप में मानते थे । 
                                            
अपनी वार्तालाप के दौरान अर्जुन ने युद्ध न लड़ने का निश्चय किया एवं उन्होंने इस तर्क को प्रस्तुत किया कि वे क्यों युद्ध नहीं करना चाहते हैं और कृष्ण ने उन्हें उनके कर्तव्यों को भगवत गीता के गीत या प्रवचनों के रूप में निर्वाह करने का उपदेश दिया । उन्होंने उन्हें एक ईश्वरत्व के सर्वोच्च सत्य का अनुभव कराया । कृष्ण ने अर्जुन में दिव्य चेतना का संचार किया और इस प्रकार अर्जुन स्वयं से देखने एवं अनुभव करने में सक्षम हुए कि कृष्ण सर्वोच्च ईश्वरत्व हैं जिसमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का निर्माण, पालन पोषण और विनाश होता है । इस दर्शन के बाद, अर्जुन ने कृष्ण को योगियों के योगी एवं जगत गुरु के रूप में संबोधित किया । यही उचित दर्शन एवं ज्ञान हैं जिसने अर्जुन के संबोधन के प्रकार कृष्ण के प्रति यादव एवं सखा से योगियों के योगी तथा जगतगुरु के रूप में परिवर्तित कर दिया ।  
                                                       
अर्जुन एक महान योद्धा थे और उनका निशाना  पक्का था । लेकिन वास्तविकता के प्रति उनका ज्ञान अपूर्ण था । वे जीवन एवं महाभारत के युद्ध में अपनी भूमिका को नहीं जानते थे । उन्हें इस बात का ज्ञान था कि कृष्ण ईश्वर हैं लेकिन इस सत्य को उन्होंने स्वयं में अनुभव नहीं किया । कृष्ण ने उन्हें ईश्वरत्व की सर्वोच्च शक्ति का अनुभव करने में सक्षम किया  । उसके बाद अर्जुन अपने कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्वों को समझने में सक्षम हुए और उन्होंने ठीक तरह से महाभारत के  युद्ध में धर्म के लिए एक योद्धा के रूप में अपनी भूमिका को निभाया । उन्होंने इस बात को भी जाना एवं मूल्यांकन किया कि ईश्वर स्वयं उनके मार्गदर्शक एवं सारथी हैं । 
                
जब परम गुरु हमारे जीवन में आते हैं, वे हमें ज्ञान तथा अध्यात्मिक अभ्यास प्रदान करते हैं । वे कृष्ण की तरह होते हैं और हम अर्जुन की तरह होते हैं । हम अनभिज्ञ होते हैं तथा जीवन में अपनी भूमिकाओं को नहीं जानते हैं ।  परमगुरु हमें उस दिन के लिए तैयार  करते हैं जब हम ईश्वरीय दर्शन प्राप्त करते हैं और स्वयं में सर्वोच्च वास्तविकता का अनुभव करने में सक्षम होते हैं । जैसे ही हम अपने नियमित अभ्यास से अधिक अनुभव प्राप्त करते हैं, हम जीवन में अपनी भूमिकाओं एवं उत्तरदायित्वों को समझने में सक्षम हो जाते हैं, हमारा तीसरा नेत्र या ज्ञान दृष्टि खुल जाती है तथा जीवन के प्रति हमारी विचारधारा परिवर्तित हो जाती है । जीवन  के प्रति हमारी पसंद तथा दृष्टिकोण में परिवर्तन हो जाता है और अधिक आनन्दमयी हो जाता है । अंततः तब हम इस बात को समझते में सक्षम हो जाते हैं कि हम कौन हैं और यह कि हम ईश्वर की सर्वोच्च सत्ता से एकाकार हैं । जब तक कि इस सत्य को नहीं जाना जाता है, हम अज्ञानता के कोहरे में भौतिक आनन्दों का पीछा करते हुए जीते हैं जो एक आरामदायक जीवन के लिए आवश्यक होती है । लेकिन कभी भी हमें परम संतुष्टि नहीं दे सकती है । 
                                  

रविवार, 7 जुलाई 2013

परम गुरु द्वारा निभाई गई भूमिकायें


परम गुरु परम योगी होते हैं जो ब्रह्माण्डीय शक्ति से अपनी आत्मा को जोड़े रहते हैं और उससे एकाकार होते हैं । जैसे कि ईश्वर विभिन्न स्वरूपों के माने जाते हैं एवं अपने भक्त की रक्षा के लिए भिन्न-२ भूमिकायें निभाते हैं । परम गुरु भी विभिन्न भूमिकाओं एवं स्वरूपों में अपने शिष्य तथा समाज की उन्नति के लिए माने जाते हैं । परम योगी शिष्य के लिए सबकुछ होते हैं । वे तत्क्षण की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु विभिन्न भूमिकाओं में माने जाते हैं । वे शिष्य तथा समाज की रक्षा हेतु सभी चार वर्ण/जाति ब्राह्मण (अध्यापक) क्षत्रिय (सुरक्षाकर्मी), वैश्य (किसान और व्यापारी) और शूद्र (सफाई कर्मी और मजदूर ) के रूप में भूमिका निभाते हैं । ये भूमिकाए मूलतः किये गए कार्य या एक व्यक्ति का उक्त कार्य के प्रति झुकाव के आधार पर निश्चित की गई थीं न की उसके जन्म के आधार पर । 
                 
एक ब्राह्मण के रूप में परम गुरु अपने शिष्य तथा संसार को  ज्ञान एवं शिक्षा देते हैं । परमगुरु द्वारा दिया गया ज्ञान प्रमाणित होता है क्योंकि यह आन्तिरिक अनुभवों पर आधारित होता है और कई हज़ार वर्ष पूर्व गुरु से शिष्य को सौंप दिया गया । एक क्षत्रिय के रूप में परमगुरु अपने शिष्य के आश्रयदाता होते हैं तथा एक समुदाय के भी । अतीत में परम गुरुओं ने व्यवहारिक युद्धकालीन कला और हथियारों तथा मंत्रों का प्रयोग करना सिखाया । गुरु वशिष्ठ ने राम को मंत्र के रहस्य और तीरंदाजी में प्रयोग किये जाने वाले मंत्रों को सिखाया था । वे अपने आश्रम के भी प्रभावकारी सुरक्षाकर्ता थे । एक वैश्य के रूप में परमगुरु आश्रम तथा उसके आश्रितों की उन्नति के लिए पर्याप्त धन कोष संग्रह करते हैं । एक शूद्र के रूप में परमगुरु विषाक्त पदार्थों , गंदगी और नकारात्मकता को शिष्य से दूर करते हैं , जो बुद्धिमान एवं अपनी साधना में नियमित होते हैं । परमगुरु का ज्ञान तथा ऊर्जा शिष्य के मानस से विचारों को बाहर निकालती है  और उच्च स्तर का ज्ञान  तथा शिक्षाओं को प्राप्त करने के लिये योग्य बनाती है । 
                               
श्रीकृष्ण परम योगी एवं परमगुरु थे ।  कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में जब उन्होंने भगवत गीता के सिद्धांतों को अर्जुन को सिखाया श्रीकृष्ण ज्ञान देने वाले एक ब्राह्मण थे । भगवत गीता हमें विविध पथों को सिखाती है जिसके द्वारा एक व्यक्ति ईश्वर तथा उन विभिन्न पथों को प्राप्त कर लेता है जिसमे एक व्यक्ति अच्छा तथा सफलतापूर्वक जीवन जीता है । एक क्षत्रिय के रूप में श्रीकृष्ण ने युद्धक्षेत्र में अर्जुन के जीवन को बचाने के लिए सुदर्शन चक्र उठाया । वे एक महान योद्धा तथा तीरंदाज़ थे जिन्हें कई मन्त्रों एवं युद्धकलाओं में महारत हासिल थी । उन्होंने कई युद्ध जरासंध तथा अन्य दानवों से मथुरा, वृन्दावन और उज्जैन के निरपराध उद्देश्यों की रक्षा के लिए किये ।  एक वैश्य के रूप में उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि द्वारका के खजाने में उद्धेश्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति तथा राज्य को चलाने के लिए पर्याप्त धन कोष था । उन्होंने अपने गुरु के आश्रम में सफाई सम्बन्धी कार्य किये एवं एक शूद्र की भूमिका निभाई । 
                 
मूलतः वर्ण व्यवस्था एक व्यक्ति द्वारा अपने व्यक्तिगत गुणों पर आधारित स्वभावों से मेल खाते कार्यों को निभाने के लिए बनाई गई थी । बाद में यह जाति व्यवस्था में परिवर्तित हो गई जिसमें किरदारों को जन्म से परिभाषित किया गया । परमगुरु किसी जाति से सम्बन्धित नहीं होते हैं । वे सभी भूमिका निभाते हैं जिसकी उन्हें आवश्यकता होती है । परमगुरु विशाल रूप से अपने शिष्य तथा मानवता के सुधार के लिए कार्य करते हैं ।