हम सब सर्वोच्च की वास्तविकता तथा जीवन के सत्य के परिप्रेक्ष्य में अज्ञानता के कोहरे में जीते हैं । अज्ञानता की यह पर्त हमें सर्वोच्च के सत्य एवं ब्रह्माण्ड की वास्तविकता से प्रथक करती है । हम सब सम्पूर्ण जीवन इस अज्ञानता से घिरे हुए जीते हैं । हमारे माता पिता एवं दादा दादी भी ऐसी अज्ञानता में जीते रहे हैं । इस प्रकार हमें सर्वोच्च की शक्ति और ईश्वरत्व का कोई ज्ञान नहीं होता है । हम लोग उन लोगों की तरह होते हैं जो स्थाई रूप से धुंधला द्रष्टिकोण रखते हैं और ऐसा कोई ज्ञान या सजगता नहीं रखते हैं जिसमे अल्प मात्रा में भी स्पष्ट दृष्टिकोण हो । हम लोग अपूर्ण जानकारी के गहरे धुंध में जीते हैं एवं अपने जीवन को ध्यानकेंद्रित दृष्टिकोण से परे देखते हैं । यह ध्यानकेंद्रित दृष्टिकोण से परे जीवन हमारे दृष्टिकोण एवं जीवन का लक्ष्य होता है जिसके लिए हमलोग अथक परिश्रम करते हैं और रात दिन दास बने रहते हैं ।
जब परमगुरु हमारे जीवन में आते हैं, वे हमें ज्ञान देते हैं और जीवन का उचित पथ हमें बताते हैं । जीवन का हमारा दृष्टिकोण परिवर्तित हो जाता है क्योंकि हम परम गुरु से ज्ञान को आत्मसात करते हैं । परमगुरु द्वारा प्रदान किया गया ज्ञान एवं अध्यात्मिक अभ्यास हमें जीवन के उचित दृष्टिकोण को प्राप्त करने के लिए तैयार करता है । इसे समझिये :-
अर्जुन पांडवों में सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर जानते थे कि कृष्ण सर्वोच्च ईश्वरत्व हैं । कृष्ण पांडवों के अनेक परीक्षणों एवं क्लेशों के कई वर्षों में आधार एवं सहायक थे । अर्जुन कृष्ण की चमत्कारिक शक्ति और उनकी असंभव से संभव करने की योग्यता को देख चुके थे । लेकिन उन्होंने स्वयं में अनुभव नहीं किया था और ना ही जाना था कि कृष्ण सर्वोच्च शक्ति हैं ।
कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन और सेनायें अपनी मात्रभूमि के लिए सभी तरह के युद्ध के लिए तैयार थीं । कृष्ण उनके सारथी थे । अर्जुन ने कृष्ण को स्वयं के लिए रणनीतिक योजना के दृष्टिकोण से दोनों सेनाओं की मजबूती देखने तथा आकलन करने के लिए रथ को दोनों सेनाओं के बीच में केंद्र बिंदु पर ले जाने के लिए कहा । जब वे सुरक्षात्मक स्थिति का अवलोकन कर रहे थे, वे कृष्ण से बात चीत कर रहे थे एवं उन्हें यादव एवं सखा के रूप में संबोधित कर रहे थे - यादव के रूप में कृष्ण यादव जाति से सम्बंधित थे और सखा तात्पर्य मित्र अर्जुन एवं कृष्ण के रूप में जो हम उम्र थे और अर्जुन कृष्ण को अपने सर्वश्रेष्ठ मित्र के रूप में मानते थे ।
अपनी वार्तालाप के दौरान अर्जुन ने युद्ध न लड़ने का निश्चय किया एवं उन्होंने इस तर्क को प्रस्तुत किया कि वे क्यों युद्ध नहीं करना चाहते हैं और कृष्ण ने उन्हें उनके कर्तव्यों को भगवत गीता के गीत या प्रवचनों के रूप में निर्वाह करने का उपदेश दिया । उन्होंने उन्हें एक ईश्वरत्व के सर्वोच्च सत्य का अनुभव कराया । कृष्ण ने अर्जुन में दिव्य चेतना का संचार किया और इस प्रकार अर्जुन स्वयं से देखने एवं अनुभव करने में सक्षम हुए कि कृष्ण सर्वोच्च ईश्वरत्व हैं जिसमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का निर्माण, पालन पोषण और विनाश होता है । इस दर्शन के बाद, अर्जुन ने कृष्ण को योगियों के योगी एवं जगत गुरु के रूप में संबोधित किया । यही उचित दर्शन एवं ज्ञान हैं जिसने अर्जुन के संबोधन के प्रकार कृष्ण के प्रति यादव एवं सखा से योगियों के योगी तथा जगतगुरु के रूप में परिवर्तित कर दिया ।
अर्जुन एक महान योद्धा थे और उनका निशाना पक्का था । लेकिन वास्तविकता के प्रति उनका ज्ञान अपूर्ण था । वे जीवन एवं महाभारत के युद्ध में अपनी भूमिका को नहीं जानते थे । उन्हें इस बात का ज्ञान था कि कृष्ण ईश्वर हैं लेकिन इस सत्य को उन्होंने स्वयं में अनुभव नहीं किया । कृष्ण ने उन्हें ईश्वरत्व की सर्वोच्च शक्ति का अनुभव करने में सक्षम किया । उसके बाद अर्जुन अपने कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्वों को समझने में सक्षम हुए और उन्होंने ठीक तरह से महाभारत के युद्ध में धर्म के लिए एक योद्धा के रूप में अपनी भूमिका को निभाया । उन्होंने इस बात को भी जाना एवं मूल्यांकन किया कि ईश्वर स्वयं उनके मार्गदर्शक एवं सारथी हैं ।
जब परम गुरु हमारे जीवन में आते हैं, वे हमें ज्ञान तथा अध्यात्मिक अभ्यास प्रदान करते हैं । वे कृष्ण की तरह होते हैं और हम अर्जुन की तरह होते हैं । हम अनभिज्ञ होते हैं तथा जीवन में अपनी भूमिकाओं को नहीं जानते हैं । परमगुरु हमें उस दिन के लिए तैयार करते हैं जब हम ईश्वरीय दर्शन प्राप्त करते हैं और स्वयं में सर्वोच्च वास्तविकता का अनुभव करने में सक्षम होते हैं । जैसे ही हम अपने नियमित अभ्यास से अधिक अनुभव प्राप्त करते हैं, हम जीवन में अपनी भूमिकाओं एवं उत्तरदायित्वों को समझने में सक्षम हो जाते हैं, हमारा तीसरा नेत्र या ज्ञान दृष्टि खुल जाती है तथा जीवन के प्रति हमारी विचारधारा परिवर्तित हो जाती है । जीवन के प्रति हमारी पसंद तथा दृष्टिकोण में परिवर्तन हो जाता है और अधिक आनन्दमयी हो जाता है । अंततः तब हम इस बात को समझते में सक्षम हो जाते हैं कि हम कौन हैं और यह कि हम ईश्वर की सर्वोच्च सत्ता से एकाकार हैं । जब तक कि इस सत्य को नहीं जाना जाता है, हम अज्ञानता के कोहरे में भौतिक आनन्दों का पीछा करते हुए जीते हैं जो एक आरामदायक जीवन के लिए आवश्यक होती है । लेकिन कभी भी हमें परम संतुष्टि नहीं दे सकती है ।