भक्ति ईश्वर के
प्रति प्रेम होती है | मानव विभिन्न कारणों से ईश्वर के प्रति भक्ति प्रदर्शित
करता है | कई प्रकार की भक्ति होती है | ईश्वर के प्रति भौतिक प्रेम होता है -
साकाम भक्ति और ईश्वर के प्रति अद्ध्यात्मिक प्रेम निष्काम भक्ति |
हम उन सभी
उपहारों के लिए ईश्वर की आराधना करते हैं जो वह हम पर बरसाता है | जब हम किसी
नौकरी या पदोन्नति के लिए प्रार्थना करते हैं, यह साकाम भक्ति होती है | हम ईश्वर
को खोजते हैं बीमारियों के इलाज के लिए, अच्छे स्वास्थ्य, एक प्यारी पत्नी, पुत्र,
पुत्री, वंशवाद को जारी रखने के लिए, घर, संपत्ति, व्यवसाय एवं अधिकाधिक रुपये,
द्रुतगामी कार, द्रुतगामी मोबाईल तथा सबसे तेज़ इन्टरनेट और कई ऐसी इच्छाओं के लिए
| हम एक अंतहीन इच्छाओं की सूची - दुकान सहित सम्पूर्ण जीवन ईश्वर के पीछे पड़े
रहते हैं | हम मंत्र जाप करते हैं, विभिन्न प्रकार की प्रार्थना करते हैं, गुरु,
मन्दिर, चर्च, एवं पवित्र स्थलों का दर्शन करते हैं, दान देते हैं और ईश्वर को
प्रसन्न रखने का प्रयत्न करते हैं ताकि वह हमें हमारी सदा की मांग प्रदान करे | हम
मे से अधिकांश साकाम भक्ति की श्रेणी में पड़े रहते हैं | अपनी इच्छाओं को प्राप्त
करने के लिए ईश्वर से मांगना एवं गंभीरता से प्रार्थना करना और अपनी इच्छाओं की
पूर्ति के लिए प्रार्थना करने में कुछ भी अनुचित नहीं है | मानव के पैरों में
गिरने के बजाय ईश्वर से मांगना और कठोर परिश्रम करना तथा अपनी पूजा के प्रसाद को
प्राप्त करना सदैव अधिक बेहतर होता है |
निष्काम भक्ति
ईश्वर के प्रेम के खातिर ईश्वर की आराधना करना है | इसमें कोई भी इच्छायें या
आकांक्षाये शामिल नहीं होती हैं | कोई भी क्रिसमस इच्छाओं की सूची नहीं होती है |
भक्त प्रेम के लिए ईश्वर से प्रेम करता है | इस क्ष्रेणी में बहुत थोड़े भक्त हैं |
जब भक्त अंततः यह समझ जाता है कि ईश्वर प्रदत्त उपहार लोगों की इच्छाओं की पूर्ति
कर सकता है लेकिन कभी भी चिरस्थायी शान्ति या प्रेम नहीं दे सकता जिसकी वह इच्छा
करता है | वह इच्छाओं की सूची से छुटकारा पा जाता है, वह ईश्वर के खातिर ईश्वर को
ढूंढता तथा प्रेम करता है | जब हम आन्तरिक रूप से ईश्वर से लगातार प्रेम का तालमेल
रखते हैं, हमारे जीवन में विशाल परिवर्तन स्थान लेता है | हम ईश्वर के प्रकाश एवं
प्रेम से परिपूर्ण हो जाते हैं | उनका (ईश्वर का) ज्ञान, सहानुभूति, अनासक्ति,
साहस, आशीर्वाद, संतुष्टि हमें पूर्ण कर देता है | हम कई सिद्धियाँ प्राप्त करते
हैं | हम स्वयं में सर्वोच्च शक्ति का अनुभव करते हैं एवं सभी प्राणियों में
उसे (ईश्वर को) देखते हैं |
एक दूसरा
वर्गीकरण भक्ति का अपरा एवं परा भक्ति है | अपरा भक्ति आरंभकर्ता के लिए होती है |
यह पूजा स्थल पर जाना, मोमबत्तियाँ जलाना, या अगरबत्तियां जलाना, पुष्प चढ़ाना और
प्रार्थना करना, खाद्य पदार्थ या नैवेध्य चढ़ाना, ईश्वर की पवित्र मूर्ति या पवित्र
ग्रन्थ या पवित्र उक्ति को श्रद्धा से ध्यान से देखना होता है | भक्त नियमित रूप
से प्रार्थना या अनुष्ठान अपने ईश्वर के प्रिय स्वरुप के लिए करता है और आश्वस्त
हो जाता है कि वह उस स्वरुप के माध्यम से सर्वोच्च को प्रसन्न कर सकता है ( वह
अपने द्रष्टिकोण में द्रण हो जाता है| ) वह ईश्वर के दूसरे स्वरुप या दूसरी प्रकार
की प्रार्थना को नहीं स्वीकार करेगा | वह विश्वास करता है कि वह दूसरों के
अपेक्षाकृत अपनी पूजापाठ से अधिक बेहतर है |
उसका ह्रदय
विस्तृत नहीं होता है | वह विचारधारा में संकुचित होता है उसमे एक उच्चकोटि का
अहंकार अद्ध्यात्मिक तकनीको के कारण भर जाता है , जिन तकनीकों का वह अभ्यास करता
है | हम अपने चारों तरफ ऐसे लोगों को पहचान सकते हैं |
ईश्वर की पूजा
किसी भी तरह और किसी भी ढंग से करना प्रतिफल देने वाला होता है | उसका फल जल्दी या
देर से प्राप्त ही हो जाता है | अपरा भक्ति के अधिक समय व्यतीत होने के बाद भक्त
में परा भक्ति उत्पन्न होती है | यह भक्ति का सर्वोच्च रूप होती है, जहाँ भक्त
ईश्वर को ब्रहमाण्ड में सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी के रूप में देखता है | उसे उस
सत्य का ज्ञान एवं अनुभव हो जाता है कि ईश्वर की शक्ति ब्रह्माण्ड में सभी
स्वरूपों में प्रत्येक जगह विराजमान है | वह ईश्वर का प्रकाश हर जगह देखता है |
प्रत्येक साँस जो वह लेता है, प्रत्येक गतिविधि जो वह करता है, प्रत्येक समय जिस
जल को वह ग्रहण करता है या भोजन करता है - सभी में उसे ईश्वर की कृपा का स्मरण
रहता है | उसका मस्तिष्क सदैव जीवन के प्रत्येक क्षण एवं क्रियाकलाप के दौरान
ईश्वर की आन्तरिक आराधना में संलिप्त रहता है | प्रत्येक पत्ती जो मन्द वायु में
स्पंदन करती है एवं प्रत्येक पुष्प जो खिलता है, उसके चेहरे पर सूर्य के प्रकाश का
अनुभव एवं उसके शरीर में स्पंदन उसकी आत्मा को विनम्र बनाती है और ईश्वर के प्रति
प्रेम तथा कृतज्ञता को प्रस्तुत करने वाला बनाती है |
भक्ति गौड़ एवं
मुख्य भक्ति में विभाजित होती है | गौड़ भक्ति भौतिक एवं निम्न कोटि की होती है |
मुख्य भक्ति उच्च कोटि की भक्ति होती है |
हम सभी निम्न
क्ष्रेणी से आरम्भ करते हैं और धीरे धीरे उच्च क्ष्रेणी की भक्ति की ओर अग्रसर
होते है | निरन्तर अभ्यास एवं अनुशासन आवश्यक होता है | यदि हमें ईश्वर के उच्च
कोटि के प्रेम के लक्ष्य को प्राप्त करने की आवश्यकता होती है, हमारा अहंकार एवं
हमारी अनन्त इच्छायें ईश्वर के खातिर ईश्वर के प्रेम के लिए आज्ञा नहीं देती है |
हम ईश्वर से व्यापारिक सम्बन्ध रखते हैं जहाँ हम मनोकामनाओं की सूची प्रस्तुत करते
है तथा प्रार्थना या पूजा उसे पाने के लिए करते हैं और ईश्वर तथा ईश्वर की सहायता
से भी यदि एक इच्छा निर्दिष्ट मानकों के अनुरुप नहीं प्राप्त होती | हमारा अहंकार
इसे स्वीकारने की आज्ञा नहीं देगा कि जो कुछ भी ईश्वर के द्वारा दिया गया है वह
हमारी अच्छाई के लिए होता है | हम आश्वस्त हो जाते हैं कि हम जानते हैं कि हमारे
लिए सबसे अच्छा क्या है एवं उसकी ईश्वर से मांग करते हैं | क्रोध, लालसा, तृष्णा,
अहंकार, तामसिकता, आसक्ति हमारे ह्रदय एवं मस्तिष्क में भरी होती है एवं ईश्वर की
उपस्थिति को प्रकट करने की आज्ञा नहीं देती है | हमें सीताराम मंत्र के सिद्ध
मंत्र एवं ध्यान के प्रति समर्पित रहने की आवश्यकता होती है एवं मस्तिष्क की
अनियमितताओं पर काबू पाने की आवश्यकता होती है | केवल जब ये अवगुण हमें छोड़ देते
हैं, हम शान्त तथा स्वस्थ रहते हैं | तब हम अपनी पूजा पर ध्यान केन्द्रित कर सकते
हैं तथा ईश्वर के खातिर ईश्वर से प्रेम करना सीख सकते हैं |