Amrit Dhara - Dhyanyogi Omdasji

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गुरुवार, 5 नवंबर 2015

दत्तात्रेय के २४ गुरु

परमेश्वर के तीन मुख्य कार्य होते हैं :- निर्माण, भरण पोषण एवं विनाश | ये क्रियाकलाप सनातन हैं | हिन्दू धर्म में ईश्वर के ये कार्य भगवान् ब्रह्मा - निर्माणकर्ता, भगवान् विष्णु - पालनकर्ता, भगवान् शिव - विनाशक के रूप में नामांकित किये गए हैं | एक समय था जब ईश्वर के ये तीन स्वरुप मानव जाति की अगुवाई करने के उद्देश्य से ईश्वर को पुनः पृथ्वी पर प्रकट करने के लिए एकाकार हुए थे | यह अवतार दत्तात्रेय नामक था | वे योगाचार्य थे | वे आदि गुरु थे या नाथ एवं परमगुरु दोनों के रूप में पूजे जाते थे |

दत्तात्रेय ने हमें सचेत होना एवं सतर्कता से रहना सिखाया | वे सत्य में रहे तथा सत्य को सिखाया | जैसे ही वो जीवन की ओर अग्रसर हुए, उन्होंने बहुत सी बातों का अवलोकन किया एवं सीखा | दत्तात्रेय २४ गुरुओं को बताते हैं जिनसे उन्होंने महत्वपूर्ण शिक्षा ग्रहण की : पृथ्वी, हवा / साँस, आकाश, अग्नि, सूर्य, कबूतर, अजगर, समुद्र, कीट पतंग, हाथी, चीटी, मछली, पिंगला- वैश्या, तीर- रचनाकार, शिशु, चंचल लड़का, चंद्रमा, मधुमक्खी, हिरण, शिकारी पक्षी, अपरणीता, सर्प, मकड़ी, इल्ली और जल |

दत्तात्रेय ने अपने चारों ओर सजीव एवं निर्जीव वस्तुओं से ग्रहण किया एवं सीखा | वे उनके गुरु थे | पृथ्वी से उन्होंने धैर्यवान होना सीखा, हवा से उन्होंने इस संसार में दुःख तथा सुख से प्रभावित हुए बिना रहना सीखा जैसे कि हवा अच्छी एवं बुरी गंध से छुटकारा पा जाती है जब वह बहती है | स्वयं में शुद्ध एवं अनासक्त होना उन्होंने आकाश से सीखा जो बादलों से प्रभावित नहीं होता है ; अग्नि से उन्होंने सीखा कि वह प्रत्येक चीज़ को एक समान राख में जला देती है ठीक उसी तरह जैसे एक आत्मसाक्षात्कार प्राप्त व्यक्ति प्रकट रूपों तथा संपत्तियों को माया के रूप में नकार देता है और अपने मूल स्वरुप को जान जाता है ; सूर्य से उन्होंने सीखा जो प्रकृति में कई स्वरूपों को हमारे दृष्टिगोचर के लिए उजागर कर देता है ठीक उसी प्रकार जैसे एक साधु जो अपने शिष्यों के लिए सभी वस्तुओं की वास्तविक प्रकृति को उजागर कर देता है ; कबूतरों के परिवार से उन्होंने सीखा जो आसक्ति के कारण एक दूसरे के लिए अपना जीवन त्याग देते हैं शिक्षा यह है कि हमें अधिकार की भावना के मकड़जाल में जकड़े नहीं रहना चाहिए एवं स्वयं का अध्यात्मिक विनाश नहीं करना चाहिए |

उन्होंने अजगर से सीखा जो एक स्थान में पड़ा रहता है तथा जो कुछ भी वह पाता है पकड़ता एवं खाता है, एक मनुष्य को ज्ञान की खोज में सुख के पीछे भागने से प्रथक रहना चाहिए , और जो कुछ भी वह अनायास पाता है, संतोष के साथ स्वीकारना चाहिए ; समुद्र से उन्होंने सीखा कि जो सभी नदियों का पानी लेता है लेकिन इंच भी ऊपर नहीं उठता, उन्होंने सीखा कि प्रसन्नता से बहुत उछलना तथा जीवन के अवसाद से ग्रस्त नहीं होना चाहिए ; कीट पतंगों से जो अग्नि में उछल जाते हैं एवं जल जाते हैं , उन्होंने ज्ञान की अग्नि में कूदना और माया रुपी जीवन को जलाना सीखा ; चींटी से जो बिना थके भोजन के संग्रह हेतु कार्य करती है, उन्होंने उदाहरण देखा कि कैसे बाधाओं पर काबू पाया जाता है और बिना थके आत्मसाक्षात्कार की ओर कार्य करना है ; मछली से जो कीड़े के कारण काँटे में फँस जाती है , उन्होंने सीखा कि स्वादिष्ट भोजन की लालसा में फंसे नहीं रहना चाहिए और इस प्रकार स्वाद पर नियंत्रण रखना चाहिए |

 पिंगला वेश्या अपनी दिव्य भावना को नकारती है तथा अपने जीवन को सांसारिक आनन्दों में बर्बाद करती है, जब अपनी भूल जान जाती है तथा पश्यताप करती है ; ठीक उसी प्रकार एक बुद्धिमान मनुष्य को समझना चाहिए कि भौतिक वस्तुओं का आत्मत्याग अनंत आनन्द को साकार करने का मार्ग दिखलाता है ; तीर निर्माता से जो अपने कार्य में इतना तल्लीन था कि उसने जाते हुए जुलूस पर ध्यान नहीं दिया, उन्होंने सीखा कि हमें आत्मसाक्षात्कार पर एकल विचारयुक्त होकर ध्यान केन्द्रित करना सीखना चाहिए ; चंचल लड़के जो किसी चीज़ की परवाह नहीं करता है लेकिन स्वयं में प्रसन्न रहता है, उन्होंने सीखा कि ठीक उसी तरह एक बुद्धिमान व्यक्ति स्वयं में प्रसन्न रहता है ; चंद्रमा से उन्होंने सीखा जो सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित होता है , ठीक उसी तरह जैसे हमारी आत्मा ईश्वर के प्रकाश से प्रकाशित होती है ; मधुमक्खी से उन्होंने सीखा जो केवल फूलों का मधु चूसती है , ठीक उसी तरह सभी पवित्र ग्रंथों को पढ़कर केवल चित्त में वही रखना चाहिए जो हमारी आध्यात्मिक अभ्यासों के लिए आवश्यक हो ; हिरण से उन्होंने सीखा जो संगीत से पकड़ा जाता है उसी प्रकार एक आध्यात्मिक आकांक्षी जो एक धर्म निरपेक्ष संगीत की कमजोरी रखता है उसी के द्वारा पकड़ा जाता है |

 शिकारी पक्षी से उन्होंने सीखा जो अन्य पक्षियों के आक्रमण से बचने के लिए मरे हुए चूहे को छोड़ देता है - ठीक उसी तरह एक बुद्धिमान व्यक्ति को शांति में रहने के लिए सांसारिक इच्छाओं से छुटकारा पा जाना चाहिए ; एक अविवाहिता से उन्होंने सीखा जो हाँथ में एक चूड़ी के अतिरिक्त बाकी सभी से अछूती रहती है इसलिए कि अफवाहें उड़े ठीक उसी तरह एक बुद्धिमान व्यक्ति एकांत में रहता है ताकि वह अफवाहों एवं गपशपों से मुक्त रह सके एवं एकाग्रचित्त होकर साधना कर सके ; साँप से उन्होंने सीखा जो केचुल छोड़ देता है जब नवीन शरीर तैयार होता है - ठीक उसी प्रकार मृत्यु के समय , एक बुद्धिमान व्यक्ति अपने शरीर का पुराने वस्त्रों को त्यागने की भांति त्याग कर देता है एवं एक नवीन शरीर धारण कर लेता है ; मकड़ी से उन्होंने सीखा जो जाला उगलती है तथा जाला बुनती है बाद में जाला को स्वयं में खींच लेती है ठीक उसी प्रकार परमात्मा स्वयं से ब्रह्मांड का निर्माण करते हैं और उसे प्रलय के समय स्वयं में समाहित भी कर लेते हैं ; कमला से उन्होंने सीखा जो ततैया की भनभनाहट करने पर केन्द्रित है और अंत में एक ततैया हो जाता है ठीक उसी प्रकार शिष्य का ध्यान गुरु के आकर्षण तथा गुणों पर केन्द्रित होता है वह भी गुरु की तरह हो जाता है ; जल से उन्होंने सीखा जो सभी को उनकी प्यास बुझाने के लिए परोसा जाता है और फिर भी वह ऊपर से नीचे की ओर बहता है - ठीक उसी प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति सभी की सेवा करता है और फिर भी विनम्र तथा ईश्वर का एक सेवक रहता है |


 दत्तात्रेय सभी परम्पराओं के श्रोत हैं और उन्होंने सभी अध्यात्मिक मार्गों को अपनाया | उन्होंने सत्य धर्म की सार्वभौमिकता को फैलाया | जब हम सत्य के मार्ग पर चलते हैं , हम दत्तात्रेय के मार्ग पर चलते हैं | हम किसी धर्म या सम्प्रदाय से सम्बंधित हो सकते हैं , परन्तु हमें अंततः दत्तात्रेय के मार्गदर्शन के तहत आना होगा जो समस्त मानव जाति के गुरु हैं | वे मानव एवं देवत्व के मध्य एक कड़ी हैं |

रविवार, 9 अगस्त 2015

प्रसन्नता स्वयं के अन्दर है


सभी साधु एवं गुरु हमें बताते हैं कि प्रसन्नता हमारे अन्दर है | अपने अन्दर प्रसन्नता को ढूँढना कठिन होता है, परन्तु बाहर प्रसन्नता को ढूँढना असंभव है | यह एक विरोधाभास की भांति प्रतीत होता है, परन्तु यह सत्य है | हमारा सम्पूर्ण जीवन बाहर की ओर प्रसन्नता को ढूँढने के उद्धेश्य से लगा होता है एवं तैयार होता है | अपने प्रयासों के माध्यम से हम प्रसन्नता प्राप्त करते हैं | लेकिन ये अल्प समय के लिए होता है और पुनः हम अप्रसन्न हो जाते हैं |

लोग सामान्यतः अनुभव करते हैं कि धन, शक्ति और प्रसिद्धि प्रसन्नता के मुख्य सूचक हैं | यह सत्य है कि धन, शक्ति और प्रसिद्धि अल्प समय के लिए एक स्तर की संतुष्टि दे सकती है | परन्तु यदि यह कथन पूर्णतयः सत्य था तब वो सभी जिन्होंने उक्त सभी को प्राप्त कर लिया है, उन्हें पूर्ण रूप से प्रसन्न होना चाहिए | हम जानते हैं कि ऐसा नहीं है |
                                                    
हमारे सभी भौतिक एवं मानसिक प्रयत्न हमारा समय तथा धन, हमारे सम्बन्ध प्रसन्नता को प्राप्त करने के इर्द गिर्द होते हैं | हम निरंतर इसके पीछे पड़े रहते हुए प्रतीत होते हैं | हम संसार की अधिकाधिक वस्तुओं को संग्रह करना जारी रखते हैं | ये हमे कुछ समय के लिए संतुष्टि देती है | तब पुनः हम अपनी प्रसन्नता को खो देते हैं, तथा हम दूसरे प्रकार के प्रयत्न उद्धयोग तथा संग्रह के चक्रों को आरम्भ करते हैं |
              
हम कब यह जान पाएंगे कि प्रसन्नता उन चीजों में निहित नहीं हैं | क्या वस्तुएँ हमें प्रसन्नता को देने की अंतर्निहित क्ष्रमता प्रदान करती हैं ? क्या चिकन का टुकड़ा सभी को एक समान खाने का आनन्द देता है ? क्या लोग एक समान आम को चखने तथा खाने के दौरान अन्तर महसूस करते हैं ? क्या चिकन और आम में स्वनिर्मित ऐसे गुण निहित होते हैं, जो सभी को एकसमान प्रसन्नता प्रदान करे | क्या विद्युत रहित गाँव में एक निरक्षर व्यक्ति प्रसन्न होगा यदि उसे अत्याधुनिक लेपटॉप प्रदान किया जाय ? क्या एक गुब्बारे को एक बच्चे तथा वयस्क को पाने की प्रसन्नता एक समान होगी ?
                               
हमें तनिक सोंचने की आवश्यकता है | क्या उन विशेष वस्तु का स्वामित्व जैसे एक कार प्रत्येक व्यक्ति को एक समान प्रसन्नता देता है ? क्या प्रत्येक व्यक्ति जो एक भौतिक वस्तु के सम्पर्क में आता है, समान संतुष्टि तथा संतोष के भाव को अनुभव करता है ? यहाँ तक कि एक ही व्यक्ति के लिए, क्या वह उस भौतिक वस्तु के साथ लम्बी समयावधि तक अनवरत प्रसन्नता रखता है ? नहीं | ऐसा नहीं है | हम एस सत्य को जान सकते हैं जब हम इसके बारे में सोंचते हैं | हम में से अधिकांश सत्य से वास्तव में अवगत होते हैं | तब हम लोग क्यों अपने बाहर की प्रसन्नता एवं भौतिक वस्तुओं में निरंतर पड़े रहते हैं ?
                 
उत्तर है कि हम यह नहीं जानते हैं कि प्रसन्नता हमारे अन्दर है | यदि हमने इसके बारे में सुन लिया है या पढ़ लिया है या अंततः उस सारांश को पा भी लिया है, हम नहीं जानते कि कैसे अपने अन्दर जाया जाय तथा प्रसन्नता को ढूंढा जाये | प्रत्येक धर्म हमें सिखाता है कि हमे अपने अन्दर जाना चाहिए | क्योंकि प्रसन्नता का स्रोत हमारे अन्दर ईश्वर की चिंगारी हमारी आत्मा होती है | ईश्वर आनन्द होता है | आत्मा का स्वभाव आनन्द होता है | यह आनन्द जब खुल जाता है, तेज़ी से चमकता है और हमें हर समय प्रसन्न बनाये रखता है |
                    
यह तब होता है जहाँ एक परम गुरु खोजकर्ता की सहायता करते हैं | जब हमारे पास एक परमगुरु होता है और हम मंत्र जाप तथा ध्यान का अभ्यास करते हैं, हम अपने अन्दर जाते हैं तथा अपने मस्तिष्क एवं विचारों का अवलोकन करते हैं | हम बाहर से अन्दर की ओर का अवलोकन करते हुए अवस्था बदलते हैं | गुरु मंत्र की तरंगे हमारे अन्दर के विकारों को शुद्ध एवं स्वच्छ करती हैं और हम विचारों के नमूनों तथा अपनी प्रतिक्रियाओं को देख सकते हैं | जब हमारी आंतरिक क्रियाकलापों की समझ बढती है तब अज्ञानता की परतों से छुटकारा पाना जो आत्मा को ढके होती है तथा आत्मा के प्रकाश को देखना एवं अपने अन्दर हर समय आनन्द का अनुभव करना आसान हो जाता है |
                                            
जिन लोगों के पास गुरु नहीं होता है वे स्वयं से अपने अन्दर देखना तथा अपने विचारों का अनुपालन करना सीखते हैं | तुम उभरते हुए विचारों के नमूनों को देखोगे तथा समझोगे | तुम इस ज्ञान को प्राप्त कर लोगे कि क्या पकड़ कर रखना तथा किससे छुटकारा पाना है | जब तुम्हारी ईश्वर तथा सत्य से इच्छाशक्ति दृढ़ हो जाती है, तुम्हारे गुरु तुम्हारे पास आयेंगे और आगे तुम्हारा मार्गदर्शन करेंगे | स्मरण रहे कि केवल आंतरिक प्रसन्नता स्थायी होती है | क्यों की वह आत्मा से सम्बंधित होती है और आत्मा ईश्वर की एक चिंगारी होती है, जो सनातन है | यह सत्य तुम्हे स्वयं के अन्दर जाने में शक्ति प्रदान करेगा एवं तुम्हारी स्वयं सहायता करेगा |

बुधवार, 27 मई 2015

विभिन्न प्रकार की भक्ति

भक्ति ईश्वर के प्रति प्रेम होती है | मानव विभिन्न कारणों से ईश्वर के प्रति भक्ति प्रदर्शित करता है | कई प्रकार की भक्ति होती है | ईश्वर के प्रति भौतिक प्रेम होता है - साकाम भक्ति और ईश्वर के प्रति अद्ध्यात्मिक प्रेम निष्काम भक्ति |

हम उन सभी उपहारों के लिए ईश्वर की आराधना करते हैं जो वह हम पर बरसाता है | जब हम किसी नौकरी या पदोन्नति के लिए प्रार्थना करते हैं, यह साकाम भक्ति होती है | हम ईश्वर को खोजते हैं बीमारियों के इलाज के लिए, अच्छे स्वास्थ्य, एक प्यारी पत्नी, पुत्र, पुत्री, वंशवाद को जारी रखने के लिए, घर, संपत्ति, व्यवसाय एवं अधिकाधिक रुपये, द्रुतगामी कार, द्रुतगामी मोबाईल तथा सबसे तेज़ इन्टरनेट और कई ऐसी इच्छाओं के लिए | हम एक अंतहीन इच्छाओं की सूची - दुकान सहित सम्पूर्ण जीवन ईश्वर के पीछे पड़े रहते हैं | हम मंत्र जाप करते हैं, विभिन्न प्रकार की प्रार्थना करते हैं, गुरु, मन्दिर, चर्च, एवं पवित्र स्थलों का दर्शन करते हैं, दान देते हैं और ईश्वर को प्रसन्न रखने का प्रयत्न करते हैं ताकि वह हमें हमारी सदा की मांग प्रदान करे | हम मे से अधिकांश साकाम भक्ति की श्रेणी में पड़े रहते हैं | अपनी इच्छाओं को प्राप्त करने के लिए ईश्वर से मांगना एवं गंभीरता से प्रार्थना करना और अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करने में कुछ भी अनुचित नहीं है | मानव के पैरों में गिरने के बजाय ईश्वर से मांगना और कठोर परिश्रम करना तथा अपनी पूजा के प्रसाद को प्राप्त करना सदैव अधिक बेहतर होता है |

निष्काम भक्ति ईश्वर के प्रेम के खातिर ईश्वर की आराधना करना है | इसमें कोई भी इच्छायें या आकांक्षाये शामिल नहीं होती हैं | कोई भी क्रिसमस इच्छाओं की सूची नहीं होती है | भक्त प्रेम के लिए ईश्वर से प्रेम करता है | इस क्ष्रेणी में बहुत थोड़े भक्त हैं | जब भक्त अंततः यह समझ जाता है कि ईश्वर प्रदत्त उपहार लोगों की इच्छाओं की पूर्ति कर सकता है लेकिन कभी भी चिरस्थायी शान्ति या प्रेम नहीं दे सकता जिसकी वह इच्छा करता है | वह इच्छाओं की सूची से छुटकारा पा जाता है, वह ईश्वर के खातिर ईश्वर को ढूंढता तथा प्रेम करता है | जब हम आन्तरिक रूप से ईश्वर से लगातार प्रेम का तालमेल रखते हैं, हमारे जीवन में विशाल परिवर्तन स्थान लेता है | हम ईश्वर के प्रकाश एवं प्रेम से परिपूर्ण हो जाते हैं | उनका (ईश्वर का) ज्ञान, सहानुभूति, अनासक्ति, साहस, आशीर्वाद, संतुष्टि हमें पूर्ण कर देता है | हम कई सिद्धियाँ प्राप्त करते हैं | हम स्वयं में सर्वोच्च शक्ति का अनुभव करते हैं एवं सभी प्राणियों में उसे  (ईश्वर को) देखते हैं |

एक दूसरा वर्गीकरण भक्ति का अपरा एवं परा भक्ति है | अपरा भक्ति आरंभकर्ता के लिए होती है | यह पूजा स्थल पर जाना, मोमबत्तियाँ जलाना, या अगरबत्तियां जलाना, पुष्प चढ़ाना और प्रार्थना करना, खाद्य पदार्थ या नैवेध्य चढ़ाना, ईश्वर की पवित्र मूर्ति या पवित्र ग्रन्थ या पवित्र उक्ति को श्रद्धा से ध्यान से देखना होता है | भक्त नियमित रूप से प्रार्थना या अनुष्ठान अपने ईश्वर के प्रिय स्वरुप के लिए करता है और आश्वस्त हो जाता है कि वह उस स्वरुप के माध्यम से सर्वोच्च को प्रसन्न कर सकता है ( वह अपने द्रष्टिकोण में द्रण हो जाता है| ) वह ईश्वर के दूसरे स्वरुप या दूसरी प्रकार की प्रार्थना को नहीं स्वीकार करेगा | वह विश्वास करता है कि वह दूसरों के अपेक्षाकृत अपनी पूजापाठ से अधिक बेहतर है |

उसका ह्रदय विस्तृत नहीं होता है | वह विचारधारा में संकुचित होता है उसमे एक उच्चकोटि का अहंकार अद्ध्यात्मिक तकनीको के कारण भर जाता है , जिन तकनीकों का वह अभ्यास करता है | हम अपने चारों तरफ ऐसे लोगों को पहचान सकते हैं |

ईश्वर की पूजा किसी भी तरह और किसी भी ढंग से करना प्रतिफल देने वाला होता है | उसका फल जल्दी या देर से प्राप्त ही हो जाता है | अपरा भक्ति के अधिक समय व्यतीत होने के बाद भक्त में परा भक्ति उत्पन्न होती है | यह भक्ति का सर्वोच्च रूप होती है, जहाँ भक्त ईश्वर को ब्रहमाण्ड में सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी के रूप में देखता है | उसे उस सत्य का ज्ञान एवं अनुभव हो जाता है कि ईश्वर की शक्ति ब्रह्माण्ड में सभी स्वरूपों में प्रत्येक जगह विराजमान है | वह ईश्वर का प्रकाश हर जगह देखता है | प्रत्येक साँस जो वह लेता है, प्रत्येक गतिविधि जो वह करता है, प्रत्येक समय जिस जल को वह ग्रहण करता है या भोजन करता है - सभी में उसे ईश्वर की कृपा का स्मरण रहता है | उसका मस्तिष्क सदैव जीवन के प्रत्येक क्षण एवं क्रियाकलाप के दौरान ईश्वर की आन्तरिक आराधना में संलिप्त रहता है | प्रत्येक पत्ती जो मन्द वायु में स्पंदन करती है एवं प्रत्येक पुष्प जो खिलता है, उसके चेहरे पर सूर्य के प्रकाश का अनुभव एवं उसके शरीर में स्पंदन उसकी आत्मा को विनम्र बनाती है और ईश्वर के प्रति प्रेम तथा कृतज्ञता को प्रस्तुत करने वाला बनाती है |

भक्ति गौड़ एवं मुख्य भक्ति में विभाजित होती है | गौड़ भक्ति भौतिक एवं निम्न कोटि की होती है | मुख्य भक्ति उच्च कोटि की भक्ति होती है |

हम सभी निम्न क्ष्रेणी से आरम्भ करते हैं और धीरे धीरे उच्च क्ष्रेणी की भक्ति की ओर अग्रसर होते है | निरन्तर अभ्यास एवं अनुशासन आवश्यक होता है | यदि हमें ईश्वर के उच्च कोटि के प्रेम के लक्ष्य को प्राप्त करने की आवश्यकता होती है, हमारा अहंकार एवं हमारी अनन्त इच्छायें ईश्वर के खातिर ईश्वर के प्रेम के लिए आज्ञा नहीं देती है | हम ईश्वर से व्यापारिक सम्बन्ध रखते हैं जहाँ हम मनोकामनाओं की सूची प्रस्तुत करते है तथा प्रार्थना या पूजा उसे पाने के लिए करते हैं और ईश्वर तथा ईश्वर की सहायता से भी यदि एक इच्छा निर्दिष्ट मानकों के अनुरुप नहीं प्राप्त होती | हमारा अहंकार इसे स्वीकारने की आज्ञा नहीं देगा कि जो कुछ भी ईश्वर के द्वारा दिया गया है वह हमारी अच्छाई के लिए होता है | हम आश्वस्त हो जाते हैं कि हम जानते हैं कि हमारे लिए सबसे अच्छा क्या है एवं उसकी ईश्वर से मांग करते हैं | क्रोध, लालसा, तृष्णा, अहंकार, तामसिकता, आसक्ति हमारे ह्रदय एवं मस्तिष्क में भरी होती है एवं ईश्वर की उपस्थिति को प्रकट करने की आज्ञा नहीं देती है | हमें सीताराम मंत्र के सिद्ध मंत्र एवं ध्यान के प्रति समर्पित रहने की आवश्यकता होती है एवं मस्तिष्क की अनियमितताओं पर काबू पाने की आवश्यकता होती है | केवल जब ये अवगुण हमें छोड़ देते हैं, हम शान्त तथा स्वस्थ रहते हैं | तब हम अपनी पूजा पर ध्यान केन्द्रित कर सकते हैं तथा ईश्वर के खातिर ईश्वर से प्रेम करना सीख सकते हैं |