Amrit Dhara - Dhyanyogi Omdasji

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बुधवार, 9 अप्रैल 2014

सम्बन्धों में कुंठाओं पर काबू पाना

हम जीवन में कई समस्याओं का सामना करते हैं | उनमे से एक संबंधों में कुंठा है | हम नहीं जानते हैं कि उनसे कैसे निपटा जाए | ऐसी कुंठायें हमारे मस्तिष्क में स्वयं से रात दिन बार-२ आती हैं और हमें शांति से रहने नहीं देती या रात्रि में सोने नहीं देती हैं | वे हमारी प्रगति के लिए भौतिक एवं आध्यात्मिक जीवन में बाधाएं हैं | हम अपने मस्तिष्क में इतनी अधिक कुंठाओं के साथ मंत्र जाप एवं ध्यान नहीं कर सकते हैं | हम सभी को अपने सम्बन्धों को सुद्रढ़ करने के लिए, अपने जीवन के उत्थान के लिए एवं अपने आध्यात्मिक जीवन को सुधारने के लिए उनसे (कुंठाओं से) सामना करना सीखना चाहिए |
                                        
कुंठा क्रोध का एक स्वरुप होता है | क्रोध तब आता है जब लोग हमारी आशाओं के अनुरुप बोलते, कार्य करते या प्रदर्शन नहीं करते हैं | कुंठा चरमोत्कर्ष पर होती है जब हम आशानुरूप परिणाम नहीं प्राप्त करते हैं जो हम लोगों में ढूंढते हैं | हम स्वयं को कुंठाग्रस्त पाते हैं जब हम अपनी योजनानुसार प्राप्त करने, कार्य करने या आचरण में भविष्यवाणी करने में या इच्छाओं में अक्षम होते हैं | यह अत्यंत कष्टप्रद होता है | क्योंकि यह असफलता का सूचक होता है | हम योजना बनाते हैं और सावधानी से उस पर अमल करते हैं और आशानुरूप अपेक्षित परिणाम नहीं पाते हैं |  हम असफल जैसा महसूस करते हैं | हम अपना आत्म सम्मान एवं आत्मविश्वास खो देते हैं | और यह हमारे जीवन में और अधिक क्रोध तथा कुंठा भर देता है |
           
सम्बन्धों में कुंठा पर काबू पाने के लिए हमें दो बातों को समझना चाहिए : अतीत को परिवर्तित या पूर्ववत नहीं किया जा सकता है और लोगों को बदला नहीं जा सकता है |
       
इसलिए हमें अतीत से बाहर आना सीखना चाहिए और इस बात को पकड़े नहीं बैठना चाहिए कि वहां क्या किया गया है या किया जा सकता है | हम अतीत का विश्लेषण करने में अधिकाधिक समय व्यतीत करते हैं | हम स्वयं को या दूसरों को अतीत की पीड़ा के लिए या अतीत में परिणामों के अभाव के लिए दोषारोपित करते हैं | लेकिन अतीत अतीत होता है | गुज़रे हुए अतीत का कोई भाग किसी की सहायता नहीं कर सकता है | यह केवल हमारे रक्तचाप को बढाता है और हम जो किया जा सकता था उसके अन्तहीन तर्क वितर्कों में लिप्त रहते हैं | इस बात को समझें कि कुछ भी नहीं किया जा सकता है उसके बारे में जो समाप्त हो चुका है | हम केवल अतीत से शिक्षा ले सकते हैं और उसपर क्रियान्वन कर सकते हैं | लेकिन अतीत को पूर्ववत नहीं किया जा सकता है | माता पिता को एक दूसरे पर , बच्चों पर या परिवार में अन्य पर अतीत की घटनाओं के लिए दोषारोपण नहीं करना चाहिए | हमें अतीत की घटनाओ एवं उनके परिणामों को स्वीकारना चाहिए जो पहले ही घटित हो चुका है और जा चुका है  |
                          
लोग परिवर्तित नहीं होते हैं | हमें इस कठोर सच्चाई को सीखना एवं स्वीकार करना चाहिए | हम स्वयं को परिवर्तित करने में इसमें असमर्थ पाते हैं | हम दूसरों से उनको परिवर्तित करने की आशा कैसे कर सकते हैं | हमें स्वयं को परिवर्तित करना सीखना चाहिए ताकि हम इस बात से आहत ना हों कि कैसे दूसरे जीवन में व्यवहार करते हैं या कार्य करते हैं | माता बच्चे को कठोर परिश्रमी, आज्ञाकारी, प्रिय, कुशाग्र एवं विद्यालय में मेधावी बना हुआ चाहती हैं | बच्चा माता को कम चिड़चिड़ी, मधुर भाषी, उसके प्रिय आहार को पकाने वाली और उन बातों के पीछे ना पड़ने वाली जो वह चाहता न हो , चाहता है | पति अपनी पत्नी को अधिक शान्तिप्रिय, प्रसन्नचित्त, स्वच्छ, नम्र तथा एक बेहतर रसोइया चाहता है | पत्नी स्वयं के पीछे चलने वाला, खर्राटे न भरने वाला , अधिक कमाने वाला एवं घर के काम में हाँथ बंटाने वाला पति चाहती है | परिवार में सभी सदस्यों के प्रति हमारी आशाओं की सूची अंतहीन होती है | हम अपनी शक्ति एवं पद का दुरुप्रयोग करते हैं और दूसरों को गंभीर परिणामों के साथ धमकाते हैं यदि वे परिवर्तित नहीं होते हैं | भावात्मक, विश्वासघात एक दूसरा हथियार है जो दूसरों को स्वीकार्य व्यवहारिक स्वरूपों में बाध्य किया करता है | लिंग भेद में - मैं पुरुष हूँ और तुम्हे मेरा अनुसरण करना चाहिए या मैं स्त्री हूँ तथा मैं कमज़ोर हूँ और इस प्रकार तुम्हे यह कार्य करना चाहिए | उम्र में - मैं बड़ा हूँ और तुम्हें मेरी आज्ञा माननी चाहिए या में छोटा हूँ और यह नहीं कर सकता हूँ | रोना, हिंसा, धमकी एवं अन्य दूसरे व्यवहार दूसरों को निशाना बनाते हैं और उनपर अपनी इच्छाओं को थोपते हैं | कोई कार्य जो इस प्रकार दूसरों पर थोपा जाता है , दीघ्रकालीन एक सकारात्मक परिणाम नहीं देगा |
                                
इस बात को समझना चाहिए कि अतीत परिवर्तित नहीं किया जा सकता है और लोग बदलते नहीं हैं , आओ हम लोग जीवन में यथार्थवादी लक्ष्य बनाएं | एक बार हम लोगों को उनकी क्ष्रमताओं एवं कमजोरियों के साथ स्वीकारते हैं, हम अधिक अच्छी तरह से प्रत्येक परिस्थिति में परिणामों का आकलन करने में सक्षम होंगे | व्यक्ति की क्ष्रमताओं पर प्रकाश डालना सीखें लेकिन उसकी कमजोरियों के विरुद्ध अपने आधार को सुरक्षित करना सीखें और जब परिणामों में लघु परिपथ होता है, हम निराश होने के बजाय अधिकाधिक उचित तरह से संतुलन बनाये रखने में एवं स्वीकार करने में सक्षम होंगे | जब हम दूसरों से जुड़ने के दौरान व्यवहार एवं परिणामों में छोटे-२ और अधिक से अधिक यथार्थवादी लक्ष्य बनाते हैं, यह नियमित रूप से सकारात्मक परिणाम देता है | जब एक सफल व्यावहारिक ढंग स्थापित होता है अधिक शांति, प्रसन्नता एवं संबंधों में पूर्णता आती है | जब लोगो के विचारों को समझें, हमें अधिक प्रिय नामों एवं संगठनों के साथ अपने मस्तिष्क में उन्हें पुनर्स्थापित करना चाहिए | अपने पिता को " तानाशाह " न कहें | जब आप उनके बारे में सोंचे उन्हें "डेडी " उसी प्यार से पुकारें जो आप रखते थे जब आप बच्चे थे | उनके कल्याण के लिए प्रार्थना करें | और आप स्वयं को उनके साथ एक सुधरे हुए मानसिक सम्बन्ध में पाएंगे | यह उनके साथ एक सुधरे हुए सम्बन्धों में आभासित करेगा |
                                
स्वयं में या दूसरों में यह बदलाव स्थापित करना आसान नहीं होता है | लेकिन आप स्वयं पर थोडा सा नियंत्रण रखते हैं | स्वयं को , अपने विचारों , शब्दों या आचरणों को नियंत्रित करने में कुंठा को ना आने दें | अपने स्वयं के जीवन पर नियंत्रण रखें और किसी को स्वयं पर दबाव बनाने के लिए या नकारात्मक प्रतिक्रियाओं में हेर फेर करने छूट न दें | अपने विचारों एवं प्रतिक्रियाओं पर नियंत्रण रखें एवं अपनी व्यक्तिगत शक्ति को पकड़े रखें | आपको विचार करना एवं निर्णय लेना चाहिए जो आप सोंचना एवं अनुभव करना चाहते हैं |
                             
जब आप सीता राम मंत्र का जाप करते हैं, मंत्र की तरंगे आपको आवश्यक इच्छा शक्ति, समझ , योग्यता आत्मनियंत्रण का अभ्यास करने में प्रदान करेंगी | विशेष परिस्थितियों में भी आप अपने प्रसन्नचित्त को नहीं खोएंगे और वैसा ही व्यवहार करेंगे जैसा कि आप सामान्यतः करते हैं | सीता राम मंत्र की तरंगे आपके चारों ओर एक सुरक्षा कवच बनायेंगी और आप दूसरों के क्रोधयुक्त तरंगों से प्रभावित नहीं होंगे | तब आपकी प्रतिक्रियाएं वैसी ही होंगी जैसा कि आप उसे होने देना - आध्यात्मिक रूप से विकसित हुआ चाहते हैं |