Amrit Dhara - Dhyanyogi Omdasji

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शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

रसोई घर का सहायक जो एक गुरु बना

गुरु अपने सभी शिष्यों को सामान रूप से प्रेम करते हैं एवं मार्गदर्शन देते हैं । लेकिन सभी शिष्य समान रूप से ग्रहणशील नहीं होते हैं । केवल वही शिष्य जो गुरु के प्रति महान प्रेम, निष्ठा विनयशीलता रखते हैं, गुरु की कृपा के लिए ग्रहणशील होते हैं । मात्र शास्त्रों का अध्यन करना एवं प्रार्थना करना एक अच्छा शिष्य नहीं बनाता है । पूर्ण विश्वास एवं अनुशासन एक शिष्य की पात्रता को परिभाषित करता है ।
                    
सिख गरू गुरु नानक के वंश में गुरु रामदास थे । वे चौथे सिख गुरु थे । उनके कई शिष्य थे जो उत्तम एवं योग्य के रूप माने जा सकते थे । सभी शिष्य अपने नियमित कार्य को करने और गुरु के प्रवचन में भाग लेने के लिए जाते थे । उनका (गुरु का ) का सबसे छोटा पुत्र अर्जनदेव भी एक शिष्य था । गुरु रामदास ने उसे रसोई घर में काम करने का तथा बर्तन साफ़ करने का नियत कार्य दिया था । अर्जन देव ने पूरे समर्पण के साथ गुरु सेवा की । उसने कभी भी प्रश्न नहीं किया कि उसे ही क्यों इस निम्न कार्य को करने के लिए कहा जाता था । गुरु का रसोई घर सदैव खुला रहता था और जो कोई भी किसी भी समय आता था उसे गर्मागर्म भोजन परोसा जाता था । अर्जन देव सदैव बर्तनों को  साफ करने में ही व्यस्त रहते थे ।
                                     
दूसरे शिष्य अर्जनदेव के निम्न कार्य के बारे में विचार करते थे । वे उसे चिढ़ाते थे । उन्होंने कहा : अर्जन बर्तनो को माजना बंद करो और आओ तथा प्रवचनों में भाग लो । तुम अपने वर्तमान क्रियाकलाप से गुरु को प्रसन्न नहीं कर सकते हो । आओ तथा दूसरी गुरु सेवा करो । तब तुम गुरु को प्रसन्न रख सकते हो । अर्जन देव ने उत्तर दिया : मेरा कर्तव्य गुरु कि आज्ञा मानना है । मैं अन्य कार्य को करके उन्हें प्रसन्न करने का लक्ष्य नहीं रखता हूँ ।
                               
दूसरे शिष्यों ने सबकुछ अर्जनदेव पर छोड़ दिया एवं उसे अकेला छोड़ दिया । गुरु अर्जनदेव से उसके प्रेम ,निष्ठा और आज्ञाकारिता के कारण बहुत प्रेम करते थे । समय गुज़रता गया । गुरु एवं अन्य शिष्य प्रवचनों, धार्मिक सभाओं एवं अन्य कार्यों में व्यस्त थे । तभी एक शिष्य को गुरु के कार्यों को करने के लिए लाहौर भेजने की आवश्यकता हुई । दूसरे शिष्यों ने अर्जनदेव को भेजने की गुरु से याचना की । वे अर्जनदेव को मार्ग से भ्रमित करना चाहते थे और प्रत्येक शिष्य गुरु का अगला उत्तराधिकारी होना चाहता था । अर्जनदेव ने शान्तिपूर्वक गुरु की उक्ति को स्वीकार किया और लाहौर चला गया । उसे अपने गुरु की कमी अत्यधिक महसूस हुई और उसने दो पत्र गुरु को लिखे । आश्रम में अन्य शिष्यों ने पत्रों को छुपा दिया । जब तीसरा पत्र आया गुरु ने उसे देखा । वे समझ गए कि अर्जनदेव ने भी पहले भी उन्हें लिखा है एवं दूसरे शिष्यों ने उसे छिपाने कि साजिश की है । अर्जनदेव के प्रेम एवं निष्ठा को देखकर उन्होंने उसे लाहौर से वापस बुलाया एवं उसे अपने उत्तराधिकारी के रूप में घोषित किया ।
                           
पूर्ण निष्ठा एवं आज्ञाकारिता जो अर्जनदेव अपने गुरु के प्रति रखते थे " उन्हें अन्य दूसरे शिष्यों के अपेक्षाकृत जो गुरु से भौतिक रूप से अधिक निकट थे और शायद शास्त्रों से अच्छी तरह से अवगत थे उनके (गुरु के ) उत्तराधिकारी के रूप में चुना । गुरु अर्जनदेव एक महान गुरु हुए । वे ईश्वरीय भक्ति, निःस्वार्थ सेवा और सार्वभौमिक प्रेम का अवतार थे । उन्होंने समाज के कल्याण के लिए योगदान दिया । उन्होंने अमृतसर में स्वर्ण मन्दिर का निर्माण कराने में महती भूमिका निभायी । उन्होंने पूर्व गुरुओं की शिक्षाओं को एकत्रित एवं संकलित किया एवं उसे गुरु वाणी का नाम दिया । उन्होंने गुरु वाणी को स्वर्णमन्दिर में स्थापित किया । वे अपने सिद्धांतो पर अडिग रहे जिसमे उन्होंने विश्वास किया और अन्त में उन्होंने अपने जीवन का बलिदान कर दिया मानव जाति के इस इतिहास में अनूठा बलिदान प्राप्त कर लिया ।
             
जब रसोईघर ने उनके गुरु के आशीर्वाद को प्राप्त करने में सहायता प्रदान की, वे वंश के महानतम गुरुओं में से एक में परिवर्तित हो गए ।