"ध्यानमूलम गुरु मूर्ति , पूजा मूलम गुरुर पदम् ,
मंत्र मूलम गुरुरवाक्यम, मोक्ष मूलम गुरुकृपा " - गुरु गीता
गुरु के स्वरुप का अवलोकन करते हुए ध्यान कीजिये । गुरु के चरणकमलों में समर्पित होकर पूजा को सीखिए । गुरु द्वारा बोला गया प्रत्येक शब्द एक मंत्र होता है और प्रबोधन बल्कि गुरु की असीम अनुकम्पा होती है ।
गुरु गीता की ये पंक्तियाँ पूर्णतयः गुरु के प्रति प्रेम तथा प्रशंसा की उद्घोषणा हैं । गुरु शिष्य को सर्वॊच्च का अनुभव करने में उसे सहायता प्रदान करता है । महाराष्ट्र में एक साधु नामदेव की कथा गुरु की महत्ता की व्याख्या करती है।
नामदेव अपने जीवन में असामान्य कृपा रखते थे । पंढरपुर के भगवान् विट्ठल (कृष्णा )उनके द्वारा समर्पित आहार को ग्रहण करने हेतु नामदेव के सम्मुख भौतिक स्वरुप में प्रकट हो जाया करते थे । नामदेव भगवान् से ऐसे बात करते थे जैसे कि हम लोग एक दूसरे से बात करते हैं । भगवान् उनके द्वारा गाये गए भजनों पर नृत्य भी किया करते थे । वे अपने समय के महान साधु माने जाते थे । एक बार कुम्हार संत - गोरा के आवास पर एक जन समारोह था । उस समय के सभी प्रसिद्द साधु उपस्थित थे - ज्यानानेश्वर निवृत्ति, सोपान, मुक्ताबाई एवं अन्य दूसरे । ज्यानानेश्वर ने गोरा कुम्हार से कहा कि वे निरिक्षण करे कि सभी बर्तन अच्छी तरह से पक गए हैं । गोरा समझ गए एवं उन्होंने अपनी छड़ी उठाई तथा वहां बैठे हुए सभी साधुओं के सिर पर प्रहार किया ठीक उसी प्रकार जैसे वे अपने मिटटी के बर्तनों को ठीक तरह से पके हुए देखने के लिए निरीक्षण करते थे । किसी ने एक शब्द भी नहीं कहा । लेकिन नामदेव ने रोषपूर्ण शब्दों के साथ आपत्ति की । छडी से सिर पर इस प्रहार से प्रहार करना उन्हें पसंद नहीं आया । मुक्ताबाई ने टिप्पणी की यह बर्तन ठीक तरह से नहीं पका है । नामदेव क्रोधित हुए एवं उन्होंने आवेश में समूह को छोड़ दिया तथा सीधे विट्ठल के मन्दिर में गए । जब उन्होंने पुकारा भगवान् प्रकट हुए और उन्होंने भगवान् से शिकायत की । उन्हें आराम देने के बजाय, भगवान् ने उनसे कहा :- वह व्यक्ति जिसने गुरु के प्रति समर्पण नहीं किया है एवं गुरु से दीक्षा नहीं ली है, वह अधूरा होता है । राम के रूप में मैं संत वशिष्ठ के प्रति समर्पित हुआ हूँ एवं उनसे अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया है । कृष्ण के रूप में मैं संत सान्दिपनि के आश्रम में गया एवं उनसे दीक्षा ग्रहण की । गुरु विसोबा के पास जाओ । तुम उन्हें मल्लिकार्जुन के शिव मन्दिर में पाओगे कृपया उनके पास जाओ एवं उनसे दीक्षा लो । यही तुम्हे पूर्ण करेगा । गुरु के श्री चरणों में शरण लेने के अतिरिक्त पूर्ण होने का कोई अन्य मार्ग नहीं है ।
इसलिए उनके पास कोई विकल्प नहीं था । नामदेव मल्लिकार्जुन के मन्दिर में गए एवं उन्होंने गरु का अवलोकन किया । विसोबा शिवलिंग के ऊपर चरण रखकर सो रहे थे । नामदेव स्तब्ध हुए एवं उन्होंने कहा :- मैंने सुना है कि आप एक महान साधु हैं, फिर भी आप ऐसा आचरण कर रहे हैं ? विसोबा ने उत्तर दिया :- मैं एक बूढा व्यक्ति हूँ । मेरे पास शिवलिंग से पैर हटाने की शक्ति नहीं है । कृपया इसे कहीं भी रख दीजिये तथा उत्तम कार्य को करने के लिए पुरस्कृत होइये । नामदेव ने विसोबा के पैर को खींचा तथा उन्हें दूसरी जगह रख दिया । और तभी अचानक शिवलिंग भूमि से निकल आया एवं बूढ़े व्यक्ति के चरणों को सहारा दे दिया । क्रोधित एवं सशंकित , नामदेव ने बूढ़े साधु के चरणों को उठाया एवं उसे अन्य दूसरे स्थान पर रख दिया । और प्रत्येक जगह एक शिवलिंग विसोबा के चरणों को सहारा देने के लिए निकल जाता था । नामदेव ने अनुभव किया कि विसोबा एक महान गुरु हैं एवं वे उनके चरणों में गिर गए तथा स्वयं को शिष्य बनाने की याचना की । वे समझ गए कि शिवलिंग का चमत्कार स्थान ले लेता था क्योंकि विसोबा शिवलिंग से एकाकार थे एवं जहाँ विसोबा उपस्थित थे - शिव उपस्थित थे ।
नामदेव विसोबा के साथ ठहरे एवं उन्होंने अपने गुरु से अध्यात्मिक अभ्यासों को सीखा । उन्होंने अनुभव किया कि सत्य उनके अन्दर है तथा उनके चारों ओर है । उन्होंने स्वयं को विट्ठल के रूप में तथा संसार को उसी ईश्वर के रूप में अपने चारों ओर देखा। जब वे पंढरपुर वापस आये, एक भोज का आयोजन हो रहा था । नामदेव भी भोजन के लिए नीचे बैठ गए । भकरी- अनाज ज्वार की बनी हुई एक रोटी जो घी के साथ परोसी गई थी जो पत्तियों से बने एक प्याले में रखी हुई थी । एक कुत्ता आया और उसने नामदेव के पत्तल से भकरी को झपट लिया तथा भागा । नामदेव ने घी का प्याला उठाया तथा कुत्ते के पीछे दौड़ पड़े । वे चिल्लाये :-ओ विट्ठल ऐसी भकरी को मत खाओ । यह बहुत सख्त एवं सूखी हुई है । मुझे इसे घी में भिगो लेने दो एवं आपको प्रदान करने दो । तब इसका स्वाद बेहतर होगा ।
नामदेव इस सत्य को जान गए थे कि सभी प्राणी उनके भगवान् विट्ठल के स्वरुप थे । इसलिए वे कुत्ते के पीछे भागे तभी उन्होंने घी में भिगोई हुई भकरी को खिलाने के लिए अपने ईश्वर को सामने देखा । बाद में जब वे भगवान् विट्ठल से मिले एवं उनको गले लगाया, भगवान् ने शिकायत की :- अपने गुरु को पाने के उपरान्त, तुम्हारे पास मेरे लिए समय नहीं रहा । नामदेव ने उत्तर दिया :- मैंने अज्ञानता पर काबू प्राप्त कर लिया है एवं मैं आपको अपने गुरु से प्रथक नहीं देखता हूँ । आप दोनों एक हैं और विट्ठल ने टिप्पणी की : बर्तन अब पक गया है ।
यद्दपि नामदेव ने भगवान से वार्तालाप की एवं उन्हें अपने हाथों से खिलाया भी था, फिर भी उनका अनुभव अधूरा था क्योंकि उनके पास एक गुरु नहीं था उन्हें शिक्षित करने के लिए कि कैसे अज्ञानता पर काबू पाया जा सकता है एवं सभी प्राणियों को ईश्वर के रूप में देखा जा सकता है । यही वह कारण है कि एक गुरु की क्यों आवश्यकता होती है ।