गुरु हमारे अन्दर होते हैं । गुरु को बाहर क्यों ढूंढा जाये ? इन दिनों इन्टरनेट, प्रिंट मीडिया एवं दूसरे प्रकार के मीडिया में सामान्यतः यह वक्तव्य प्रकाशित होता है । जो इन वक्तव्यों को कहते हैं, वे चाहते हैं कि सभी लोगों द्वारा निर्बाध रूप से उनके वक्तव्य को स्वीकार किया जाए । वे यह भी चाहते हैं कि गुरु के रूप में उनके अनुयायियों द्वारा उन्हें स्वीकारा जाय । क्योंकि वे सिखाते हैं कि गुरु अन्दर होता है ।
वक्तव्य 'गुरु स्वयं में होता है ' वास्तव में सत्य है । निश्चित रूप से गुरु स्वयं में होता है । एक निश्चित सीमा बाद आन्तिरिक गुरु विद्द्यार्थी की सहायता करता है । लेकिन इस आन्तिरिक गुरु तक पहुँचना अत्यन्त कठिन है । ईश्वर मौलिक गुरु होते हैं । केवल ईश्वर ईश्वर को जानते हैं । इस प्रकार ईश्वर गुरु का स्वरुप माने जाते हैं एवं उन्हें सर्वोच्च शक्ति के बारे में बताने एवं मार्गदर्शन देने के लिए मानव समाज के बीच में पैदा होते हैं ।
ईश्वर स्वयं में होते हैं । हम लोगों ने इसे पढ़ा है तथा इसके बाते में बताया है । फिर भी हमलोग क्यों ईश्वर को महसूस करने में सक्षम नहीं होते हैं जो हमलोगों के अन्दर होता है । यह इस कारण होता है कि इस सत्य के बारे में सुनना या पढना अपने अन्दर के इस सत्य को अनुभव करने से कुछ भिन्न होता है । जब हम इस सत्य को जान जाते हैं कि ईश्वर स्वयं में है और उसका उन तरीकों से अनुभव करते हैं जो हमे पूर्णतयः प्रेरित कर रहे होते हैं, तब हम अपने अन्दर ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करने तथा अपने चारों ओर ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करने में सक्षम हो जायेंगे । इस उदाहरण से समझें
एक व्यक्ति को मक्खन की सख्त आवश्यकता थी । उसने अपने पड़ोसियों से कुछ मक्खन देने के लिए कहा । किसी ने उसे मक्खन नहीं दिया । तब किसी ने उससे कहा : तुम अपने घर पर एक गाय रखो । तुम स्वयं से मक्खन क्यों नहीं तैयार करते हो ? मैं तुम्हे बताऊंगा कि इसे कैसे तैयार करना है । वह व्यक्ति इस बात को नहीं जानता था कि मक्खन गाय के दूध से तैयार किया जाता है । उसने दूसरे व्यक्ति से इस विधा को सीखा कि दूध से कैसे मक्खन निकाला जाता है तथा मक्खन की पर्याप्त मात्रा को प्राप्त किया।
हम उपरोक्त उदाहरण के उस व्यक्ति की तरह होते हैं । उसके पास गाय थी, उसके पास दूध था । लेकिन वह नहीं जानता था कि दूध से क्रीम को कैसे प्रथक करना है एवं उसे मथना है । उसे उस व्यक्ति से इस विधा को सीखना पड़ा जो उसे जानता था । हमें इस ज्ञान को प्राप्त करने की आवश्यकता होती है कि स्व में निहित इस वास्तविकता (ईश्वर स्वयं में है ) को कैसे प्रथक (स्वयं से अनुभव करना है ) करना है । हमें इस सत्य को गुरु से सीखने की आवश्यकता होती है । हमें अपने अन्दर जाने के लिए और मस्तिष्क को स्थिर करने के लिए गुरु के स्पर्श एवं ज्ञान की आवश्यकता होती है । हमें अपने अन्दर स्वयं का मंथन करने के लिए एवं आत्मसाक्षात्कार के रूप में मक्खन को प्राप्त करने के लिए गुरु से ये अध्यात्मिक विधाओं को सीखने एवं अभ्यास करने की आवश्यकता होती है । हम सब मक्खन - स्वयं में ईश्वर /गुरु की उपस्थिति लिए हुए हैं लेकिन यह नहीं जानते हैं कि स्व का कैसे मंथन करना है और मक्खन ( स्वयं में विराजमान गुरु / ईश्वर ) की उपस्थिति का स्पष्टीकरण ) को कैसे प्राप्त करना है । इसलिये हमें आन्तिरिक गुरु का अनुभव करने के लिए वाह्य गुरु की आवश्यकता होती है ।
समय तथा किये गए प्रयत्नों के साथ-2 किसी भी प्रकार का ज्ञान अर्जित किया जा सकता है । यह सांसारिक या अध्यात्मिक ज्ञान हो सकता है । लेकिन इसे अर्जित करने में बहुत अधिक समय लगता है एवं आधिकाधिक प्रयत्न स्वयं द्वारा करना पड़ता है । हमें उचित मार्ग में उचित कार्य को सीखने से पूर्व कई कार्य प्रणालियों एवं विधाओं को सीखना पड़ता है । यह एक गुरु से सीखना अत्यधिक सरल होता है जो ज्ञान एवं अनुभव रखते हैं । गुरुओं ने अपने गुरुओं से इसे सीखा है और ये ज्ञान आदि अनादि काल से प्रदान किये समय के साथ समुचित एवं मिलते जुलते परिणामो को देने के लिये प्रमाणित किये गए हैं । एक सक्षम गुरु से सीखकर हम समुचित ज्ञान प्राप्त करते हैं एवं अल्प समय में ही उचित कार्य प्रणालियों को सीखते हैं । स्वयं से सीखने में बहुत अधिक समय लगता है । तथा समय के साथ हमने विशेष रूप से आध्यात्मिकता के मार्ग में विभिन्न तकनीकों का प्रयोग किया है एवं प्रमाणित किया है । प्राप्त की गई एक तकनीक जो हमें संतोषजनक परिणाम देती है,हम स्वयं एवं शक्ति का बहुत बड़ा हिस्सा खो देंगे तथा अपने समय की समाप्ति से पूर्व अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उसे ( तकनीक को ) पाना कठिन होगा ।
राम, कृष्ण और महान साधुओं की तरह अवतारों ने भी गुरुओं को रखा था । राम ने अपने ज्ञान एवं अध्यात्मिक अच्छाइयों का सम्पूर्ण क्ष्रेय अपने गुरुओं को दिया । एक अवतार के रूप में वे इस संसार में सम्पूर्ण ज्ञान स्वयं द्वारा सीखे हुए आ सकते थे । लेकिन वे गुरु की आवश्यकता एवं महत्ता को संसार को दिखाने के लिए गुरु वशिष्ठ के पास गए । बाद में उन्होंने गुरु विश्वामित्र तथा ऋषि अगस्त्य से ज्ञान अर्जित किया । कृष्ण गुरु सान्दीपनि के पास गए एवं ज्ञान अर्जित किया । गुरु की भूमिका एवं उनकी महानता का वर्णन गुरु गीता में किया गया है । गुरु गीता भगवान् शिव एवं उनकी शक्ति पार्वती देवी के बीच एक वार्तालाप है । इसमें भगवान् शिव ने गुरु की आवश्यकता, उनकी शक्ति एवं गुरु का कैसे अनुसरण करना है के बारे में वर्णन किया है ।
बहुत कम व्यक्ति स्वयं से अपने अन्दर के गुरु को समझने की योग्यता रखते हैं । स्वयं का गुरु एक रहस्य रहता है जब तक कि तीसरा नेत्र या ज्ञान चक्षु नहीं खुल जाते हैं । हमें अपने तीसरे नेत्र या ज्ञान चक्षु को खोलने में सहायता के लिए एक गुरु की आवश्यकता होती है । बहुत सावधानी से गुरु का चयन करें । तब बिना शर्त के उनकी शिक्षाओं का अनुसरण करें । आपका जीवन परिवर्तित हो जाएगा और आप इस संसार में शान्ति एवं आनन्द से रहेंगे तथा अंततः सर्वोच्च परमानन्द के साथ एकाकार हो जायेंगे ।