परमेश्वर के तीन
मुख्य कार्य होते
हैं :- निर्माण, भरण पोषण
एवं विनाश | ये
क्रियाकलाप सनातन हैं | हिन्दू
धर्म में ईश्वर
के ये कार्य
भगवान् ब्रह्मा - निर्माणकर्ता, भगवान्
विष्णु - पालनकर्ता, भगवान् शिव
- विनाशक के रूप
में नामांकित किये
गए हैं | एक
समय था जब
ईश्वर के ये
तीन स्वरुप मानव
जाति की अगुवाई
करने के उद्देश्य
से ईश्वर को
पुनः पृथ्वी पर
प्रकट करने के
लिए एकाकार हुए
थे | यह अवतार
दत्तात्रेय नामक था
| वे योगाचार्य थे
| वे आदि गुरु
थे या नाथ
एवं परमगुरु दोनों
के रूप में
पूजे जाते थे
|
दत्तात्रेय
ने हमें सचेत
होना एवं सतर्कता
से रहना सिखाया
| वे सत्य में
रहे तथा सत्य
को सिखाया | जैसे
ही वो जीवन
की ओर अग्रसर
हुए, उन्होंने बहुत
सी बातों का
अवलोकन किया एवं
सीखा | दत्तात्रेय २४ गुरुओं
को बताते हैं
जिनसे उन्होंने महत्वपूर्ण
शिक्षा ग्रहण की : पृथ्वी,
हवा / साँस, आकाश,
अग्नि, सूर्य, कबूतर, अजगर,
समुद्र, कीट पतंग,
हाथी, चीटी, मछली,
पिंगला- वैश्या, तीर- रचनाकार,
शिशु, चंचल लड़का,
चंद्रमा, मधुमक्खी, हिरण, शिकारी
पक्षी, अपरणीता, सर्प, मकड़ी,
इल्ली और जल
|
दत्तात्रेय
ने अपने चारों
ओर सजीव एवं
निर्जीव वस्तुओं से ग्रहण
किया एवं सीखा
| वे उनके गुरु
थे | पृथ्वी से
उन्होंने धैर्यवान होना सीखा,
हवा से उन्होंने
इस संसार में
दुःख तथा सुख
से प्रभावित हुए
बिना रहना सीखा
जैसे कि हवा
अच्छी एवं बुरी
गंध से छुटकारा
पा जाती है
जब वह बहती
है | स्वयं में
शुद्ध एवं अनासक्त
होना उन्होंने आकाश
से सीखा जो
बादलों से प्रभावित
नहीं होता है
; अग्नि से उन्होंने
सीखा कि वह
प्रत्येक चीज़ को
एक समान राख
में जला देती
है ठीक उसी
तरह जैसे एक
आत्मसाक्षात्कार प्राप्त व्यक्ति प्रकट
रूपों तथा संपत्तियों
को माया के
रूप में नकार
देता है और
अपने मूल स्वरुप
को जान जाता
है ; सूर्य से
उन्होंने सीखा जो
प्रकृति में कई
स्वरूपों को हमारे
दृष्टिगोचर के लिए
उजागर कर देता
है ठीक उसी
प्रकार जैसे एक
साधु जो अपने
शिष्यों के लिए
सभी वस्तुओं की
वास्तविक प्रकृति को उजागर
कर देता है
; कबूतरों के परिवार
से उन्होंने सीखा
जो आसक्ति के
कारण एक दूसरे
के लिए अपना
जीवन त्याग देते
हैं शिक्षा यह
है कि हमें
अधिकार की भावना
के मकड़जाल में
जकड़े नहीं रहना
चाहिए एवं स्वयं
का अध्यात्मिक विनाश
नहीं करना चाहिए
|
उन्होंने अजगर से
सीखा जो एक
स्थान में पड़ा
रहता है तथा
जो कुछ भी
वह पाता है
पकड़ता एवं खाता
है, एक मनुष्य
को ज्ञान की
खोज में सुख
के पीछे भागने
से प्रथक रहना
चाहिए , और जो
कुछ भी वह
अनायास पाता है,
संतोष के साथ
स्वीकारना चाहिए ; समुद्र से
उन्होंने सीखा कि
जो सभी नदियों
का पानी लेता
है लेकिन १
इंच भी ऊपर
नहीं उठता, उन्होंने
सीखा कि प्रसन्नता
से बहुत उछलना
तथा जीवन के
अवसाद से ग्रस्त
नहीं होना चाहिए
; कीट पतंगों से
जो अग्नि में
उछल जाते हैं
एवं जल जाते
हैं , उन्होंने ज्ञान
की अग्नि में
कूदना और माया
रुपी जीवन को
जलाना सीखा ; चींटी
से जो बिना
थके भोजन के
संग्रह हेतु कार्य
करती है, उन्होंने
उदाहरण देखा कि
कैसे बाधाओं पर
काबू पाया जाता
है और बिना
थके आत्मसाक्षात्कार की
ओर कार्य करना
है ; मछली से
जो कीड़े के
कारण काँटे में
फँस जाती है
, उन्होंने सीखा कि
स्वादिष्ट भोजन की
लालसा में फंसे
नहीं रहना चाहिए
और इस प्रकार
स्वाद पर नियंत्रण
रखना चाहिए |
पिंगला वेश्या अपनी
दिव्य भावना को
नकारती है तथा
अपने जीवन को
सांसारिक आनन्दों में बर्बाद
करती है, जब
अपनी भूल जान
जाती है तथा
पश्यताप करती है
; ठीक उसी प्रकार
एक बुद्धिमान मनुष्य
को समझना चाहिए
कि भौतिक वस्तुओं
का आत्मत्याग अनंत
आनन्द को साकार
करने का मार्ग
दिखलाता है ; तीर
निर्माता से जो
अपने कार्य में
इतना तल्लीन था
कि उसने जाते
हुए जुलूस पर
ध्यान नहीं दिया,
उन्होंने सीखा कि
हमें आत्मसाक्षात्कार पर
एकल विचारयुक्त होकर
ध्यान केन्द्रित करना
सीखना चाहिए ; चंचल
लड़के जो किसी
चीज़ की परवाह
नहीं करता है
लेकिन स्वयं में
प्रसन्न रहता है,
उन्होंने सीखा कि
ठीक उसी तरह
एक बुद्धिमान व्यक्ति
स्वयं में प्रसन्न
रहता है ; चंद्रमा
से उन्होंने सीखा
जो सूर्य के
प्रकाश से प्रकाशित
होता है , ठीक
उसी तरह जैसे
हमारी आत्मा ईश्वर
के प्रकाश से
प्रकाशित होती है
; मधुमक्खी से उन्होंने
सीखा जो केवल
फूलों का मधु
चूसती है , ठीक
उसी तरह सभी
पवित्र ग्रंथों को पढ़कर
केवल चित्त में
वही रखना चाहिए
जो हमारी आध्यात्मिक
अभ्यासों के लिए
आवश्यक हो ; हिरण
से उन्होंने सीखा
जो संगीत से
पकड़ा जाता है
उसी प्रकार एक
आध्यात्मिक आकांक्षी जो एक
धर्म निरपेक्ष संगीत
की कमजोरी रखता
है उसी के
द्वारा पकड़ा जाता
है |
शिकारी पक्षी से
उन्होंने सीखा जो
अन्य पक्षियों के
आक्रमण से बचने
के लिए मरे
हुए चूहे को
छोड़ देता है
- ठीक उसी तरह
एक बुद्धिमान व्यक्ति
को शांति में
रहने के लिए
सांसारिक इच्छाओं से छुटकारा
पा जाना चाहिए
; एक अविवाहिता से
उन्होंने सीखा जो
हाँथ में एक
चूड़ी के अतिरिक्त
बाकी सभी से
अछूती रहती है
इसलिए कि अफवाहें
न उड़े ठीक
उसी तरह एक
बुद्धिमान व्यक्ति एकांत में
रहता है ताकि
वह अफवाहों एवं
गपशपों से मुक्त
रह सके एवं
एकाग्रचित्त होकर साधना
कर सके ; साँप
से उन्होंने सीखा
जो केचुल छोड़
देता है जब
नवीन शरीर तैयार
होता है - ठीक
उसी प्रकार मृत्यु
के समय , एक
बुद्धिमान व्यक्ति अपने शरीर
का पुराने वस्त्रों
को त्यागने की
भांति त्याग कर
देता है एवं
एक नवीन शरीर
धारण कर लेता
है ; मकड़ी से
उन्होंने सीखा जो
जाला उगलती है
तथा जाला बुनती
है बाद में
जाला को स्वयं
में खींच लेती
है ठीक उसी
प्रकार परमात्मा स्वयं से
ब्रह्मांड का निर्माण
करते हैं और
उसे प्रलय के
समय स्वयं में
समाहित भी कर
लेते हैं ; कमला
से उन्होंने सीखा
जो ततैया की
भनभनाहट करने पर
केन्द्रित है और
अंत में एक
ततैया हो जाता
है ठीक उसी
प्रकार शिष्य का ध्यान
गुरु के आकर्षण
तथा गुणों पर
केन्द्रित होता है
वह भी गुरु
की तरह हो
जाता है ; जल
से उन्होंने सीखा
जो सभी को
उनकी प्यास बुझाने
के लिए परोसा
जाता है और
फिर भी वह
ऊपर से नीचे
की ओर बहता
है - ठीक उसी
प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति सभी
की सेवा करता
है और फिर
भी विनम्र तथा
ईश्वर का एक
सेवक रहता है
|
दत्तात्रेय सभी परम्पराओं
के श्रोत हैं
और उन्होंने सभी
अध्यात्मिक मार्गों को अपनाया
| उन्होंने सत्य धर्म
की सार्वभौमिकता को
फैलाया | जब हम
सत्य के मार्ग
पर चलते हैं
, हम दत्तात्रेय के
मार्ग पर चलते
हैं | हम किसी
धर्म या सम्प्रदाय
से सम्बंधित हो
सकते हैं , परन्तु
हमें अंततः दत्तात्रेय
के मार्गदर्शन के
तहत आना होगा
जो समस्त मानव
जाति के गुरु
हैं | वे मानव
एवं देवत्व के
मध्य एक कड़ी
हैं |